NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बिहार चुनाव : वाम को छोड़ कोई नहीं कर रहा 2 करोड़ खेत मज़दूरों की बात
बहुत कम मज़दूरी, सीज़नल काम, हद से ज़्यादा मेहनत और सामाजिक उत्पीड़न इस वर्ग के जीवन को परिभाषित करता है।
सुबोध वर्मा
23 Oct 2020
Translated by महेश कुमार
बिहार

ऐसे राज्य में जहां दो तिहाई से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है और 88 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है, वहाँ का शोरगुल से भरा चुनावी अभियान खेतिहर मजदूरों के बारे में अजीब मौन धारण किए हुए है। कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल समाज के इस सबसे बड़े, सबसे अधिक शोषित और सबसे उत्पीड़ित तबके के बारे में बात करने को तैयार नहीं है। उनकी मजदूरी बढ़ाने या उनकी स्थिति में सुधार करने का कोई वादा नहीं किया जा रहा है। चुनाव विश्लेषकों और उस पर चर्चा करने वाले प्रमुख लोग भी सामाजिक संरचना का पासा खेलते हुए बिहार के जातिगत समीकरण के बारे में अधिक बात करते है, लेकिन कोई भी उनकी तरफ देखने या उनके हालात की परवाह नहीं करता है। केवल वामपंथी पार्टियाँ जिनमें- भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और भारती की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिब्रेशन प्रमुख है- उनके हालत के बारे में बात करते नज़र आते हैं।

ऐसा नहीं है कि कृषि मजदूरों की संख्या कम है- वास्तव में, यह सबसे बड़ा आर्थिक वर्ग है। 2011की जनगणना के अनुसार, बिहार में लगभग 95.4 लाख मुख्य खेतिहर मजदूर थे। 'मुख्य' का अर्थ है कि उनका प्राथमिक व्यवसाय दूसरों के खेतों में काम करना है। इसके अलावा, 88 लाख “सीमांत' कृषि मजदूर हैं, जो एक वर्ष, छह महीने या उससे कम समय दूसरों के खेतों में काम करते हैं। इन सीमांत मजदूरों में से कई सीमांत किसान भी हैं, जिनके पास बहूत मामूली जमीने हैं जो परिवार का पेट भरने के लिए अपर्याप्त है, उन्हें दूसरों के खेतों में मजदूरी कर अपनी आय में इजाफा करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

इन दोनों तरह के श्रमिकों को एक साथ रखें तो यह लगभग 1.8 करोड़ कृषि मजदूरों की चौंकाने वाली संख्या उभर कर सामने आती है। यह 2011 की संख्या है। 2020 में इसका अंदाज़ा पिछले दशक (2001-2011) की विकास दर के आधार पर लगाया जा सकता है जो एक काफी तंग अनुमान के अनुसार: 2.3 करोड़ बैठती है। [नीचे चार्ट देखें]

bihra agri chart.png.jpeg

बिहार के खेत मजदूरों में से लगभग एक चौथाई मजदूर दलित हैं और लगभग 3 प्रतिशत आदिवासी हैं। इन तबकों को शोषण और उत्पीड़न की दोहरी मार झेलनी पड़ती है क्योंकि वे अपने दैनिक जीवन में भयंकर भेदभाव और हिंसा का भी सामना करते हैं।

आगामी चुनावों में राज्य की मतदाता सूची में लगभग 7.29 करोड़ मतदाता दर्ज हैं। इसलिए, खेतिहर मजदूरों का हिस्सा कम से कम एक तिहाई तो बनता है। फिर भी, इस तबके को लेकर सब शांत और चुप है!

