NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
भारत
राजनीति
सेंट्रल यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUCET) सतही नज़र से जितना प्रभावी गहरी नज़र से उतना ही अप्रभावी
भारत के शिक्षा क्षेत्र की बड़ी परेशानी यह है कि उच्च शिक्षा की पढ़ाई करने वाले छात्रों की संख्या ज़्यादा है और उच्च शिक्षा के नाम पर बढ़िया संस्थान कम हैं। किसी तरह की छंटनी की प्रक्रिया बनाने से ज़्यादा ज़रूरी है कि उच्च शिक्षा के गुणवत्तापूर्ण संस्थानों का अधिक से अधिक निर्माण किया जाए।
अजय कुमार
24 Mar 2022
CUCET
Image courtesy : Feminism in India

12वीं क्लास के बाद स्त्नातक की पढाई के लिए विश्वविधालय में दाख़िला पाने के लिए देश के कई विशवविधालय 12वीं की परीक्षा में हासिल किये गए अंकों के आधार पर एडमिशन देते थे तो कई विश्वविधालय एडमिशन देने के लिए प्रवेश परीक्षा लेते थे। दिल्ली यूनिवर्सिटी 12वीं क्लास में मिले अंकों के आधार पर एडमिशन देता था तो बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी प्रवेश परीक्षा यानी एंट्रेंस एग्जामिनेशन के आधार पर। अब नियम बदल दिया गया है। भारत में उच्च शिक्षा की देख रेख से जुड़ी संस्था यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन यानी विश्वविधालय अनुदान आयोग ने 12 वीं क्लास के बाद देश भर के 45 केंद्रीय विशवविधालय में दाखिला हासिल करने के लिए सेंट्रल यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट कराने का फैसला लिया है। जहाँ तक स्टेट, प्राइवेट और डीम्ड यूनिवर्सिटी की बात है तो उन्हें स्वतंत्रता है वह चाहें तो अपनाएं या न अपनाएं। 

सेंट्रल यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट की परीक्षा नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के जरिये कराई जायेगी। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी कम्प्यूटर के जरिये परीक्षा लेगी। प्रश्न वैकल्पिक प्रकृति के होंगे यानी मल्टीपल चॉइस के होंगे। छात्रों के पास अंग्रेजी, हिंदी, असमी, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, ओडिया, पंजाबी, तमिल, तेलुगु और उर्दू भाषा में परीक्षा देने का विकल्प रहेगा। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी परीक्षा लेकर मेरिट लिस्ट बनाएगी।  इस मेरिट लिस्ट के आधार पर एडमिशन दिया जाएगा। लेकिन एक पेंच और है। यूनिवर्सिटी को यह स्वंत्रता है कि वह चाहे तो 12वीं क्लास के अंकों की एक सीमा तय करे। यह नियम बनाये कि उसकी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के लिए कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट में पास होना जरूरी है, साथ में 12वीं क्लास में तय सीमा से ज्यादा नंबर होना चाहिए। अभी तक तो इस पेंच को लेकर कोई ऐसी स्पष्टता नहीं है कि यह साफ़- साफ पता चले कि कोई सेंट्रल यूनिवर्सिटी अगर चाहें तो 12वीं से मिले कितने प्रतिशत अंकों से अधिक अपनी तय सीमा नहीं बना सकती है। इसलिए हो सकता है कि नामी गिरामी सेंट्रल यूनिवर्सिटी 60 प्रतिशत से लेकर 90 प्रतिशत तक की सीमा तय कर दे। इस तरह की तमाम बिंदुओं पर स्पष्टत्ता जब एक दो बार परीक्षा ले ली जायेगी तभी आ पाएगी।

