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जाति-जनगणना : क्यों और कौन कर रहा है विरोध?
यदि जातिगत जनगणना होती है तो सत्ता के समीकरण बदलेंगे। यथास्थिति बदलेगी। समाज में एक बड़ी हलचल होगी। यही कारण है कि भाजपा इस विषय में बहुत बचकर चल रही है। वह न विरोध कर पा रही है न खुलकर समर्थन।
राज वाल्मीकि
01 Sep 2021
जाति-जनगणना : क्यों और कौन कर रहा है विरोध?
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : गूगल

हमारे देश में जातिगत जनगणना की मांग एक बार फिर जोर पकड़ रही है। खासकर तब से जब से जातीय जनगणना की मांग को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत 11 दलों के नेताओं ने दिल्ली आकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की है। नीतीश कुमार ने जातिगत जनगणना के समर्थन में बोलते हुए इस बात पर जोर दिया कि विभिन्न जातियों से संबंधित आंकड़े प्रभावी विकास योजनाएं बनाने में मदद करेंगे। बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने भी जातिगत जनगणना को राष्ट्र हित में बताते हुए कहा कि इससे गरीबों-वंचितों को मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि सामान्य दशकीय जनगणना में जातिगत जनगणना भी की जा सकती है। आखिर धार्मिक समूहों और अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) की अलग से गणना की ही जाती है। जब एससी/एसटी वर्ग के लोगों की गिनती हो सकती है तो दूसरों की गणना क्यों नही की जा सकती? जनगणना फॉर्म में जाति का कॉलम भी होता ही है।

गौरतलब है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को जो आरक्षण मिला है, उसकी बुनियाद उनकी आबादी है। अगर जातिगत जनगणना होती है तो पिछड़े–अति पिछड़े वर्ग के लोगों की शैक्षणिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक स्थिति का पता चलेगा। सही संख्या व हालात की जानकारी मिलने के बाद ही उनकी बेहतरी के लिए मुनासिब नीति निर्धारित की जा सकेगी। नीतियों के विश्लेषण और डिजाइन के लिए आंकडे आवश्यक मानक हैं।

जातिगत जनगणना से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को भी लाभ मिलेगा। जातिगत जनगणना के आधार पर क्षेत्रीय दलों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में ओबीसी कोटे में बदलाव के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ाने का मुद्दा मिल सकता है। वे ओबीसी के अधिक आरक्षण की मांग करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय कर रखी है उसमे बदलाव करना होगा। वैसे आरक्षण की सीमा बढ़ाना कोई असंभव बात नहीं है। कुछ वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक आधार पर सवर्णों को भी 10 प्रतिशत आरक्षण का अनुमोदन किया ही था। हालांकि विगत में मंडल आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की 50 प्रतिशत आरक्षण की तय सीमा मानते हुए ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश  की थी। जबकि रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि ओबीसी की आबादी (हिन्दू और गैर-हिन्दू दोनों) को मिलाकर देश की कुल जनसख्या की 52 प्रतिशत है। इसी कारण मंडल आयोग मात्र  27 प्रतिशत तक आरक्षण की सिफारिश की लिए बाध्य हुआ था। भले ही उनकी आबादी इससे दोगुनी हो। केन्द्रीय सूची में 2,633 अन्य पिछड़ी जातियां हैं।

यहां बताते चलें कि अनुसूचित जाति की आबादी कुल आबादी की 15 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति की आबादी 7.5 प्रतिशत यानी कुल मिलाकर 22.5 प्रतिशत है। इस तरह 27 प्रतिशत और 22.5 प्रतिशत 50 फीसदी के अंदर ही आती है। मंडल आयोग ने ओबीसी को कुल आबादी का 52 प्रतिशत बताया है लेकिन अन्य जो नमूना सर्वेक्षण किए गए हैं उनमे भी यही निष्कर्ष निकलकर आया है कि ओबीसी समूह हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा है – करीब 40 प्रतिशत। जबकि सरकारी नौकरियों या अवसरों में उन्हें सिर्फ 27 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध है। यदि जातिगत जनगणना होती है तो ये समीकरण बदलेंगे। इससे यथास्थिति बदलेगी। समाज में एक बड़ी हलचल होगी। यही कारण है कि भाजपा इस विषय में बहुत संभल कर चल रही है। वह न जातिगत जनगणना का विरोध कर रही है और न खुलकर समर्थन में है। वह फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। हालांकि उस पर जातिगत जनगणना कराने का दबाव तो बन ही रहा है।

इसे पढ़ें : जातिवार जनगणना की ज़रूरत क्यों?

एक सवाल यहां जेहन में आता है कि क्यों जरूरी है जातिगत जनगणना? क्या हम जातियों में बंटे रहना चाहते हैं? क्या जाति का विनाश हमारा मकसद नहीं होना चाहिए? क्या समतामूलक समाज बनाना हमारा उद्देश्य नहीं होना चाहिए? बिल्कुल होना चाहिए। पर जो ‘चाहिए’ वो है नहीं। ‘चाहिए’ एक आदर्श स्थिति होती है और ‘जाति’ भारतीय समाज का कटु यथार्थ है।

इसे पढ़ें : विशेष: गिनने और न गिनने के बीच जीती जागती जाति

इसी यथार्थ के मद्देनजर मान्यवर कांशीराम ने 85 प्रतिशत बहुजन और 15 प्रतिशत सवर्ण का फार्मूला दिया था। उन्होंने देखा था कि समाज में दलित-बहुजन की  बहुलता है फिर भी कम आबादी वाले उन पर शासन कर रहे हैं। यानी 15 प्रतिशत वाले 85 प्रतिशत पर शासन कर रहे हैं। इसीलिए उन्होंने नारा दिया था – ‘वोट हमारा राज तुम्हारा, नहीं चलेगा नहीं चलेगा’। और ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’।

