NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
ज़रा सोचिए: पानी का पानी तो रख लेते!
कैसा होता जा रहा हमारा समाज, जिसमें किसी को पानी पीने देना भी गुनाह है। ...ऐसा धर्म किस मुँह से विश्व-गुरु होने अथवा लोक कल्याण कारी होने का दावा करता है।
शंभूनाथ शुक्ल
15 Mar 2021
ज़रा सोचिए: पानी का पानी तो रख लेते!
पानी पीने पर बच्चे को पीटने के आरोपी शृंगी यादव को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है। फोटो साभार : अमर उजाला

ग़ाज़ियाबाद ज़िले में डासना के क़रीब एक मंदिर में जब दूसरे समुदाय का एक बच्चा पानी पीने गया तो मंदिर के सेवादार शृंगी यादव ने उसे पकड़ लिया और उसका नाम पूछा। यह पता चलते ही कि वह अन्य समुदाय का है शृंगी ने अपने एक साथी को बुलाया और उसे पीटना शुरू कर दिया। जब वह अधमरा हो गया, तब छोड़ा। और इस पिटाई कांड का वीडियो भी सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया। इस तरह की घटनाएँ सन्न कर देती हैं। कैसा होता जा रहा हमारा समाज, जिसमें किसी को पानी पीने देना भी गुनाह है।

पीड़ित बच्चा

अभी कोई ज़्यादा समय नहीं बीता, जब दिल्ली में जगह-जगह पौशाले (प्याऊ) दिख जाते थे। चिलचिलाती धूप और गर्मी में लोग वहाँ जाकर अपनी प्यास बुझाते। कई जगह तो गुड़ भी मिलता। ये पौशाले प्रशासन भी खुलवाता और कुछ चैरिटी वाले भी। लेकिन फिर पानी बिकना शुरू हुआ। और पाँच-दस पैसे फ़ी गिलास शुरू हुआ पानी 20 रुपए बोतल तक पहुँच गया। पानी का धंधा अब इतना बड़ा हो गया है, कि अब लोग मरते हुओं के मुँह में भी पानी न डालें।

लेकिन ग़ाज़ियाबाद की यह घटना थोड़ी अलग है। यह मामला एक दीगर धर्म के मानने वाले को पानी पीने से मना करने का है। हमारा समाज अब इतना असहिष्णु हो गया कि अब किसी भिन्न समुदाय के व्यक्ति को पानी नहीं पीने देंगे। जबकि पानी का नल सार्वजनिक है। एक ऐसे समाज से कैसे उम्मीद की जाए कि आने वाले वर्षों में वह आधुनिक होगा। वह बराबरी, समरसता अथवा सहिष्णुता का वाहक बनेगा? ऐसा धर्म किस मुँह से विश्व-गुरु होने अथवा लोक कल्याण कारी होने का दावा करता है। मुझे ख़ुद याद है, कि हमारे बचपन में किसी प्यासे को लोग घर से मँगा कर पानी पिला देते थे। अब क्या संभव है, कि कोई प्यास व्यक्ति किसी का दरवाज़ा भड़भड़ा कर पानी की माँग करेगा?