यह तो नियम कायदे कानून की बात हो गयी। अब बात करते हैं इसका असर कैसा पड़ेगा। शिक्षा के जानकारों का कहना है कि नए नियम का पहला फायदा यह है कि अधिक से अधिक अंक हासिल करने वाली कुतार्किक बातें कम होंगी। शोषणकारी किस्म की मेहनत से थोड़ा छुटकारा मिलेगा। रट्टामार पढ़ाई के बजाए सीखने पर जोर दिया जाएगा। दूसरा, लगातार देखा गया है कि स्टेट बोर्ड छात्रों को कम नंबर देता है।  जबकि सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड से छात्रों को ज्यादा नंबर मिलते हैं इसलिए एंट्रेंस एग्जाम का पैमाना होने के चलते स्टेट बोर्ड का छात्र भी दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिले की तमन्ना पूरी कर सकता है। तीसरा, 13 भाषाओं में परीक्षा होने के चलते भाषा से जुड़ी बाध्यता से छुटकारा मिलेगा। तीसरा, दाखिला लेने के लिए केवल एक एंट्रेंस एग्जाम होने के चलते छात्रों को विश्वविधालय में एडमिशन लेने के लिए कई विश्वविधालयों के फॉर्म भरने और कई प्रवेश परीक्षा देने से छुटकारा मिलेगा। इन कई तरह के फायदों का मतलब यह नहीं है कि एंट्रेंस एग्जामिनेशन वह जादू की छड़ी है जिससे देश भर के सभी छात्रों के लिए अवसर की समानता और उच्च शिक्षा में गुणवत्ता हासिल करने से जुड़ी सभी परेशानियों से मुक्ति मिल जाए।

अगर नुकसानों की बात करें तो सबसे बड़ा नुकसान यह है कि 12 वीं तक की सारी काबिलियत मापने के लिए सारा जोर एक एंट्रेंस एग्जाम पर डाल दिया जाएगा। यह कहीं से पचने वाली बात नहीं है कि 3 घंटे की दो परीक्षा में किसी की काबिलियत माप ली जाए। दूसरा नुकसान यह है कि एंट्रेंस एग्जाम में ज्यादा से ज्यादा नम्बर हासिल करने के लिए वैसी ही मारमारी होगी जैसी आईआईटी में दाखिला लेने के लिए होती है। नामी गिरामी विश्वविधालय में दाखिला दिलवाने के लिए कोचिंग सेंटरों का बजार ज्यादा से ज्यादा कमाई करने के लिए छात्रों का जमकर शोषण करेगा। तीसरा नुकसान यह है कि अंकों को लेकर कुतार्किक किस्म की मारामारी एंट्रेंस एग्जाम में अधिक से अधिक नंबर लाने और मेरिट लिस्ट में सबसे ऊपर रहने की मारमारी में बदल जायेगी। चौथा नुकसान यह है कि 12 वीं तक की पढाई का महत्व खत्म हो जाएगा, सारी अहमियत एंट्रेंस एग्जामिनेशन को दी जाने लगेगी। जहां तक इसकी बात है कि एंट्रेंस एग्जाम की वजह से सामाजिक न्याय से जुडी नीति गड़बड़ा जायेगी  तो उसके बारे में ugc की तरफ से अभी तो आश्वाशन मिल रहा है कि ऐसा कुछ नहीं है। लेकिन क्या होगा या नहीं होगा ? इसका अंदाज़ा तो इस प्रणाली के तहत चार पांच साल परीक्षा लेने के बाद ही पता चल पायेगा।  

इन सारे फायदे नुकसान को छोड़कर अगर थोड़ा गहरे तरीके से सोचे तो दिखेगा कि इस नियम से भारतीय शिक्षा की अवसर की समानता को लेकर बड़ी परेशानी का हल नहीं निकल रहा है।  भारत की शिक्षा व्यवस्था को दिल्ली की दुनिया को छोड़कर सोचते हैं तो यह नियम उतना बढ़िया नहीं लगता जितना कि यह पहली नजर में दिखता है। इसकी वजह यह है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था की सरचनात्मक परेशानियां इतनी गहरी है कि केवल 12 वीं क्लास के बाद यूनिवर्सिटी में दाखिले के लिए कोई भी सिस्टम बनाया जाएगा तो बहुतों के लिए इससे कोई फायदा नहीं होगा। भारत के अधिकतर छात्रों को गुणवत्तापूर्ण पढाई लिखाई का माहौल नहीं मिलता है, ऐसे में उन अधिकतर छात्रों की एंट्रेंस एग्जाम होने पर पास होने से ज्यादा फेल होने की सम्भावना ही बनी रहेगी। वह पहले भी पीछे थे, नए नियम में भी पीछे ही रहेंगे। जो छात्र पहले 90 प्रतिशत से अधिक अंक लाते थे, उनमें से अधिकतर छात्र ही कॉमन एंट्रेंस की मेरिट लिस्ट में भी आगे रहेंगे। 12 वीं में मिले अंकों के आधार पर एडमिशन न देने के बजाए एंट्रेंस एग्जाम के जरिये एडमिशन देने से यकीनन बदलाव होगा लेकिन भारतीय शिक्षा व्यवस्था की खतरनाक खामियों की वजह से उतना अधिक नहीं होगा जितने के बारे में पहली नजर में दिखता है।

