NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
झारखंड : एनआरसी-सीएए बनाम 1932 की खतियानी स्थानीयता
एनसीआर-सीएए को आदिवासी विरोधी मानने वाले बौद्धिक–सामाजिक कार्यकर्ताओं का सक्रिय समूह 1932 के खतियान मुद्दे को मोदी सरकार के नागरिकता क़ानून के काट के तौर पर पेश कर रहा है।
अनिल अंशुमन
22 Jan 2020
झारखंड

पिछले दिनों बोकारो स्थित अपने आवास पर दिसोम गुरू शिबू सोरेन के दिये गए बयान के अनुसार, "हेमंत सोरेन सरकार द्वारा 1932 के खतियान के आधार पर झारखंड राज्य की स्थानीय नीति बनाएगी।" इस बयान से इन दिनों प्रदेश में स्थानीयता विवाद नए सिरे से सरगर्म हो उठा है। मीडिया ने इस अतिसंवेदनशील मसले को भरसक सनसनीखेज बनाते हुए इसके पक्ष–विपक्ष के राजनीतिक बयानों को परोसने में हमेशा की भांति कोई कसर नहीं छोड़ी। वहीं सोशल मीडिया में आदिवासी युवाओं की बड़ी तादाद इस बयान के समर्थन में ज़ोरदार अभियान शुरू कर दिया। अधिकांश पोस्ट में केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा एनआरसी-सीएए थोपे जाने की प्रतिक्रिया में लिखा गया कि सरकार समर्थक लोग भी अब झारखंड में अपने स्थानीय नागरिक होने का सबूत क्यों न पेश करें?

वहीं एनसीआर-सीएए को आदिवासी विरोधी मानने वाले बौद्धिक–सामाजिक कार्यकर्ताओं का सक्रिय समूह 1932 के खतियान मुद्दे को मोदी सरकार के नागरिकता क़ानून के काट के तौर पर पेश कर रहा है। उनका कहना है कि आदिवासी समाज इससे काफ़ी भ्रमित-भयभीत है कि कहीं इसकी आड़ लेकर कश्मीर की तरह उनकी भी संवैधानिक स्वायत्तता व अधिकारों को ख़त्म न कर दिया जाये।

उक्त संदर्भ में युवा आदिवासी एक्टिविस्ट गौतम मुंडा का स्पष्ट कहना है कि झारखंड के व्यापक आदिवासी समुदाय के लोग भाजपा शासन के आदिवासी विरोधी रवैये को भली भांति जान समझ गए हैं। एनआरसी राजनीति को लेकर भी यही मानते हैं कि देर-सबेर उन्हें भी इसके निशाने पर चढ़ाया जाना है,  स्थानीयता तो महज़ बहाना है। इसलिए झारखंड राज्य की स्थानीयता के लिए 1932 के खतियानी होने का मामला भाजपा की एनआरसी राजनीति का ही एक जवाब है। झारखंड अलग राज्य के लिए सबसे अधिक संघर्ष और राज्य दमन का सामना करने के बावजूद यहाँ के आदिवासी अपने ही देश में परदेसी बनते जा रहें हैं। देश की आज़ादी के बाद से ही झारखंड में बाहर से आई आबादी का बड़ा हिस्सा आदिवासियों को ही धकेलकर यहाँ स्थापित हुआ है। यहाँ की सभी नौकरियों और स्थायी रोज़ी-रोज़गार पर उन्हीं का क़ब्ज़ा बना हुआ है। जिससे आदिवासी अपनी ज़मीनों की जबरन लूट का शिकार और पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। बाहर से आयी इस आबादी के अधिकतर लोग भाजपा के ही कट्टर समर्थक हैं। इसीलिए हमारा कहना है कि जिस तरह से स्थानीयता कानून लागू कर बाहर से आए (घुसपैठियों) मुसलमानों को चिन्हित किया जा रहा, झारखंड की स्थानीयता के मामले में भी यही फार्मूला लागू होना चाहिए। ताकि यहाँ की ज़मीन व रोज़ी-रोज़गार समेत अन्य सभी क्षेत्रों में झारखंडियों को उनका अपना वाजिब अधिकार मिल सके।

दिसोम गुरू के स्थानीयता को लेकर दिये गए बयान पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया भाजपा परिवार की ओर से ही हो रही है। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता ने शिबू सोरेन जी के बयान को झारखंड में फिर से अस्थिरता का माहौल पैदा करनेवाला बताते हुए कहा है, "रघुबर सरकार ने स्थानीयता को लेकर सही-सर्वमान्य नीति बनाई थी लेकिन अभी फिर से इस मुद्दे पर सूबे में भय का वातावरण बनाने का प्रयास हो रहा है। इस मसले पर वर्तमान गठबंधन सरकार के प्रमुख घटक दल कॉंग्रेस का कहना है कि मिलकर स्थानीय नीति तय करेंगे।"

