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सरकार से किसानों के भिड़ंत के दौर में बिहार के ‘किसान चौपाल’ का हाल
जनता की तरफ से कृषि सहायकों पर सवालों की बौछार कर दी गई। बेचारे सहायक अब इस बात का क्या जवाब दें कि प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के तहत बटाईदार के खाते में पैसा क्यों नहीं आता? पैसा मालिक के खाते में क्यों आता है?
अजय कुमार
15 Dec 2020
‘किसान चौपाल’

“सरकारी काम है। लोग समय पर नहीं आते हैं। सुबह 10:00 बजे की बैठक है तो इसका मतलब अधिकारी और जनता दोनों को पता है की बैठक शुरू होते होते तकरीबन 12:00 बज जाएंगे।” सरकार और जनता के बीच लाचारी की इस भावना को बिहार राज्य के प्रखंड मधुबनी और पंचायत दौनाहा के कृषि सहायक अरविंद कुमार ने बयान किया।

अरविंद कुमार दौनाहा पंचायत में किसान चौपाल लगाने के लिए तकरीबन दो दिन से जुटे हुए थे। तकरीबन तीन सौ से ज्यादा ग्रामीणों को कॉल किया था। रास्ते पर चलते हुए सुबह से ही सब को बताते चल रहे थे कि किसान चौपाल है। आप सब सुबह 10:00 बजे आ जाइएगा। मैं भी उनके साथ ही था। मैंने उनसे कहा कि अगर किसान चौपाल है तो एक रिक्शा पर माइक के साथ पूरे पंचायत में तो एलान कराया ही जा सकता है कि अमुक तारीख को किसान चौपाल है सारे ग्रामीण वासियों की किसान चौपाल में मौजूदगी उन्हीं के लिए फायदेमंद होगी। इस बात को सुनते ही अरविंद कुमार ने कहा कि ऐसा नहीं कि इस पर हमने सोचा नहीं। हम सबने भी इस पर खूब सोचा है। लेकिन हमारी नौकरी कॉन्ट्रैक्ट पर मिली हुई नौकरी है। सरकार से महीने में हमें कुछ पैसा मिलता है। इसके सिवाय कुछ नहीं मिलता। अगर आप भी कहीं रिपोर्ट करने जाते होंगे तो आपका संस्थान आपका खर्च उठाता होगा। लेकिन कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले हम जैसे कामगारों के साथ ऐसा नहीं है। हम अगर दिन भर किसान के कामों की वजह से ही पंचायत में चक्कर मारे तो हमें ही उसका खर्चा उठाना पड़ता है। ऐसे में बहुत मुश्किल है कि हम प्रचार करवा पाए। लेकिन फिर भी मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। फोन पर ही इतने लोगों से बात कर लिया की किसान चौपाल की खबर पूरे गांव में पहुंच गई होगी।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या लोग पहुंचेंगे? उन्होंने कहा- “मैं अपने कामकाज के अनुभव से बता सकता हूं कि लोग ऐसे आयोजनों में बहुत कम भागीदारी करते हैं। जबकि जब तक वह खुलकर भागीदारी नहीं करेंगे तब तक ऐसे आयोजन बेमतलब के रह जाएंगे। हमारा तो काम है। हम उन योजनाओं को लोगों तक पहुंचाते हैं जो बिहार सरकार द्वारा लोगों के लिए बनाई गई हैं। हम कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले लोग हैं। हमारी हैसियत बहुत छोटी है। लोग हमसे ऐसे सवाल करते हैं जिनका जवाब हमारे बूते से बाहर की बात है। अब आप ही बताइए हम इसका क्या जवाब दे सकते हैं की पैक्स में अनाज की खरीदारी नहीं हो रही है। हम तो केवल इतना ही बता सकते हैं कि यहां की जमीन पर केले की अच्छी खेती की जा सकती है। केले की खेती करने के लिए सरकार ऐसे सहयोग दे रही है। आप इन सरकारी सहयोग का इस तरह की से फायदा उठा सकते है। यही हमारा काम होता है। अजीब है लोग चुनाव के समय जाति, भाजपा, कांग्रेस, लालू और तेजस्वी की चर्चा करते हैं। जबकि जब किसान चौपाल लगता है तो हमसे पूछते हैं कि उनके अनाज की वाजिब कीमत क्यों नहीं मिल रही है? हमें चोर समझते हैं। आप ही बताइए हम क्या कर सकते हैं।”

