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भारत
राजनीति
गोवा का यूनिफॉर्म सिविल कोड न्याय से उतना ही दूर है जितना न्याय से दूर भाजपा का दौर है!
क्या गोवा का सिविल कोड वैसा ही यूनिफॉर्म सिविल कोड है जिसकी जरूरत 21 वीं सदी के हिंदुस्तान को है, जिसकी चर्चा हमारे संविधान में की गई है।
अजय कुमार
01 Apr 2021
SA Bobde
Image courtesy : Bar and Bench

यूनिफॉर्म सिविल कोड के मामले पर गोवा की बड़ी तारीफ की जाती है। प्रतियोगी परीक्षा के विद्यार्थी भी यह एक लाइन रटते हैं कि गोवा भारत का एकमात्र राज्य है, जहां यूनिफॉर्म सिविल कोड है। यूनिफॉर्म सिविल कोड में गोवा की तरफदारी मौजूदा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एस ए बोबडे ने भी की है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने यह कहा कि जिस तरह के यूनिफॉर्म सिविल कोड की चर्चा संविधान निर्माताओं के बीच हो रही थी, वैसा यूनिफॉर्म सिविल कोड गोवा में मौजूद है। भारत के बुद्धिजीवियों को इसका अध्ययन करना चाहिए। 

जिस यूनिफॉर्म सिविल कोड के मामले पर भाजपा शुरू से चर्चा करते आई है, जिसे उसने खुलकर अपने चुनावी मुद्दे में हर बार पेश किया है लेकिन जिस पर तमाम तरह चर्चा राय मशविरा होने के बाद भी अभी तक कोई सरकारी कमेटी नहीं बैठी है। किसी को यह नहीं पता है कि आखिरकार यूनिफॉर्म सिविल कोड का प्रारूप क्या होगा? सब संकल्पना और विचार के स्तर पर ही बात कर रहे हैं तो वैसे समय में जब चुनावी माहौल की सरगर्मियां उफान मार रही हो तब मुख्य न्यायाधीश के यूनिफॉर्म सिविल कोड पर दिए गए बयान की चर्चा करना बहुत जरूरी हो जाता है। तो चलिए परखते हैं कि आखिर कर गोवा के यूनिफॉर्म सिविल कोड में है क्या? 

गोवा की यूनिफॉर्म सिविल कोड में क्या है? यह जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिरकार यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब क्या होता है?

खासकर परिवार से जुड़े मामले जैसे कि शादी, शादी से अलग हो जाना यानी तलाक, संपत्ति में उत्तराधिकार, गोद लेना, वसीयत जैसे सिविल मामलों में भारत के सभी समुदायों के अलग-अलग नियम कानून हैं।  देशभर में एक नियम कानून नहीं है। 

बड़े गहमागहमी के बाद अंबेडकर की अगुवाई में साल 1950 में हिंदू धर्म में कुछ जरूरी सुधार कर हिंदू कोड बिल बनना तो शुरू हुआ लेकिन दूसरे धर्म और समुदाय से जुड़े नियम कानूनों के साथ ऐसा नहीं हुआ। आपराधिक मामलों से जुड़े कानून पूरे देश भर में सभी समुदायों पर एक समान तरीके से  लागू होते हैं। लेकिन ठीक ऐसा ही सिविल मामलों में नहीं होता। 

यह मामले विभिन्न समुदायों के पर्सनल लॉ के तहत प्रशासित होते हैं। अंग्रेजों के भारत में आने के बाद आपराधिक मामले तो कोड में तब्दील होते चले गए लेकिन सिविल मामलों के साथ ऐसा नहीं हुआ। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि भारतीय समाज के ताने-बाने में छेड़छाड़ करें। ऐसा करना उनके लिए घातक साबित हो सकता था। लेकिन फिर भी उन्होंने धीरे-धीरे कुछ सिविल मामले जैसे कि सती प्रथा, विधवा विवाह पर भी  हस्तक्षेप किया। लेकिन यह हस्तक्षेप भी अधिकतर हिंदू धर्म से ही जुड़ा था।

