NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्या मंदिर आंदोलन को आज़ादी के आंदोलन से जोड़ा जा सकता है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल, 5 अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर के लिए भूमि पूजन के बाद अपने भाषण में मंदिर आंदोलन की तुलना आज़ादी के आंदोलन से की। इसे बिल्कुल ठीक नहीं कहा जा सकता।
मुकुल सरल
06 Aug 2020
Modi
फ़ोटो साभार : बीबीसी

तीस साल में दूसरी बार मंदिर के शिलापूजन का ‘ऐतिहासिक’ अवसर 5 अगस्त, 2020 को आया। इससे पहले 9 नवंबर, 1989 को भी ऐसा ही एक अवसर आया था, बहुतों की नज़र में वह समय भी ऐतिहासिक ही था। लेकिन वह ‘ऐतिहासिक अवसर’ अब भुला दिया गया और एक नया ‘अवसर’ बनाया गया है। जिसके बाद कहा जा रहा है कि अब देश में दो दीपावली मनाईं जाएंगी एक 5 अगस्त को और दूसरी कार्तिक मास की अमावस्या को। हो सकता है कि कुछ साल बाद तीन दीपावली भी मनाईं जाएं जब इस मंदिर का निर्माण पूरा हो जाएगा। हो सकता है कि तब नये सिरे से ‘ऐतिहासिक अवसर’ और ‘ऐतिहासिक दिन’ परिभाषित किया जाए और नया इतिहास बनाया जाए। और जब ‘अच्छे दिनों’ की तरह ‘रामराज’ आ जाएगा तो ‘हर दिन होली, हर रात दिवाली...’

ख़ैर इतिहास बनते और बिगड़ते रहते हैं। हां, लेकिन यह सच है कि मिटते नहीं हैं। जिस स्थल पर राम मंदिर की नींव रखी गई है (माफ़ कीजिए कहा जा रहा है कि अभी नींव नहीं रखी गई, केवल शिलापूजन किया गया है, नींव की खुदाई किसी और शुभ दिन और शुभ मुहूर्त में की जाएगी। वह भी ‘ऐतिहासिक’ अवसर होगा। दरअसल इस समय चातुर्मास चल रहा है और हिन्दू मान्यता के अनुसार इन चार महीनों सावन, भादो, अश्विन, कार्तिक में देवता आराम करते हैं। भगवान विष्णु, राम जिनके अवतार कहे जाते हैं, वे योग निद्रा में रहते हैं और हिन्दुओं में शादी-ब्याह जैसे मांगलिक कार्य करने की भी मनाही होती है। इस बार यह चातुर्मास 1 जुलाई से शुरू हो चुका है और 24 नवंबर तक रहने वाला है। इसी वजह से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के संस्थापक सदस्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती अयोध्या के भूमि पूजन में शामिल नहीं हुए। उन्होंने इलाहाबाद यानी प्रयागराज के अलोपीबाग आश्रम में अलग से शिला का पूजन किया। इसे वे चातुर्मास पूरा होने के बाद जब अयोध्या जाएंगे तब वहां स्थापित करेंगे।)

बात हो रही थी कि इस इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता कि जिस स्थल पर राम मंदिर की नींव रखी गई है वहां हमारी आंखों के सामने 6 दिसंबर 1992 तक बाबरी मस्जिद थी। जिसे जबरन गिरा दिया गया। कोर्ट में झूठी शपथ देकर। झूठा हलफ़नामा देकर। और जिसे कोर्ट ने आपराधिक कृत्य माना।

ख़ैर इस विवाद से आगे बढ़ते हैं, कुल मिलाकर कल वाकई एक ऐतिहासिक दिन था। कोराना काल में 52,509 नए मरीज़ों, 19,08,254 कुल मरीज़ों और 39,795 मौतों के आंकड़े के बीच 32 सेकंड के शुभ मुहूर्त में भारत के प्रधानमंत्री द्वारा राम मंदिर का भूमि पूजन और शिलापूजन किया गया। जिसके बाद प्रधानमंत्री द्वारा ऐतिहासिक भाषण दिया गया।

इसे पढ़ें : बीच बहस :  कोरोना काल में 32 सेकंड का शुभ मुहूर्त!

