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राजनीति
कोरोना संकट: भोजन, नौकरी और सुरक्षा के लिए हुआ देशव्यापी विरोध
मोदी सरकार की कोरोना से निपटने की रणनीति के हानिकारक प्रभाव के खिलाफ सीटू, एआईकेएस, एआईएडब्ल्यूयू, एडवा, एसएफआई और डीवाईएफआई जैसे संगठनों ने 21 अप्रैल को छतों से विरोध का आह्वान किया था।  
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
21 Apr 2020
CITU

दिल्ली: पिछले महीने मार्च में राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन होने के बाद किसी भी अन्य दिन के विपरीत देश में मंगलवार को अलग तस्वीर थी। मंगलवार को देश के सभी कोनों कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक किसानों, श्रमिकों, युवाओं, छात्रों, महिलाओं और उनके परिवारों ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले केंद्र सरकार के कोरोना महामारी और लॉकडाउन के हानिकारक प्रभाव के विरोध में अपनी छतों या दरवाजों पर पोस्टर, बैनर और नारे लगाकर विरोध जताया।

देश भर के युवाओं ने मांग की कि सरकारें- केंद्र और राज्य दोनों- लॉकडाउन अवधि के दौरान सभी फंसे हुए प्रवासी मजदूरों के लिए भोजन और आश्रय सुनिश्चित करें। चूंकि काम और यात्रा प्रतिबंध से मानवीय संकट पैदा हो गया, जिसके परिणामस्वरूप कई प्रवासी मजदूरों को अपने घर तक पहुंचने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ा, जबकि अन्य को अपने कार्य शहर और राहत शिविरों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।
 
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इस दौरान छात्रों ने मांग की कि केंद्र यह सुनिश्चित करे कि कॉलेज हॉस्टल फीस वापस करें क्योंकि सभी शैक्षणिक संस्थान लॉकडाउन के कारण बंद हैं।

Students protests hostel fee lockdown.jpeg

स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने सरकार से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि छात्रों को छात्रवृत्ति और अनुदान का वितरण किया जाए।
 

Students protests hostel fee lockdown 1.jpeg
SFI ने सरकार से जो मांग की वो इस प्रकार है कि:-

I. सरकार द्वारा छात्रों को न्यूनतम राशि सीधे बैंक खातों में प्रदान करनी चाहिए
2. छात्रों को फैलोशिप/ छात्रवृत्ति और अनुदान वितरित करें (स्नातक - पीएचडी)
3. सरकार दो महीने का शुल्क अवश्य माफ करें
4. लॉकडाउन के दौरान छात्रावास का शुल्क न लिया जाए।
5. सरकार को उन छात्रों की ओर से किराए का भुगतान करना चाहिए जो किराए पर रह रहे हैं
6. साथ ही छात्रों की बुनियादी जरूरतों को सुनिश्चित करने के लिए सरकार को आवश्यक कदम उठाने चाहिए

घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं का विरोध प्रदर्शन

ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमन एसोसिएशन (एडवा) के नेतृत्व में महिलाओं ने केंद्र से मांग की कि वह लॉकडाउन अवधि के दौरान घरेलू हिंसा में वृद्धि के समस्या पर ध्यान दे।

Women Protest Domestic Violenc 1.jpeg

COVID-19 का मुकाबला करने के लिए आंदोलन पर प्रतिबंध के साथ, देश भर में कई महिलाओं को घर में रहने और उनके खिलाफ हिंसा में वृद्धि के साथ रहना मुश्किल हो रहा है। घरेलू हिंसा की शिकायत प्राप्त करने वाली संस्था राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के अनुसार, लॉकडाउन अवधि में घरेलू हिंसा के मामलों में पहले से दोगुना की वृद्धि हुई हैं।

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सभी के लिए राशन की मांग
 
देश भर में भूख के बढ़ते मामलों के मद्देनजर दिल्ली के निवासियों ने केंद्र से सभी के लिए भोजन और राशन को राशन कार्ड या आधार कार्ड की अनिवार्यता के बिना सुनिश्चित करने की मांग की।

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पिछले महीने मार्च में लॉकडाउन शुरू होने के कुछ दिनों बाद केंद्र ने 5 किलोग्राम गेहूं या चावल मुफ्त देने का वादा किया और हर निम्न आय वाले परिवार के लिए एक किलोग्राम दाल की बात कही। हालांकि, कई लोगों के पास राशन कार्ड नहीं है, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने बताया कि लगभग चालीस से पचास लाख लोगों को भोजन राशन नहीं मिलेगा।


किसानों ने वित्तीय सहायता की मांग की

देश में तालाबंदी के 28वें दिन में प्रवेश करते ही देश भर के किसानों ने सरकारों से फसल, परिवहन, खेती के लिए वित्तीय सहायता की माँग की। मांगें ऐसे समय में आईं जब किसान संकट की कई खबरें मीडिया में सामने आईं, जो तालाबंदी के दौरान अपनी पहले से ही  आर्थिक संकट से घिरे हैं।

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अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) के नेतृत्व वाले किसानों ने भी सरकारों से सभी फसलों के लिए कृषि संचालन, पारिश्रमिक मूल्य और खरीद केंद्र सुनिश्चित करने को कहा।

आईटी कर्मचारी भी राष्ट्रव्यापी विरोध में हुए शामिल

कई आईटी और आईटीईएस कर्मचारी भी अपने संघ के नेतृत्व में 21 अप्रैल को देशव्यापी विरोध में शामिल हुए। वे मांग कर रहे हैं कि केंद्र को इस क्षेत्र में कोई कटौती नहीं करनी चाहिए।

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कोरोना वायरस के प्रकोप के मद्देनजर कर्मचारियों ने 50 प्रतिशत कार्यबल के साथ चलने के लिए आईटी कंपनियों को दिए गए छूट का विरोध किया, जो संघ के अनुसार "तर्कहीन" है और कर्मचारियों के स्वास्थ्य को जोखिम में डालेगा। उनका कहना है इससे फायदा 1% होगा जबकि जान का जोख़िम 99 % है

बैंक कर्मचारी भी विरोध में हुए शामिल

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बैंक कर्मचारी फेडरेशन ऑफ इंडिया (BEFI) के नेतृत्व में देश भर के बैंक कर्मचारियों ने दैनिक कामकाज की शिफ्ट को आठ घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे करने के प्रस्ताव का विरोध किया। कर्मचारियों ने अनुबंध, आकस्मिक और आउटसोर्स श्रमिकों को पूरी मजदूरी का भुगतान करने की मांग की- जो वर्तमान में बैंकिंग उद्योग में भी हैं- जो तालाबंदी का खामियाजा भुगत रहे हैं।

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गौरतलब है कि दुनिया भर में कहीं भी इस तरह के देशव्यापी पैमाने पर लोगों के विरोध का शायद यह पहला उदाहरण है। आपको बता दें कि मज़दूर संगठन (सीटू), अखिल भारतीय किसान सभा (ए.आई.के.एस), अखिल भारतीय खेतिहर मजदूर यूनियन (एआई.ए.डब्ल्यू.यू), ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमेन्स एसोसिएशन (एडवा), स्टूडेन्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एस.एफ.आई) और डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (डी.वाई.एफ.आई) जैसे संगठनों ने 21 अप्रैल को छतों से विरोध का आह्वान किया।  

 इसे भी पढ़े:-मंगलवार को देशव्यापी प्रतिवाद : “जनता को भाषण नहीं, राशन और वेतन चाहिए”

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