NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
विशाल टेक कम्पनियाँ, मृत लोकतंत्र
निवेशकों और स्टार्टअप्स पर बड़ी टेक कंपनियों का प्रभाव एक बात है, लेकिन इनकी सर्वव्यापी प्रवृत्ति से रोज़मर्रा की ज़िदगी पर प्रभाव पड़ रहा है। यह केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है। उन लोगों को भी यह चीजें प्रभावित कर रही हैं, जो इन प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल नहीं करते।
सुभाष राय
31 Jul 2020
विशाल टेक कम्पनियाँ, मृत लोकतंत्र
Image Courtesy: flicker

रॉबर्ट मैकचेसनी मीडिया के सबसे बेहतरीन विद्वानों में से एक हैं, उन्होंने "रिच मीडिया, पूअर डिमॉक्रेसी" नाम से एक किताब लिखी है। अगर हम "बिग टेक, डेड डिमॉक्रेसी (विशाल टेक कंपनियां, मृत लोकतंत्र)" कहें, तो भी यह कोई बड़बोलापन नहीं होगा। फ़ेसबुक के मार्क ज़करबर्ग, जिनके ठीक पीछे अल्फाबेट के सुंदर पिचई दौड़ लगा रहे हैं, उनके द्वारा भारत के बाज़ारों में पहुंच बनाने की कोशिशों और डोनाल्ड ट्रंप की जीत के बीच, भारत को अमेरिका में इन कंपनियों पर चल रही गहमा-गहमी पर बारीक नज़र रखनी चाहिए।

दशकों से प्रगतिशील लोग चिंता जताते रहे हैं कि मीडिया के बड़े हिस्से का संक्रेंद्रण कुछ बड़े उद्योग घरानों के हाथों में हो रहा है। पर एक आंकड़ा प्रगतिशील लोगों की इन सारी चिंताओं को खत्म कर देता है। लेकिन अब हमें यह देखना होगा कि जब बड़ी टेक कंपनियों को इस खेल में शामिल कर दिया जाता है, तब क्या मतलब निकलता है:  

software.jpg

बड़ी टेक कंपनियां

मीडिया के हिस्से में हुए इस बड़े बदलाव से लोकतंत्र बचाने के नाम पर कैपिटल हिल (अमेरिका के वाशिंगटन डीसी में स्थित राजधानी क्षेत्र) में तलवारें तन गई हैं। "बड़ी टेक कंपनियां किस तरह से डिजिटल इंडस्ट्री में अपना वर्चस्व बनाए रखती हैं और अपने विरोधियों व ग्राहकों को नुकसान पहुंचाती हैं" इस विषय पर एक द्विदलीय जांच बिठाई गई है। जांच प्रक्रिया के तहत गूगल, ऐप्पल, फ़ेसबुक और अमेजॉन के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEO) को "यूएस हाउस ज्यूडिशियरी एंटीट्रस्ट सबकमेटी" के सामने पेश होना पड़ा। महामारी के चलते यह पेशी आभासी तरीके से की गई।

हाल में खत्म हुए इस कार्यक्रम के बारे में जैसा अंदेशा था, इस पर मीडिया का बहुत ध्यान रहा। "एंटीट्र्स्ट कमेटियों" के सामने सशरीर उपस्थित होने में जैसी धक्का-मुक्की होती है, उसके उलट यहां चारों कंपनियों के सीईओ आराम से शामिल हो गए और कार्यक्रम को कम तनावपूर्ण बनाने में मदद की। 

एक रिपब्लिकन रिप्रेंजेटेटिव जिम जॉर्डन ने गूगल के सीईओ सुंदर पिचई से पूछा- क्या गूगल पूर्व उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति चुनावों में संभावित तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बिडेन की मदद करेगा। इस तरह के बहुत सवालों से शायद ही पिचई को कोई मुश्किल महसूस हुई होगी। तकनीकी व्यवधानों के चलते अमेजॉन के सीईओ को कुछ असुविधाओं का सामना भी करना पड़ा। फ़ेसबुक के ज़ुकरबर्ग सभी के निशाने पर बने रहे। वहीं ऐप्पल के टिम कुक द्वारा दी गई मजबूत प्रतिक्रियाओं ने कार्यक्रम में गर्मी नहीं आने दी। इन सबके बावजूद यह एक अहम दिन था, क्योंकि बड़ी टेक कंपनियों को भी माहौल की गर्मी का अहसास होना शुरू हो गया है।  

सत्र की समाप्ति पर डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता और कमेटी के अध्यक्ष डेविड सिसिलिन ने कहा, "हमने गवाहों से जो भी चीजें सुनीं, उनके द्वारा, पिछले एक साल में हमने जितने सबूत इकट्ठा किए हैं, उनकी पुष्टि होती है।"

बड़ी टेक कंपनियों द्वारा स्टार्ट अप्स और निवेशकों को प्रभावित करना एक चीज है, लेकिन इन प्लेटफॉर्म की सर्वव्यापी प्रवृत्ति, रोजमर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करती है। ऐसा सिर्फ़ अमेरिका के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है। उन लोगों के लिए भी यह मुसीबत है, जो इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल नहीं करते।

