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COP 26: भारत आख़िर बलि का बकरा बन ही गया
विकसित देशों का सारा गेम प्लान भारत और चीन पर कोयले के उपयोग में कमी लाने पर फिर से रजामंद करने और इसके जरिए अगले साल संयुक्त राष्ट्र की आगामी बैठक तक कार्बन उत्सर्जन में कटौती लाने के लिए उन पर दबाव बनाने का है।
एम. के. भद्रकुमार
18 Nov 2021
COP 26
फोटो साभार: इयान फोर्सिथ/ब्लूमबर्ग

प्रसिद्ध स्वीडिश महिला जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने शनिवार को ग्लासगो में सम्पन्न हुए पर्यावरण सम्मेलन COP-26 में हुए समझौते का बेहद संक्षिप्त शब्दों में सारांश प्रस्तुत करते हुए कहा कि अनेक खामियां सहित यह "बहुत, बहुत ही अस्पष्ट" है। उन्होंने ग्लासगो में मीडिया को बताया कि यह समझौता केवल "बकवास कर उसे कमजोर बनाने में सफल हो गया"।

ग्रेटा थनबर्ग ने कहा, "अभी भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि हम पेरिस समझौते पर पहुंचेंगे भी। वह पाठ जो अब एक दस्तावेज़ की शक्ल में हम सबके सामने है, उसकी आप अलग-अलग तरीकों से कई-कई व्याख्याएं कर सकते हैं...कि हम अभी भी जीवाश्म ईंधन के बुनियादी ढांचे का विस्तार करते रह सकते हैं, कि इस तरह हम अभी भी वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि करते रह सकते हैं...। दरअसल, यह सब बहुत, बहुत ही अस्पष्ट है"।

ग्लासगो सम्मेलन में भाग लेने आए प्रतिनिधिमंडल विकासशील देशों को क्रमिक रूप से अक्षय ऊर्जा को अपनाने का समर्थन करने जिसे "न्यायसंगत संक्रमण" के रूप में जाना जाता है, उसके लिए अधिक धन या यहां तक कि नए दिशानिर्देश जारी करने में विफल रहे। विकासशील देशों के प्रतिनिधियों में से कई ने कहा कि COP-26 उन देशों को विफल कर दिया, जो आज जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक पीड़ित हैं: अफ्रीका के छोटे द्वीपीय देश और क्षेत्र, साहेल और हॉर्न जैसे विषम मौसम की आपदाओं से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं।

इसमें सबसे विचित्र बात तो जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए आवश्यक वित्तीय कोष के निर्माण को लेकर नीतिगत खामियां और इनसे संबंधित अस्पष्टताएं थीं। जी-20 देशों का जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को अनुकूलित करने और उन्हें कम करने के लिए विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को सहयोग के रूप में दिए जाने वाले 100 डॉलर के कोष के निर्माण की अवधि को आगे खिसका कर 2023 कर दिया गया है। हालांकि यूरोपीय और उत्तरी अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों ने जलवायु परिवर्तन के कारण हुए नुकसान और क्षति से पीड़ित देशों की क्षतिपूर्ति के लिए तत्काल एक कोष की स्थापना के आह्वान का विरोध किया। इसके बजाय, उन्होंने वित्तीय कोष की संरचना और तंत्र पर आगे विचार-विमर्श करने का प्रस्ताव रखा।

सम्मेलन के आखिर में, हालांकि ब्रिटिश मेजबानों ने यह नैरेटिव बनाकर धूर्तता का काम किया कि COP-26 नतीजों के नजरिए से एक उत्कृष्ट सम्मेलन हुआ होता, अगर चीन और भारत ने आखिर क्षण में गुटबंदी कर कोयले के उपयोग को "फेज आउट" करने के बजाय "फेज डाउन" के जरिए खत्म करने पर दबाव नहीं बनाया होता।

वास्तव में हुआ यह कि यूरोपीय संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन परस्पर राजी हो गए और शेष विश्व को कोयले से बिजली उत्पादन को चरणबद्ध तरीके से निजात पाने को एक अपरिवर्तनीय निर्णय के रूप में पेश किया, जिसने दुनिया की निगाहों में भारत और चीन को निश्चित रूप से एक कठिन स्थिति में डाल दिया। इससे गरीब देशों और जलवायु कार्यकर्ताओं में रोष उत्पन्न हो गया, जिन्हें ब्रिटेन ने पीछे से उकसाया कि ताकतवर प्रदूषकों-भारत और चीन-के एक छोटे से गुट ने दुनिया को अनिवार्य रूप से बंधक बना लिया है।

