NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
भारत
राजनीति
बुंदेलखंड: सरकार को किसानों की चिंता है तो सैकड़ों बंद मंडियों को खोलती क्यों नहीं है?
सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के मुताबिक उत्तर-प्रदेश में बुंदेलखंड के सात जिलों में सूखा राहत पैकेज के तहत करीब 650 करोड़ रुपए खर्च करके 138 सरकारी मंडियां बनाई गई थीं, लेकिन इनमें से ज़्यादातर को चालू नहीं किया गया।
शिरीष खरे
03 Feb 2021
बुंदेलखंड
ललितपुर जिले की कुम्हेरी कृषि उपज मंडी। फोटो साभार: सोशल मीडिया

बात गए दिसंबर की है जब बुंदेलखंड के कई किसानों को राजधानी दिल्ली से करीब 70 किलोमीटर दूर पलवल में पुलिस ने रोक लिया था। ये किसान राशन और अन्य जरूरी सामानों को साथ लेकर केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार से अपनी मांग मनवाने दिल्ली जा रहे थे। इनकी मांग थी कि केंद्र सरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस ले। साथ ही, केंद्र सरकार कानून बनाकर समर्थन मूल्य पर ख़रीदी की गारंटी भी दे। दरअसल, बुंदेलखंड में ज्यादातर किसान दलहन और तिलहन की खेती करते हैं। इनकी शिकायत है कि सरकार बुंदेलखंड के कई इलाके में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल नहीं खरीदती है। कई सारे किसानों ने तो 'एमएसपी' का नाम तक नहीं सुना है। वजह यह है कि उनके इलाके में या तो सरकारी मंडी है ही नहीं, या फिर कई मंडियों को सालों बाद तक चालू नहीं किया गया है। ऐसे में यदि सरकार तीन नए कानून लागू करने की बजाय बुंदेलखंड के इलाके में सरकारी मंडियां खोल दे और उन्हें चालू रखते हुए सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों की उपज की ख़रीदना शुरू कर दे तो किसानों को लगता है कि इससे उनको बड़ी राहत मिलेगी।

तीन नए कृषि कानूनों को लेकर केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार यह दावा कर रही है कि ये यदि लागू हो गए तो किसानों को ख़ुला बाजार मिलेगा और वे सरकारी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज बेच सकेंगे। लेकिन, खेतीबाड़ी के नजरिए से संकटग्रस्त क्षेत्र माने जाने वाले बुंदेलखंड में यह कोई नयी बात नहीं है। इस बारे में किसान नेता महेश कुशवाहा बताते हैं कि यहां के किसान तो हमेशा से ही औने-पौने दामों पर अपनी उपज का सौदा सरकारी मंडियों के बाहर कर ही रहे हैं। ऐसा इसलिए कि कई सरकारी मंडियां बनाने के बाद भी चालू नहीं की गई हैं, इसलिए वे अपनी उपज निजी व्यापारियों को बहुत सस्ती दर पर खुले बाजार में बेचने के लिए मजबूर हैं। वहीं, कई किसानों का कहना है कि सरकार यदि नए कानूनों को लागू करने की बजाय सरकारी मंडियां चालू कर दे तो उनका कुछ भला हो जाएगा। कारण यह है कि इससे उन्हें कम-से-कम उनकी उपज का न्यूनतम मूल्य तो मिलने लगेगा।

 अपने खेत में काम करता एक बुजुर्ग किसान। फोटो साभार: बुंदेलखंड किसान सेवा

बता दें कि सूचना के अधिकार (RTI) से मिली जानकारी के मुताबिक उत्तर-प्रदेश में बुंदेलखंड के सात जिलों में सूखा राहत पैकेज के तहत करीब 650 करोड़ रुपए खर्च करके 138 सरकारी मंडियां बनाई गई थीं। बुंदेलखंड के किसानों का सवाल है कि यदि कई सौ करोड़ रुपए खर्च करके इन मंडियों को खोलना ही नहीं था तो फिर इन्हें बनाया ही क्यों गया। ऐसी मंडियां बांदा जिले में 20, महोबा जिले में 11, चित्रकूट जिले में 16, हमीरपुर में 24 जालौन में 20, ललितपुर में 24 और झांसी में 25 हैं।