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा है कि गुरु जी सम्मानित नेता और गार्जियन हैं, उन्होंने किस संदर्भ में ऐसा कहा है यह समझने के बाद ही कुछ कहेंगे।

स्थानीयता का सवाल और विवाद झारखंड राज्य गठन के तत्काल बाद से ही सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा है। 2002 में तत्कालीन भाजपा मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने जब राज्य की स्थानीयता को लेकर डोमिसाइल नीति लायी थी तो इसके पक्ष और विपक्ष में काफ़ी तीखी झड़पे हुई थीं। जिससे कई स्थानों पर तनावपूर्ण हालात बन गए थे और आपसी टकराव में कई मासूमों की जान भी गयी थी। बाद में झारखंड हाई कोर्ट ने इसे अमान्य घोषित करते हुए रद्द कर दिया था। अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्रित्व काल में भी स्थानीयता नीति तय करने के लिए बनाई गयी तीन सदस्यीय कमेटी ने एक रिपोर्ट पेश की थी लेकिन उसपर आगे कुछ नहीं हुआ। अंततोगत्वा 2014 जब रघुबर सरकार ने 2018 में राज्य की स्थानीयता कि नीति घोषित कर दी। जिसमें 1985 के समय से राज्य में रहने वाले सभी लोगों को स्थानीय माना गया। जिसका प्रदेश के झामुमो व अन्य विपक्षी दलों समेत कई आदिवासी–मूलवासी संगठनों ने काफ़ी विरोध किया था। वर्तमान सरकार के दिसोम गुरु जी का स्थानीयता को लेकर दिये गए बयान से दबा हुआ तीखा सामाजिक विवाद एकबार फिर से सामने आ गया है।

जहां तक झारखंड में बाहर से आई हुई आबादी के यहाँ बसने का मामला है, तो एकीकृत बंगाल और बाद में उससे अलग हुए बिहार के समय से ही तत्कालीन के दक्षिण बिहार और वर्तमान के झारखंड क्षेत्र में बाहर से आकर यहाँ बसने वालों का सिलसिला जारी रहा है। 1952 में धनबाद में सिंदरी उरर्वरक कारख़ाना, उसके बाद हटिया रांची में भारी इस्पात उद्योग लिमिटेड और बोकारो स्टील सिटी की स्थापना के समय यहाँ काम करनेवाले मज़दूर–कर्मचारियों के रूप में काफ़ी संख्या में बाहर से लोग आए। 1971 के दौर में भी धनबाद और उसके आसपास के इलाक़ों के निजी कोयला खदान मालिकों ने काफी तादाद में यूपी–बिहार से मज़दूर मंगाए थे जो कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद से यहीं बस गए। इसके पहले 1932 में जब जमशेदपुर में टाटा स्टील कंपनी की स्थापना करके जमशेदपुर नगर बसाया गया तो उस समय भी कई राज्यों से यहाँ लोग आकर बसे थे।

इस बार फिर कहा जा रहा है कि स्थानीयता विवाद का सीधा नकारात्मक असर बाहर से आई हुई पूरी आबादी पर ही पड़ेगा। इन सभी इलाकों में वर्षों पूर्व से जारी ‘बाहरी–भीतरी’ का सामाजिक विवाद एकबार फिर से तीखा और विस्फोटक स्वरूप ले लेगा। पहले के समय में बाहर से आयी आबादी का अधिकांश हिस्सा कांग्रेस पार्टी को वोट देता था, आज के समय में यह सारा वोट भाजपा को मिलता है। जानकारों के मुताबिक 2014 में केंद्र और प्रदेश की सत्ता में जब से भाजपा शासन हुआ है, बाहरी आबादी का रसूखदार और दबंग तबका काफी आक्रामक हो गया है। जिससे झारखंडियों का दबा हुआ क्षोभ फिर से सतह पर आने लगा है। खासकर साधन व पूंजी सम्पन्न होकर इनसे प्रतिस्पर्धा कर रहे झारखंडी तबके में इसकी मुखरता अधिक दिख रही है।