यह सारी बातें अरविंद कुमार किसान चौपाल तक पहुंचने के रास्ते में चलते हुए मुझे बता रहे थे। रुक रुक कर लोगों से बात कर रहे थे। और लोग किसान चौपाल में आने के दिलासा देती बातों से ऐसा लग रहा था जैसे मानो वह कह रहे हो कि जिंदगी में और भी काम है, इस फिजूल काम के सिवा। हम क्या करने जाएं? कौन सा सरकार हमारी जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव कर देगी। ऐसे ही बातों के बीच अरविंद कुमार ने मेरी मुलाकात वार्ड मेंबर बलराम चौहान से करवाई।

चौहान साहेब नल जल योजना के तहत हो रही धांधली के बारे में बताने लगे। उन्होंने नल जल योजना के तहत लगी खराब किस्म के नलों को मुझे दिखाया। और कहा कि हमने बड़ी ईमानदारी से काम किया। लेकिन जिस कंपनी से यह नलें मिली है। उसकी वजह से हर दिन कोई न कोई शिकायत आती है कि पाइप में लगा यह नल टूट गया। पाइप किस इलाके से लीकेज मार रहा है। हम हर दिन परेशान होते हैं।

समय के मुताबिक किसान चौपाल की जगह पर हम 10 बजे से पहले ही पहुंच चुके थे। लेकिन वहां कोई नहीं था। धीरे-धीरे लोग आना शुरू हुए। लोगों को इकट्ठा करने के लिए थोड़ी सी टेक्टिस भी लगानी पड़े। वार्ड मेंबर चौहान ने इसकी जिम्मेदारी ली। सड़क से गुजरते हर इंसान को रोककर कहते हैं कि बिहार सरकार की कोई योजना आई है। आज फॉर्म भरने का दिन है। अगर फॉर्म नहीं भरा गया तो पैसा नहीं मिलेगा। लोग पैसे की बात सुनकर रुक जाते। लेकिन जैसे ही चौहान को लगता कि हो सकता है कि लोग किसी जरूरी काम से कहीं जा रहे हैं तो वह वैसे ही कह देते कि अगर कोई जरूरी काम है तो आप जाइए जल्दी से निपटा कर आइए।

इस तौर तरीके का जिक्र मैंने इसलिए किया कि ताकि आप सब समझे कि जनता और सरकार के बीच आपसी संवाद का रिश्ता किस तरीके से काम करता है।

धीरे धीरे किसान चौपाल पर लोगों का मजमा जमने लगा था। अच्छी खासी भीड़ हो गई थी। कृषि सहायक के पद पर काम करने वाले कर्मचारी सरकार की योजनाएं किसानों को बता रहे थे। किसान सुन रहे थे। उनके सामने अपनी परेशानी रख रहे थे। कृषि सहायक के पद पर बोल रहे कर्मचारी की तरफ से कहा जा रहा था कि बिहार सरकार 10 लीटर डीजल 5 एकड़ से कम जमीन वालों को सब्सिडी पर देगी। परंपरागत तरीके से खेती करने पर बहुत अधिक खर्चा लगता है। सरकार द्वारा नए-नए मशीन खरीदने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। किसान अपने रजिस्ट्रेशन संख्या से मशीनें खरीदें। कुल खर्चे के 10 फ़ीसदी लागत का भुगतान किसान करें। बाकी 90 फ़ीसदी का भुगतान सरकार करेगी। पंपिंग सेट से सिंचाई करने पर डीजल बहुत अधिक खर्च होता है। पानी बहुत अधिक लगता है। और फसलों की सिंचाई भी सही नहीं हो पाती है। इसलिए किसानों को ड्रिप इरिगेशन का इस्तेमाल करना चाहिए। छोटे छोटे किसान साथ में आकर बड़े भूखंड पर ड्रिप इरिगेशन का इंतजाम करवाए। यह केला जैसी खेती के लिए बहुत अच्छा है। सरकार इस पर 90 फ़ीसदी सब्सिडी देगी। यह सारी बातें कृषि सहायक की तरफ से की जा रही थी। लोगों की भीड़ अच्छी खासी थी लेकिन बहुत ज्यादा नहीं थी।

