NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
जलवायु परिवर्तन : हम मुनाफ़े के लिए ज़िंदगी कुर्बान कर रहे हैं
मौसम परिवर्तन एक जानलेवा ग़लत गणना का परिणाम है: वैश्विक कॉरपोरेट कंपनियों के मुनाफ़े के लिए ज़िन्दगियों को जोख़िम में डाला जा सकता है, यहां तक कि उन्हें गंवाया भी जा सकता है।
सोनाली कोल्हटकर
16 May 2022
climate change
प्रतिकात्मक फ़ोटो: साभार: Flickr

विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने हाल में हाल में एक ऐसी धमाकेदार बात का खुलासा किया था, जिसे अमेरिका और अन्य जगह के मीडिया में प्रमुखता से जगह मिलनी थी, लेकिन नहीं मिली। संगठन का नया शोध कहता है, "इस बात की 50 फ़ीसदी संभावना है कि अगले पांच सालों में से कम से कम एक साल, औसत वार्षिक वैश्विक तापमान, पूर्व-औद्योगिक युग से पूर्व के तापमान की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक के तात्कालिक स्तर पर पहुंचेगा।

संगठन के महासचिव प्रोफ़ेसर पेटेरी तालास ने बताया, "1.5 डिग्री सेल्सियस का आंकड़ा कोई मनमुताबिक नहीं है। बल्कि यह मौसम के उस स्तर को बता रहा है, जहां जलवायु परिवर्तन लोगों के लिे बहुत ज़्यादा हानिकारक हो जाएगा, बल्कि यह पूरे ग्रह के लिए हानिकारक होगा।"

2015 में पांच साल में इस आंकड़े तक पहुंचने की संभावना बिल्कुल शून्य थी। 2017 में यह 10 फ़ीसदी थी, आज यह 50 फ़ीसदी है। आज हम प्रचुर मात्रा में वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं, इसलिए हर गुजरते साल के साथ यह दर बढ़ रही है औऱ जल्द ही हम 100 फ़ीसदी के स्तर पर पहुंच जाएंगे।   

जब औसत वैश्विक तापमान बढ़े हुए डेढ़ डिग्री सेल्सियस के स्तर को छुएगा, मौसम वैज्ञानिकों का दावा है कि तब पृथ्वी की ज़्यादातर प्रवाल शैल खत्म हो जाएंगी। 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ने पर सभी प्रवाल शैल खत्म हो जाएँगी। इसलिए 2021 में आखिरी वैश्विक मौसम बैठक में संयुक्त राष्ट्रसंघ के सभी सदस्यों ने वैश्विक औसत तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ने से रोकने पर सहमति जताई थी।

पृथ्वी 1.1 डिग्री सेल्सियस ज़्यादा गर्म हो चुकी है, जिसके ख़तरनाकर प्रभाव हर जगह दिखाई दे रहे हैं। भारत पिछले 122 सालों में सबसे भयावह ताप-लहर का सामना कर रहा है और पड़ोसी पाकिस्तान में सबसे उच्च तापमान का पिछले 61 साल का रिकॉ़र्ड टूट गया है। बहुत तेज गर्मी के चलते कई दर्जन लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। 

फ्रांस में हर दिन किसान "पृथ्वी में दरारें आते देख रहे हैं”, क्योंकि वहां रिकॉर्ड तोड़ स्तर का सूखा पड़ा है, जिसने फ्रांस के कृषि उद्योग को संकट में डाल दिया है। यहां अमेरिका में देश के केंद्रीय और उत्तरपूर्वी हिस्सों में इतनी तेज ताप लहर इतनी तेज है कि लोग टेक्सास से मैन तक लोगों ने मई में तीन अंकों का तापमान महसूस किया।

