NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
ग्रामीण भारत में कोरोना-16: पंजाब के गांव में पेंशन बैंकों में  हस्तांतरित, लेकिन पैसे की निकासी मुश्किल
सूचनाएं मुहैया कराने वालों ने यह भी कहा कि लॉकडाउन के दौरान परिवहन की कमी सब्ज़ियों और दूध की बिक्री पर असर डाल रही है, क्योंकि बाज़ारों में उत्पाद की आवाजाही का कोई ज़रिया नहीं है।
सुखराम सिंह
21 Apr 2020
ग्रामीण भारत

यह उस श्रृंखला की 16वीं रिपोर्ट है, जो ग्रामीण भारत के जीवन पर COVID-19 से जुड़ी नीतियों के असर की झलक देती है। सोसाइटी फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा संचालित इस श्रृंखला में उन अलग-अलग जानकारों की रिपोर्ट शामिल हैं, जो भारत के अलग-अलग हिस्सों में गांवों का अध्ययन करते रहे हैं। ये रिपोर्ट, अध्ययन किये जाने वाले गांवों के प्रमुख सूचनायें देने वालों के साथ टेलीफ़ोन से की गयी बातचीत के आधार पर तैयार की गयी है। यह लेख पंजाब के मनसा ज़िले के उस रामगढ़ शाहपुरियां गांव पर लॉकडाउन के तात्कालिक असर पर रौशनी डालता है, जहां आपूर्ति श्रृंखलायें यानी सप्लाई चेन टूट गयी है और मज़दूर, कारीगर, सीमांत और छोटे किसान बुरी तरह से प्रभावित हो गये हैं। जहां किसान फ़सल में देरी से चिंतित हैं, वहीं दिहाड़ी मज़दूरों को मनरेगा के तहत भी काम नहीं मिल पा रहा है।

पंजाब के मनसा ज़िले के इस रामगढ़ शाहपुरियां गांव में 240 घर हैं और इस गांव की कुल आबादी 1,250 (आशा कार्यकर्ताओं के रिकॉर्ड के अनुसार) है। ज़्यादातर जाट सिख ज़मींदार हैं और खेती-बाड़ी में लगे हुए हैं। गांव की क़रीब 54% आबादी या तो अनुसूचित जाति या पिछड़ी जाति की श्रेणी में आती है; ये लोग बड़े पैमाने पर भूमिहीन हैं और कृषि मज़दूर के रूप में काम करते हैं। गांव के कई लोग गांव के भीतर या आस-पास के शहरों में ग़ैर-कृषि गतिविधियों में भी लगे हुए हैं।

गांव की रबी की प्रमुख फ़सल गेहूं है, और यहां कटाई का काम काफी हद तक यंत्रों से होता है। किसानों में से एक के मुताबिक़, कटाई का काम मशीन से होने की वजह से श्रम पर उनकी निर्भरता कम हो गयी है, और मशीनों को चलाने के लिए गांव में पर्याप्त श्रम उपलब्ध है। इसके अलावा, चूंकि पंजाब के बनिस्पत मध्यप्रदेश और राजस्थान में गेहूं पहले काट लिया जाता है, इसलिए पंजाब के कंबाइन हार्वेस्टर के मालिक अक्सर उन राज्यों में अपने हार्वेस्टर ले जाते थे, और अप्रैल के पहले सप्ताह में लौट आते थे। लेकिन, एक कंबाइन हार्वेस्टर के मालिक ने बताया कि इस बार जगह-जगह देशव्यापी लॉकडाउन के चलते उन्हें पंजाब लौटने में मुश्किल हो रही है।

इसके अलावा, श्रम की कमी से ख़रीद बाज़ारों पर असर पड़ने की संभावना है, क्योंकि उतराई, पैकिंग, लदान और दूसरी गतिविधियां उन मज़दूरों द्वारा अंजाम दी जाती हैं, जिनमें से अधिकांश उत्तर प्रदेश और बिहार से आते हैं। चूंकि लॉकडाउन ने उन्हें सफ़र करने से रोक दिया है, इसलिए अनुमान है कि गेहूं की ख़रीद प्रक्रिया धीमी होगी या उसमें देरी होगी। किसान इस बात को लेकर भी निश्चिंत नहीं दिखते हैं कि इस बार उनकी फ़सल को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर समय पर ख़रीदा जा सकेगा या नहीं।