लम्बे समय की नजर से देखें तो यह पूरा मामला बोर्ड परीक्षा बनाम एंट्रेंस एग्जाम पर आकर सीमट जाएगा। अगले चार पांच साल बाद यह नया नियम भी इसी विवाद को पैदा करेगा। बोर्ड एग्जाम बनाम एंट्रेंस एग्जाम को बहुत लम्बी बहस है। इस पर ढेर सारा रिसर्च भी हो चूका है।  शिकागो यूनिवर्सिटी का एक रिसर्च बताता है कि जिन बच्चों को किसी प्रतियोगी परीक्षा में बराबर अंक मिले उनमें से जिसे हाई स्कूल में ज्यादा अंक मिले थे उसने अपने आगे की यूनिवर्सिटी की पढ़ाई में ज्यादा बेहतर किया। यानी हाईस्कूल का अंक किसी प्रतियोगी परीक्षा के मुकाबले काबिलियत तय करने का ज्यादा बढ़िया मानक है। 

कई सारे जानकारों का एंट्रेंस एग्जाम को लेकर कहना होता है कि एंट्रेंस एग्जामिनेशन के लिए किसी को प्रशिक्षित किया जा सकता है। लेकिन एंट्रेंस एग्जामिनेशन की डिजाइन ऐसी नहीं होती कि इसके जरिए व्यक्ति के भीतर मौजूद समझदारी यानी इन्हेरेंट इंटेलिजेंस की परख हो पाए। इन्हरेंट इंटेलिजेंस का विकास विशुद्ध तौर पर शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। पढ़ाई लिखाई पर कितना समय और किस तरह की शिक्षा ली जा रही है इस पर डिपेंड करता है। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ऐसी पढ़ाई नहीं की जाती। इसीलिए प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल करने के नाम पर कई तरह के कोचिंग सेंटर खुले हुए हैं। कोचिंग सेंटर में ले जाकर बच्चों को पटक दिया जाता है। वह कभी विद्यार्थी होने का सुख नहीं ले पाते। साल 2005 का एक अध्ययन था कि आईआईटी में एडमिशन लेने वाले तकरीबन 95% बच्चों ने किसी शहरी इलाके में कोचिंग सेंटर से प्रशिक्षण लिया था। गरीब तबकों से आने वाले मुश्किल से 3% से कम बच्चे भी ऐसी नामी गिरामी शिक्षण संस्थानों में नहीं पहुंच पाते हैं।

कुल मिलाजुलाकर कहने का मतलब यह है कि जब तक शिक्षा की संरचनात्मक कमियों को दूर नहीं किया जाता तब तक हम चाहें एंट्रेंस एग्जाम वाली व्यवस्था ले आएं या बोर्ड एग्जाम वाली ही रहने दे - इनके जरिये वह परेशानी नहीं सुलझ पाएगी जो भारत में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करने के लिए मौजूद दीवार ढह पाए। भारत सरकार केवल किसी दिल्ली बम्बई वाले के लिए नहीं बल्कि भभुआ देवरिया वालों के लिए भी है। चुनौती यह नहीं है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के नामी गिरामी कॉलेज में दाखिला किस का हो बल्कि चुनौती यह है कि  कैसे भारत के सभी छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलबध कराइ जाई? कैसे मारामारी दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए ना हो बल्कि गोरखपुर यूनिवर्सिटी में दाखिला मिले फिर भी किसी तरह का अफसोस न हो। भारत के शिक्षा क्षेत्र की बड़ी परेशानी यह है कि उच्च शिक्षा की पढाई करने वाले छात्रों की संख्या ज्यादा है और उच्च शिक्षा के नाम पर बढ़िया संस्थानों का कम। किसी तरह की छंटनी की प्रक्रिया बनाने से ज्यादा जरूरी है कि उच्च शिक्षा के गुणवत्तापूर्ण संस्थानों का अधिक से अधिक निर्माण किया जाए।