इसलिए भारत के तकरीबन सभी धर्म और समुदायों से जुड़े सिविल मामले किसी तरह के कानूनी जांच परख से दूर रहे। भारत समुदाय, भाषा, संस्कृति, भूगोल के आधार पर इतना अधिक विविध देश है कि सभी जगहों के सिविल मसलों को समेट कर कोई एक नियम कानून बना पाना नामुमकिन के हद तक असंभव है।

पूर्वोत्तर का समाज संविधान की छठवीं अनुसूची के तहत अपने समाज के लिए जिस तरह के नियम कानून की वकालत करता है उससे बिल्कुल उलट उत्तर भारत के सिविल मामलों से जुड़े नियम कानून होते हैं। जिस तरह से मातृत्व प्रधान समाज महिलाओं को अपने समाज में मुख्य भूमिका देता है, ठीक वैसे ही भूमिका भारत के अधिकतर पुरुष प्रधान क्षेत्रों में महिलाओं को नहीं मिलती। कई तरह की शादियां होती हैं, कई तरह की परंपराएं हैं। इन कई तरह की शादी और कई तरह की परंपराओं में मर्द और औरत लिए कई तरह के अलग-अलग नियम कानून है।  

नामुमकिन के हद तक मुश्किल होने के बावजूद भी अंबेडकर ने कहा था कि जब पूरे भारत के लिए एक संविधान बन सकता है तो यह बिल्कुल मुमकिन है कि पूरे भारत के विभिन्न तरह के समुदायों के लिए एक सिविल कोड भी बन जाए।

इसलिए यूनिफॉर्म सिविल कोड के पक्ष में खड़े लोगों का यह जायज तर्क होता है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाते समय यह ध्यान रखना है कि सबकी अपनी अपनी परंपराएं भी मौजूद रहे उनका अलगाव और विविधता भी मौजूद रहे लेकिन उनके भीतर की अन्यायपूर्ण विषय बाहर निकल जाएं। ऐसे न कि सबके लिए एक समान नियम कानून बनाने के दौरान भेदभाव और अन्याय वाले नियम भी बन जाए।

जहां तक भारत के संविधान के संविधान की बात है तो अनुच्छेद 44 में यूनिफॉर्म सिविल कोड का जिक्र किया गया है। अनुच्छेद 44 नीति निदेशक तत्व से जुड़ा विषय है। जिसे मूल अधिकारों की तरह कानूनन लागू नहीं करवाया जा सकता है।

अनुच्छेद 44 में लिखा गया है कि भारत अपनी सीमा क्षेत्र के सभी नागरिकों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाने का प्रयास करेगा। अनुच्छेद 44 और 43 की भाषा के अलावा सभी तरह के नीति निदेशक तत्व की भाषा ऐसी है जिसके केंद्र में यह है कि राज्य की जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसा करे। लेकिन अनुच्छेद 44 की भाषा यह है कि राज्य यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाने के लिए प्रयास करेगा। कहने का मतलब यह कि ऐसा नहीं होगा कि कहीं से उठाया और उसे पूरे हिंदुस्तान पर थोप दिया गया।

बल्कि यूनिफॉर्म सिविल कोड तभी लागू होगा जब उस पर सभी नागरिकों की रजामंदी के सहारे बहस होगी और सभी उसे मानने के लिए तैयार होंगे। और अब तक की स्थिति यह है कि यह भाजपा का एक महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा है। जो हर चुनाव से पहले किसी ना किसी तरह से उछल कर सामने आता है। लेकिन अभी तक इस पर सरकार की तरफ से गंभीरता से विचार करने के लिए कोई कमेटी नहीं बनी है। 

 अब गोवा की यूनिफॉर्म सिविल कोड को कुछ बिंदुओं में सहारे कानूनी भाषा की बजाए कुछ सरल तरीके से समझते हैं:

*  दिसंबर साल 1961 में गोवा भारत का हिस्सा बन गया। और इसी साल हिंदू कोड बिल भी लागू हुआ। गोवा आजाद हुआ लेकिन गोवा के अंदर साल 1867 में बना पुर्तगाली सिविल कोड ही लागू रहा। जिसमें तकरीबन 2 हजार से अधिक धाराएं हैं।

संविधान के अनुच्छेद 44 में यह लिखा है कि राज्य यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाने का प्रयास करेगा। यानी सभी तरह के समुदायों से बात करना और उनकी रजामंदी लेना यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए संविधान के मुताबिक जरूरी प्रक्रिया है। 