इस बारे में बुंदेलखंड किसान यूनियन के नेता और महोबा निवासी सुशील खेवरिया बताते हैं, "जब केंद्र में यूपीए और उत्तर-प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी तो सूखा राहत पैकेज के तहत कई सरकारी मंडियां बनाई गई थीं। उसके बाद केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा की सरकार आ गई। इन सरकारों द्वारा बनी बनाई मंडियों को चालू नहीं किया जा रहा है। हम चाहते हैं कि ये मंडियां फिर से चालू हो जाएं। ऐसा हुआ तो अनाज भंडारण की व्यवस्था शुरू हो जाएगी और किसानों को अपनी उपज बेचने पर थोड़ा कम घाटा लगेगा।"

वहीं, इस बारे में महोबा जिले में लोधीपुरा गांव के किसान भानुप्रताप कहते हैं कि पिछले साल अप्रैल से मई इन दो महीनों में किसानों ने चौदह सौ रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से निजी व्यापारियों को अपना गेहूं बेचा। जबकि, सरकारी मंडी में सरकार ने उन्नीस सौ रूपए प्रति क्विंटल के हिसाब से गेहूं की खरीद की थी। हालांकि, उन्नीस सौ रुपए प्रति क्विंटल से की गई गेहूं की ख़रीदी भी बहुत कम थी। लेकिन, यह खुले बाजार में व्यापारियों को बेचने से फिर भी ठीक थी। बुंदेलखंड में सरकारी मंडी व्यवस्था अच्छी तरह से नहीं चल पा रही है। इसलिए मुट्ठी भर बड़े किसानों को ही इसका लाभ मिल पाता है। छोटे किसान को तो और भी अधिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। दरअसल, यहां अधिकतर किसानों द्वारा सस्ती दर पर व्यापारियों को अनाज इसलिए भी बेच दिया जाता है कि उन्हें घरेलू और अन्य कामों के लिए तुरंत नकद राशि की ज़रूरत पड़ती है।

स्पष्ट है कि केंद्र के कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे आंदोलन के बीच बुंदेलखंड के किसान अपनी उपज का उचित दाम न मिलने के कारण परेशान हैं। वहीं, महोबा जिले में जखा गांव के किसान ओमप्रकाश कहते हैं, "तूपा और बोरहारी जैसी छोटी-छोटी जगहों पर लाखों रुपए खर्च करके सरकार ने कई सारी मंडियां तो बनाई हैं, पर वहां अनाज बेचने के लिए न कोई किसान जाता है, न ही कोई अधिकारी या कर्मचारी ही दिखता है। दूरदराज के कई किसानों को तो मालूम ही नहीं है कि उनके इलाके में कोई सरकारी मंडी है। ऐसी मंडियां बस खड़ी हुई हैं, उनका कोई रखरखाव तक नहीं हो पाता है।" वे बताते हैं कि यदि सरकार इन मंडियों को चालू करा दे तो अनाज व्यापारी ख़ासकर छोटे किसानों का शोषण नहीं कर सकेंगे। यदि पंजाब और हरियाणा की तर्ज़ पर इन सरकारी मंडियों का अच्छी तरह से संचालन हो तो मंडियों में किसान बड़ी मात्रा में अपना अनाज बेच सकेंगे। ज्यादा से ज्यादा किसान वहां पहुंचेंगे और ज्यादा से ज्यादा छोटे किसानों का भी अनाज वहां बिक सकेगा।

इसी प्रकार, महोबा जिले में लोधीपुरा गांव के एक अन्य किसान शिवराम कहते हैं, "हम तो सरकारी मंडी के बाहर ही अपनी फसल बेचते रहे हैं, लेकिन खुले बाजार में सही दाम की कोई गारंटी नहीं रहती है। सरकार ज्यादा कानून न बनाए बस एक काम कर दे। वह हमें कानून में न्यूनतम मूल्य पर ख़रीदी की गारंटी दे दे। ज्यादा है तो वह यह सुनिश्चित कर दे कि कोई भी अनाज व्यापारी सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य से सौ-पचास रुपए के नीचे किसान की उपज नहीं खरीद सकता है। यदि इतना हुआ तब भी हम मुसीबत से बाहर आ सकते हैं। पर, सरकार हमारे लिए इतना भी नहीं कर रही है।" इसके अलावा शिवराम यह भी मानते हैं कि बुंदेलखंड में सिंचाई की सुविधाएं विकसित नहीं हुई हैं और यहां का जल संकट भी भयावह है। इसलिए पानी की कमी के कारण यहां के किसान साल में एक ही बार फसल ले पाते हैं। जब तक इस समस्या का समाधान नहीं होगा तब तक बुंदेलखंड में खेती की तस्वीर नहीं बदलेगी। लेकिन, उन्हें अफ़सोस है कि सरकार किसानों के बुनियादी मुद्दों पर ध्यान ही नहीं दे रही है। जाहिर है कि किसानों के नाम पर कानूनों की भरमार है, लेकिन बुंदेलखंड में खेतीबाड़ी का संकट सरकार के सामने एक सवाल है। सवाल यह है कि अब तक कई सारे कानून किसानों को लाभ पहुंचाने के नाम पर बन चुके हैं। इसके बावजूद बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में किसानों की हालत बद से बदतर क्यों होती जा रही है।