CUCET
Common University Entrance Test
CUET
education
Education Sector
new education policy

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

कर्नाटक पाठ्यपुस्तक संशोधन और कुवेम्पु के अपमान के विरोध में लेखकों का इस्तीफ़ा

जौनपुर: कालेज प्रबंधक पर प्रोफ़ेसर को जूते से पीटने का आरोप, लीपापोती में जुटी पुलिस

बच्चे नहीं, शिक्षकों का मूल्यांकन करें तो पता चलेगा शिक्षा का स्तर

'KG से लेकर PG तक फ़्री पढ़ाई' : विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं की सभा में उठी मांग

अलविदा शहीद ए आज़म भगतसिंह! स्वागत डॉ हेडगेवार !

कर्नाटक: स्कूली किताबों में जोड़ा गया हेडगेवार का भाषण, भाजपा पर लगा शिक्षा के भगवाकरण का आरोप

शिक्षा को बचाने की लड़ाई हमारी युवापीढ़ी और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई का ज़रूरी मोर्चा

स्कूलों की तरह ही न हो जाए सरकारी विश्वविद्यालयों का हश्र, यही डर है !- सतीश देशपांडे


बाकी खबरें

  • New Homes, School Buildings, Roads and Football Academies Built Under Kerala Govt’s 100-Day Programme
    अज़हर मोईदीन
    केरल सरकार के 100-दिवसीय कार्यक्रम के तहत नए घर, विद्यालय भवन, सड़कें एवं फुटबॉल अकादमियां की गईं निर्मित  
    20 Sep 2021
    100-दिवसीय कार्यक्रम में शामिल परियोजनाओं के कार्यान्वयन पर नजर रखने के लिए बनाये गए राजकीय नियंत्रण-मंडल की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों के विभिन्न विभागों के तहत…
  • Afghanistan
    एम. के. भद्रकुमार
    शांघाई सहयोग संगठन अमेरिका की अगुवाई वाले क्वाड के अधीन काम नहीं करेगा
    20 Sep 2021
    एससीओ यानी शांघाई सहयोग संगठन, अमेरिका की अगुवाई वाले चार देशों के गठबंधन क्वाड के अधीन काम नहीं करेगा।
  • Indigenous People of Brazil Fight for Their Future
    निक एस्टेस
    अपने भविष्य के लिए लड़ते ब्राज़ील के मूल निवासी
    20 Sep 2021
    हाल ही में इतिहास की सबसे बड़ी मूल निवासियों की लामबंदी ने सत्ता प्रतिष्ठानों के आस-पास की उस शुचिता की धारणा को को तोड़कर रख दिया है जिसने सदियों से इन मूल निवासियों को सत्ता से बाहर रखा है या उनके…
  • Government employees in Jammu and Kashmir
    सबरंग इंडिया
    जम्मू-कश्मीर में सरकारी कर्मचारियों से पूर्ण निष्ठा अनिवार्य, आवधिक चरित्र और पूर्ववृत्त सत्यापन भी जरूरी
    20 Sep 2021
    16 सितंबर को जारी सरकारी आदेश में कहा गया है कि अगर किसी कर्मचारी के खिलाफ किसी भी तरह की प्रतिकूल रिपोर्ट की पुष्टि होती है तो उसे बर्खास्त किया जा सकता है
  • UP fever
    विजय विनीत
    EXCLUSIVE :  यूपी में जानलेवा बुखार का वैरिएंट ही नहीं समझ पा रहे डॉक्टर, तीन दिन में हो रहे मल्टी आर्गन फेल्योर!
    20 Sep 2021
    डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया के मरीजों के आधे-अधूरे आंकड़े तो बताए जा रहे हैं, लेकिन स्क्रब टाइफस और लेप्टो स्पायरोसिस बुखार का कोई आंकड़ा यूपी सरकार के पास नहीं है। हैरानी की बात यह है कि इन…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License