स्थानीयता समस्या-विवाद का सम्यक समाधान अब प्रदेश की नयी सरकार के आत्मविवेक और ज़िम्मेदार लोकतांत्रिक बोध और सक्रियता पर ही निर्भर है। क्योंकि अब तक इस मुद्दे पर होने वाली निहित स्वार्थ की सत्ता राजनीति से सिर्फ़ सामाजिक विभाजन व टकराव ही बढ़ाया गया जिससे किसी भी पक्ष को फ़ायदा नहीं हुआ। हमारे संविधान में देश के हर नागरिक के उसके स्थानीय होने के विशेषाधिकार के प्रावधान हैं। लेकिन जब से केंद्र में काबिज सत्ता–सरकार अपने छुपे एजेंडे को लागू करने की मनमानी से सांविधान को ही धता बताने पर उतारू नज़र आ रही है, दुष्परिणाम के ही आसार अधिक बनते जा रहें हैं।

Jharkhand
khatiyani movement
Citizenship
citizenship in jharkhand
CAA-NRC
khatiyani 1932

Related Stories

झारखंड: बोर्ड एग्जाम की 70 कॉपी प्रतिदिन चेक करने का आदेश, अध्यापकों ने किया विरोध

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

झारखंड की खान सचिव पूजा सिंघल जेल भेजी गयीं

झारखंडः आईएएस पूजा सिंघल के ठिकानों पर छापेमारी दूसरे दिन भी जारी, क़रीबी सीए के घर से 19.31 करोड़ कैश बरामद

खबरों के आगे-पीछे: अंदरुनी कलह तो भाजपा में भी कम नहीं

आदिवासियों के विकास के लिए अलग धर्म संहिता की ज़रूरत- जनगणना के पहले जनजातीय नेता

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

झारखंड: पंचायत चुनावों को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध, जानिए क्या है पूरा मामला

झारखंड : हेमंत सोरेन शासन में भी पुलिस अत्याचार बदस्तूर जारी, डोमचांच में ढिबरा व्यवसायी की पीट-पीटकर हत्या 

झारखंड रोपवे दुर्घटना: वायुसेना के हेलिकॉप्टरों ने 10 और लोगों को सुरक्षित निकाला


बाकी खबरें

  • भारतीय विधिज्ञ परिषद
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    भारतीय विधिज्ञ परिषद द्वारा नियमों में संशोधन के ख़िलाफ़ अधिवक्ताओं का प्रदर्शन
    01 Jul 2021
    अधिवक्ता संघर्ष मोर्चा के बैनर तले हुए इस प्रदर्शन में पुतला दहन किया गया तथा भारतीय विधिज्ञ परिषद द्वारा नए उक्त संशोधन की प्रतियां जलाई गईं।
  • डब्ल्यूएचओ
    भाषा
    आगामी हफ्तों में दुनिया में सबसे ज्यादा हावी स्वरूप होगा डेल्टा: डब्ल्यूएचओ
    01 Jul 2021
    डेल्टा स्वरूप के अत्यधिक संक्रामक होने के मद्देनजर डब्ल्यूएचओ ने आगाह किया है कि इस स्वरूप के अन्य स्वरूपों के मुकाबले अधिक हावी होने और आगामी महीनों में सबसे अधिक प्रभावशाली स्वरूप बन जाने का अंदेशा…
  • असम:आख़िरकार डेढ़ साल जेल में रहने के बाद रिहा हुए अखिल गोगोई
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    असम: आख़िरकार डेढ़ साल जेल में रहने के बाद रिहा हुए अखिल गोगोई
    01 Jul 2021
    रिहा होने के बाद राइजोर दल के प्रमुख ने कहा,‘‘ आखिरकार सत्य की जीत हुई, हालांकि मुझे सलाखों के पीछे रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई।’’ उन्होंने कहा कि घर में सामान रखने के बाद वह ‘‘सीएए के पहले शहीद…
  • Thousands of tribals
    विष्णुकांत तिवारी
    साकेरगुडा नरसंहार के 9 साल पूरे होने के मौक़े पर पहुंचे हज़ारों प्रदर्शनकारी, बस्तर में आदिवासी की होती हत्यायाओं को बताया एक निरंतर चलने वाला वाक़या
    01 Jul 2021
    साल 2012 के 27-28 जून के बीच पड़ने वाली उस रात को सरकेगुड़ा गांव में सुरक्षा बलों ने तीन बच्चों सहित 17 लोगों को मार डाला था,उस बर्बर घटना की याद में इस साल आदिवासी एक साथ जमा हुए।
  • स्वाज़ीलैंड में लोकतंत्र समर्थक विरोध प्रदर्शनों में 24 लोगों की मौत, 70 से अधिक घायल
    पीपल्स डिस्पैच
    स्वाज़ीलैंड में लोकतंत्र समर्थक विरोध प्रदर्शनों में 24 लोगों की मौत, 70 से अधिक घायल
    01 Jul 2021
    सैन्य कार्रवाई के बावजूद शहरी और ग्रामीण स्वाज़ीलैंड के लोग अफ़्रीका के अंतिम निरंकुश सम्राट के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर रहे हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License