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केंद्रीय मज़दूर संगठन कामगारों की लंबी आम हड़ताल पर कर रहे हैं विचार
कामगार संगठनों का लक्ष्य है कि केंद्र पर श्रम संहिता को वापस लेने का दबाव बनाया जाए, साथ ही मौजूदा किसान आंदोलन के साथ भाईचारा और समर्थन जताया जाए।
रौनक छाबड़ा
30 Dec 2020
केंद्रीय मज़दूर संगठन

नई दिल्ली: एक महीने से राष्ट्रीय राजधानी में किसानों का आंदोलन जारी है, जिससे केंद्र सरकार बुरी तरह हिल चुकी है। अब ट्रेड यूनियन अपना खुद का आंदोलन तेज करने की योजना बना रही हैं, जो कामगारों की श्रम क़ानूनों से संबंधित मांगों को लेकर चल रहा है।

जिस तरह किसान विवादित कृषि विधेयकों का विरोध कर रहे हैं, उसी तरह से कामगार वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली यूनियनों ने सुधार संबंधी नई श्रम संहिता के खिलाफ़ चिंता जताई थी। श्रम सुधारों से संबंधित 4 क़ानूनों में से 3 अभी सितंबर में संपन्न हुए संसदीय सत्र में पारित किए गए हैं, जिन पर किसी भी तरह की चर्चा नहीं हुई। 

केंद्र ने संकेत दिया है कि अगले साल अप्रैल से एक साथ इन चारों क़ानूनों को लागू कर दिया जाएगा। दिल्ली के बाहर, राज्य की सीमा पर हज़ारों की संख्या में इकट्ठे होकर किसान समुदाय ने केंद्र को अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए दबाव में ला दिया है, अब मज़दूर संगठन भी अपनी आंदोलन को तेज करने के लिए कदम उठा रहे हैं, इसके तहत आने वाले दिनों में कामगारों की एक लंबी हड़ताल भी शामिल है।

आने वाले बजट सत्र के दौरान 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने भूख हड़ताल करने का फ़ैसला किया है, ताकि देश के कामगार वर्ग की मांगों को उठाया जा सके। "ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC)" के महासचिव अमरजीत कौर ने न्यूज़़क्लिक को बताया, "अगले साल हम कई दिनों तक हड़ताल करने की योजना बना रहे हैं।"

वह कहती हैं कि इन कार्रवाईयों का मक़सद केंद्र पर श्रम क़ानूनों को वापस लेने का दबाव बनाना होगा। साथ ही हड़ताल के ज़रिए किसानों के आंदोलन का समर्थन किया जाएगा।

कौर के मुताबिक़, जिस तरह किसानों को इस बात की चिंता है कि बिना दावेदारों से बातचीत किए कृषि क़ानूनों को पारित कर दिया गया है, उसी तरह ट्रेड यूनियन भी इस तथ्य को उठा रही हैं कि श्रम क़ानूनों को संहिताबद्ध करने से पहले ठीक ढंग से विमर्श नहीं किया गया। 

कौर कहती हैं, "कामगार संगठन और किसानों के यूनियन कंधे से कंधा मिलाकर केंद्र की नीतियों के खिलाफ़ खड़े हैं। इस साल जब नवंबर में किसानों ने 'दिल्ली चलो' की पुकार की थी, उसी वक़्त कामगारों ने आम हड़ताल की थी।" कौर कहती हैं कि आगे ट्रेड यूनियन जो भी योजनाएं बनाने जा रही हैं, वह मज़दूर-किसान एकता को मजबूत करने के लिए होगा। 

किसानों के प्रदर्शन के बड़े स्थल, जैसे-सिंघु, टिकरी, गाजीपुर, चिल्ला और शाहजहांपुर, यहां बड़ी संख्या में कामगार वर्ग के लोग, खासकर आसपास के औद्योगिक शहरों से आकर कामगार भागीदार बन रहे हैं।