इस आधार पर देखा जाए तो गोवा साल 1961 में भारत का हिस्सा बना लेकिन सिविल कोड पुराना वाला ही रहा। किसी से किसी तरह की बातचीत नहीं हुई। पुराना वाला ही आगे चलता चला गया। मतलब यह की यूनिफॉर्म सिविल कोड बनने के लिए संविधान में लिखी परीक्षा को पुर्तगाल सिविल कोड ने पार नहीं किया। बल्कि पुराना वाला ही हूबहू अपना लिया गया। यानी गोवा का पुर्तगाली सिविल कोड इस आधार पर यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं कहा जा सकता है।

और अगर सभी धर्मों के नियम कानून को एक किताब में बहुत सारे प्रावधानों के तहत लिख देना ही यूनिफॉर्म सिविल कोड है तब तो कोई बात ही नहीं। 

* गोवा के सिविल कोड की खास बात यह है कि यहां शादी को एक अनुबंध के तौर पर रखा गया है। ठीक इसी तरह से मुस्लिम पर्सनल ला में भी शादी को एक तरह के पवित्र अनुबंध के तौर पर माना जाता है। इस्लामी कानून के जानकारों का कहना है कि शादी को अनुबंध के तौर पर मानना एक प्रगतिशील कदम है। इस अनुबंध में वह सारी शर्ते लिखी जा सकती हैं जो मर्द और औरत अपने जीवन को ध्यान में रखकर जरूरी समझते हैं। जैसे शादी में शामिल हुआ मर्द और औरत कैसी स्थितियों में तलाक लेंगे? तलाक लेने के बाद किस तरह की प्रक्रिया अपनाते हुए विवादों का निपटारा होगा? हर तरह की शर्त लिखी जा सकती हैं। बस दिक्कत यही होती है की अधिकतर औरतें अपने अधिकारों को लेकर जागरूक नहीं होती हैं इसलिए शर्तें वैसी नहीं लिखी जाती है जैसी लिखनी चाहिए। 

लेकिन जिस तरह की शर्त इस्लामिक शादी के अनुबंध पत्र पर लिख सकने की आजादी है। ठीक वैसी ही शर्ते लिख सकने की आजादी गोवा के सिविल कोड में नहीं है। जैसे तलाक की स्थिति में संपत्ति के बंटवारे के लिए मर्द और औरत के शादी से पहले और शादी के बाद की संपत्ति को ध्यान में रखकर संपत्ति का बंटवारा करना जैसी शर्तें पहले ही लिखी हुई हैं। जब तक तलाक न हुआ हो तब तक संपत्ति का प्रशासन प्रबंधन करने की जिम्मेदारी केवल मर्द के पास होगी औरत के पास नहीं। यह सारी शर्तें पुर्तगाली सिविल कोड के मुताबिक हर अनुबंध में निहित रहती हैं। इस तरह से देखा जाए तो पुर्तगाली सिविल कोड लैंगिक भेदभाव पर आधारित है। साथ में अनुबंध की वैसी आजादी नहीं मिलती जैसी इस्लामिक पर्सनल लॉ के तहत मिलती है। यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाने के लिए जरूरी न्याय का मूल्य भी इसमें ठीक तरह से शामिल नहीं हो पाता है। 

* गोवा की पुर्तगाली सिविल कोड के मुताबिक वसीयत में 50% से अधिक की संपत्ति किसी ऐसे को नहीं दी जा सकती जो वसीयत लिखने वाले का माता - पिता या बेटा बेटी ना हो। यानी चाहे कुछ भी हो जाए वसीयत का आधा हिस्सा तो वसीयत लिखने वाले के परिवार को ही जाएगा। लेकिन ठीक ऐसा ही प्रावधान हिंदू उत्तराधिकार कानून में नहीं है। यहां पर अगर वसीयत नहीं लिखी गई है तो बेटा - बेटी सब में बराबर बराबर उत्तराधिकार की संपत्ति बांट देने का नियम है। और अगर वसीयत लिख दी गई है तो उसी के मुताबिक संपत्ति का बंटवारा होगा। यानी अगर पिता चाहे तो अपनी पूरी संपत्ति का मालिक अपने बेटे या अपनी बेटी या किसी को भी बना सकता है।

