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सोनी सोरी और बेला भाटिया: संघर्ष-ग्रस्त बस्तर में आदिवासियों-महिलाओं के लिए मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली योद्धा
भारत की सामूहिक उदासीनता ने आदिवासियों के अधिकारों को कुचलने वालों के प्रतिरोध में कुछ साहसी लोगों को खड़ा करने का काम किया है, और उनमें सबसे उल्लेखनीय दो महिलाएं हैं- सोनी सोरी और बेला भाटिया।
सौरव कुमार
10 Mar 2022
SONI SORI
बेला भाटिया और सोनी सोरी (फोटो- द वायर)

मध्य भारत का छत्तीसगढ़ भूगोल का वह टुकड़ा है जिसे माओवादी चरमपंथियों और सुरक्षा बलों के द्वारा बुरी तरह से नोच-खरोंच दिया गया है। “महिला दिवस” को दुनिया भर में बड़ी धूमधाम से मनाया गया, लेकिन दंडकारण्य के घने जंगलों में आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाली दो महिला कार्यकर्ताओं की अथक यात्रा को तथ्यात्मक रूप से दोहराए बिना इसे अधूरा ही कहा जा सकता है।

सोनी सोरी और बेला भाटिया, दो ऐसी मानवाधिकार योद्धा हैं, जिन्हें आदिवासी समुदायों के लिए मजबूत स्तंभ और संकट प्रबंधन के तौर पर माना जाता है, जिनकी जिंदगी हमेशा बंदूक की नली के सामने झूलती रहती हैं, वो चाहे राज्य पुलिस हो, या केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) हो या बागी माओवादी हों।

भारत की सामूहिक उदासीनता ने कुछ ऐसे समूहों या व्यक्तियों को खड़ा करने का काम किया जिन्होंने आदिवासियों के बुनियादी अधिकारों का गला घोंटने के प्रयासों का प्रतिरोध किया। सोनी सोरी जो कि दंतेवाड़ा की एक कोया जनजाति से संबद्ध हैं, को अपनी स्कूल अध्यापिका की नौकरी तब छोड़नी पड़ी, जब उन्होंने पुलिस का मुखबिर बनने से इंकार कर दिया था और माओवादियों के साथ उनके संपर्क होने के आरोपों के साथ सुरक्षा बलों के द्वारा उन्हें जबरन चुन लिया गया। उनके परिवार के सदस्यों को मनमाने तरीके से प्रताड़ित किया गया। 2011 में, सोरी को माओवादियों की ओर से एक प्रतिष्ठित औद्योगिक समूह से जबरन वसूली के आरोपों सहित राजद्रोह एवं कई अन्य आरोपों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया था।

जिस सीमा तक अभियोजन, हिरासत में यातना, और यौन उत्पीड़न का उन्हें सामना करना पड़ा है, वह मानवाधिकारों के उल्लंघन के सबसे जघन्यतम प्रकरणों से एक बना रहने वाला है और संभवतः यह भारत के सबसे खूंखार क्षेत्र में से एक में मानवाधिकार रक्षक के तौर पर खड़े होने के लिए उकसाने वाला बिंदु रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा निर्देशित जांच में पाया गया कि पुलिस हिरासत में रहते हुए सोनी सोरी के साथ जिस प्रकार की शारीरिक प्रताड़ना हुई थी, वह राज्य प्रायोजित बर्बरता का एक पारदर्शी प्रतिबिंब था। व्यवस्था की सबसे भयानक शिकार होने से लेकर आदिवासी महिलाओं के अधिकारों की रक्षक के तौर पर, इस बदलाव में सोरी अडिग खड़ी रही हैं। 

सोरी के परिवार को न तो पुलिस वालों ने और न ही माओवादियों ने बख्शा। 2012 में, यह देखने को मिला कि माओवादियों ने उनके सगे-संबंधियों को तीन वर्षों के लिए भूमि पर खेती करने से प्रतिबंधित करने का फरमान जारी किया था।

