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भारत
राजनीति
बिहार चुनाव का तीसरा और आख़िरी दौर : भारी दिखाई पड़ रहा है महागठबंधन का पलड़ा
आज, शनिवार को तीसरे चरण के चुनाव के दौरान 78 सीटों के लिए वोटिंग हो रही है। जिन इलाकों में चुनाव हो रहे हैं वहां ज्यादातर सीटें ग्रामीण क्षेत्र की हैं। इस क्षेत्र में एनडीए की राह बड़ी कठिन है।
सुबोध वर्मा
07 Nov 2020
Bihar election

बिहार में आज, शनिवार, 7 नवंबर को तीसरे और आखिरी दौर की वोटिंग हो रही है। 15 जिलों की 78 सीटों पर वोटर अपना वोट डाल रहे हैं। इनमें से 13 सीटें सुरक्षित (अनुसूचित जातियों लिए) हैं। 

राज्य की जिस उत्तर पट्टी में वोटिंग हो रही वह नेपाल की सीमा से सटी हुई है। यह इलाका पश्चिम में पश्चिम चंपारण और पूरब में कटिहार पूर्णिया और किशनगंज तक पसरा हुआ है। पूरब का इलाका पश्चिम बंगाल की सीमा से सटा है। इसमें मिथिला और सीमांचल जैसे ऐतिहासिक इलाके समाए हुए हैं। यहीं पर गांधी के चंपारण आंदोलन की भूमि है, जहां उन्होंने 1917 में नील की खेती करने वाला किसानों के लिए सत्याग्रह का प्रयोग किया था।

इस इलाके के पोर-पोर में समाए सामंती शोषण और किसानों की जिंदगी को यहां पैदा हुए साहित्य के दो दिग्गजों फणीश्वर नाथ रेणु और नागार्जुन ने अपनी रचनाओं में बड़े ही जबरदस्त ढंग से उकेरा है। रेणु ने ‘मैला आंचल’ और अपनी दूसरी रचनाओं में इसका बड़ी ही खूबसूरती से चित्रण किया है। वहीं बाबा नागार्जुन ने ‘बलचनमा’ और अपनी दूसरी साहित्यिक रचनाओं में यहां के माहौल को सजीव बना दिया है।

घनी आबादी वाले इस विस्तृत इलाके में दो करोड़ से अधिक वोटर हैं। ज्यादातर इलाका ग्रामीण है। सिर्फ 11 शहरी और अर्धशहरी विधानसभा क्षेत्र हैं। बाकी सभी 58 चुनाव क्षेत्र ग्रामीण हैं। धान और गेहूं मुख्य फसल है लेकिन बिहार में गन्ना और मक्के की सबसे ज्यादा उपज यहीं होती है। इस इलाके के मक्का और गन्ना किसान लंबे समय से अपनी पैदावार की सही कीमत ने मिलने से परेशानी में फंसे हैं। शुगर मिल और मक्का खरीदने वाली बड़ी कंपनियां किसानों की फसल की बेहद कम कीमत देती हैं ।

तीसरे चरण के तहत जिन 78 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं उनमें 25 ऐसी हैं, जिनमें मुस्लिमों की खासी आबादी है। दूसरे चरण में 17 ऐसी सीटें थीं, जहां मुसलमान वोटर अच्छी संख्या में हैं। पहले चरण में ऐसी 11 सीटें थीं।

चुनावी गणित

2015 में जब नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड, लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने महागठबंधन बना कर चुनाव लड़ा था तो उन्होंने इस इलाके में जबरदस्त कामयाबी हासिल की थी। महागठबंधन को यहां 55 सीटों पर जीत मिली थी। आरजेडी को 20, जनता दल यूनाइटेड 23 और कांग्रेस को 11 और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को 1 सीट मिली थी। बीजेपी सिर्फ 20 सीटें ही जीत पाई थी। अन्य दूसरे दलों के खाते में गई थीं। इसके बाद नीतीश कुमार ने 2017 में पाला बदल कर बीजेपी के साथ सरकार बना ली।

इस बार पार्टियों का गठजोड़ अलग-अलग है। बीजेपी, जनता दल यूनाइटेड के साथ है। इस गठबंधन में जीतन राम मांझी  की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्यूलर) भी है। वहीं, महागठंधन में पुराने सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस है। उनके पास वामपंथी पार्टियों का पूरा धड़ा है। हालांकि वामपंथी पार्टियां यहां छोटी ताकत हैं लेकिन कुछ इलाकों में इनकी मजबूत मौजूदगी है। इसके साथ ही आंदोलनकारी कार्यकर्ताओं की एक समर्पित पीढ़ी भी इस गठबंधन को मजबूत बना रही है।

तीसरे चरण में बीजेपी इस पट्टी में 35 सीटों पर लड़ रही है, जबकि जनता दल यूनाइटेड 37 सीटों पर किस्मत आजमा रहा है। हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्यूलर) और विकासशील इंसान पार्टी यानी VIP  क्रमश: एक और पांच सीटों पर लड़ रही हैं। महागठबंधन की पार्टियों की बात करें तो आरजेडी 46 और कांग्रेस 25 सीटों पर लड़ रही हैं। बाकी की सात सीटों पर वामपंथी पार्टियां लड़ रही हैं।