इस संदर्भ में पानी को लेकर मैं एक कथा सुनाना चाहूँगा।

यह 1972 की बात है। हमारे चाचा इटावा जिले के गांव मेंहदी पुर में ग्रामसेवक के पद पर नियुक्त थे। उसी साल गर्मियों की छुट्टियों में जब मैं गांव गया हुआ था मेरी दादी ने कुछ काम से मुझे उनके पास भेजा। लंबा सफर था और बस पकडऩे के लिए ही चार कोस यानी आठ मील अर्थात करीब 13 किमी दूर मूसानगर जाना था जो यमुना किनारे मुगल रोड पर बसा एक कस्बा है। उमर भी तब कोई खास नहीं थी इसलिए दादी को डर भी था कि लड़का उतनी दूर पहुंच जाएगा। खैर मैं सुबह चार बजे घर से निकला। साढ़े छह बजे मूसानगर पहुंच गया और सात बजे वाली बस मिल गई जो इटावा जा रही थी। भोगनीपुर, सिकंदरा, औरय्या, अजीतमल होती हुई बस जब महेवा पहुंची तब तक डेढ़ बजे चुके थे। भूख और प्यास दोनों तेज लगी थी और जेब में पैसे किराया निकाल देने के बाद बस दो या तीन रुपये बचे थे। तब होटल तो होते नहीं थे और पानी की बोतलें नहीं मिला करती थीं। कुएं पर पानी भरती कोई घटवारिन पानी पिला दे तो ठीक पर ऐन जेठ की दुपहरिया को कौन पानी भरने आता। सो अजीब-से पशोपेश में मैं रहा। किसी के घर का दरवाजा खटखटाने में झिझक हो रही थी। एक जगह एक नीम के पेड़ के नीचे एक बूढ़ा आदमी बैठा था। सफेद दाढ़ी-मूंछ बेतरतीब रूप से बिखरे, लंगोट नुमा एक कपड़ा शरीर पर और एकदम काला। मैंने उसके पास जाकर कहा- बाबा प्यास लगी है। पानी मिलिहै? वह जो मेरे करीब आते ही उठ खड़ हुआ था बोला- साहब हम तो चमार हैं आप यादव जी के घर चले जाओ। उसने रास्ता भी बता दिया। मैंने कहा बाबा प्यास बड़ी जोर से लगी है मुझे पिलाय देव। वह बोला- साहब कोहू ने देख लओ तौ तुम्हाओ तो कछू न हुइहै पै हमाई चमड़ी उधेर दीन जइए। उसकी जिद के चलते मुझे प्यासा ही आगे बढऩा पड़ा।

किसी तरह थूक चाटते हुए मैं आधा मील बढ़ा होऊँगा तो पाया कि खेतों की सीमा खत्म होने लगी और अब बीहड़ व ऊबड़-खाबड़ रास्ता मिलने लगा। माथे पर हथेली टिकाकर मैंने दूर तक देखने की कोशिश की तो गांव तो क्षितिज तक बस बीहड़। या ऊँचे-ऊँचे कगार। यह जमना के किनारे का इलाका था जो मीलों तक फैला था। मैं यूं ही टहलते हुए जमना तक जा सकता था पर जमना कितनी दूर है पता नहीं और अगर भटक गया तो कहां जाकर लगूंगा कुछ पता नहीं। न खाने को कुछ न पीने को ऊपर से डकैतों का डर अलग। पर अब जाता तो कहां और मेंहदीपुर गांव का पता पूछता तो किससे। अजीब मुसीबत थी। हिम्मत जवाब देने लगी और लगा कि यहां अगर भूख प्यास से तड़प कर मर भी गया तो महीनों तक पता तक नहीं चलेगा कि कोई मर भी गया। सांसें जवाब देने लगी थीं। कब तक जीभ को थूक से लथेड़ता। गर्म हवा (लू) भी चल रही थी। और छाया के नाम पर न तो आम या इमली, नीम या पीपल के पेड़ न कोई और पौधा जो करील थे भी वे बस टांगों तक आते। अगर कगार के नीचे जाऊँ तो क्या पता कि कहां कौन सा जानवर बैठा होगा। और करील की पत्तियां चबाई नहीं जा सकती थीं। एक बड़ा-सा बबूल का पेड़ दिखा। मैं उसी के नीचे बैठ गया। आसपास कांटे बिखरे पड़े थे उन्हें किसी तरह हटाया और आराम से पसर गया। आध घंटे बाद फिर आगे बढऩे की सोची।

अचानक एक कगार से उतरते ही मुझे कुछ लोगों के बतियाने की आवाज सुनाई दी। आवाज सुनते ही मुझे लगा कि जैसे मेरे प्राण लौट आए हैं। भागते हुए वहां पहुंचा जहां आवाजें आ रही थीं। वह एक पौशाला थी। एक झोपड़ी बनी थी और दो बड़े-से मटके जमीन में गड़े थे जिनमें पानी भरा था। वहां एक और आदमी था और वे दोनों बतिया रहे थे। मैंने जाते ही कहा- बाबा पानी पिलाओ। बूढ़े ने एक लोटा भरकर मुझे दिया और मैंने पीने के वास्ते चिल्लू बनाया। वह बोला- रुको लल्ला गुर तो खाय लेव। यानी पानी के पहले उसने मुझे एक भेली गुड़ दिया और उसके बाद मैंने पूरा लोटा पानी पिया। लगा जैसे जान मिली। तब दोनों की ओर मैंने देखा। पानी पिलाने वाला एक बुजुर्ग था और वह एक अधेड़ आदमी से बतिया रहा था। मैंने उससे पूछा कि बाबा मेंहदीपुरा कहां है। उसने कहा कि बस आध कोस है और वो देखो मेंहदीपुरा के खेत दिखाई देत हैं। फिर उसने पूछा कि किसके यहां जाना है? मैने चाचा का नाम लिया तो बोला कि ग्रामसेवक बाबू सुबह तो आए थे। चले जाओ।