अधिकतर मामलों में भारत के पिता बेटी को संपत्ति नहीं देते। बेटी की शादी में दिया गया दहेज ही भारत के पीताओं के लिए बेटी की हिस्सेदारी होती है।  अभी तक हुई तमाम रिसर्च से पता चला है कि संपत्ति के उत्तराधिकार में बेटियों को मामूली संपत्ति मिली है। 

 मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक भी अपनी वसीयत में एक तिहाई संपत्ति से अधिक संपत्ति अपने परिवार के सिवाय किसी दूसरे के नाम नहीं लिखी जा सकती। 

अब वसीयत के आधार पर कौन सा बेहतर है, इसका निर्धारण कर पाना बहुत मुश्किल है। कई परिस्थितियों में हिंदू कोड बेहतर है तो कई परिस्थितियों में मुस्लिम और पुर्तगाली कोड। कई परिस्थितियों में हिंदू कोड खराब है तो कई परिस्थितियों में पुर्तगाली और मुस्लिम कोड। यानी इस आधार पर भी देखा जाए तो इसमें ऐसे गुण नहीं है किसी यूनीफामर्ली तरीके से अपना लिया जाए। इसे यूनिफॉर्म सिविल कोड का हिस्सा बना दिया जाए।

- गोवा के सिविल कोड के तहत शादी का कनूनी तौर पर रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है। रजिस्ट्रेशन दो बार होगा। पहला शादी से 15 दिन पहले और दूसरा शादी से 15 दिन बाद। अगर कैथोलिक क्रिश्चन शादी कर रहे हैं तो उन्हें अपना दूसरा रजिस्ट्रेशन कैथोलिक चर्च में करवाना होगा। 

यानी नियम सबके लिए एक नहीं है। जो यूनिफॉर्म सिविल कोड की सबसे जरूरी शर्त होती है। कैथोलिक क्रिश्चियन के लिए दूसरों से अलग नियम है। यहां धर्म को ज्यादा मान्यता दी गई है। धर्म के आधार पर भेदभाव भी किया गया है।

 रजिस्ट्रेशन के मामले में भी देखा जाएं  तो यह बहुत प्रगतिशील नहीं दिखता। आखिर कर क्या जरूरत है की शादी से 15 दिन पहले और शादी के 15 दिन के बाद रजिस्ट्रेशन करवाया जाए। अभी हाल फिलहाल स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने वालों को 30 दिन पहले रजिस्ट्रेशन करवाने जैसे नियम को कोर्ट ने खारिज किया है। 

अगर शादी को खत्म करना है तो कैथोलिक क्रिश्चियन के लिए गोवा सिविल कोड में यह नियम है कि उनकी शादी चर्च में जाकर ही खत्म होगी। यानी यहां भी यूनिफॉर्म नियम का कानून नहीं। धर्म के आधार पर अलग-अलग नियम। और चर्च को कोर्ट से ज्यादा तवज्जो दिया गया है। आधुनिक जमाने में अदालतों और न्यायाधीशों की बजाए चर्च मंदिर मस्जिद मौलवी पादरी पंडित को तवज्जो देना कहीं से भी उचित नहीं।

- गोवा के सिविल कोड के मुताबिक अगर पत्नी पर व्यभिचार यानी पति के अलावा दूसरे मर्द के साथ दैहिक संबंध सिद्ध हो जाता है तो पति, पत्नी को छोड़ सकता है। लेकिन वहीं पर अगर पति, पत्नी के अलावा दूसरे औरतों से संबंध बनाता है तो पत्नी को अधिकार नहीं है कि वह पति को छोड़ दें। उसे और भी कई तरह के आधारों पर पति के व्याभिचार को साबित करना पड़ेगा। 

व्यभिचार से जुड़ा नियम आधुनिक मूल्यों के मुताबिक नहीं है। अगर व्यभिचार की शर्त भी है तो पति के लिए अलग और पत्नी के लिए अलग है। मतलब यह की मर्द और औरत के साथ यहां न्याय नहीं हो पा रहा है।