यहां तक कि दक्षिणी कैलिफोर्निया की ऑरेंज काउंटी में लागुना निगेल के संपन्न रहवासी इलाकों में आग लगने की घटनाएँ हुईं और कई घर तबाह हो गए। लेकिन बाकी लोगों की तुलना में अमीर लोगों के पास मौसम परिवर्तन के प्रभावों को झेलने और उनसे सुरक्षित रहने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में संसाधन हैं। इससे पता चलता है कि अब भयावह तरीके से गर्म होती पृथ्वी पर कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है।  

विडंबना है कि अब वैश्विक तापन के साथ ताप-लहर जितनी तेज हो रही हैं, इंसान उतनी ही ज़्यादा मात्रा में हवा को एसी के ज़रिए ठंडा करने के लिए जीवाश्म ईंधन जलाएगा, ताकि वे जिंदा रह सकें, इससे और भी ज़्यादा तापमान बढ़ेगा। 

ऐसी स्थिति में दुनिया को बिना ज़्यादा सोच-विचार में पड़कर, तुरंत नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ रुख करना चाहिए। लेकिन इसके बजाए, राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अप्रैल में तेल और प्राकृतिक गैस कंपनियों के लिए सरकारी ज़मीन पर नई लीज़ की घोषणा कर दी और इस तरह वे अपने चुनाव अभियान के दौरान किए हुए वायदे से पलट गए। 

बाइडेन ने ऐसा घरेलू ऊर्जा आपूर्ति को बढ़ाने और गैस कीमतों को कम करने के लिए किया है। उन्होंने कंपनियों द्वारा संघीय सरकार को दी जाने वाले शुल्क को साढ़े बारह फ़ीसदी से बढ़ाकर 18.75 फ़ीसदी भी कर दिया है। लेकिन ग्राहक चाहे गैसे पर कितना ही पैसा बचा लें या संघीय सरकार कितना ही कमा ले, यह भौतिकशास्त्र के नियमों को बदल नहीं सकता और मौसम को सुरक्षित नहीं कर सकता। 

न्यूयॉर्क टाइम्स की लीसा फ्रीडमैन कहती हैं, “सरकारी ज़मीन और संघीय सरकार के जल से निकला जीवाश्म ईंधन अमेरिका द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों में से 25 फ़ीसदी का उत्सर्जन करता है, ध्यान रहे चीन के बाद अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषक है।” यह वह एक इलाका है, जहां संघीय प्रशासन का नियंत्रण है, लेकिन यहां भी आर्थिक पहलू फ़ैसले करवा रहे हैं, ना कि अस्तित्व के सवाल से प्रेरित होकर कुछ किया जा रहा है। 

जब पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस कदम की कड़ी आलोचना की, तो बाइडेन आखिरकरा अलास्का और मैक्सिको की खाड़ी की लीज़ रद्द कर दी। गृह मंत्रालय ने इसके लिए कार्यकर्ताओं के दबाव के बजाए, “उद्योग जगत की कम दिलचस्पी” और “विरोधाभासी कोर्ट फ़ैसलों” को लीज़ रद्द करने की वजह बताई। खैर, जलकर खाक होने के मुहाने पर खड़े ग्रह के लिए यह राहत की एक छोटी कोशिश है।

जहां बाइडेन और दूसरे सांसद कहते हैं कि उनके फ़ैसले मतदाताओं की जेब पर बढ़ती महंगाई और गैस की ऊंची कीमतों के प्रभाव से प्रेरित हैं, लेकिन ऐसा समझ आता है कि जनता इन कीमतों को कम करने के लिए बड़ी मात्रा में तेल और गैस का आगे उत्सर्जन नहीं चाहती है।

ऊर्जा और पर्यावरण पर राष्ट्रीय सर्वेक्षण के एक नए पोल से पता चला है कि जनता में मौसम परिवर्तन के प्रभावों को लेकर अब कोई संदेह नहीं है, पोल में 76 फ़ीसदी लोगों का विश्वास है कि “इस बात के पुख़्ता सबूत मौजूद हैं कि पृथ्वी पर पिछले चार दशकों में तापमान में बहुत बढ़ोत्तरी हुई है।”  

