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ग्राउंड रिपोर्ट: देश की सबसे बड़ी कोयला मंडी में छोटी होती जा रही मज़दूरों की ज़िंदगी
यूपी के चंदौली जिले में चंधासी, देश की सबसे बड़ी कोयला मंडी है। यह इलाका उस संसदीय क्षेत्र के साथ लगा है, जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुना है। ..."जिस सड़क से पांच मिनट गुजरने में दम निकलता हो, सोचिए 24 घंटे यहां रहने वालों का जीवन कैसा होगा?"
विजय विनीत
25 Nov 2021
workers

बिहार के भभुआ जिले के माधोपुर गांव के गोवर्धन बिंद पिछले कई सालों से चंधासी कोयला मंडी में काम कर रहे हैं। मंडी के आखिरी छोर पर एक कारोबारी ने मजदूरों के लिए छोटी सी कोठरी बनवा रखी है। इसी कोठरी के बाहर एक कोने में कोयले की भट्ठी सुलग रही थी, जिस पर दाल पक रही थी और चावल भी। छोटे से चबूतरे पर एक कड़ाही में दो गोल बैगन और आलू-मिर्च की एक पोटली रखी थी। कड़ुआ तेल की एक छोटी सी शीशी और नमक के पाउच से संकेत मिल रहा था कि चावल-दाल पकने का इंतजार कर रहे गोवर्धन बिंद चोखा बनाने की तैयारी में हैं।  

सिर पर मैला-कुचैला गमछा और बदन पर टीशर्ट। दुबली-पतली कद-काठी। उदास चेहरा और सिर से लेकर पांव तक कालिख ही कालिख। गोवर्धन बिंद दिन भर में फकत 100, 200 या फिर 250 रुपये मजदूरी कमा पाते हैं। इनका काम है झारखंड और मध्य प्रदेश के सिंगरौली इलाके से ट्रकों से आने वाले कोयले को उतारना और आगे जाने वाले ट्रकों में लादना। एक टन कोयले की लोडिंग-अनलोडिंग पर इन्हें मिलते हैं 63.50 रुपये। काम होता है सीढ़ी लगाकर कोयले को ट्रक पर चढ़ना और कोयले के भारी-भरकम पत्थरों को दूसरे ट्रक में लादना। 

गोवर्धन बिंद जिस जगह भोजन पका रहे थे, उसके चारों तरफ ज़मीन कालिख से पटी थी। कोयले की कालिख हवा में भी तैर रही थी। उनके खाने के बर्तनों में भी कालिख की महीन सी परत चढ़ गई थी। कुछ कदम के फासले पर कई दूसरे मजदूर एक ट्रक पर कोयले की लोडिंग कर रहे थे। गोवर्धन ने अपने बदन पर जमी कालिख दिखाते हुए कहा, "खाने की थाली से होती हुई यह कालिख हमारे फेफड़ों में पहुंचती है। कभी-कभी सीना भी जाम हो जाता है। कोयले की कालिख हमारी चमड़ी का हिस्सा है। रोआं खीचेंगे तो चमड़ी से कालिख ही निकलेगी। लैट्रिन भी काली ही निकलती है। शरीर से पसीना निकलता है तो वह भी कोयले से सन जाता है। हमें पता है कि हमारी जिंदगी हर रोज छोटी होती जा रही है, लेकिन क्या करें?ज़हर घोंटना हमारी मजबूरी है। यहां जिंदगी भी कोयला होकर रह गई है। समूची जवानी इसी कोयला मंडी में गुजार दी और अब बुढ़ापे की ओर बढ़ रहे हैं। सांस कब थम जाएगी, कह पाना मुश्किल है। शायद कफन भी कोयले से ही नसीब हो।" 

गोवर्धन बिंद यहीं नहीं रुकते। वह बताते हैं, "मेरे पांच बच्चे हैं। एक लड़का और चार लड़कियां। बेटा बंटवारा करके हमसे अलग हो गया है। कोयला मंडी की कमाई से हम तीन बेटियों की शादी कर चुके हैं। सबसे छोटी बेटी बची है, जिसके हाथ पीले करने हैं। उसकी शादी की चिंता हमें साले जा रही है। पहले गांव रहता था तब जमींदार के यहां बंधुआ मज़दूरी करता था। मंडी में आए तो जिंदगी काली हो गई है। दिन हो या रात कालिख और गर्द-ए-गुबार के बीच गुजरती है जिंदगी। मुंह ढंकने के लिए हमारे पास न कोई मास्क है और न ही नजदीक में कोई चिकित्सक। गर्मी के दिनों में जब कभी अंधड़ चलता है तो नाक-मुंह को गमछे से ढक लेते हैं। इसके बावजूद कालिख शरीर में घुसती रहती है।" 