- साल 1955 से पहले हिंदू धर्म का मर्द भी एक से अधिक पत्नी रख सकता था। बहु पत्नी प्रथा हिंदुओं में प्रचलित थी। लेकिन हिंदू कोड बिल के बाद इसे रोक दिया गया। मुस्लिमों में यह आज भी प्रचलित है। मुस्लिम एक से अधिक पत्नी रख सकते हैं। मीम और मजाक बना कर भारतीय समाज को समझने वाला हिंदुस्तान का बहुत बड़ा वर्ग यही समझता है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो जाने के बाद मुस्लिमों से यह अधिकार छिन जाएगा। इसलिए यह जल्द से जल्द लागू कर देना चाहिए। उसकी सतही समझ यहीं पर जाकर रुक जाती है। 

जबकि गोवा के सिविल कोड के मुताबिक हिंदुओं को यह अधिकार है कि वह एक से अधिक पत्नी रख लें। अगर 25 साल तक बच्चा नहीं हुआ तो दूसरी पत्नी रखी जा सकती है। अगर 30 साल तक बेटा पैदा नहीं हुआ तो बेटा पैदा करने और अपने वंश चलाने के लिए दूसरी शादी की जा सकती है। 

 कानून के कई जानकार इस नियम को संविधान के मूल भावना के खिलाफ मानते हैं। 21वीं सदी को बहुत पीछे ले जाने वाला नियम मानते हैं। उनके मुताबिक अगर देखा जाए तो इस तरह के सिविल कोड को भारत का यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं बनाया जा सकता।

इसी तरह से दूसरे धर्मों के नियमों के जैसे ही पुर्तगाली सिविल कोड भी तमाम तरह की अच्छी और बुरी नियमों को अपने अंदर समेटे हुए हैं। साल 1867 में फ्रांस के जरिए बने कानून से यह अपेक्षा करना कि वह साल 2021 में भारत की जरूरतों के मुताबिक होगा और न्याय सम्मत होगा। यह एक तरह की चालबाजी और बेईमानी वाली बात ही हो सकती है। लेकिन फिर भी कई मीडिया प्लेटफार्म पर यह खबर मिल जाएगी कि गोवा भारत का एकमात्र यूनिफॉर्म सिविल कोड वाला राज्य है। जबकि हकीकत यह है कि इस कानून में सबके लिए एक तरह के नियम नहीं है। न ही लिंग के आधार पर औरत और मर्द को एक समान समझकर नियम गढ़ गए हैं। कई तरह के भेदभाव हैं।

यह बात बिल्कुल सही है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाना बहुत मुश्किल काम है। अंबेडकर को बहुत सारी परेशानी झेलनी पड़ी थी। आज जो यूनिफॉर्म सिविल कोड की वकालत कर रहे हैं, वहीं 1950 से पहले अंबेडकर का बहुत अधिक विरोध कर रहे थे। उन्हें हिंदुओं को अशुद्ध करने वाला और ऊंची जातियों से बदला लेने वाला इंसान बताया था। इसीलिए हिंदू कोड बिल एक बार में पास ना हो सका। धीरे - धीरे कई सारे विरोध झेलने के बाद तीन बार में पास हुआ। 

समाज के नियमों को बदलकर कानूनी जामा पहनाना जितना मुश्किल होता है उससे कहीं अधिक उस कानूनी जामा को समाज द्वारा अपनाना मुश्किल होता है। सब कुछ होने के बावजूद भी आज भी जातिगत भेदभाव है। दूसरी जातियों में शादी होने पर लोग एक दूसरे का गला भी काट देते हैं। 

भारत जैसे विविधता वाले देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाना नामुमकिन के हद तक मुश्किल है। अगर अंबेडकर ने कर दिखाया है तो दूसरे भी कर सकते हैं। लेकिन जरूरत इस बात की है कि यूनिफॉर्म बनाने के नाम पर कहीं का बेकार माल कहीं कहीं पर चेप ना दिया जाए। सबको एक धागे में बांधने की कोशिश करते समय सब के साथ नाइंसाफी न कर दी जाए। यूनिफॉर्म हो लेकिन उसके अंदर न्याय की भावना गहरे तौर पर धंसी हुई हो। जो न्याय की भावना गोवा के सिविल कोड में तो बिल्कुल नहीं दिखाई देती।

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