पोल में यह भी कहा गया कि “मौसम परिवर्तन के बुरे प्रभावों को खत्म करने के लिए अमेरिकी लोग अब भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने पर जोर देते हैं।” और वे “जियो-एनजीनियरिंग या सब-टेरेनियन कॉर्बन सैबोटॉज या फिर अनुकूलन जैसी तकनीकों को प्राथमिकता देने वाली जलवायु नीतियों से कोई राहत मिलने पर संदेह रखते हैं।”

इसलिए मौसम परिवर्तन के प्रभाव को कम करने या इसके अनुकूल होने के बजाए (जिसे बाज़ार से चलने वाली अर्थव्यवस्था प्राथमिकता पर रखती हैं), लोग अब भी प्राथमिक उपाय के तौर पर ग्रह को गर्म होने से रोकने को ही पहली जरूरी कार्रवाई मानते हैं।

लेकिन अब मौसम वैज्ञानिकों में यह चिंता बढ़ रही है कि शायद हमने नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों की तरफ जाने में देर कर दी है। एक अध्ययन के मुताबिक़, सौर और पवन ऊर्जा के तुलनात्मक तौर पर ज़्यादा सस्ते और ज़्यादा पहुंच में होने के बावजूद, कुल विद्युत खपत बेहद तेजी से बढ़ रही है। अध्ययन के लेखक मार्क डाइसेनडॉर्फ के मुताबिक़, “नवीकरणीय ऊर्जा के लिए अब पिछड़ते लक्ष्य को पाना नामुमकिन है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा का कोई दोष भी नहीं है। यह खपत बढ़ने और देरी से कदम उठाने का नुकसान है।

चूंकि कॉरपोरेट मुनाफ़े से निर्देशित चीजों ने हमारी ऊर्जा खपत और जलवायु नीतियों को हमेशा से प्रभावित किया है, इसलिए हम प्रभावी तौर पर मान चुके हैं कि ऊर्जा के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता की कीमत हम जिंदगियों की कुर्बानी, खासतौर पर अश्वेत गरीबों की, देकर चुकाएंगे।

कोविड महामारी से एक तुलना देखने को मिलती है। जिस तरह महीनों तक वैज्ञानिक वायरस को रोकने के लिए निवारण, लॉकडाउन लगाने, मास्क और वैक्सीन की वकालत करते रहे थे, उसी तरह मौसम वैज्ञानिक भी दशकों से वैश्विक तापन के खिलाफ़ चेतावनियां देते आ रहे हैं। विज्ञान आधारित दोनों ही अभियानों को कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा। वित्तीय बलिदान के बावजूद जनता की सुरक्षा को बढ़ाने के लिए तार्किक दिशानिर्देश जारी करने की अपनी चुनौतियां थीं ( कोविड महामारी के तहत ज़्यादातर उद्यमों, रेस्त्रां को बंद करना पड़ा, खेलों और मनोरंजन के कार्यक्रमों को रोकना पड़ा। जबकि मौसम संकट में सौर ऊर्जा सब्सिडी को प्रोत्साहन दिया गया, पवन ऊर्जा की तरफ झुकाव बनाया गया और हाइब्रिड व इलेक्ट्रिक गाड़ियों की तरफ ध्यान बढ़ाया गया)। इस बीच कॉरपोरेट हित और दक्षिणपंथी राजनीतिक अवसरवादी सत्ता के गलियारों में अपना एजेंडा बढ़ाते हुए कहते रहे कि आर्थिक विकास ही सबसे बड़ा सवाल है।

