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भू-माफियाओं के वर्चस्व में जलती बंगाली बस्ती
आग केवल घर ही नहीं जलाती है वह उन परिवारों के सपनों को भी जला देती है जो पाई पाई इकट्ठा करके रखते हैं। इन गरीबों को फिर बांस, बल्ली, कपड़े, बर्तन जुटाने में महीनों और पहली वाली स्थिति में आने में सालों लग जाते हैं।
सुनील कुमार
21 Jul 2020
बंगाली बस्ती

दिल्ली के अन्दर शाहबाद डेयरी का नाम लेते ही लोगों के अन्दर वैसा ही भाव आता है जैसे कि देश के अन्य राज्यों में बिहार के निवासियों को देख कर आता है। शाहबाद डेयरी को देखा जाये तो यहां पर दिल्ली का इंजीनियरिंग कॉलेज भी है, अभी यहां पर रोहिणी कोर्ट के न्यायधीशों, कर्मचारियों के लिए स्टाफ क्वार्टर भी बन चुके है लेकिन लोगों के जेहन में एक अलग छवि रहती है। क्योंकि उत्तरी दिल्ली के अन्दर में यहां से सस्ते औद्योगिक मजदूर, डोमेस्टिक वर्कर मिल जाते हैं।

यहां तक कि दिल्ली को मुफ्त में स्वच्छ बनाने वाले ‘कबाड़ियों’ की बंगाली बस्ती भी इस इलाके में हैं। यह कूड़े का काम (घरों से कूड़े उठाना, रास्ते, इंडस्ट्रियल एरिया से कूड़ा चुनना) करते हैं। सरकार ‘स्वच्छता अभियान’ का नारा देकर या कुछ फोटो-सोटो खिंचवा कर भूल गई कि उसको यह कूड़े वाले अपने रोजी-रोटी के लिये ही सही इस अभियान को मुफ्त में लागू कर रहे हैं। क्योंकि कूड़ा उठाना इनके लिए, फोटो खिंचवाना और फ्रेम में सजाने की बात नहीं हैं इनके लिए यह जीविका की बात है।

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इन कूड़ा उठाने/बीनने वाले के साथ सभी जाति और धर्म के लोगों द्वारा भेद-भाव किया जाता है। यहां के लोग अपने रिक्शों से या पीठ पर कूड़े को लाद कर घर ले जाते हुये दिख जाते हैं जिसको देखकर ही लोग दूरी बना लेते हैं। अगर यह थके हों और बस या कोई पब्लिक वाहन (खाली भी हो तो) से अपने कूड़े के साथ घर जाना चाहे तो उनको इन वाहनों में यात्रा नहीं करने दिया जाता है। इनको कूड़े उठाने के लिये कोई पैसा नहीं मिलता (घरों से कूड़ा उठाने का जो पैसा मिलता है वह भी इनके जेब में नहीं आता है)। सड़क पर, इंडस्ट्रियल एरिया और इधर-उधर जो कूड़ा बिखरा होता है उसके लिये इनको कोई मजदूरी नहीं मिलती अगर कुछ मिलता है तो ‘गंदे लोग’ की उपाधि। कूड़े के ढेर में ही इनकी जिन्दगी का गुजारा होता है। कोविड-19 के समय भी वे इस खतरे वाले काम को कर रहे हैं।

शाहबाद डेयरी की मुख्य सड़क (बवाना रोड) के उत्तर अन्दर की तरफ कई बंगाली बस्तियां हैं यहां पर वे लोग रहते हैं जो मुफ्त में उत्तरी दिल्ली की सफाई का काम करते हैं। इन्हीं बस्तियों से महिलाएं रोहिणी में जाकर बहुत कम मजदूरी में डोमेस्टिक वर्कर का काम करती हैं और पुरुष घरों, सड़कों, खता और औद्योगिक क्षेत्रों से कूड़ा उठाने का काम करते हैं। जब से कूड़े का काम निजी हाथों मे दिया जाने लगा है इनके लिए परिवार चलाना और कठिन होता जा रहा है। कूड़े के गाड़ी सोसाइटी से कूड़ा उठा लेती है और उन्ही कूड़ा गाड़ियों को ये लोग पैसा देकर खरीदते हैं और कूड़ा निकाल कर अपनी जिन्दगी चलाते हैं। लेकिन यह कूड़ा गाड़ी पैसे देने के बाद भी आसानी से इनको नहीं मिलता है इसके लिए उन्हें कूड़ा डालने वाली जगह यानी खते पर इनको बेगारी स्वरूप साफ-सफाई करनी पड़ती है। 