यहां बताना जरूरी है कि दलित-बहुजन की आर्थिक अधिकारों को लेकर भी लड़ाई चल रही है। इसके अंतर्गत मांग की गई है कि देश के संसाधनों पर आबादी के अनुपात में देश के लोगों की हिस्सेदारी हो। इस सम्बन्ध में डाइवर्सिटी को लेकर भी समय समय पर मांग उठती रही है।

एक दूसरा पहलू यह भी आ रहा है कि मान लीजिए सरकार जातिगत जनगणना करा भी देती है और आबादी के अनुपात में आरक्षण का लाभ भी दे देती है तो भी फायदा नहीं होगा। क्योंकि अव्वल तो सरकार जातिगत जनगणना कराएगी नही। और कराएगी भी तो दलित-बहुजनों को मिलने वाले लाभों को पहले ही निजी हाथों को सौंप देगी। अभी हाल ही में मोदी सरकार के एक मंत्री ने संसद में कह दिया कि सरकार किसी सरकारी उपक्रम को निजी हाथों को सौंप देती है तो उसमे आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। तब यदि सरकार आरक्षण 50 फीसदी से बढ़ा कर 80 फीसदी भी कर दे तो तो कहां नौकरी या दाखिला ले लेंगे?

वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द शेष कहते हैं – “सरकार का इससे शातिर इंतजाम और क्या हो सकता है कि आरक्षण का प्रतिशत बढ़ा कर अस्सी कर दिया जाए, लेकिन सरकार के मातहत नौकरियां और पढ़ाई-लिखाई ही नहीं रहे! इसलिए वे बहुस्तरीय खेल कर रहे हैं। एक ओर चुपचाप सरकारी नौकरियां और संस्थान खत्म कर रहे हैं, दूसरी ओर सरेआम सब कुछ प्राइवेट में झोंक रहे हैं, बल्कि सरकार के मातहत ही ठेकेदारी व्यवस्था के तहत नौकरी दे रहे हैं। अब आप बढ़वाते रहिए आरक्षण का प्रतिशत। क्या फर्क पड़ेगा।”

सरकार सरकारी उद्यमों का जिस तेजी से निजीकरण कर रही है और उन्हें प्राइवेट हाथों में सौंप रही है खासतौर पर अडानी-अम्बानी को हवाईअड्डे और भारतीय रेल सौंपी जा रही हैं। खेती-किसानी को भी कॉर्पोरेट के हवाले कर रही है–यह निश्चित रूप से गंभीर मामला है और चिंता का विषय है। इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। पिछले 9-10 महीनों से किसान जो आंदोलन कर रहे हैं – वह अकारण नहीं है। इसी तरह सरकार की निजीकरण नीतियों के खिलाफ दलित-बहुजनों-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को भी आंदोलन करने की जरूरत है।

एक ओर जहां दलित-बहुजन-ओबीसी जातिगत जनगणना कराने के लिए सरकार पर दबाब बना रहे हैं वहीं सवर्णों की ओर से इसके विरोध में स्वर उठने लगे हैं। उनका कहना है कि इससे सामजिक व्यवस्था चरमरा जायेगी। हिन्दुतान टाइम्स के आर्थिक समीक्षक रोशन किशोर अपने एक लेख “जनगणना से नफा हो, नुकसान नहीं” (हिंदुस्तान 25 अगस्त 2021) में लिखते हैं –“अगर आर्थिक पैमाने के साथ एक व्यापक जातिगत जनगणना आयोजित की जाती है और उसके आंकड़े कुछ समूहों को उनके मौजूदा लाभों से वंचित करने का प्रयास करते हैं तो देश को एक बड़े सामाजिक-राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ सकता है”।

24 अगस्त 2021 का हिंदुस्तान का सम्पादकीय लिखता है –“वैसे जातिगत जनगणना के फायदे भी हैं और नुकसान भी। क्या इसके फायदे उठाने की समझदारी हमारे राजनीतिक दलों में पर्याप्त है? क्या इससे होने वाले नुकसान को संभालने के लिए भी पार्टियां तैयार हैं? क्या जातिगत आंकड़े दुरुस्त न होने के कारण जन-कल्याणकारी योजनाओं या आरक्षण देने में कोई परेशानी आ रही है?”

सवर्णवादी सोच के लोग  इस तरह की आशंकाएं और सवाल उठा रहे हैं। जाहिर है अप्रत्यक्ष रूप से वे जातिगत जनगणना का विरोध कर रहे हैं। क्योंकि उन्हें डर है कि अब तक उन्होंने दलितों-आदिवासियों-ओबीसी के हक़-अधिकारों पर जो कब्ज़ा कर रखा है – वो कहीं उनके हाथ से निकल न जाएं। पर आज जरूरत इस बात की है कि सिर्फ अपने बारे में न सोच कर जो तबका अब तक अपने हक़-अधिकारों से वंचित रहा है या विकास की राह पर पिछड़ गया है उसे भी उसका लाभ मिले, इस बारे में सोचने की जरूरत है। जाति आधारित जनगणना होने पर जाति की आबादी के अनुपात में उसे शासन-प्रशासन में प्रतिनिधित्व मिलेगा और हमारा देश एक समावेशी विकास की राह पर चल सकेगा।

 (लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इसे देखें--जनगणना-2021में जाति-गणना के वादे से क्यों मुकर रही मोदी सरकार?

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