साहिबाबाद इंडस्ट्रियल टॉउन में सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (CITU) के अध्यक्ष ईश्वर त्यागी कहते हैं "कई कामगारों की 10 से 12 घंटे की रोजाना की शिफ्ट होती है, उसके बाद भी वह हर दिन किसानों के समर्थन में प्रदर्शन स्थल जरूर जाते हैं।" गाजियाबाद में मौजूद साहिबाबाद, गाजीपुर के प्रदर्शन स्थल के पास है, जहां पश्चिमी उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड से आए किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। 

त्यागी आगे कहते हैं, "फैक्ट्रियों में काम करने वाले कई मज़दूर इन्हीं राज्यों से हैं। कई मज़दूरों के रिश्तेदार या पड़ोसी उनकी मूल जगह पर किसानी के काम में लगे हैं। इसलिए मज़ूदरों में उनका समर्थन करने की नैतिक जिम्मेदारी की भावना है। कामगार प्रदर्शन स्थल जाते हैं और वहां किसानों की लंगर सेवा या दूसरी किसी गतिविधि में मदद करते हैं।"

राजस्थान-हरियाणा बॉर्डर पर शाहजहांपुर गांव में भी ऐसी भागीदारी खूब देखी जा रही है। यहां किसानों ने दिल्ली-जयपुर एक्सप्रेस वे को बंद कर रखा है। संयोग से यह रोड हरियाणा के बावल, मनेसर और राजस्थान के नीमराना जैसे कुछ बड़े औद्योगिक केंद्रों को जोड़ती है। यह सभी आसपास ही स्थित हैं।

इंकलाबी मज़दूर केंद्र के योगेश कुमार कहते हैं कि औद्योगिक केंद्रों के आसपास जहां किसान प्रदर्शन कर रहे हैं, अब वहां अब श्रम क़ानूनों के बुरे प्रभावों पर भी विमर्श होने लगा है।

किसान यूनियनों की चिंता है कि कृषि विधेयक कॉरपोरेट के पक्ष में चीजों को झुका देंगे, ट्रेड यूनियन भी ऐसी ही चिंता श्रम क़ानूनों के संहिताबद्ध करने पर जताती हैं, इस प्रक्रिया में 40 मौजूदा कृषि क़ानूनों का विलय किया जाएगा, जिससे नियोक्ता, मज़ूदरों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए और भी सशक्त होंगे। 

कुमार कहते हैं, "हर सीमा पर हमारे संगठन के सदस्य पर्चे वितरित कर रहे हैं, जिसमें मज़दूरों से जुड़े मुद्दों की चर्चा है।" मनेसर के औद्योगिक कामगारों के बीच खासतौर पर सक्रिय मज़दूर केंद्र ने टिकरी सीमा पर एक बुक स्टॉल भी लगाया है। 

भाईचारा और समर्थन जताने के ऐसे कार्यक्रम ट्रेड यूनियन जारी रख रही हैं, अब उनका मानना है कि किसानों के समानांतर कामगारों का आंदोलन नरेंद्र मोदी सरकार को उसके हालिया फ़ैसलों पर और भी ज़्यादा घेरने का काम करेगा।

CITU हरियाणा के सतबीर सिंह इस विचार से सहमति जताते हुए कहते हैं कि यूनियन की राष्ट्रीय समिति इस दिशा में पहले ही कई आह्वान कर चुकी है।

30 दिसंबर को अपने काम की जगहों पर एक देशव्यापी विरोध प्रदर्शन आयोजित करने का आह्वान किया गया है। वहीं CITU से जुड़े संघ 7 और 8 जनवरी को जिला स्तर पर अपने सदस्यों की गिरफ़्तारियों देंगे।

सिंह कहते हैं, "फिलहाल जो आंदोलन जारी है, उससे कामगारों की अपने अधिकारों के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई मजबूत होगी। दूसरी तरफ अब कामगार भी यह समझ चुके हैं कि अगर किसान हारते हैं, तो उनका हारना भी तय है।"

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें। 

Central Trade Unions Mull Over Prolonged General Strike of Workers

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