हर माह 50 करोड़ से ज्यादा का कारोबार

यूपी के चंदौली जिले में चंधासी देश की सबसे बड़ी कोयला मंडी है। यह इलाका उस संसदीय क्षेत्र के साथ लगा है, जिसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुना है। मंडी के अध्यक्ष धर्मराज यादव कहते हैं, "सरकार को हर महीने लाखों रुपये टैक्स देने के बावजूद कोयला मंडी बदहाल है। गर्मी में गर्द उड़ता है तो बारिश के दिनों में यह मंडी तालाब का शक्ल अख्तियार कर लेती है। बदहाली के बावजूद यहां हर महीने 50 करोड़ से ज्यादा का कारोबार होता है। आंकड़ा इससे भी ज्यादा हो सकता है।"  

"मंडी में हर रोज एक से डेढ़ हजार के बीच गाड़ियां कोयला लेकर आती हैं। हर ट्रक पर सवा दो लाख का कोयला होता है। कोयले का रेट 7000 से 9000 रुपये प्रति टन है। ट्रकों का भाड़ा दूरी के हिसाब से खरीददार को वहन करना पड़ता है। यहां मजदूर अपनी शर्तों पर काम करते हैं। कारोबारियों को इस बात से कोई मतलब नहीं कि वह कैसे रहते हैं और क्या खाते-पीते हैं? मास्क खरीदने की ज़िम्मेदारी भी अनुबंध पर काम करने वाले मजदूरों का है। "  

गर्द-कालिख से पट गई है हर्बल रोड

चंधासी पहुंचते ही कोयले की राख चारों ओर दिखती है। सड़क के दोनों तरफ़ ट्रक कोयले से भरे नजर आते हैं। यहां करीब 700 से ज्यादा कोयले के व्यापारी हैं। मंडी में जहां-तहां चाय-पान और मिठाई की दुकानें भी हैं। दुकानों में खुली रखी मिठाइयों पर भी बारीक सी काली पर्त जमी हुई नजर आती है। चंधासी कोयला मंडी जीटी रोड गुजरती है। सड़क के किनारे नीम के पेड़ों की लंबी श्रृंखला होने की वजह से यूपी सरकार ने इस साल इसे नाम दिया है हर्बल रोड।

पड़ाव से लेकर मुगलसराय वाया पचफेड़वा तक के मार्ग को हर्बल रोड नाम दिया गया है। इसकी जिम्मेदारी दी गई है चंदौली के लोक निर्माण विभाग के प्रांतीय खंड को। साफ-सफाई और पेड़ों की देख-रेख के लिए संस्था को धन भी आवंटित किया गया है, लेकिन हालात पहले से भी ज्यादा बदतर हो गया है। सड़क की सफाई न होने के कारण पेड़ों पर काले धूल की मोटी सी परत जम गई है। इंसान ही नहीं, यहां पेड़ भी सांस नहीं ले पा रहे हैं। नतीजा, हाल के दिनों में बड़ी संख्या में पेड़ सूख गए हैं अथवा ठूंठ हो गए हैं।  

हर्बल रोड से रोजाना लाखों लोग आते-जाते हैं। चंधासी के आसपास करीब दो किमी का फासला पार करने में राजगीरों का दम फूलने लगता है। कलफदार कपड़े भी कालिख से रंग जाते हैं। सिर्फ कपड़े ही नहीं, शक्ल भी काली पड़ जाती है। ट्रक अथवा किसी बड़े वाहनों के गुजरते ही काले धूल का गुबार सड़क पर फैल जाता है। आसमान में धुंध की वजह से कुछ भी नहीं दिखता। आगे की सड़क और पटरियों के किनारे खड़े ट्रक भी। नतीजा आए दिन सड़क हादसे होते हैं और लोग रोते-बिलखते लोगों को देखकर आगे बढ़ जाते हैं।  