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बंगाली बस्ती में रहने वाले लोग भले ही कबाड़ फ्री में उठाते हैं लेकिन यह जिन बस्तियों में रहते हैं वह फ्री की नहीं होती है इनको प्रति घर नहीं प्रति गज 15-25 रुपये के दर से भुगतान करना पड़ता है। दिल्ली सरकार प्रति घर 200 यूनिट फ्री बिजली दे रही है लेकिन इनको बिजली चाहिए तो कम से कम 500 रुपये महीने का भुगतान करना होता है। वह बिजली भी ऐसी दी जाती है कि इनको वोल्टेज पाने के लिए अपने घरों में अर्थिंग करनी पड़ती है। कभी बिजली के कारण तो कभी भू-माफिया के वर्चस्व में इनके घरों में आग लगती रहती है या लगाई जाती रही है जिसके कारण इनका सालों की मेहनत की कमाई से जमा किया हुआ सामान जल कर खाक हो जाता है।

15 जुलाई की रात करीब 11.15 बजे को शाहबाद दौलतपुर गांव के रामा एन्कलेव, डी 108 के झुग्गी बस्ती में आग लग गई जिसके कारण 77 परिवारों का आशियाना उजड़ गया और वर्षों से जमा किया हुआ सामान जल कर खाक हो गया। यहां तक कि कुछ लोगों के जीविका के साधन ई-रिक्शा भी जल कर खाक हो गया। रामा एन्कलेव, डी 108 में बंगाल के विभिन्न जिलों (वीरभूम के रहने वालों की संख्या ज्यादा है) के ये लोग 15 सालों से झुग्गी बस्ती डाल कर रह रहे हैं। उनको यह जमीन 25 रुपये प्रति गज के हिसाब से दिया गया है और 500 रुपये प्रति झुग्गी बिजली का देना होता है।

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15 जुलाई की शाम सलमा (40) और रोशनी (18) जो कि मां-बेटी थी करंट लगने से घर में मौत हो गई। बस्ती वालों से बिजली का पैसा तो लिया जाता है लेकिन यह बिजली उनको बिजली विभाग की मद्द से चोरी करके दिया जाता था। करंट से मृत्यु होने के कारण डर से कटीया डाल कर जो बिजली बस्ती में लाया जाता था वह उतार दिया गया और लोग मोमबत्ती जला कर अपने रोजमर्रा का काम कर रहे थे। मोमबत्ती से एक घर में आग लग जाती है और देखते ही देखते पूरी बस्ती जल कर खाक हो जाती है। जिसमें लोगों की जिन्दगी को उजड़ गई। लॉकडाउन के कारण कूड़े की कीमत आधी हो गई है तो लोग कई माह से कूड़े जमा किए हुए थे वह सब जल कर राख में बदल गया। किसी के पास जीविका को चलाने के लिए ई-रिक्शा था वह भी जल कर खत्म हो गया। वह अपने समान को निकाल नहीं सकते थे क्योंकि बस्ती से निकलने का एक ही रास्ता था और उधर आग लगी थी।

