NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
बिहारः भूमिहीनों को ज़मीन देने का मुद्दा सदन में उठा 
"बिहार में 70 वर्षों से दबे-कुचले भूमिहीन परिवार ये उम्मीद लगाए बैठे हैं कि हमारा भी एक दिन आएगा कि जिस चटाई पर हम सोएंगे उसके नीचे की ज़मीन हमारी होगी।।" 
एम.ओबैद
14 Mar 2022
bihar

बिहार में बड़ी संख्या में भूमिहीन परिवार हैं। इनमें ज्यादातर दलित, अतिपिछड़ा, अल्पसंख्यक और अदिवासी समाज के लोग हैं। समय-समय पर भूमिहीनों को घर बनाने के लिए जमीन देने की मांग उठती रही है। इसको लेकर वाम दलों ने अक्सर आवाज बुलंद की है और आंदोलन चलाया है। बिहार की सरकारें भूमिहीनों की जमीन और घर के साथ तमाम बुनियादी चीजों की पूर्ति करने का वादा करती रही है लेकिन आज भी बिहार की बड़ी आबादी भूमिहीन है। इनमें ज्यादातर लोग ग्रामीण क्षेत्र के हैं उपरोक्त चार वर्ग के हैं।

वर्ष 2014 में वाम दल सीपीआइएमएल ने सामाजिक-आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट जारी कर बताया था कि बिहार में ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले करीब 60.74% प्रतिशत परिवार भूमिहीन हैं और सभी मानव विकास संकेतकों में वंचित पाए गए हैं। रिपोर्ट में तब बताया गया था कि इन भूमिहीनों में 44.69% एससी/एसटी, 24.31% अतिपिछड़ा, 15.76 % ओबीसी, 11.45% अल्पसंख्यक तथा शेष 3.78% अन्य जाति और वर्ग के हैं।

भूमिहीनों को जमीन देने की मांग को लेकर बिहार विधानसभा में जारी बजट सत्र में दरौली विधानसभा क्षेत्र से विधायक सीपीआइएमएल सत्यदेव राम ने सदन में भूमिहीनों को मुद्दा उठाते हुए कहा कि, "हम सरकार से हाथ जोड़कर निवेदन करेंगे कि राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की जगह पर टैक्स क्लेक्शन विभाग बनाइए। चूंकि भूमि सुधार आप नहीं कर रहे हैं बल्कि टैक्स क्लेक्शन कर रहे हैं। इसको हटा देने से आपके भी सर का बोझ खत्म हो जाएगा। बिहार में 70 वर्षों से दबे-कुचले भूमिहीन परिवार ये उम्मीद लगाए बैठे है कि हमारा भी एक दिन आएगा कि जिस चटाई पर हम सोएेंगे उसके नीचे की जमीन हमारी होगी।।"

उन्होंने कहा कि, "पानी, जमीन, हवा प्राकृतिक प्रदत्त संपत्ति है। कोई भी व्यक्ति जमीन लेकर नहीं आया है लेकिन सरकार की गलत नीतियों और पक्षपात रवैये के कारण आज बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनको एक झोपड़ी डालने की जमीन नहीं है और बहुत सारे लोग दो-दो सौ एकड़ जमीन कब्जा किए हुए हैं। वे इसके मालिक बने हुए हैं। जब यह प्राकृतिक प्रदत्त संपत्ति है तब सरकार को एक कानून बनाना चाहिए। पहले कई कानून बनी हैं लेकिन सरकार जमींदारों के पक्ष में खड़ी होकर उन कानूनों को लागू नहीं किया जिसका परिणाम आज बिहार में देखने को मिल रहा है कि कहीं मार-काट हो रही है तो कहीं झगड़े हो रहे हैं।"

ज्ञात हो कि करीब पांच दिन पहले एआइडीडब्ल्यूए के बैनर तले राज्य भर से आई भूमिहीन महिलाओं ने बिहार की राजधानी पटना में प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में महिलाएं घर और जमीन की मांग को लेकर शामिल हुईं। महिलाओं ने मीडिया से बात करते हुए अपना दर्द बायां किया। उन्होंने कहा कि हम बसने के लिए सिर्फ घर और जमीन मांगते हैं। हमलोगों के पास राशन कार्ड तक नहीं है। जहां पर रहे हैं वहां के स्थानीय लोग हमलोगों को उजाड़ रहे हैं। किसी के पास एक धूर भी जमीन नहीं है कि घर बना कर रह सके। हम लोगों के पास रहने का कोई ठिकाना नहीं है।

इस मुद्दे पर सीपीआइएम के केंद्रीय समिति के सदस्य अरुण कुमार मिश्रा ने कहा कि, "बिहार में भारी संख्या में भूमिहीन हैं। इनमें ज्यादातर दलित हैं। इसके बाद अतिपिछड़ा वर्ग है। इन दो वर्गों में भूमिहीनों की संख्या काफी अधिक है। इन दोनों वर्गों के बाद अल्पसंख्यक और आदिवासी वर्ग हैं जो भूमिहीन हैं। बिहार में किशनगंज, पूर्णिया जैसे इलाकों में आदिवासी समाज के लोगों की संख्या ज्यादा है। इनमें ज्यादातर मजदूर हैं। पालयन भी सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों का होता है। ये लोग शहरों में जाकर भी मजदूरी का काम करते हैं और बाहर जाकर कंस्ट्रक्शन के काम में लग जाते हैं।"