इस भाषण पर बात करनी ज़रूरी है, क्योंकि ये किसी आम व्यक्ति या धर्माचार्य का भाषण या उद्भोधन नहीं बल्कि भारत के प्रधानमंत्री का भाषण है। लेकिन इससे पहले उस त्रिमूर्ति की तस्वीर पर गौर कर लिया जाए जो इस पूरे आयोजन में छाई रही। भारत के भविष्य की तस्वीर शायद यही बताई जा रही है। आधुनिक भारत की तस्वीर..जिसका निर्माण कल से शुरू हो गया है...इसमें एक तरफ़ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत हैं, तो दूसरी तरफ़ (मुख्यमंत्री) योगी आदित्यानाथ और बीच में (प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी। इस नाम का शिलापट भी वहां लग गया है।

एक तस्वीर और भी कल वायरल रही जिसमें नरेंद्र मोदी, भगवान राम को उंगली पकड़कर मंदिर की ओर ले जा रहे हैं। ये अकेली तस्वीर ही अपने आप में काफी कुछ कह देती है। 

इस तरह कहा जा सकता है कि कल, 5 अगस्त,2020 को केवल एक मंदिर का शिलान्यास नहीं हुआ बल्कि एक ऐसे राज्य की भी नींव रखी गई, जो बहुलतावादी से बहुसंख्यकवादी की ओर जा रहा है।

फिर लौटते हैं 5 अगस्त को अयोध्या में दिए गए ऐतिहासिक भाषण पर। एक ऐतिहासिक भाषण सबसे पहले मुख्यमंत्री, भाजपा के भविष्य और गोरखनाथ पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ जी ने दिया। उन्होंने इसे पांच शताब्दियों के इंतज़ार के बाद आई शुभ घड़ी बताया। उनसे पहले समाचार चैनल और अख़बार भी घोषणा कर चुके थे कि 492-493 साल पहले राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। हालांकि इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने भी नहीं माना। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक विवादित इमारत के नीचे मिले ढांचे से किसी धार्मिक स्थल होने के तो संकेत मिलते हैं लेकिन वह एक हिन्दू मंदिर था, ऐसा साबित नहीं होता और न यह साबित होता है कि बाबर या उसके सिपाहसलारों ने राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई।

ख़ैर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस अवसर को सदियों के सपने का सच होना बताया।

उनके भाषण में बहुत अच्छी-अच्छी बातें थीं, राम की महिमा थी, राम के आदर्शों, उनकी मर्यादा का गुणगान था। लेकिन राम के नाम पर उन्होंने अपने और अपनी पार्टी, अपने पितृ संगठन आरएसएस, उसके अनुषंगिक संगठन विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और अन्य समर्थकों के उन कृत्यों को भी जायज़ ठहराने की कोशिश की जिन्हें किसी भी स्तर पर जायज़ नहीं कहा जा सकता। जब वे इसे कई सदियों से अनवरत चले आंदोलन, संघर्ष और संकल्प का फल बताते हैं तो वे इस दौरान चोरी से मस्जिद के गुंबद में मूर्तियां रखने और 1992 में जबरन मस्जिद गिराने के कृत्य को भी वैध ठहराने की कोशिश करते हैं जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी आपराधिक कृत्य माना है। और जिसका मुकदमा अभी भी लखनऊ में सीबीआई की विशेष अदालत में चल रहा है। यही नहीं क्या कोई इस पूरे उग्र अभियान के दौरान हुए दंगों को भी वाजिब ठहराया जा सकता है। इस दौरान हुए ख़ून-ख़राबे और हज़ारों निर्दोष लोगों जिसमें हिन्दू-मुसलमान दोनों शामिल हैं, की जान जाने को सही ठहराया जा सकता है? नहीं।

इसी तरह क्या इस आंदोलन या अभियान को आज़ादी के आंदोलन से जोड़ा जा सकता है। क्या एक समुदाय विशेष यानी बहुसंख्यकों के एक धर्म स्थल के लिए चलाए गए उग्र आंदोलन की तुलना आज़ादी के आंदोलन से की जा सकती है, जिसमें एक वर्ग या समुदाय नहीं वरन् सभी वर्ग-समुदाय हिन्दू, मुस्लिम, सिख सभी ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और देश को विदेशी शासन से मुक्त कराया। एक ऐसा आंदोलन जिसमें आस्तिक-नास्तिक, स्त्री-पुरुष सभी शामिल थे, जिसका मकसद एक ऐसा स्वराज स्थापित करना था जिसमें शोषण रहित समता पर आधारित भेदभाव रहित समाज हो। जिसके नेताओं ने तय किया था कि राज्य का अपना कोई एक धर्म नहीं होगा, बल्कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनेगा। जिन महात्मा गांधी का नाम मोदी जी ने कल भी दोहराया, उनके राम में भी ईश्वर-अल्लाह दोनों शामिल हैं। जो सबको सन्मति देते हैं। उन्हीं महात्मा गांधी ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में एक भी सरकारी पैसा ख़र्च करने से उस समय के गृहमंत्री सरदार पटेल को रोक दिया था।