ज़िंदा रहने के हालात दयनीय 

बिहार में पुरुष कृषि मजदूरों की औसत मजदूरी दर मार्च 2020 में 264 रुपये प्रतिदिन थी, जो अखिल भारतीय औसत 293 रुपये से बहुत कम है, ये श्रम ब्यूरो द्वारा इकट्ठे किए गए मासिक वेतन आंकड़ों और भारतीय रिज़र्व बैंक डेटाबेस के अनुसार है। बिहार के कृषि-मजदूरों को हमेशा देश-व्यापी औसत से कम मजदूरी मिलती है। [2000 तक का नीचे चार्ट देखें]

waages chart.jpg

2005 में, जब नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब भारत के 68 रुपये की मजदूरी  के मुकाबले बिहार में मजदूरों की मजदूरी केवल 59 रुपये प्रतिदिन थी। यह पूरे देश में औसत से नीचे थी। लेकिन 2014 के बाद से, केंद्र में मोदी युग की शुरुआत के बाद बिहार में स्थितियां अधिक खराब हो गई हैं- देखें कि 2014 के बाद से लाल रेखा कैसे काली रेखा से दूर होती जाती है और कैसे उससे अलग हो जाती है। जून 2014 में, देश की औसत मजदूरी (217 रुपये) यानि बिहार से 8.5 प्रतिशत अधिक थी (यानि 200 रुपए थी)। मार्च 2020 में, यह अंतर लगभग 10 प्रतिशत तक बढ़ गया है।

मोदी शासन ने कृषि समुदाय के भाग्य को भयंकर रूप से उलट दिया है, जिसमें कृषि मजदूरों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। यदि मुद्रास्फीति का समायोजन किया जाए तो उनकी मजदूरी मुश्किल से बढ़ी है। ध्यान दें कि कृषि का काम मौसम के हिसाब से चलता है और ये मजदूरी केवल काम के महीनों में हासिल होती है। शेष वर्ष यानि चार से छह महीने के लिए कोई आय का जुगाड़ नहीं होता है। महिला कृषि श्रमिकों की मजदूरी हमेशा पुरुष मजदूरों की तुलना में बहुत कम होती है। आधिकारिक रूप से दर्ज मजदूरी आमतौर पर वास्तव में भुगतान की गई मजदूरी से अधिक होती है।

पलायन के लिए मजबूर 

भूमिहीनता, कम मजदूरी और अन्य गैर-कृषि रोजगार की कमी की वजह पलायन की प्रेरक शक्ति बन जाती है। बिहार राज्य सरकार का अनुमान है कि हालिया लॉकडाउन के दौरान लगभग 21 लाख प्रवासी मजदूर अपने पैतृक गांवों वापस आए हैं। जबकि वास्तविक संख्या अधिक होगी। यह बात सब जानते है कि बिहार के मजदूर महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली आदि कई राज्यों में काम करते हैं वे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अर्थव्यवस्था के सबसे निचले पायदानों पर काम करने के लिए पलायन करते हैं। वे पंजाब और हरियाणा के खेतों में खेतिहर मजदूर के रूप में काम कर सकते हैं या फिर दिल्ली या महाराष्ट्र में औद्योगिक इकाइयों, या निर्माण स्थलों में आकस्मिक श्रम रोजगार करने या रिक्शा खींचने या घरेलू नौकर और दिल्ली, मुंबई आदि शहरों में अन्य व्यक्तिगत सेवा श्रमिक के रूप में काम करते हैं।

एक अध्ययन में पाया गया था कि 66 प्रतिशत प्रवासी या तो भूमिहीन मजदूर थे या गैर-खेतिहर मजदूर थे। ज्यादातर प्रवासी या तो अनपढ़ थे या उन्होंने प्राथमिक स्तर तक ही पढ़ाई की थी। उनमें से सिर्फ 23 प्रतिशत ’उच्च’ जातियों” से थे जबकि बाकी दलित, आदिवासी या ओबीसी थे।

इनके लिए लड़तीं वाम पार्टियां  

अधिकांश राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने और उनके बीच अपना समर्थन बनाए रखने के लिए जाति या धर्म का इस्तेमाल करते हैं। ऐसा इसलिए है कि ये दल खेतिहर मजदूरों की पहचान एक ऐसे वर्ग के रूप में नहीं करना चाहते हैं, जिन्हें सशक्तीकरण की सख्त जरूरत है और उनके ज़िंदा रहने के हालात में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। इसलिए, इस विशाल तबके के सबसे ज्वलंत मुद्दों पर चुप्पी छाई रहती है।