लॉकडाउन शुरू होने से पहले, गांव के लगभग 25 लोग आसपास के क़स्बों और शहरों में राजमिस्त्री, बढ़ई, निर्माण कार्य में लगे श्रमिकों, पेंटरों, दर्जियों, स्कूल वैन के ड्राइवरों के रूप में और मरम्मत करने वाली दुकानों आदि जैसी जगहों पर काम कर रहे थे। ये सभी लोग इस समय बेरोज़गार हैं, क्योंकि वे गांव के बाहर नहीं जा सकते हैं। जानकारी देने वालों में से एक, पास के ही एक शहर में राजमिस्त्री के तौर पर काम कर रहा था; अब वह कम मज़दूरी पर भी गांव में ही काम करने के लिए राज़ी है, लेकिन उसके पास कोई काम ही नहीं है, क्योंकि पुलिस ने गांव के भीतर सभी निर्माण कार्य पर रोक लगा दी हैं। इस समय उसके पास आय का कोई ज़रिया ही नहीं बचा है।

एक पंचायत सदस्य ने बताया कि लगभग 200 घर मनरेगा योजना के तहत पंजीकृत हैं, लेकिन लॉकडाउन के दौरान किसी को भी कोई काम नहीं दिया गया है। सिंचाई, तालाबों की खुदाई और तालाबों की सफ़ाई और सड़कों के रखरखाव जैसी गतिविधियां लॉकडाउन के दौरान बंद हो गयी हैं।

सूचना देने वालों ने बताया कि चारा जुटाने के लिए खेतों में जाने पर तो कोई रोक नहीं है, लेकिन फिर भी किसानों के पास दुधारू पशुओं के लिए ज़रूरी चारा की कमी है, क्योंकि इसकी नियमित आपूर्ति शहर से ही होती थी, जो इस समय रुकी हुई है। लॉकडाउन के चलते परिवहन की कमी से सब्ज़ियों और दूध की बिक्री पर भी असर पड़ रहा है, क्योंकि बाज़ारों में उत्पाद की आवाजाही का कोई ज़रिया नहीं है।

गांव में न कोई बैंक है और न कोई एटीएम है, इसलिए गांव के लोग पड़ोस के गांव, मघनिया जाते थे, जो इस गांव से तीन किमी दूर है। लॉकडाउन के शुरुआती दिनों के दौरान बैंक बंद था, लिहाजा ग्रामीणों की पहुंच बैंकिंग सुविधाओं तक बिल्लुल नहीं थी। लेकिन, 30 मार्च को बैंक शाखा फिर से खोल दी गयी। भीड़ बहुत बढ़ जाने की वजह से बड़े पैमाने पर नक़दी की कमी हो गयी; कुछ लोगों को तो ग्रामीणों ने गांव में प्रवेश करने से ही रोक दिया।

एक सूचना देने वाले ने कहा कि अगर लोग अपने घर या अपने गांव से बाहर जाते हैं, यहां तक कि बैंक भी जाते हैं,तो भी लोगों को पुलिस के मारपीट का डर लगा रहता है। कुछ के पास तो कोई एटीएम कार्ड ही नहीं है, जबकि जिनके पास कार्ड हैं भी, वे नक़दी निकालने में असमर्थ हैं, क्योंकि वे बोहा (दस किमी दूर) और बरेटा (बारह किमी दूर) जैसे पास के शहरों में स्थित एटीएम तक नहीं पहुंच सकते हैं। सरकार ने लाभार्थियों के बैंक खातों में वृद्धावस्था और दूसरे सामाजिक सुरक्षा पेंशन तो हस्तांतरित कर दी है, लेकिन ये लाभार्थी अपना पैसा निकालने के लिए बैंक जाने में असमर्थ हैं। गांव का एक शख़्स बैंक के संपर्क में है और उसने लाभार्थियों के लिए पेंशन के पैसे निकलवा दिये हैं (प्रत्येक 1,000 रुपये पर 30 रुपये का कमीशन लेकर)।

गांव की छोटी-छोटी दुकानों में केवल भोजन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की सीमित आपूर्ति है। जबकि आस-पास के शहर में, प्रशासन केवल सीमित संख्या में ही ख़ुदरा दुकानें खोलने की अनुमति दे रहा है। कुछ सब्ज़ी विक्रेताओं को ज़िला प्रशासन द्वारा पास जारी किये गये हैं। आपूर्ति में कमी के चलते सब्ज़ियों सहित ख़ुदरा खाद्य पदार्थों की क़ीमतें बढ़ रही हैं। सूचना देने वालों ने बताया कि ग्रामीण एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं, और जो भोजन की आपूर्ति करने में सक्षम हैं,वे उन लोगों को भोजन उपलब्ध करा रहे हैं, जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