तकरीबन 80 से 90 लोग मौजूद थे। सरकारी योजनाएं कृषि सहायकों द्वारा बताई जा रही थी। जिनके पास पावर ना के बराबर थी। इसलिए जैसे ही कृषि सहायकों द्वारा कोई योजना बताई जाती। वैसे ही कोई भीड़ से खड़ा होकर कहता "ई साहेब आप यह बताइए कि क्या सरकार गरीबों के लिए होती है?" हम जैसे गरीबों का इसमें क्या फायदा है? हम तो पूरे साल 30 हजार रुपया नहीं कमा पाते तो 30 हजार की मशीन क्या खाक खरीदेंगे? कोई कहता कि मेरे पास तो जमीन ही नहीं है दूसरे की जमीन पर काम कर रहा हूं। मेरे लिए सरकार ने क्या किया है? मुझे आधा हिस्सा भी जमीन के मालिक को देना पड़ता है और जमीन के मालिक के पास सारी सरकारी मदद भी आती है। तो हम जैसे लोगों का क्या होगा? कोई कहता कि यूरिया की बोरी तकरीबन 400 रुपये में बिक रही है लेकिन साहब कहे थे कि यूरिया की बोरी 266 रुपये से अधिक की नहीं बिकेगी। साहब यह बताइए क्यों हो रहा है?

माहौल केवल एक तरफा नहीं था। जनता की तरफ से कृषि सहायकों पर सवालों की बौछार कर दी गई। बेचारे सहायक अब इस बात का क्या जवाब दें कि प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के तहत बटाईदार के तहत खेती करने वाले किसान के खाते में पैसा क्यों नहीं आता? पैसा मालिक के खाते में क्यों आता है? इस बात का क्या जवाब दें कि 6 महीने पहले ही मशीन खरीदी गई थी लेकिन अभी तक इसकी सब्सिडी सरकार ने खाते में नहीं डाली है? इन सारे सवालों को जैसे तैसे टरकाया जा रहा था। उनकी जगह पर कोई भी रहता तो शायद यही काम करता।

मैं भी इस माहौल में कुछ किसानों से नए कृषि कानून से जुड़े विरोध के बारे में पूछ रहा था। सबने एक ही जवाब दिया कि पंजाब के किसान दिल्ली बॉर्डर पर डटे हुए हैं। एमएसपी की बात कर रहे हैं। लेकिन हमें ठीक से नहीं पता कि मुद्दा क्या है? TV वाले तो उन्हें विपक्ष की साजिश बता रहे हैं।

उनकी बातें ठीक भी थी। आखिरकार बिहार कि किसी पिछड़े इलाके का किसान गोदी मीडिया के दौर में नए कृषि कानूनों के बारे में कैसे कुछ अच्छी तरह से जान पाएग? उसके भीतर कई सारे सवाल तो होंगे ही। उनकी बातें सुनकर मैंने अरविंद कुमार से कहा कि अगर मुमकिन हो तो कृषि कानून से जुड़े मसले पर किसान चौपाल से बातचीत करने की इजाजत मिल सके तो थोड़ा मैं भी किसानों को कृषि कानून पर कुछ बता दूं। मेरा निवेदन स्वीकार लिया गया।

मैंने बड़ी संक्षिप्त में उन्हें एमएसपी, एपीएमसी मंडी और कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े कुछ बेसिक बातों को बता दिया। अंत में उनसे यह भी पूछा कि अब आप ही बताइए कि क्या सही है क्या ग़लत। क्या किसानों को उनकी उपज की वाजिब कीमत मिलना चाहिए या नही? अगर मांग वाजिब है तो किसानों को सरकार से लड़ने का हक है या नहीं। इस पर तकरीबन सभी किसानों ने एक आवाज में चिल्ला कर कहा कि पंजाब के किसान जबरदस्त लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके बाद किसान खुद मेरे पास आकर अपनी परेशानी बताने लगे।