मैं आधा घंटे बाद मेंहदीपुरा पहुंच गया। चाचा-चाची और भाई-बहनों से मिला। चाचा को प्याऊ के बारे में बताया तो उन्होंने सूचना दी कि यह पौशाला एक नामी डकैत ने खुलवाई हुई थी और गुड़ का इंतजाम वही करता था और उस पौशाले वाले बुजुर्ग को 50 रुपये महीना भी देता था। यह सही है कि यह पौशाला डकैतों के भी काम की थी मगर मेरे जैसे भटके राहगीरों के लिए तो यह ईश्वरीय वरदान थी। अगर वह पौशाला न मिलती और ठंडा पानी न मिलता तो शायद यह लिखने के लिए मैं जिंदा नहीं रह पाता।

पहले दिल्ली शहर में भी सेठ लोग पौशाला खुलवाते थे। पेठा भी मिला करता था लेकिन अब बोतल खरीदो। पहले हर जिले में डीएम भी पौशाले खुलवाया करता था साथ सत्तू-पानी भी पर अब रेलवे ने एक रुपया गिलास पानी देना शुरू कर दिया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Ghaziabad
Ghaziabad temple
Boy Beaten in Temple
Boy beaten for drinking water

Related Stories


बाकी खबरें

  • Oxfam report
    अब्दुल रहमान
    सरकारों द्वारा होने वाली आर्थिक हिंसा की तरह है बढ़ती असमानता- ऑक्सफ़ैम रिपोर्ट
    20 Jan 2022
    रिपोर्ट अपने दावे में कहती है कि ग़लत सरकारी नीतियों के चलते असमानता में भारी वृद्धि हुई है। शुरुआती 10 अमीर पुरुषों ने, मार्च 2020 में महामारी की शुरुआत के बाद से नवंबर 2021 तक अपनी संपत्ति दोगुनी कर…
  • election commission
    न्यूज़क्लिक टीम
    चुनाव आयोग की विश्वसनीयता ख़त्म होती जा रही है
    19 Jan 2022
    चुनाव आयोग की जो विश्वसनीयता और जो एक मज़बूती उनके नियमों में होनी चाहिए, वह इस सरकार यानी मोदी सरकार में कमज़ोर नज़र आ रही है।
  • round up
    न्यूज़क्लिक टीम
    2021 में बढ़ी आर्थिक असमानता, लगातार बढ़ते कोरोना मामले और अन्य ख़बरें
    19 Jan 2022
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हम बात करेंगे Oxfam की हालिया रिपोर्ट, कोरोना के बढ़ते मामले और अन्य ख़बरों पर।
  • rbi
    अजय कुमार
    RBI कंज्यूमर कॉन्फिडेंस सर्वे: अर्थव्यवस्था से टूटता उपभोक्ताओं का भरोसा
    19 Jan 2022
    आरबीआई ने जब कंज्यूमर कॉन्फिडेंस सर्वे में लोगों से यह पूछा कि भारत की अर्थव्यवस्था का हाल पहले से बेहतर है या पहले से खराब? तो खराब बताने वालों की संख्या, बेहतर बताने वालों से 57% अधिक निकली। 
  • akhilesh
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तर प्रदेश गरमाया! अखिलेश भी लड़ेंगे चुनाव!
    19 Jan 2022
    बोल की लब आज़ाद हैं तेरे के इस अंक में अभिसार शर्मा अखिलेश यादव के चुनाव लड़ने के फैसले पर बात कर रहे हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License