इसमें भारत पर विशेष रूप से प्रहार किया गया है और अंततः उसे बलि का बकरा बना दिया गया। सारा गेम प्लान भारत और चीन के कार्बन उत्सर्जन रोकने के लिए कोयले से बिजली उत्पादन रोकने की पेशकश पर विचार करने और अगले साल होने वाली संयुक्त राष्ट्र की बैठक तक उत्सर्जन में कटौती करने के लिए उन पर दबाव बनाने का है। न तो चीन और न ही भारत ने 2030 तक निर्धारित वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड रखने के अनुरूप मार्ग का अनुसरण किया है, और इसलिए वे अगले वर्ष अधिक महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम के साथ लौटाने वाले राष्ट्रों की दबाव वाली लक्षित सूची में दर्ज होंगे। ब्रिटेन को अगले एक और साल के लिए COP का अध्यक्ष रहना है, इसलिए आलोक शर्मा इसमें एक प्रमुख राजनयिक चेहरा बने रहेंगे।

सम्मेलन के बाद, ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन हाउस ऑफ कॉमन्स के मंच से डींग हांकी कि COP-26 ने इसके नतीजे पर “संदेह करने वालों और निंदा करने वालों को गलत साबित कर दिया," और कि, दशकों पहले से, कोयले की समस्या से निपटना "कहावत में कहे गए हाथी के खाने जितना ही चुनौतीपूर्ण साबित होता रहा है," (इस कथन का इस्तेमाल भारत को एक धूर्त देश बताने के लिए किया गया है) लेकिन ग्लासगो में दुनिया ने "पहला कदम उठाया है"।

सोमवार की शाम लंदन में लॉर्ड मेयर के भोज में व्यापारिक नेताओं और राजनयिकों से जॉनसन ने कहा : "मुझे राजनीति देखते-करते हुए अब लंबा समय हो गया है, और मुझे पता है कि एक महत्त्वपूर्ण बिंदु पर कब पहुंचा जाता है। इसमें भाषा बेशक मायने रखती है लेकिन चाहे आप (कार्बन उत्सर्जन) चरणबद्ध तरीके से उसकी सघनता को कम करते जाने की बात करें या चरणबद्ध रूप से समाप्त करने की, वे दिन दूर नहीं जब यह भाषा राजनीतिक रूप खारिज हो जाएगी। तब दुनिया में कहीं भी, कोयला आधारित एक नया बिजली उत्पादन केंद्र की स्थापना, जैसा कि अभी चलन में है, वह हवाई जहाज़ में सवारी करने और फिर उसमें सिगार सुलगाने जैसा (खतरनाक) होगा।”

यह जॉनसन-शैली ब्लैकमेल करना है यानी कि दावेदार का शिकार करना। जॉनसन समूह की भावनाएं भड़काने में कुख्यात हैं, वे यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि चीन और भारत दोनों ही कोयले से उत्पादित ऊर्जा-शक्ति पर बहुत अधिक निर्भर हैं। उनकी सरकार दोनों देशों के कुछ सबसे गरीब नागरिकों को गरीबी से बाहर निकालने में इस कोयला उद्योग की भूमिका से भी अच्छी तरह वाकिफ हैं। कोयले को ऊर्जा के उपयोग से चरणबद्ध तरीके से खत्म करने के लिहाज से दोनों देशों की घरेलू राजनीति बेहद संवेदनशील बनी हुई है, खासकर वैश्विक ऊर्जा संकट और इस कोरोना महामारी के बीच।

जॉनसन को उंगलियां उठाने और ब्लैकमेल करने का सबसे नकारात्मक हिस्सा यह है कि उन्होंने या उनके जैसे अमीर औद्योगिक पश्चिम देशों ने व्यावहारिक और वित्तीय सहायता की पेशकश की दिशा में कुछ भी नहीं किया है, जिसकी जरूरत विकासशील देशों को इस संक्रमण को पार करने के लिए हो सकती है।

सबसे बड़ी विडंबनाओं यह है कि भारत और चीन दोनों अच्छे इरादे से ग्लासगो सम्मेलन में शिरकत करने गए थे। वहां भारत का 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य पाने की घोषणा ने खूब सुर्खियां बटोरीं थी और इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह संकल्प था जिसमें उन्होंने 2030 तक भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं के 50 फीसदी हिस्से की आपूर्ति नवीकरणीय ऊर्जा-स्रोतों करने की बात कही थी।