दूसरी तरफ, कई मंडियां चालू न हो पाने के कारण किसानों में असंतोष की एक अन्य वजह भी है। उन्हें किसानों के नाम पर बनीं इन मंडियों को इस तरह ढहते हुए देखना अच्छा नहीं लगता है। इस बारे में सुशील खेवरिया बताते हैं, "मंडियों की देखभाल न होने से वे जर्जर हो रही हैं, परिसर पर ताले लगे गेट जंग खा रहे हैं। भीतर घास उग आई है और सड़के टूट रही हैं। आखिर पैसा तो सरकारी खजाने से ही गया। फिर इतनी बर्बादी क्यों? इससे फायदा सिर्फ और सिर्फ ठेकादारों को हुआ है।" हालांकि, सारी मंडियां उपयोग में नहीं लाई जा रही हैं ऐसा नहीं हैं। सरकार ने कुछ सरकारी मंडियों को गोदाम में बदल दिया है। जबकि, कुछ सरकारी मंडियों को अस्थायी गौ-शाला घोषित कर दिया गया है।

(शिरीष खरे स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Bundelkhand
farmers
MSP
Farm bills 2020
Anaj mandis
RTI

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

अगर फ़्लाइट, कैब और ट्रेन का किराया डायनामिक हो सकता है, तो फिर खेती की एमएसपी डायनामिक क्यों नहीं हो सकती?

आख़िर किसानों की जायज़ मांगों के आगे झुकी शिवराज सरकार

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

MSP पर लड़ने के सिवा किसानों के पास रास्ता ही क्या है?

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा

यूपी चुनाव : किसानों ने कहा- आय दोगुनी क्या होती, लागत तक नहीं निकल पा रही

उत्तर प्रदेश चुनाव : डबल इंजन की सरकार में एमएसपी से सबसे ज़्यादा वंचित हैं किसान

उप्र चुनाव: उर्वरकों की कमी, एमएसपी पर 'खोखला' वादा घटा सकता है भाजपा का जनाधार


बाकी खबरें

  • govt employee
    अनिल जैन
    निजीकरण की आंच में झुलस रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए भी सबक़ है यह किसान आंदोलन
    28 Nov 2021
    किसानों की यह जीत रेलवे, दूरसंचार, बैंक, बीमा आदि तमाम सार्वजनिक और संगठित क्षेत्र के उन कामगार संगठनों के लिए एक शानदार नज़ीर और सबक़ है, जो प्रतिरोध की भाषा तो खूब बोलते हैं लेकिन कॉरपोरेट से लड़ने…
  • poverty
    अजय कुमार
    ग़रीबी के आंकड़ों में उत्तर भारतीय राज्यों का हाल बेहाल, केरल बना मॉडल प्रदेश
    28 Nov 2021
    मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स के मुताबिक केरल के अलावा भारत का और कोई दूसरा राज्य नहीं है, जहां की बहुआयामी गरीबी 1% से कम हो। 
  • kisan andolan
    शंभूनाथ शुक्ल
    हड़ताल-आंदोलन की धार कुंद नहीं पड़ी
    28 Nov 2021
    एक ज़माने में मज़दूर-किसान यदि धरने पर बैठ जाते थे तो सत्ता झुकती थी। पर पिछले चार दशकों से लोग यह सब भूल चुके थे।
  • Hafte Ki Baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    संवैधानिक मानववाद या कारपोरेट-हिन्दुत्ववाद और यूपी में 'अपराध-राज'!
    27 Nov 2021
    संविधान दिवस के मौके पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोपों-प्रत्यारोपो की खूब बौछार हुई. क्या सच है-संविधानवाद और परिवारवाद का? क्या भारत की सरकारें सचमुच संविधान के विचार और संदेश के हिसाब से…
  • crypto
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या Crypto पर अंकुश ज़रूरी है?
    27 Nov 2021
    मोदी सरकार क्रिप्टोकरेंसी पर अंकुश लगा रही हैI लेकिन आखिर यह क्रिप्टोकरेंसी है क्या? क्या यह देश में मुद्रा की जगह ले सकती है?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License