इसे पढ़ें : राममंदिर बनाम सोमनाथ पुनर्निर्माणः गांधी, पटेल और नेहरू

क्या आज़ादी के आंदोलन से मंदिर आंदोलन को जोड़ना भी उसे वैधता दिलाने का ही एक प्रयास नहीं है। और शायद उस गिल्ट, उस शर्म से बाहर आने की भी एक कोशिश जिसका आरोप उनके पितृसंगठन आरएसएस जिसे उन्होंने और मुख्यमंत्री ने विचार परिवार के तौर पर चिह्नित किया, की आज़ादी के आंदोलन में कोई भूमिका न होने को लेकर लगातार लगता है। इसलिए वे दो आंदोलनों का घालमेल करना चाहते हैं। यही वजह है कि वे भूमिपूजन को लिए भी अगस्त का महीना चुनते हैं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के ख़ात्में का एक साल पूरा होने के अलावा 5 अगस्त की इसलिए भी मान्यता है कि ये अगस्त महीना आज़ादी के महीने के तौर पर जाना जाता है। 9 अगस्त, 1942 भारत छोड़ों आंदोलन और 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के तौर पर हमारे दिलों में बसा है। और उन्होंने इसी तरह इस दिन को भी याद करने का आह्वान किया।

एक और बात जो ग़ौर करने वाली थी वो यह कि राम की नीति, आदर्शों का गुणगान करते हुए मोदी जी ने सत्य, अहिंसा, उदारता और प्रेम पर बहुत ज़ोर दिया लेकिन अंत में मुस्कुराते हुए यह भी कहा कि यह भी रामजी की नीति है कि ‘भय बिनु होई न प्रीति’ यानी भय या डर के बिना प्रेम संभव नहीं है। इसका यह अर्थ मानस में समुद्र से रास्ता मांगने के प्रसंग या राजनीति या शासन के संदर्भ में सही हो सकता है, लेकिन आध्यात्मिक या वास्तविक अर्थों में ठीक नहीं हो सकता है, क्योंकि जहां भय या डर है वहां प्रेम संभव ही नहीं है। प्रेम तो हर तरह के भय से मुक्त करता है। इसलिए मानस में लिखी यह पंक्ति लेखक गोस्वामी तुलसीदास की अपनी राय या समझ भी हो सकती है। वैसे भी मानस में ऐसे कई छंद-चौपाई और प्रसंग हैं जो वाल्मीकि रामायण से अलग हैं या जिन पर लगातार बहस और विवाद रहता है। ख़ैर जिन संदर्भों और अर्थों में मोदी जी ने इसे दोहराया उस इशारे को भी समझने की ज़रूरत है।

एक बात के लिए मोदी जी की तारीफ़ करनी होगी कि उन्होंने ‘जय श्रीराम’ के उग्र नारे को ‘जय सियाराम’ के नारे में बदल दिया। यही हमारी संस्कृति है, यही जनमानस का वास्तविक उद्बोधन है। लोक में यानी हमारे घर-परिवार में कभी भी जय श्रीराम का उच्चारण नहीं रहा, कोई भी कार्य हो या एक-दूसरे को अभिवादन भी करना हो तो लोग राम-राम या जय सियाराम बोलते हैं। वैसे भी हमारी संस्कृति में किसी भी देवता का नाम अकेले नहीं लिया जाता। कृष्ण के नाम से पहले राधा का नाम आता है। शिव-पार्वती भी साथ आते हैं और विष्णु लक्ष्मी के साथ। जय श्रीराम का नारा तो एक राजनीतिक नारा था, जिसे आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद और भारतीय जनता पार्टी ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए स्थापित किया। इसमें जो उग्रता, अहंकार और शक्ति प्रदर्शन था वो जग-जाहिर है।

जय श्रीराम से जय सियाराम की यह यात्रा स्वागत योग्य तो है, लेकिन इसके भी राजनीतिक निहितार्थ ही हैं। इसकी मान्यता तब और ज़्यादा होती जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने घर की स्त्री, अपनी पत्नी जशोदाबेन को भी इतना मान देते। उन्हें साथ रखते या वास्तव में यानी कानूनी रूप से छोड़ देते। और ये भी नहीं तो सालों-साल अपने शादीशुदा होने की बात छुपाए न रहते। अगर 2014 के चुनाव में चुनाव आयोग ने सभी कॉलम भरने की बाध्यता न रखी होती तो वे शायद अपने Marital status यानी वैवाहिक स्थिति के खाने को खाली ही छोड़ देते।

ख़ैर अब इस बात को कुरेदने की बहुत ज़रूरत नहीं। यह उनका निजी मामला है और इसपर आपत्ति जताने का अधिकार जशोदाबेन को है। लेकिन जब वह सार्वजिनक रूप से नैतिक उपदेश देते हैं, दूसरों को नसीहत देते हैं तो सवाल उठ जाता है।