वीरभूम जिला के रहने वाली शुकुरूम बीबी बताती हैं कि उनका बेटा टिंकू शेख (22) एक पैर से विकलांग है और वह ई-रिक्शा चलाकर ही परिवार का भरण-पोषण करता था लेकिन इस आग ने उनके ई-रिक्शा को जला कर नष्ट कर दिया। शुकुरूम बीबी बताती हैं कि एक साल से कुछ पहले 1,60,000 रू. में ई-रिक्शा किश्त पर ली थी जिसका किश्त वह एक साल में चुकता कर दी थी। लॉकडाउन के दौरान ही ई-रिक्शा का इन्श्योरेंस खत्म हो गया था जिसका अभी नवीनीकरण नहीं हो पाया था।

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शुकुरूम बीबी के पति अन्सार शेख बिमार रहते हैं तो वह कुछ नहीं कर पाते हैं। शुकुरूम बीबी रोहणी सेक्टर 13 में दो घरों में डोमेस्टिक वर्क करती हैं जिससे कि उनको छह हजार रू. मिल जाता था लेकिन लॉकडाउन में उनका काम भी बन्द पड़ रहा है अब परिवार के सामने भुखमरी की समस्या आ गई है। शुकुरूम बीबी ने बताया कि आग लगने पर वे लोग पीछे की दीवार तोड़ कर नाले की तरफ भागे नहीं तो कई लोगों की जान जा सकती थी भागने के क्रम में दो लोग आग की चपेट में आने से हल्का झुलस गये।

हजरत खां (55) 1984 में दिल्ली आये थे सबसे पहले उन्होनें रिक्शा चलाने का काम किया लेकिन 20 सालों से वह दिल्ली के बादली, समयपुर बादली, नरेला, बवाना, रोहिणी, पीतमपुरा की सड़कों से कबाड़ उठाने का काम करते हैं। उनका तीन माह से कूड़ा नहीं बिका था और अब वह सब कुछ जल कर खत्म हो गया।

मिनरूल शेख (32) पश्चिम बंगाल के वर्दमान जिले से हैं और 10 साल से दिल्ली की सड़कों पर कूड़ा बीनने का काम करते हैं। अभी वह पीतमपुरा के एमपी मॉल के पास बने खते पर काम करते हैं और वहां से कूड़ा चुन कर लाते हैं। वह सुबह 6.30 बजे घर से निकल जाते हैं और शाम के 5 बजे तक खते की साफ-सफाई करके आते हैं।

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नजीरा बेगम 10-12 साल से घरों में काम करती थी लेकिन लॉक डाउन के कारण 200 रुपये रोज पर पीतल की फैक्ट्री में छंटाई का काम करती हैं।

खुर्शीद अपनी बहन कुलशुम बीबी के घर की साफ-सफाई कर रहे थे। उन्होंने बताया कि उनके बहन का परिवार लॉकडाउन से पहले घर गया था जो कि लॉकडाउन में फंस गया और वापस नहीं आ पाये। उनका सभी सामान जल कर खाक हो गया और 30-40 हजार का कूड़ा भी जल गया। इसी तरह की कहानी इस बस्ती के 85 परिवारों की हैं। इस बस्ती से 150-200 बच्चे प्राइमरी स्कूल से लेकर इण्टर तक पढ़ने जाते थे सभी की कॉपी-किताब सब कुछ जल कर खाक हो चुका है। लोगों के पास पहनने तक के कपड़े नहीं है। प्रशासन खाना बांट रहा है जो कि अपर्याप्त है। कुछ एनजीओ भी पहुंच गये हैं लेकिन उनकी हालत भी वही है जो कि प्रशासन की है ‘देना कम और प्रचार ज्यादा’ करते हैं।

बस्ती के बहुत से निवासी डर से कहते हैं कि वह किराया नहीं देते हैं। ऐसे ही एक लड़के से बात हुई जिसने कि पहले कहा था कि उनका परिवार किराया नहीं देता है। बाद में वह लड़के ने अकेले में बोला कि अगर हम बोलेंगे कि किराया देते हैं तो हमें यहां से भगा दिया जाएगा। इसलिए लोग कह देते हैं कि हम किराया नहीं देते हैं।