सूचना देने वालों ने  यह भी बताया कि ज़रूरी दवाओं की क़िल्लत है, क्योंकि गांव में सरकार द्वारा संचालित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या यहां तक कि कोई फ़ॉर्मेसी भी नहीं है। लॉकडाउन की ऐलान स्थानीय गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर से किया गया था और पुलिस ने लॉकडाउन के कार्यान्वयन को सुनिश्चित कर दिया है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने ग्रामीणों को COVID -19 को लेकर जागरूक करने के लिए गांव का दौरा अभी तक नहीं किया है। ग्राम पंचायत ने खंड विकास और पंचायत अधिकारी (BDPO) के कार्यालय के निर्देश पर सड़कों और दूसरे सामान्य इलाक़ों की सफ़ाई करा दी गयी है। पुलिस विभाग और पंचायत के निर्देशों पर, ग्रामीण ड्यूटी पर गश्त लगा रहे हैं और गांव में प्रवेश करने पर रोक रहे हैं। लेकिन, सूचना देने वालों का कहना था कि इन रुकावटों के बीच हाथ धोने या साफ़-सफ़ाई के लिए कोई इंतज़ाम नहीं की गयी है।

COVID -19 के प्रकोप और लॉकडाउन ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अनिश्चित और हताशा के हालात के हवाले कर दिया है।

[यह रिपोर्ट उन दस लोगों से हुई बातचीत के आधार पर तैयार की गयी है, जिनमें दो पंचायत सदस्य,  एक आशा कार्यकर्ता, दो किसान, दो मज़दूर, एक कंबाइन हार्वेस्टर का मालिक, एक राजमिस्त्री और एक बढ़ई हैं। इनसे बातचीत 31 मार्च और 1 अप्रैल, 2020 को की गयी थी।]

लेखक पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला में अर्थशास्त्र विभाग में रिसर्च फेलो हैं।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

COVID-19 in Rural India- XVI: Pension Transferred to Banks but Unable to Withdraw due to Lockdown in Punjab’s Shahpurian

Combine Harvesters
COVID 19
COVID 19 Lockdown
COVID Impact in Rural India
farmers distress
MSP
Wheat harvest
Rabi harvest
punjab
Daily Wage Workers

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

क्या कोविड के पुराने वेरिएंट से बने टीके अब भी कारगर हैं?

जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?

कोविड-19 : दक्षिण अफ़्रीका ने बनाया अपना कोरोना वायरस टीका

कोविड-19 से सबक़: आपदाओं से बचने के लिए भारत को कम से कम जोखिम वाली नीति अपनानी चाहिए

कोविड-19 : मप्र में 94% आईसीयू और 87% ऑक्सीजन बेड भरे, अस्पतालों के गेट पर दम तोड़ रहे मरीज़

कोविड के नाम रहा साल: हमने क्या जाना और क्या है अब तक अनजाना 

Covid-19 : मुश्किल दौर में मानसिक तनाव भी अब बन चुका है महामारी

कोविड-19: अध्ययन से पता चला है कि ऑटो-एंटीबाडी से खतरनाक रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है

गिग वर्करों पर कैसा रहा लॉकडाउन का प्रभाव?


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में आज फिर एक हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 71 मरीज़ों की मौत
    06 Apr 2022
    देश में कोरोना के आज 1,086 नए मामले सामने आए हैं। वही देश में अब एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 11 हज़ार 871 रह गयी है।
  • khoj khabar
    न्यूज़क्लिक टीम
    मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं, देश के ख़िलाफ़ है ये षडयंत्र
    05 Apr 2022
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने दिल्ली की (अ)धर्म संसद से लेकर कर्नाटक-मध्य प्रदेश तक में नफ़रत के कारोबारियों-उनकी राजनीति को देश के ख़िलाफ़ किये जा रहे षडयंत्र की संज्ञा दी। साथ ही उनसे…
  • मुकुंद झा
    बुराड़ी हिन्दू महापंचायत: चार FIR दर्ज लेकिन कोई ग़िरफ़्तारी नहीं, पुलिस पर उठे सवाल
    05 Apr 2022
    सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि बिना अनुमति के इतना भव्य मंच लगाकर कई घंटो तक यह कार्यक्रम कैसे चला? दूसरा हेट स्पीच के कई पुराने आरोपी यहाँ आए और एकबार फिर यहां धार्मिक उन्माद की बात करके कैसे आसानी से…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    एमपी : डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे 490 सरकारी अस्पताल
    05 Apr 2022
    फ़िलहाल भारत में प्रति 1404 लोगों पर 1 डॉक्टर है। जबकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के मानक के मुताबिक प्रति 1100 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए।
  • एम. के. भद्रकुमार
    कीव में झूठी खबरों का अंबार
    05 Apr 2022
    प्रथमदृष्टया, रूस के द्वारा अपने सैनिकों के द्वारा कथित अत्याचारों पर यूएनएससी की बैठक की मांग करने की खबर फर्जी है, लेकिन जब तक इसका दुष्प्रचार के तौर पर खुलासा होता है, तब तक यह भ्रामक धारणाओं अपना…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License