बड़ी तस्वीर पर नज़र रखने के चलते हमें रोजाना दिखने वाले सबूतों से नज़र नहीं हटानी चाहिए। जैसे कोविड-19 पर गलत जानकारी वाले वीडियो को हटाने में लगने वाला लंबा वक़्त। खुद फ़ेसबुक ने माना है कि इस वीडियो को जल्दी हटा लेना चाहिए था। या फिर भाड़े पर लिए गए दक्षिणपंथियों की फौज, सनकी लोग जो गलत जानकारी फैलाते हैं, जरूरत है कि ट्विटर उन ट्वीट्स की गैर भरोसेमंद और छेड़खानी वाले ट्वीट्स के तौर पर चिन्हित करे। इस तरह के लोगों में अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके बेटे भी शामिल हैं। या फिर, जैसा एक अध्ययन में बताया गया कि गूगल सर्च में पहले पेज 41 फ़ीसदी गूगल के उत्पाद नज़र आते हैं। इस बात के और भी कई सबूत मौजूद हैं कि यह कंपनियां अन्यायपूर्ण ढंग से काम कर रही हैं, लेकिन यह सबूत अब भी पर्याप्त नहीं हैं।

इन सभी चीजों के चलते नये प्रतिस्पर्धा और निजता कानून बनाकर बड़ी कंपनियों पर ज़ुर्माना लगाया जा सकता है, उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है। या फिर उन कानूनों का निरसन किया जा सकता है, जिनसे इन प्लेटफॉर्म को अपनी साइट पर लगाने वाले कंटेट के प्रति सुरक्षा प्रदान हो सकती है। सबसे ख़तरनाक कार्रवाई यह हो सकती है कि इन कंपनियों को विघटित कर दिया जाए।

अपने देश में इन बड़ी कंपनियों को जस्टिस डिपार्टमेंट और फेडरल ट्रेड कमीशन से दिक़्कतों का सामना करना पड़ सकता है, जो टेक में जारी प्रतिस्पर्धा पर नज़र रख रहा है। लेकिन बात इतने तक ही सीमित नहीं है, इन कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे यूरोपीय संघ भी इन कंपनियों के पीछे है।

हाउस सबकमेटी द्वारा इस साल के अंत तक अपनी रिपोर्ट प्रकाशित किए जाने की संभावना है। जिसमें जरूरी सुझाव भी होंगे। इन सुझावों का बेसब्री से इंतज़ार किया जा रहा होगा। लेकिन इनका भारत समेत बाकी दुनिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा, वह ज़्यादा अहम होगा। आख़िर यह चारों कंपनियां हमारे टेलीकॉम, टेक और मीडिया के तंत्र में गहरी पैठ बना चुकी हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Rich Big Tech, Dead Democracy

google
Facebook
twitter
Amazon
Big Tech
competition
Monopoly
Media

Related Stories

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

राज्यसभा सांसद बनने के लिए मीडिया टाइकून बन रहे हैं मोहरा!

आर्यन खान मामले में मीडिया ट्रायल का ज़िम्मेदार कौन?

विशेष: कौन लौटाएगा अब्दुल सुब्हान के आठ साल, कौन लौटाएगा वो पहली सी ज़िंदगी

धनकुबेरों के हाथों में अख़बार और टीवी चैनल, वैकल्पिक मीडिया का गला घोंटती सरकार! 

जारी रहेगी पारंपरिक खुदरा की कीमत पर ई-कॉमर्स की विस्फोटक वृद्धि

खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं

ज़मानत मिलने के बाद विधायक जिग्नेश मेवानी एक अन्य मामले में फिर गिरफ़्तार

विज्ञापन में फ़ायदा पहुंचाने का एल्गोरिदम : फ़ेसबुक ने विपक्षियों की तुलना में "बीजेपी से लिए कम पैसे"  

बीजेपी के चुनावी अभियान में नियमों को अनदेखा कर जमकर हुआ फेसबुक का इस्तेमाल


बाकी खबरें

  • Poem
    न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता: अक्टूबर के आरंभ की बरसती साँझ
    03 Oct 2021
    इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के सह प्राध्यापक और छत्तीसगढ़ के भिलाई नगर में जन्मे कवि बसंत त्रिपाठी ने ‘अक्टूबर के आरंभ की बरसती साँझ’ शीर्षक से क्या ख़ूब कविता कही है। वे कहते हैं- बरसो हे मेघ/…
  • GANDHI JI CARTOON
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: बापू मिले 'सरकार जी' से
    03 Oct 2021
    "तो बापू", सरकार जी ने कहा, "आप यहां आए किसलिए हैं। आप तो जानते ही हैं आपके और मेरे रास्ते जुदा जुदा हैं। आप सत्य के प्रयोगधर्मी और मैं असत्य को सत्य बनाने के प्रयोग में जुटा हूं। आप प्रेम के पुजारी…
  • The Country With a Burnt Post Office
    फ़राह बशीरी
    जले हुए डाकख़ाने वाला देश
    03 Oct 2021
    “रूमर ऑफ़ स्प्रिंग: अ चाइल्डहुड इन कश्मीर” 1990 के दशक में श्रीनगर में बितायी गयी फ़राह बशीर की किशोरावस्था का एक अविस्मरणीय वृत्तांत है।
  • hafte ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    राजनीति के अति-महत्वाकांक्षियों की दास्तान और किसानों पर कोर्ट
    02 Oct 2021
    आकांक्षी होना अच्छी बात है लेकिन जन-हित, समाज-हित को दरकिनार कर किन्हीं निहित स्वार्थों के लिए अति-महत्वाकांक्षी होना बुरी बात है. राष्ट्रीय राजनीति में इस सप्ताह तीन अति-महत्वाकांक्षी लोग अलग-अलग…
  • Modi
    राजेंद्र शर्मा
    कटाक्ष: राष्ट्रपिता (देश) से राष्ट्रपिता (विदेश) तक
    02 Oct 2021
    हमें नहीं लगता कि राष्ट्रपिता-(विदेश) ही रहने में बापू को कोई आपत्ति होगी। बल्कि उन्हें जानने वाले तो कहते हैं कि वह अब और राष्ट्रपिता रहना ही नहीं चाहते हैं। फिर अब मोदी जी तो हैं ही। बुजुर्ग का देश…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License