दंतेवाड़ा में अपने पिता मुंद्रा राम के साथ सोनी सोरी

बस्तर के साथ अपने रिश्ते के बारे में बताते हुए उन्होंने उन दिनों को याद किया जब माओवादियों के द्वारा उनके परिवार पर भयानक हमले किये गए थे, जिसमें उनके पिता मुंद्रा राम को पैर में गोली मार दी गई थी। सोरी ने बताया, “जिस व्यक्ति ने मेरे परिवार पर हमला किया था और मेरे पिता के पाँव में गोली मारकर उन्हें अपंग बना दिया था, ने अब आत्मसमर्पण कर लिया है और जिला रिजर्व ग्रुप (डीआरजी) का हिस्सा बन चुका है। मेरे अनवरत उत्पीड़न और बदनाम करने का श्रेय, दोनों पक्षों, यानी सरकार और माओवादियों को है, और मैं कसम खाती हूँ कि इस प्रकार की कोशिशों के सामने कभी नहीं झुकुंगी।”

तीन बच्चों और पिता के अलावा वे दो किशोर बच्चों (हिंगा और ब्रिशा) के साथ रह रही हैं, जिन्होंने 2017 में सुकमा जिले के बुरकापाल गाँव में सीआरपीएफ के द्वारा एक कथित हमले में अपने माता-पिता को खो दिया था। हिंसा के कारण लोगों को खोने के दर्द ने उन्हें इन दो किशोर अनाथ बच्चों की जीवन को अपनाने के लिए प्रेरित किया। सोरी ने 2013 में बीमारी के कारण अपने पति को खो दिया था; उन पर भी नक्सल का समर्थक होने का आरोप लगाया गया था।

बस्तर उपेक्षा, जहालत, हिंसा और विश्वासघात के ऊँचे चट्टान पर जी रहा है। जहाँ तक उपेक्षा, जहालत और विश्वासघात का प्रश्न है इसे कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के हिस्से के तौर पर देखा जाता है, जबकि हिंसा को राज्य पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के द्वारा बरपा किया जाता है।

उपरोक्त वर्णित क्रूरताओं के बीच, मानवाधिकारों की खातिर युद्ध छेड़ने का अर्थ है उस समय की सरकार के सामने सीधी चुनौती पेश करना। सोनी सोरी की ही तरह, सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया को भी विशेष रूप से महिला अधिकारों की रक्षा की लड़ाई के लिए अनवरत संघर्ष के लिए कई बाधाओं से गुजरना पड़ा है। 

बेला भाटिया बस्तर के जगदलपुर शहर में एक शोधार्थी सह मानवाधिकार वकील के तौर पर रही हैं। जनवरी 2018 से अपनी क़ानूनी प्रैक्टिस के दौरान, उन्होंने आदिवासियों के मामलों की लड़ाई लड़ते हुए जगदलपुर, दंतेवाड़ा और कोंडगांव की अदालतों के बीच में चक्कर लगाया है। ये अधिकांश मामले गुणात्मक रूप से मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन के रहे हैं। भाटिया ने कहा, “पेशेवर तौर पर मैं खुद को अन्य वकीलों से भिन्न रूप में देखती हूँ, क्योंकि मेरी एकमात्र चिंता मानवाधिकारों के नजरिये से देखने के अलावा क्रिमिनल लॉ और श्रम कानूनों पर ही रहा है।”

एक वकील के तौर पर, वे पूरी दृढ़ता के साथ बस्तर में न्याय वितरण की धीमी रफ्तार को लेकर कटु आलोचक रही हैं, जो कि आदिवासियों से संबंधित मामलों का मुख्य अड्डा है- जिनमें ज्यादातर मामले विचाराधीन कैदियों और दोष सिद्ध नहीं हुआ है। एक ऐसे समय में जब क़ानूनी प्रैक्टिस एक प्रमुख व्यवसाय हो गया है, मामलों को देखने का उनका मानवीय दृष्टिकोण एक उम्मीद की किरण को जिंदा बनाये रखता है।