ग्लासगो से पहले, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी अपनी महत्त्वपूर्ण प्रतिबद्धताओं को रेखांकित किया था : कि चीन 2060 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य तक पहुंच जाएगा, कि 2026 तक कोयले का उत्पादन चरम पर होगा, और यह कि चीन विदेशों में कोयला संयंत्रों के निर्माण के लिए धन देना बंद कर देगा।

इतने महत्त्वपूर्ण कदम उठाए जाने के बावजूद, भारत और चीन को बदनाम किया जा रहा है और उन पर प्रहार किया जा रहा है। बीबीसी ने तो भारत की आलोचना कराने के लिए पाकिस्तानी ऊर्जा मंत्री से याचना करने की हद तक चला गया, जो COP-26 में भाग लेने आए थे। पाक मंत्री ने भी बीबीसी को सहर्ष उपकृत किया और एक कथन के जरिए भारत का विरोध किया, जिसमें उसकी तुलना कीमोथेरेपी से गुजरने वाले एक कैंसर रोगी की जो इतना सब होने के बावजूद अभी भी पूरे एक पैकेट के सिगरेट को पी जाना चाहता है।

गरीब लोग ये नहीं जानते थे कि यूरोपीय और उत्तरी अमेरिकी भी चेन स्मोकर हैं। ब्लूमबर्ग ने सप्ताहांत में कोयला खनन के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के हवाले से बताया कि वे जो ईंधन पैदा करते हैं, वे इतिहास हो जाने से कोसों दूर है, और इसलिए "ऊर्जा क्षेत्र में कोयले की जगह में नाटकीय बदलाव आने में अभी दो से तीन दशक लगेंगे।"

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया है कि एशिया में मांग मजबूत बनी हुई है, और इसी हफ्ते के सोमवार को अमेरिका में पिछले 12 वर्षों में कोयले का दाम शीर्ष स्तर पर रहने के साथ यूरोप और उत्तरी अमेरिका में भी इस सर्दी के मौसम में भाव में तेजी आई है।

वैसे जापानी सरकार और बिजली उद्योग को भी COP-26 देखकर राहत मिली है, जिसमें हुए जलवायु समझौते में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए दुनिया के देशों से कोयले से चलने वाली तापीय ऊर्जा के उपयोग को "चरणबद्ध तरीके से बाहर” करने के बजाय "चरणबद्ध कम करने” का आग्रह किया गया है। जापान कोयले से चलने वाली तापीय ऊर्जा का उपयोग जारी रखने की योजना बना रहा है (जो अपने बिजली स्रोतों का लगभग 30 फीसद आपूर्ति देता है), हालांकि इसके साथ ही, वह कोयले पर अपनी ऊर्जा-निर्भरता को कम करने और कम दक्षता वाले बिजली संयंत्रों को निलंबित या समाप्त करने की कोशिश भी कर रहा है।

इन सब के बारे में अच्छी बात यह है कि मोदी सरकार के लिए यह एक सावधान करने वाला आह्वान है, जो पश्चिमी की चापलूसी में भोलेपन से बिछी हुई है और जॉनसन के ग्लोबल ब्रिटेन को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के प्रमुख भागीदार होने की कल्पना में आनंदित है। उसे मालूम होना चाहिए कि ब्रिटेन के साथ भारत का समान संबंध कभी भी संभव नहीं है। ब्रिटेन की मक्कार मानसिकता ग्लासगो में उजागर हो ही गई है। अब भारत को जॉनसन जैसे दोहरे चरित्रों को लेकर कतई भ्रम में नहीं रहना चाहिए।

इसी प्रकार, भारत के विकास की वर्तमान दशा में यह महत्त्वपूर्ण है कि वह कम से कम जलवायु परिवर्तन जैसे सामान्य हित के चयनात्मक मुद्दों पर चीन के साथ अपने जुड़ाव बनाए रखे। एक परिपक्व देश के लिए एक सर्व-सरकारी शत्रुता न तो अनुबद्ध (वारंटेड) है और न ही स्वीकार्य।

COP-26 इस बात को रेखांकित करता है कि जब भी वित्तीय कोष के सृजन/उसके हस्तांतरण की बात आती है, तो बड़े दांव शामिल होते हैं और पश्चिमी देश सामूहिक रूप से अपने हितों की रक्षा करते हैं और उन्हें विकासशील देशों में बनी दरार का फायदा उठाने में भी कोई संकोच नहीं होने वाला। ग्लासगो में एक पखवाड़े तक चलने वाला जलवायु परिवर्तन पर विमर्श के लिए यह आयोजन इस बात की बहुत याद दिलाता है कि इतिहास अभी खत्म नहीं हुआ है।

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

COP26: India Ends up as Fall Guy

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