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CAA-NPR-NRC: बिहार में वाम ने मोर्चा संभाला, 25 को मानव श्रृंखला, 30 को सत्याग्रह
वाम दलों ने इसके साथ ही बिहार में 'जल-जीवन-हरियाली' के नाम पर गरीबों को उजाड़ने आरोप लगाया। इसके आलावा बिहार के चर्चित मुजफ्फरपुर शेल्टर होम केस को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
13 Jan 2020
CPI-ML

देशभर में सीएए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ अंदोलन चल रहे हैं, उसी कड़ी में बिहार में सभी वाम दलों ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या 25 जनवरी को पूरे राज्य में मानव श्रृंखला और शहीद दिवस 30 जनवरी को जिला मुख्यालयों पर सत्याग्रह करने का ऐलान किया है।

वाम दलों ने आज सोमवार,13 जनवरी को एक संयुक्त प्रेस वार्ता में इस आशय का ऐलान किया। वाम दलों ने बिहार सरकार से मांग की है कि केरल की तर्ज पर बिहार विधानसभा से सीएए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया जाए। इसके साथ ही सभी नेताओं ने बिहार में गरीबों को उजाड़े जाने का भी विरोध किया और कहा जल-जीवन-हरियाली के नाम पर गरीबों को उजाड़ने की साजिश नहीं चलेगी। इसके आलावा बिहार के चर्चित मुजफ्फरपुर शेल्टर होम केस को लेकर भी गंभीर सवाल किये। नेताओ ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के असली अपराधियों को बचाया जा रहा है।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को भाकपा-माले के राज्य सचिव कुणाल, सीपीआईएम के राज्य सचिव अवधेश कुमार, सीपीआई के विजय नारायण मिश्र, माले पोलित ब्यूरो सदस्य धीरेन्द्र झा, सीपीआईएम के राज्य सचिव मंडल सदस्य गणेश शंकर सिंह ने संबोधित किया।

25 को पूरे राज्य में मानव श्रृंखला और 30 को जिला मुख्यालयों पर सत्याग्रह

'लोकतंत्र व संविधान विरोधी' सीएए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ चल रहे देशव्यापी आंदोलन की अगली कड़ी में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या 25 जनवरी को पूरे राज्य में पांच वाम दल क्रमशः सीपीआई, सीपीएम, भाकपा-माले, फारवर्ड ब्लाॅक और आरएसपी ने मानव श्रृंखला का आयोजन करने की घोषणा की है।

30 जनवरी महात्मा गांधी के शहीद दिवस पर जिला मुख्यालय पर एक दिवसीय सत्याग्रह का आयोजन होगा। दोनों रोज देश के अनेक संगठनों - व्यक्तियों के प्लेटफॉर्म 'हम भारत के लोग' द्वारा भी कार्यक्रम की घोषणा की गई है> वामदलों ने बिहार की जनता से इसे ऐतिहासिक बनाने की अपील की है।

'केरल की तर्ज पर बिहार विधानसभा से सीएए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ प्रस्ताव पारित करो'

वामदलों ने कहा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यदि एनआरसी के खिलाफ हैं तो वे एनपीआर पर क्यों चुपी साधे हुए हैं? ऐसे सीएए के सवाल पर नीतीश जी का पोजीशन हम सबने देख लिया है और उनकी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की पूरी तरह पोल खुल चुकी है. यदि आप एनआरसी के खिलाफ हैं तो आपको एनपीआर के भी खिलाफ होना होगा. वाम दल मांग करते हैं कि केरल विधानसभा की तर्ज पर बिहार विधानसभा से भी सीएए और एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया जाए और एनपीआर पर रोक लगाई जाए. जुबानी जमा - खर्च से काम नहीं चलेगा।

वाजपेयी सरकार द्वारा पारित 2003 के कानून के हिसाब से यूपीए सरकार ने एनपीआर बनवाया था। यह उसकी गलती थी, लेकिन उसके बाद उसने न तो एनआरसी बनाया और न ही सांप्रदायिक मंसूबों से भरा कोई नागरिकता संशोधन कानून पास करवाया। यह कानून भाजपा की सरकार लागू कर रही है।

इस बार एनपीआर के फाॅर्म में एक अलग से काॅलम जोड़ा गया है जिसमें माता-पिता के जन्म की तारीख भरनी होगी। इससे साफ है कि इसके जरिए ‘संदिग्ध नागरिकों’ की पहचान की जाएगी और एनआरसी के दौरान उनसे दस्तावेज मांगें जायेंगें. यदि माता-पिता का जन्म स्थान और जन्म तिथि जरूरी नहीं है तो फिर एनपीआर के जरिए यह डाटा क्यों इकट्ठा किया जा रहा है? इस मामले में सरकार द्वारा जारी किया स्पष्टीकरण माता-पिता के जन्म संबंधी दस्तावेज मांगने के बारे में झूठ बोल रहा है।

यह पूरी प्रक्रिया मनमानी है। किसी को ‘संदिग्ध नागरिक’ घोषित करने के बारे में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं है। इसका मतलब है कि इसमें भ्रष्टाचार की भी बड़ी गुंजाइश है। कोई स्थानीय अधिकारी किसी को भी ‘संदिग्ध’ घोषित कर सकता है और ‘संदिग्ध’ न घोषित करने के लिए घूस मांग सकता है। जाति, जेंडर, लैंगिकता और राजनीतिक विचारधारा के चलते किसी को भी ‘संदिग्ध’ घोषित किया जा सकता है। कोई सांप्रदायिक संगठन किसी पूरे धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय को ‘संदिग्ध’ कहकर रिपोर्ट कर सकता है।