बिहार के कई जिलों में, जहाँ वामपंथी आंदोलन मज़बूत है, वहाँ अक्सर खेतिहर मज़दूर उनका समर्थन करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वामपंथियों ने भूमि, मजदूरी और नागरिक सुविधाओं के लिए लगातार लड़ाई लड़ी है, साथ ही बड़े जमींदारों और अन्य सामाजिक रूप से शक्तिशाली वर्गों के हाथों हिंसा का सामना करते हुए उनके समर्थन में खड़े रहे हैं। यह समर्थन जातिगत बाधाओं को भी तोड़ता है और आर्थिक रूप से शक्तिशाली कुलीन वर्ग के खिलाफ सभी शोषित लोगों को एकजुट करता है।

विधानसभा चुनावों में, नई विधानसभा में एक छोटे लेकिन महत्वपूर्ण वामपंथी ब्लॉक के उभरने की संभावना है। 

 

Agricultural Workers
Bihar Assembly Elections
Assembly Elections 2020
Bihar government
Nitish Kumar
Left Parties in Bihar
CPIM
CPI
Agricultural Workers’ Rights
Workers rights
minimum wage
Migrant workers

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

त्रिपुरा: सीपीआई(एम) उपचुनाव की तैयारियों में लगी, भाजपा को विश्वास सीएम बदलने से नहीं होगा नुकसान

बिहार : दृष्टिबाधित ग़रीब विधवा महिला का भी राशन कार्ड रद्द किया गया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

पश्चिम बंगालः वेतन वृद्धि की मांग को लेकर चाय बागान के कर्मचारी-श्रमिक तीन दिन करेंगे हड़ताल

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

श्रृंगार गौरी के दर्शन-पूजन मामले को सुनियोजित रूप से ज्ञानवापी मस्जिद-मंदिर के विवाद में बदला गयाः सीपीएम

बिहार : सरकारी प्राइमरी स्कूलों के 1.10 करोड़ बच्चों के पास किताबें नहीं

झारखंड : हेमंत सरकार को गिराने की कोशिशों के ख़िलाफ़ वाम दलों ने BJP को दी चेतावनी


बाकी खबरें

  • सत्यम् तिवारी
    वाद-विवाद; विनोद कुमार शुक्ल : "मुझे अब तक मालूम नहीं हुआ था, कि मैं ठगा जा रहा हूँ"
    16 Mar 2022
    लेखक-प्रकाशक की अनबन, किताबों में प्रूफ़ की ग़लतियाँ, प्रकाशकों की मनमानी; ये बातें हिंदी साहित्य के लिए नई नहीं हैं। मगर पिछले 10 दिनों में जो घटनाएं सामने आई हैं
  • pramod samvant
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेकः प्रमोद सावंत के बयान की पड़ताल,क्या कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार कांग्रेस ने किये?
    16 Mar 2022
    भाजपा के नेता महत्वपूर्ण तथ्यों को इधर-उधर कर दे रहे हैं। इंटरनेट पर इस समय इस बारे में काफी ग़लत प्रचार मौजूद है। एक तथ्य को लेकर काफी विवाद है कि उस समय यानी 1990 केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी।…
  • election result
    नीलू व्यास
    विधानसभा चुनाव परिणाम: लोकतंत्र को गूंगा-बहरा बनाने की प्रक्रिया
    16 Mar 2022
    जब कोई मतदाता सरकार से प्राप्त होने लाभों के लिए खुद को ‘ऋणी’ महसूस करता है और बेरोजगारी, स्वास्थ्य कुप्रबंधन इत्यादि को लेकर जवाबदेही की मांग करने में विफल रहता है, तो इसे कहीं से भी लोकतंत्र के लिए…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये
    16 Mar 2022
    किसी भी राजनीतिक पार्टी को प्रश्रय ना देने और उससे जुड़ी पोस्ट को खुद से प्रोत्सान न देने के अपने नियम का फ़ेसबुक ने धड़ल्ले से उल्लंघन किया है। फ़ेसबुक ने कुछ अज्ञात और अप्रत्यक्ष ढंग
  • Delimitation
    अनीस ज़रगर
    जम्मू-कश्मीर: परिसीमन आयोग ने प्रस्तावों को तैयार किया, 21 मार्च तक ऐतराज़ दर्ज करने का समय
    16 Mar 2022
    आयोग लोगों के साथ बैठकें करने के लिए ​28​​ और ​29​​ मार्च को केंद्र शासित प्रदेश का दौरा करेगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License