यह आग यहां के लिए कोई नई नहीं है इससे पहले 15 फरवरी, 2020 को शाम 6 बजे एक और बंगाली बस्ती में आग लगी थी जिसमें 34 घर जल कर खाक हो गये। इस बस्ती में चार साल पहले 18 मार्च, 2016 को भी 4 बजे सुबह के समय आग लगी थी जिसमें इस बस्ती में सबकुछ जल गया था। 4 साल में लोगों ने जो भी इकट्ठा किया था वह फिर 15 फरवरी, 2020 को खत्म हो गया। 2016 में लगी आग को प्राकृतिक आपदा समझ कर भुला देने की कोशिश की और अपनी जली हुई झोपड़ी को ठीक करने लगे। उनके पास कोई नेता या किसी तरह की सरकारी सहायता नहीं पहुंची थी। बस्ती के लोगों ने ही मिल कर आग को बुझाया और आपस में चंदा इक्ट्ठा कर खाने की व्यवस्था की, और रिश्तेदारों, मुहल्ले वालों की मद्द से कुछ कपड़े पैसे इकट्ठा कर बल्ली, बांस लाये।

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बताया जाता है कि जब वह जले हुये राख को हटा कर बल्ली, बांस से अपने लिये झोपड़ी तैयार कर रहे थे उस समय चार गाड़ी और बाइक पर कुछ गुंडे आये और मार-पीट शुरू कर दी। शकीकुल शेख जो कि उसी बस्ती में रहते हैं अपने साली चुमकी को कपड़ा देने आये थे उन पर गुंडों ने बल्ली से हमला किया जिससे उनका हाथ टूट गया था। जिनको लेकर वे लोग खुद डॉ. अम्बेडकर अस्पातल रोहिणी में गये जहां से प्लास्टर चढ़ा है और आगे डॉक्टर ने कहा था कि इसमें राड डालना पड़ेगा।

यहां पर भू-माफियाओं की ज़मीन के वर्चस्व की लड़ाई है जिसका खमियाजा यहां की गरीब जनता को उठाना पड़ता है। कहा जाता है कि यहां बंगाली बस्तियों से भाजपा के एक पूर्व विधायक का भाई किराया वसूलता है। लोग दबी जुबान में यह भी कहते हैं कि पहले उनका इस्तेमाल करके जमीन कब्जा किया उसके बाद उनसे किराया भी वसूलता है। एक आदमी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि लॉकडाउन के दौरान वह किराया नहीं दे पाया था तो उसके ऊपर झूठे ही 30 हजार रुपये बकाया होने का दावा किया गया। वह किसी तरह 10 हजार रुपये देकर हाथ जोड़ कर छुटकारा पाया। जबकि उस व्यक्ति ने कहा कि वह पहले समय से किराया देता था लेकिन लिखता नहीं था जिसके कारण उस पर पीछे का भी किराया चढ़ा दिया गया। 2016 में ही एक बस्ती में और आग लगी थी।

आग केवल घर ही नहीं जलाती है वह उन परिवारों के सपनों को भी जला देती है जो पाई पाई इकट्ठा करके रखते हैं कि बच्चों को स्कूल भेजना है तो किसी के बेटे-बेटी की शादी करनी होती है। आग में वह सब कुछ जल कर खाक हो जाता है और फिर से एक नई जिन्दगी की शुरूआत करनी होती है। फिर से बांस, बल्ली, कपड़े, बर्तन जुटाने में महीनों और पहली वाली स्थिति में आने में सालों लग जाते हैं। यह केवल इसी बस्ती की कहानी नहीं है यहां पर इस तरह कि कई छोटी-छोटी बस्तियां हैं जहां पर लोग रहते हैं और आस-पास के इलाकों में सड़कों, घरों, और खता से कूड़ा इकट्ठा करने का काम करते हैं। फौरी राहत के साथ-साथ जरूरी है कि इन भू-माफियाओं के चंगुल से इनको आजाद कराना और यही इनके लिए स्थायी सामाधान हो सकता है।

(सुनील कुमार स्वतंत्र लेखक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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