चंदौली के युवा पत्रकार पवन कुमार मौर्य कहते हैं, "जिस सड़क से पांच मिनट गुजरने में दम निकलता हो, सोचिए 24 घंटे यहां रहने वालों का जीवन कैसा होगा?देश की सबसे बड़ी कोयला मंडी में तमाम युवक रोजगार के सपने लेकर आते हैं और यहां की आबो-हवा में घुला जहर धीमी मौत देने लगता है। कोयला मंडी के आसपास आठ गांवों में करीब 40 हजार की आबादी प्रदूषण की मार झेल रही है। यहां तो हर समय कोयले के गर्द की आंधियां चलती रहती हैं। नजीजा, इलाके का हर दसवां मरीज श्वास, दमा, एलर्जी और आंख की बीमारी से ग्रसित है।" 

पत्रकार पवन बताते हैं, "चंधासी कोयला मंडी का आधा हिस्सा डीडीयूनगर में है तो आधा महबलपुर गांव में। दुल्हीपुर, सतपोखरी, महबलपुर, बिसौड़ी, बगही, हरिकेशपुर, डांडी, करबत और चंधासी गांव के लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। कोयले का गर्द चौबीस घंटे करीब 20 किमी के दायरे में घरों और छतों पर गिरता रहता है। कुछ ही देर में कालिख की काली पर्त जम जाती है। नौकरशाही यह बताने के लिए तैयार नहीं है कि आखिर 40 हजार की आबादी को कब तक गर्द-ए-गुबार के बीच जीवन गुजारना होगा?"  

जिंदगी से जंग लड़ रहे 6000 मजदूर

ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए हमने एक सुरंग सी गली की ओर रुख किया। हर कदम पर काला गर्दा उड़कर हमारे कपड़ों में समाता जा रहा था। कुछ ट्रकों से कोयला उतर रहा था तो कुछ पर लादा जा रहा था। एक अनुमान के मुताबिक यहां करीब 6,000 मजदूर काम करते हैं। पहले इनकी तादाद 10,000 से ज्यादा थी। चलते-चलते हम एक कंपाउंड में पहुंचे। वहां कुछ मजदूर भोजन पकाने के जद्दोजहद में जुटे थे तो कुछ कोयले की ढुलाई में लगे थे। कुछ श्रमिक खाली हाथ बैठे थे। 

यहां हमें मिले 50 वर्षीय तिलक सिंह। एक छोटी सी कोठरी कोठरी में ईंट के स्लैब पर मैले-कुचैले कपड़े पहनकर वह लेटे हुए थे। वह बताते हैं, "बारिश के समय यह छोटी सी कोठरी भी टपकती है। इसी में हमारे साथ 15 से 20 मजदूर अंधेरी रात में सोते हैं। यहां लाइट तक का इंतजाम नहीं है। मोमबत्ती और मच्छरों के साथ खांसते-खांसते रात कट जाती है। अगर हम काम नहीं करेंगे तो रोटी कैसे मिलेगी। परिवार का पेट कैसे भर पाएगा?"

तिलक सिंह के सात बच्चे हैं, जिनमें से पप्पू, बाबूलाल, प्रियंका, समुद्री का नाम तो वह बताते हैं, लेकिन बाकी का नाम इन्हें खुद नहीं मालूम। कई दशक से तिलक मंडी में मजदूरी कर रहे हैं। उन्होंने बेबाकी के साथ कहा, "कोयले ने हमारी हर चीज़ को काला कर दिया है। सिर्फ शरीर ही नहीं, जिंदगी भी। पल-पल धुआं और गर्द सांसों में घुलता रहता है। बीमारी घेरती है तो गुड़ और अजवान खा लेते हैं। ठंड लग जाती है तो काढ़ा पीते हैं तो थोड़ी राहत मिलती है। यह काढ़ा गर्दा को भी काटता है।" 

धुंध से ढंक जाता है समूचा इलाका

चंधासी कोयला मंडी के दक्षिणी छोर पर कोयले की कैंडी बनाने वाली कई फैक्ट्रियां हैं। इन फैक्ट्रियों की चिमनियों का धुआं कोयले के गर्द के साथ मिलकर दाद में खाझ सरीखा हो जाता है। जब यहां तेज हवाएं चलती हैं तो गर्द और धुआं समूची कोयला मंडी को धुंध से ढंक लेता है। कोयले की राख से किसी मज़दूर के जीवन का दीपक बुझाने के क़रीब पहुंचता है तो उसे वापस घर भेज दिया जाता है।

कोयला मंडी में आए दिन हादसे होते रहते हैं। कभी कोयला उतारते समय तो कभी चढ़ाते वक्त। सड़क हादसों में श्रमिकों की जानें भी जाती हैं। 46 वर्षीय महेंद्र प्रसाद कहते हैं, "जब से हमने होश संभाला है तभी से मंडी आ रहे हैं। पहले पिता के साथ आते थे और अब हम खुद मंडी का हिस्सा हैं। पास के कुंडा गांव में चार बच्चों के परवरिश की जिम्मेदारी हमारे कंधे पर है। कोयले के बीच उम्र गुजर गई पर अपने बच्चों को पढ़ाने का इंतजाम तक नहीं कर सके। 