उन्होंने आगे कहा कि, "भूमिहीन परिवार तालाब के किनारे बसे हुए हैं। सफाई के नाम पर उन्हें वहां से हटाने का काम किया जा रहा है। इसको लेकर भी लड़ाई लड़ी जा रही है। इस मामले को लेकर कुछ समय पहले बिहार के मधुबनी में संघर्ष किया गया था। यहां सरकार की तरफ से भूमिहीनों को पर्चा दे दिया गया था। इसके बावजूद यहां से लोगों को हटा दिया गया था लेकिन जब इसको लेकर संघर्ष किया गया तो उन्हें जमीन देनी पड़ी। यहां जो भूमाफिया और नौकरशाह हैं मिलीभगत से जमीन की खरीद बिक्री कर रहे हैं और उससे लोगों को हटाने की साजिश कर रहे हैं। सरकार की तरफ से घोषणा कर दी गई है कि हम जमीन खाली करेंगे लेकिन वे भूमिहीन जाएंगे कहां, सरकार ने इसका कोई विकल्प नहीं बताया है।"

साथ ही उन्होंने कहा कि, "बिहार में गैरमजरुआ, भूदान और सरकारी समेत अन्य प्रकार की जमीन करीब 22लाख के आस पास है। विधायक अजय कुमार ने विधानसभा को हाल ही में बताया है कि करीब चार-साढ़े चार लाख परिवार भूमिहीन हैं।"

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार तीन दिन पहले ही बिहार के समस्तीपुर जिला चकमेहसी थाना क्षेत्र के सोरमार पंचायत के डरोरी गांव स्थित बेसिक स्कूल के तालाब के भिंडा पर बसे करीब 50 भूमिहीन परिवारों को भूमि खाली कराने के लिए प्रशासन की तरफ से दबाव डाला जा रहा था। इससे परेशान होकर भूमिहीन इन परिवारों ने बैठक किया और आंदोलन करने का निर्णय लिया। 

Bihar
landless poor
Landless Labour
Landless Farmers
dalit
Backward
minority
tribal society
CPIM
CPIML
Arun Kumar Mishra

Related Stories

केवल आर्थिक अधिकारों की लड़ाई से दलित समुदाय का उत्थान नहीं होगा : रामचंद्र डोम

बिहार: "मुख्यमंत्री के गृह जिले में दलित-अतिपिछड़ों पर पुलिस-सामंती अपराधियों का बर्बर हमला शर्मनाक"

राजस्थान : दलितों पर बढ़ते अत्याचार के ख़िलाफ़ DSMM का राज्यव्यापी विरोध-प्रदर्शन

अनुसूचित जाति के छात्रों की छात्रवृत्ति और मकान किराए के 525 करोड़ रुपए दबाए बैठी है शिवराज सरकार: माकपा

UP Elections: जनता के मुद्दे भाजपा के एजेंडे से गायब: सुभाषिनी अली

चुनाव 2022: उत्तराखंड में दलितों के मुद्दे हाशिये पर क्यों रहते हैं?

क़ानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद बिना सुरक्षा उपकरण के सीवर में उतारे जा रहे सफाईकर्मी

जयपाल सिंह मुंडा: आदिवासी समाज की राजनीति और विचारधारा की प्राणवायु

शर्मनाक: वोट नहीं देने पर दलितों के साथ बर्बरता!

झारखंड: ‘स्वामित्व योजना’ लागू होने से आशंकित आदिवासी, गांव-गांव किए जा रहे ड्रोन सर्वे का विरोध


बाकी खबरें

  • बी. सिवरामन
    खाद्य मुद्रास्फीति संकट को और बढ़ाएगा रूस-यूक्रेन युद्ध
    04 Apr 2022
    सिर्फ़ भारत में ही नहीं, खाद्य मुद्रास्फीति अब वैश्विक मुद्दा है। यह बीजिंग रिव्यू के ताजा अंक की कवर स्टोरी है। संयोग से वह कुछ दिन पहले न्यूयॉर्क टाइम्स की भी एक प्रमुख कहानी बन गई।
  • राजेंद्र शर्मा
    कटाक्ष: सांप्रदायिकता का विकास क्या विकास नहीं है!
    04 Apr 2022
    वो नेहरू-गांधियों वाला पुराना इंडिया था, जिसमें सांप्रदायिकता को तरक्की का और खासतौर पर आधुनिक उद्योग-धंधों की तरक्की का, दुश्मन माना जाता था। पर अब और नहीं। नये इंडिया में ऐसे अंधविश्वास नहीं चलते।
  • विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: किसानों के सामने ही ख़ाक हो गई उनकी मेहनत, उनकी फसलें, प्रशासन से नहीं मिल पाई पर्याप्त मदद
    04 Apr 2022
    "हमारी ज़िंदगी ही खेती है। जब खेती बर्बाद होती है तो हमारी समूची ज़िंदगी तबाह हो जाती है। सिर्फ़ एक ज़िंदगी नहीं, समूचा परिवार तबाह हो जाता है। पक चुकी गेहूं की फसल की मडाई की तैयारी चल रही थी। आग लगी…
  • भाषा
    इमरान खान के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव खारिज किए जाने पर सुनवाई करेगा उच्चतम न्यायालय
    04 Apr 2022
    पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने देश के प्रधानमंत्री इमरान खान की सिफारिश पर नेशनल असेंबली (एनए) को भंग कर दिया है। इससे कुछ ही देर पहले नेशनल असेंबली के उपाध्यक्ष कासिम सूरी ने प्रधानमंत्री के…
  • शिरीष खरे
    कोविड-19 टीकाकरण : एक साल बाद भी भ्रांतियां और भय क्यों?
    04 Apr 2022
    महाराष्ट्र के पिलखाना जैसे गांवों में टीकाकरण के तहत 'हर-घर दस्तक' के बावजूद गिने-चुने लोगों ने ही कोविड का टीका लगवाया। सवाल है कि कोविड रोधी टीकाकरण अभियान के एक साल बाद भी यह स्थिति क्यों?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License