सही सवाल के रूप में हम इस जगह उस नारे को याद कर सकते हैं जो उन्होंने पूरे देश के लिए हरियाणा की धरती से दिया था और उसे लाल क़िले से दोहराया था- “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ”, इस नारे का बहुत स्वागत हुआ था, लेकिन वास्तविकता में हुआ क्या...! 2014 के बाद से बेटियां कितना सुरक्षित हुई हैं ये राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ें बता देंगे। यही नहीं केंद्र और राज्य सरकारों में शामिल कई पूर्व मंत्री, सांसद, विधायक तक महिला शोषण के मामलों में आरोपी रहे, पकड़े गए। किस पर कितने गंभीर मामले हैं चुनाव आयोग में दर्ज है। उनका एक विधायक एक महिला का शोषण करता है, उत्पीड़न करता है, और दूसरा उसके बचाव में कहता है कि तीन बच्चों की मां के साथ भी कोई बलात्कार करता है क्या। तीसरा एक सांसद उससे मिलने जेल जाता है (उन्नाव प्रकरण)। इसलिए दिए जाने वाले भाषण और नारे वास्तविक अर्थों में धरातल पर भी परीलक्षित हों तब कुछ मायने हैं।

सवाल बहुत हैं, लेकिन समय संविधान की प्रस्तावना जिसे उद्देशिका भी कहते हैं, एक बार फिर याद करने और दोहराने का है। वही इस मुश्किल समय में हम सबका संबल है-

“हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता,

प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सब में,

व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता

और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता

बढ़ाने के लिए

दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”

...

Ram Mandir
ayodhya
Narendra modi
Temple movement
Freedom movement
BJP
RSS
Ramjanmbhoomi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • स्मार्ट सिटी में दफन हो रही बनारस की मस्ती और मौलिकता
    विजय विनीत
    स्मार्ट सिटी में दफन हो रही बनारस की मस्ती और मौलिकता
    22 Aug 2021
    बनारस का मज़ा और मस्ती लुप्त होती जा रही है। जनता पर अनियोजित विकास जबरिया थोपा जा रहा है। स्मार्ट बनाने के फेर में इस शहर का दम घुट रहा है... तिल-तिलकर मर रहा है। बनारस वह शहर है जो मरना नहीं, जीना…
  • विपक्षियों में सहमति, योगी की राजनीति और गडकरी का नेहरू-प्रेम
    न्यूज़क्लिक टीम
    विपक्षियों में सहमति, योगी की राजनीति और गडकरी का नेहरू-प्रेम
    21 Aug 2021
    सत्ताधारी भाजपा यूपी के चुनावों की तैयारी में अभी से जुट गयी है. वह इन दिनों तालिबान पर सियासी-खेल 'खेलने' में लगी है. जहां किसी खास व्यक्ति के किसी बयान में वह तनिक गुंजायश देखती है, फौरन ही समूचे…
  • ‘ईश्वर के नाम पर’ शपथ संविधान की भावना के विरुद्ध
    वसंत आदित्य जे
    ‘ईश्वर के नाम पर’ शपथ संविधान की भावना के विरुद्ध
    21 Aug 2021
    संविधान कहता है कि राज्य को विचार और कर्म में धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए और यही बात राजनीतिक पार्टियों के लिए भी लागू होती है।
  • मोदी सरकार ने दिखाया है कि हमें विभाजन के दर्द को किस तरह याद नहीं करना चाहिए
    स्मृति कोप्पिकर
    मोदी सरकार ने दिखाया है कि हमें विभाजन के दर्द को किस तरह याद नहीं करना चाहिए
    21 Aug 2021
    भारत को विभाजन को याद करने की जरूरत है, लेकिन मोदी सरकार ने इसके लिए ऐसी तारीख़ चुनी, जिसका मक़सद ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना और उनकी पार्टी को चुनावी फायदा दिलाना है। ना कि इसके ज़रिए शांति और…
  • भारत अमेरिका की अफ़गान नीति का पिछलग्गू न बन कर, स्थानीय ताकतों के साथ मिलकर काम करे
    अमिताभ रॉय चौधरी
    भारत अमेरिका की अफ़गान नीति का पिछलग्गू न बन कर, स्थानीय ताकतों के साथ मिलकर काम करे
    21 Aug 2021
    ‘किसी भी सूरत में, तालिबान शासित अफगानिस्तान भारत के लिए एक बेहद चिंताजनक विषय बना रहने वाला है, जिसका वहां करोड़ों डॉलर मूल्य का निवेश लगा हुआ है...’
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License