इसी गांव की 40 वर्षीया शीला भी ट्रकों पर कोयला लादती हैं। इनके आठ बच्चे हैं, लेकिन कोई स्कूल नहीं जाता। वह कहती हैं, "चुनाव हमारे लिए एक त्योहार की तरह आता है और चला जाता है। हमारी ज़िंदगी में कोई बदलाव नहीं होता। कोयले का पैसा तो बड़े लोगों की कोठियों में चला जाता है। हमारे नसीब में कुछ है तो सिर्फ कालिख और मच्छर। इस माहौल में रहते हुए हमारा नसीब भी काला पड़ गया है। बदन से हर रोज अनगिनत मोटे-मोटे मच्छर हमारा खून चूसते रहते हैं।  बीमारियां शरीर में घुसेड़ते रहते हैं। मच्छरों के काटने से शरीर पर दाग पड़ गए हैं। हम जानते हैं कि यही हमारा नसीब है। अगर कोयला नहीं ढोएंगे तो नसीब भी फूट जाएगा।" 

मंडी का स्थानांतरण फाइलों में दफन

कोयला मंडी में उड़ने वाली गर्द आए दिन सोशल मीडिया पर छाई रहती है। कोई न कोई रोज ही मंडी की तस्वीरें फेसबुक, इस्टाग्राम और ट्विटर पर चस्पा कर देता है। शिकायत शासन तक पहुंचती है तो खतो-कितावत का दौर शुरू हो जाता है। इलाकाई नागरिकों की शिकायतों से अज़ीज़ आकर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण विभाग के क्षेत्रीय अधिकारी कालिका सिंह ने चंधासी कोयला मंडी में प्रदूषण की पड़ताल कराई तो पता चला कि यह दुनिया का सबसे ज्यादा प्रदूषित इलाका है। क्षेत्रीय अधिकारी ने मंडी को आबादी से दूर अन्यत्र स्थानांतरित करने के लिए 17 फरवरी 2021 को मुख्य पर्यावरण अधिकारी के पास संस्तुति भेजी है। यहां सीसी रोड बनवाने के साथ-साथ लगातार पानी का छिड़काव कराने और विंड ब्रेकिंग वॉल लगाने की संस्तुति की गई है। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि 27 दिसंबर 2020 को गई जांच में पाया गया कि कोयला मंडी में हर रोज एक हजार ट्रकों का आवागमन होता है। यहां कोयले का भंडारण और बिक्री की जाती है। प्रदूषण नियंत्रण का कोई इंतजाम न होने के कारण स्थिति गंभीर होती जा रही है। अब एक मात्र विकल्प यह है कि मंडी को आबादी से कहीं दूर स्थानांतरित कर दिया जाए। 

चंधासी कोयला मंडी के अध्यक्ष धर्मराज यादव

प्रदूषण के कारण कोयला मंडी को हटाने की मांग सालों से उठती आ रही रही थी, लेकिन मंडी के अध्यक्ष धर्मराज यादव ने इसे निरस्त कर दिया। वह कहते हैं, "कोयला हमारी ज़िंदगी को निश्चित तौर पर छोटा कर रहा है, लेकिन क्या करें? यह तो हमारा काम है। हम सरकार को भारी-भरकम टैक्स देते हैं तो प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी भी उसी की बनती है।" 

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण विभाग की पड़ताल के बाद तैयार की गई रिपोर्ट के आधार पर साल 2021 के शुरुआती महीनों में प्रयास शुरू किया गया, लेकिन वह मूर्त रूप नहीं ले सका। चंधासी कोयला मंडी के गुलाब चौहान कहते हैं, "गर्द और कालिख उड़ने का मुद्दा जब-तब उठता है और फिर न जाने क्यों फाइलों में दफन हो जाता है। सरकारी नुमाइदों के छलावे में न जाने कितनों की जिंदगी कालिख में लिपटकर छोटी होती रही है।"   