 जनगणना में तो ऐसा कोई प्रावधान नहीं होता, इसलिए एनपीआर बिलकुल ही अलग चीज है। इसलिए यह एनपीआर गरीबों व वंचित समुदाय के खिलाफ है और भ्रष्टाचार का दरवाजा खोलने वाला है। एनपीआर के जरिए प्राप्त आंकड़ा सत्ता में बैठी पार्टी की पहुंच में होगी और यह भारतीय लोकतंत्र के सेहत के लिए बहुत खतरनाक होगा।

एनपीआर का काम एनआरसी को रोकना नहीं है बल्कि एनआरसी व सीएए के लिए आधार तैयार करना है, इसलिए नीतीश कुमार को इस महत्वपूर्ण सवाल पर बोलना चाहिए और इसका विरोध करना चाहिए. वाम दल मांग करते हैं कि बिहार में इसे लागू नहीं किया जाए और विधान के आसन्न सत्र में इस आसय का प्रस्ताव पारित किया जाए।

'प्रवासी बिहारियों की नागरिकता साबित करने की गारंटी करे बिहार सरकार'

असम में पिछले दिन नागरिकता का जो रजिस्टर बना, उसमें बिहार के 73019 प्रवासी मजदूरों की नागरिकता को सत्यापित करने का आवेदन बिहार सरकार को प्राप्त हुआ। उसमें बिहार सरकार महज 17227 मजदूरों का ही सत्यापन कर सकी। 55792 प्रवासी मजदूर आज असम में अपनी नागरिकता खोने के कगार पर हैं जो लंबे समय से असम में निवास कर रहे हैं। यूपी और झारखंड के भी प्रवासी मजदूरों की बड़ी संख्या आज अपनी नागरिकता खोने के कगार पर है।

 हमें पता चला है की सत्यापन के आवेदन को कई जिलों के डीएम ने ये कह कर वापस लौटा दिया कि वह अपठनीय था। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि पूरे देश में एनपीआर और एनआरसी लागू हुआ तो कितना बड़ा संकट देश के सामने खड़ा होने वाला है। वाम दल मांग करते हैं कि बिहार सरकार त्वरित पहल कदमी लेते हुए सभी प्रवासी मजदूरों की नागरिकता सत्यापित करने की गारंटी करे।

वाम दलों नेताओं ने कहा कि वे जेएनयू में एबीवीपी समर्थित गुंडों द्वारा छात्रों पर हमले और उल्टे पुलिस द्वारा जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष समेत कई छात्रों पर फर्जी मुकदमे थोप देने की कार्रवाई की कड़ी निंदा करते हैं। यह सरासर पक्षपातपूर्ण कार्रवाई है। एबीवीपी के गुंडे खुलेआम स्वीकार कर रहे हैं कि उन्होंने जेएनयू के छात्रों पर बर्बरता से हमला किया लेकिन पुलिस प्रशासन उन पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही। सब कोई जानता है कि दिल्ली पुलिस सीधे गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है, इसका साफ मतलब है कि मोदी और अमित शाह राजनीतिक दुर्भावनाओं से प्रेरित होकर लोकतंत्र का गला घोटने, कैम्पसों को बर्बाद करने और गुंडा गिरोहों को प्रश्रय देने का काम कर रहे हैं। वाम दल जेएनयू के छात्रों पर हमला करने वाले सभी अपराधियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग करते हैं।

'मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के असली अपराधियों को बचाया जा रहा है'

इस बीच बिहार में मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में सीबीआई की चार्जशीट सामने आई है। उसे वाम दलों ने बेहद असंतोषजनक बताया। वाम नेताओं ने कहा इसमें अपराधियों के राजनीतिक संरक्षकों को स्पष्ट तौर पर बचा लिया गया है, जबकि आंदोलनों की यही मुख्य मांग थी। मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के तार सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं से जुड़ रहे थे लेकिन सीबीआई ने इस दिशा में कोई काम नहीं किया। कुछ अधिकारियों पर जरूर विभागीय कार्रवाई की अनुशंसा की गई है लेकिन हम सब जानते हैं कि विभागीय कार्रवाई के नाम पर कुछ खानापूरी होगी। सीबीआई ने यह भी कहा है कि शेल्टर होम में किसी की हत्या का सबूत नहीं मिला। यह अपने आप में संदेहास्पद है। वाम दल एक बार फिर से इसके राजनीतिक संरक्षण की गहराई से जांच की मांग करते हैं ताकि शेल्टरहोम पीड़ितों को वास्तव में न्याय मिल सके।

'जल-जीवन-हरियाली के नाम पर गरीबों को उजाड़ने की साजिश'

वाम दलों के नेताओं ने कहा कि आज पूरे बिहार में जल जीवन हरियाली योजना के नाम पर नीतीश कुमार दरअसल गरीब उजाड़ो अभियान चला रहे हैं। आहर - पोखर-नहर इत्यादि की जमीन पर बसे गरीबों को हटने की नोटिस थमा दी गई है। हर कोई जानता है इस तरह की जमीन पर वास्तव में भू-स्वामियों और दबंगों का कब्जा है। इन दबंगों पर तो सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही है लेकिन गरीबों को निशाना बना रही है। पूर्वी चंपारण से लेकर के राज्य के दूसरे हिस्सों में भी गरीबों पर कहर ढाया जा रहा है। हम सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना करते है। इस नाम पर बिहार सरकार ने 19 जनवरी को मानव श्रृंखला आयोजित करने का भी फैसला किया है। हम बिहार की जनता से इसका बहिष्कार करने की अपील करते हैं। यह सरकारी तंत्र का खुलेआम दुरुपयोग है और महज अपने प्रचार की कवायद है।

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