रमेश गिरी कहते हैं कि इसीलिए हमसे अनाज खरीद कर लोकल व्यापारी जमा करता है। और जब सरकार एमएसपी का ऐलान करती है तब जाकर पैक्स में बेच देता है। हमें पैसे की जरूरत होती है। भंडारण करने की कोई जगह नहीं होती है। घर में ही बोरे में कसकर अनाज रखते हैं। हमें तो मजबूरी में बेचना ही पड़ता है। वह भी औने पौने दाम में। अबकी बार तो 900 रुपये क्विंटल धान बेचा है। जबकि सरकारी दाम 1800 रुपए क्विंटल से अधिक है। एमएसपी की गारंटी तो मिले ही मिले लेकिन ऐसी भी व्यवस्था बने की एमएसपी का पूरा पैसा हमें ही मिले। जो हम से खरीदे वह एमएसपी पर ही खरीदें। ऐसा ना हो कि मंडी में जाकर ही MSP मिले। पंजाब के किसानों को जिंदाबाद।

तभी रामचरण यादव कहते हैं कि मैं बड़ा दुखी होता हूं। जब देखता हूं कि जिस प्याज को मुझ से केवल 10 रुपये किलो के हिसाब से खरीदा गया। वही प्याज बाजार में 80-90 रुपए किलो भाव में बिक रही है। पता नहीं यह कैसे होता है। इस पूरी कड़ी को ठीक करना जरूरी है। आपकी बातों से यही लग रहा है की बॉर्डर पर किसान इसीलिए डटे हुए हैं कि उन्हें सही कीमत मिले। लेकिन हम बिहार के किसान क्या कर सकते हैं पता नहीं।

भोलू पासवान भी इस बात में हां में हां मिलाते हैं। और कहते हैं कि मेरे पास 2 बीघा जमीन है। घर में खाने वाले 15 लोग हैं। कैसे होगा? लड़के सब बिना पढ़े लिखे रह जाते हैं। बाहर जाकर मजदूरी कर रहे हैं। बड़ी मुश्किल से खेती हो पाती है। मिलता कुछ भी नहीं है। धीरे धीरे खेती तो छूट ही जाएगी। कंपनी आएगी और सब ले जाएगी। अब हमसे नहीं खेती होने वाली। अब तो केवल बाबू साहब की खेती करेंगे। जिनके पास 10 बीघा से ज्यादा जमीन है।

इसी तरह की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं मिली। पंजाब के किसानों की लड़ाई के बारे में सुनकर बहुतेरे किसान उदास थे। उनकी आंखें बता रही थी कि उनके लिए लड़ने वाला कोई नहीं है। लेकिन सब मान रहे थे कि पंजाब के किसान सरकार से लड़कर बहुत अच्छा कर रहे हैं। वह अपनी मंडी बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारे यहां तो पैक्स काम करता है। जिससे हमें से बहुत सारे किसानों का कभी कोई पाला ही नहीं पड़ा।

तभी अचानक कई सारे किसान आधार कार्ड और किसान पंजीकरण संख्या लेकर आते हैं। कृषि सहायक पद के अधिकारियों से यह चेक करवाते हैं कि उनके खाते में प्रधानमंत्री किसान समृद्धि योजना के तहत मिलने वाला पैसा कब आवेगा? अब यह बहुत आसान है। किसी के हाथ में अगर मोबाइल और इंटरनेट हो तो वह खुद ही इसे चेक कर सकता है। लेकिन किसान इतने सक्षम नहीं हैं। 

अब आप जरा सोचिए कि इन किसानों को पूरी तरह से बाजार के हवाले छोड़ा जा रहा है। यह कहा जा रहा है की बिहार का किसान इंटरनेट से देखकर यह पता लगा सकता है कि कहां उसकी उपज की सही कीमत मिलेगी। वहां जाकर वह अपनी उपज बेच सकता है। यह किसान बड़े-बड़े धन्ना सेठों से कॉन्ट्रैक्ट कर सकता है। कॉन्ट्रैक्ट में ऐसी शर्ते लिखवा सकता है जिन शर्तों से किसानों को फायदा हो। ऐसा सोचते हुए आपको कुछ अटपटा नहीं लगता। मुझे अटपटा ही नहीं लगता बल्कि साफ-साफ दिखता है कि आने वाले कुछ सालों के अंदर भारत के कृषि क्षेत्र से किसान गायब होने वाले हैं और कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट की दुनिया हावी होने वाली है।

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