योगी सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं

डीडीयूनगर की विधायक साधना सिंह कहती हैं, "कोयला मंडी में प्रदूषण की समस्या के निराकरण के लिए छह करोड़ की लागत से जीटी रोड को चौड़ा किया जा रहा है। तब शायद धूल उड़ने की समस्या थोड़ी कम हो जाएगी। हालांकि सपा नेत्री गार्गी पटेल मंडी की बद्इंतजामी के लिए योगी सरकार को जिम्मेदार मानती हैं। वह कहती हैं, "यह शर्म का विषय है कि मंडी के आसपास कोई अस्पताल नहीं है। विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाली भाजपा सरकार को धूल और कालिख पी रहे लोगों की कोई चिंता नहीं है। यहां कोई बीमार होता है तो चारपाई पर लादकर मुगलसराय पहुंचाया जाता है। कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं।" 

महबलपुर गांव के गुलाब सोनकर कहते हैं, "चुनाव का वक्त आता है तो सभी मंडी को धूलमुक्त करने का दावा करने लगते हैं और चुनाव बीतते ही वादे भूल जाते हैं। यहां साल के बारहो महीने धूल उड़ती रहती है। आसपास के गावों में तमाम लोग टीबी और दमा की चपेट में है। कुछ लोगों की आंखों की रोशनी गायब हो गई है। आप ही बताइए इसमें हमारा गुनाह क्या है? गर्द का गुबार हमारी जिंदगी छोटी करता जा रहा है। अब तो हमारे गांव के बच्चों की शादी में भी दिक्कतें आने लगी हैं। सरकार ने हमें भगवान भरोसे छोड़ दिया है।"  

आंसू बनकर रह गया मजदूरों का दर्द 

कोयले के संकट पर दुनिया भर में बहस चल रही है, लेकिन देश की सबसे बड़ी इस मंडी में तिल-तिलकर मर रहे लोगों की मुश्किलों पर कहीं कोई बहस नहीं हो रही है। गैर-कानूनी ढंग से चल रही इस कोयला मंडी में मजदूरों का दर्द आंसू बनकर रह गया है। बड़ा सवाल यह भी है कि अगर इसे हटा दिया जाए तो देश में छोटे-छोटे कारोबार के लिए कोयला कहां से आएगा? इसका जवाब न सरकार के पास है, न नौकरशाही के पास।  

एशिया की सबसे बड़ी कोयला मंडी का प्रवेश द्वार

पथरीली और कीचड़ से भरी सड़क के पास झरिया से आने वाले ट्रक खड़े होते हैं। पिछले तीन-चार दशक से यहां हर रोज हजार-बारह सौ ट्रक कोयला आता है। झारखंड व एमपी के अलावा कुछ कोयला मेघालय से भी यहां पहुंचता है। कोयला मंडी पहले पड़ाव पर थी। दशकों पहले इसे चंधासी स्थानांतरित कर दिया गया। पहले तो यहां थापर और डीसीएम घराने के भी डिपो थे। 

जब देश में कोल इंडिया की पूरी मोनोपॉली थी, तब यह मंडी अवैध कमाई के एक बड़े अड्डे के रूप में मशहूर थी। पहले यहां चोरी का कोयला भी आता था। ट्रेडर, ट्रक ऑपरेटर, कमीशन एजेंट, नेताओं और लोकल माफिया का सिंडिकेट इस मंडी को चलाता था। अब तो यहां नेता और कोल माफिया में फर्क करना मुश्किल हो गया है। सीबीआई ने साल 1996 में कोल मर्चेंट और विश्व हिंदू परिषद के ट्रेजरार नंद किशोर रूंगटा के अपहरण और हत्या में माफिया डान मुख्तार अंसारी का हाथ बताया था। 

कोल इंडिया अब कोयले का ऑक्शन ऑनलाइन करती है। इसके चलते चंधासी में इसकी सप्लाई काफी कम हो गई। साथ ही कोयले की कालाबाजारी में काफी कमी आई है। फिर भी मंडी में काम करने वाले मजदूरों की मुश्किलें जस की तस हैं। पिछले 40 वर्षों से ट्रकों पर कोयले की लोडिंग करने वाले बिरना गांव (भभुआ-बिहार) के रामदास की चार लड़कियों और दो लड़कों को पालने की जिम्मेदारी इनके ऊपर ही है। वह कहते हैं, "घर में सभी बुड़बक हैं। बच्चों का पेट भरना हमारी मजबूरी है। कमाई से जो बचता है, उसे घर भेज देते हैं।" इनके साथी शिवमूरत कहते हैं, "हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे यह काम करें और उनकी ज़िंदगी भी ये कालिख छोटी न कर दे।" 

(बनारस स्थित विजय विनीत वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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