दिवंगत राम विलास पासवान पार्टी के बेटे चिराग पासवान की अगुआई वाली पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (LJP)  41  सीटों पर लड़ रही है। इनमें में से 35 सीटें ऐसी हैं, जहां जनता दल यूनाइटेड लड़ रही है। एलजेपी ने इस तीसरे चरण समेत किसी भी सीट पर बीजेपी के खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है।

एलजेपी के इस पैंतरे से जनता दल (यूनाइटेड) की डूबती नैया को और झटका लग सकता है। इससे पूरे बीजेपी गठबंधन की सीटें कम हो सकती हैं। कुछ लोगों का मानना कि यह पूरा नाटक बीजेपी का रचा हुआ है। इसने एनडीए के घटक दलों को हतप्रभ कर दिया है, हालांकि लोगों को इससे कोई खास अचरज नहीं हुआ है। वह शायद पहले से ही अलोकप्रिय नीतीश सरकार को उखाड़ फेंकने का मन बनाए बैठे हैं।

इस चरण में एक और महा गठबंधन चुनाव लड़ रहा है। छोटी पार्टियों का यह गठबंधन ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्यूलर फ्रंट के झंडे तले चुनाव लड़ रहा है। अलग-अलग तरह की खास पार्टियों के इस गठबंधन को वोटरों की थोड़ी-बहुत तवज्जो मिल सकती है। इस महा गठबंधन में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद मुसलमिन, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) , बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी), समाजवादी जनता दल (डेमोक्रेटिक), जनवादी पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी शामिल हैं। वे दावा करती हैं कि वे मुस्लिमों, दलित समेत अलग-अलग जातियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। भले ही इसके घटक दलों की इस इलाके में मौजूदगी सीमित है लेकिन उन्हें उम्मीद है कि सीमांचल (उत्तर पूर्व बिहार) में मुस्लिम वोटरों का एक धड़ा उनके ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्यूलर फ्रंट के उम्मीदवारों को वोट देगा।  

विश्लेषकों का मानना है कि इस गठबंधन की वजह से कुछ वोटर महागठबंधन (आरजेडी, कांग्रेस और दूसरे दल) से छिटक सकते हैं। इससे सत्तारूढ़ गठबंधन की स्थिति मजबूती हो सकती है। हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि एलजेपी और एआईएमआईएम, बीएसपी, सुहेलदेव समाज पार्टी जैसी छोटी पार्टियों के गठबंधन को बीजेपी ने आगे बढ़ाया है। बीजेपी इससे दो मकसद साधना चाहती है। पहला, वह चुनाव जीतना चाहती है और दूसरा, जनता दल यूनाइटेड से बड़ी पार्टी बन कर उभरना चाहती है।

बीजेपी-जनता दल (यूनाइटेड) ने हथियार डाले?

बिहार में अब तक के चुनाव अभियान और तीसरे चरण के चुनाव अभियान के दौरान भी सत्तारूढ़-जनता दल यूनाइटेड सरकार के खिलाफ लोगों में गुस्सा दिखा। सरकार कई मोर्चों पर नाकाम रही है। उसके कामकाज से लोग खफा हैं। सरकार किसानों की दिक्कतें दूर करने में नाकाम रही है। कोरोना संक्रमण के दौरान भी इसका प्रदर्शन काफी लचर रहा। बिहार में आने वाली बाढ़ की समस्या से प्रभावी तरीके से निपटने में यह नाकाम रही है। (तीसरे चरण के मतदान जिन इलाकों में हो रहा उन्हें बाढ़ से बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा है)। सबसे ज्यादा लोग राज्य में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या से नाराज हैं। सरकार इसे काबू करने में बिल्कुल नाकाम दिख रही है।

इन वजहों से मतदाताओं को महागठबंधन एक मजबूत विकल्प के तौर पर दिख रहा है। वोटरों को लग रहा है कि यही गठबंधन बीजेपी-जनता दल यूनाइटेड को हरा सकता है। राज्य में महागठबंधन के पक्ष में भारी लहर दिख रही है। लोगों में नीतीश कुमार के नेतृत्व के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा है। यही वजह है कि नीतीश कुमार ने यह कह कर अपना आखिरी दांव खेला है कि यह उनका आखिरी चुनाव होगा। यह कह कर एक तरह से उन्होंने अपनी हार मान ली है। हालांकि उनमें सत्ता पर काबिज होने की ललक बाकी है। इस चुनाव को अपना अंतिम चुनाव कह कर आखिरी वक्त में भी वह कुछ सहानुभूति वोट खींच लेना चाहते हैं। 

लोगों के इस गुस्से और असंतोष का एक सीधा असर यह पड़ा है कि इसने जाति और समुदाय के बाड़ों को तोड़ दिया है। पारंपरिक जातीय गणित से ऊपर उठ कर लोग इस अलोकप्रिय शासन को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। ऐसा बार-बार होता है, इसके बावजूद न तो चुनाव विशेषज्ञ इसे मानते हैं और न मीडिया इसे स्वीकार करना चाहता है। ऐसा लगता है कि आखिरी चरण के चुनाव इस सरकार की किस्मत तय कर देंगे। शायद यह मौजूदा बीजेपी-जनता दल यूनाइटेड की सरकार की विदाई बेला साबित होगी।

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