बस्तर के साथ बेला भाटिया का जुड़ाव 2006 में तब शुरू हुआ जब वे सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) में एक एसोसिएट फेलो के तौर पर संबद्ध थीं, और “महिलाओं पर हिंसा के खिलाफ समिति” के हिस्से के तौर पर उन्होंने बस्तर का दौरा किया था। यह वह साल था जब माओवाद-विरोधी अभियान ‘सलवा जुडूम’ पूरे जोरों पर था, और उसे खत्म हुए एक साल ही गुजरे थे। बस्तर आने से पहले, उन्होंने 1989 में अपनी कानून की पढ़ाई पूरी की, और 2000 के दशक के शुरूआती वर्षों में कैंब्रिज विश्वविद्यालय से ‘बिहार में नक्सलवाद’ पर अपनी पीएचडी पूरी की, और साथ ही मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस में मानद प्रोफेसर के तौर पर अपना संक्षिप्त कार्यकाल भी पूरा किया था। 

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बेला भाटिया (चित्र साभार: द हिन्दू )

नापाक ‘सलवा जुडूम’ ने लाखों की संख्या में आदिवासियों को विस्थापित करने का काम किया, और इसे देश में सबसे बड़े आंतरिक विस्थापनों के तौर पर माना जाता है, जिसमें सैकड़ों गाँवों को तहस-नहस किया गया, महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया गया, हजारों लोगों को सुरक्षा शिविरों में बंधक बनाकर रखा गया था। यातनापूर्ण और विश्वासघाती परिणामों ने संभवतः बेला भाटिया को बस्तर में ही बने रहने और आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। लेकिन संघर्ष क्षेत्र को एक स्थायी निवास के तौर पर स्वीकार करने के फैसले के सामने कई चुनौतियाँ थीं। 

अक्टूबर 2015 से लेकर मार्च 2016 के बीच में सुरक्षा कर्मियों के द्वारा सामूहिक बलात्कार और भयानक यौन उत्पीड़न के खिलाफ प्राथमिक दर्ज करने में आदिवासी महिलाओं की मदद करने के कारण वे छत्तीसगढ़ प्रशासन की राडार के तहत आ गई थीं; उन्होंने इन हमलों के भुक्तभोगियों के बयानों को दर्ज करने में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की टीम की मदद की। आदिवासी महिलाओं पर होने वाले निरंतर हमलों में उन्हें लगातार मदद पहुंचाने के निरंतर प्रयास ने उनके यहाँ पर टिके रहने को भाजपा के रमन सिंह के नेतृत्व वाली राज्य सरकार के साथ भिड़ंत में डाल दिया था।

ऐसा करते हुए, उन्हें जगदलपुर के बाहरी इलाके वाले अपने किराए के कमरे को भी छोड़ने के लिए विवश कर दिया गया और सामाजिक एकता मंच नामक एक निगरानी समूह के द्वारा उन्हें माओवादी समर्थक के रूप में बदनाम किया गया था। इस समूह को राज्य सरकार की पहल पर नक्सल विद्रोहियों से निपटने के लिए तैयार किया गया था, लेकिन यह राज्य प्रशासन के प्रति आलोचक रुख रखने वाले पत्रकारों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ एक डराने-धमकाने वाली ताकत बन गई थी, और इस समूह ने उन्हें नक्सली के तौर पर कलंकित किया। इस समूह के सदस्य आज के दौर में प्रतिबंधित सलवा जुडूम के पूर्व सदस्य थे।

अंग्रेजी में प्रकाशित इस मूल आलेख को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: Soni Sori and Bela Bhatia: Human Rights Crusaders for Tribals and Women in Conflict-ridden Bastar 

BELA BHATIA
soni sori
Chattisgarh
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Women Rights

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