आज, जब कोविड महामारी की संक्रमण दर फिर से तेजी के साथ बढ़ रही है, पिछले दो हफ़्तों में 58 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है, तब सभी देशों में मास्क अनिवार्यता को खत्म किया जा रहा है और कोविड-19 से जुड़े प्रतिबंधों को रद्द किया जा रहा है। ऐसा इसलिए नहीं है कि यह वायरस नियंत्रण में आ चुका है, बल्कि अब कॉरपोरेट अमेरिका जिंदगियां बचाने के लिए मुनाफ़े को दांव पर लगाना नहीं चाहता। यही चीज जलवायु संकट के साथ है। 

यह जरूरी है कि हम इस समीकरण को खुलकर बोलें, ताकि हमें पता हो कि हम किस तरफ जा रहे हैं।

जैसे-जैसे मौसम बदलेगा, हमें पता चलेगा कि शवों को कहां दफनाया गया था। नेवादा की लेक मीड झील में पानी का स्तर इतना नीचे चला गया कि इंसानों के दो शवों के अवशेष सतह पर पाए गए। पता नहीं आगे हमें क्या-क्या परेशान करने वाली चीजें देखना बाकी है?

सोनाली कोल्हाटकर “राइज़िंग अप विद् सोनाली” की संस्थापक, प्रस्तोता और कार्यकारी निर्माता हैं, जो एक टेलीविजन और रेडियो शो है। इसका प्रसारण फ्री स्पीच टीवी और पैसिफिका स्टेशंस पर किया जाता है। वे इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्त “इक्नॉमी फॉर ऑल” के लिए राइटिंग फैलो भी हैं।

यह लेख इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्ट “इक्नॉमी फॉर ऑल” द्वारा प्रकाशित किया गया था।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

As Planet Warms, Let’s Be Clear: We Are Sacrificing Lives for Profits

activism
Asia/India
Asia/Pakistan
Biden
climate change
Community
Economy
Environment
Europe/France
health care
Human Rights
Media
North America/United States of America
opinion
politics
Science
social justice
Time-Sensitive
trade
United nations

Related Stories

गर्म लहर से भारत में जच्चा-बच्चा की सेहत पर खतरा

मज़दूर वर्ग को सनस्ट्रोक से बचाएं

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

उत्तराखंड: क्षमता से अधिक पर्यटक, हिमालयी पारिस्थितकीय के लिए ख़तरा!

मध्यप्रदेशः सागर की एग्रो प्रोडक्ट कंपनी से कई गांव प्रभावित, बीमारी और ज़मीन बंजर होने की शिकायत

लगातार गर्म होते ग्रह में, हथियारों पर पैसा ख़र्च किया जा रहा है: 18वाँ न्यूज़लेटर  (2022)

कर्नाटक : कच्चे माल की बढ़ती क़ीमतों से प्लास्टिक उत्पादक इकाईयों को करना पड़ रहा है दिक़्क़तों का सामना

‘जलवायु परिवर्तन’ के चलते दुनियाभर में बढ़ रही प्रचंड गर्मी, भारत में भी बढ़ेगा तापमान

दुनिया भर की: गर्मी व सूखे से मचेगा हाहाकार

बनारस में गंगा के बीचो-बीच अप्रैल में ही दिखने लगा रेत का टीला, सरकार बेख़बर


बाकी खबरें

  • nirmla sitaraman
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बजट में अगले 25 साल के लिये अर्थव्यवस्था को गति देने का आधार: सीतारमण
    01 Feb 2022
    आमजन ख़ासकर युवा को नए आम बजट में न अपना वर्तमान दिख रहा है, न भविष्य, लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि केंद्रीय बजट ने समग्र और भविष्य की प्राथमिकताओं के साथ अगले 25 साल के लिये…
  • cartoon
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बजट में मध्यम वर्ग के साथ विश्वासघात और युवाओं की जीविका पर प्रहार: विपक्ष 
    01 Feb 2022
    “सरकार ने देश के वेतनभोगी वर्ग और मध्यम वर्ग को राहत नहीं देकर उनके साथ ‘विश्वासघात’ और युवाओं की जीविका पर ‘आपराधिक प्रहार’ किया है।”
  • kanpur
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव: ' बर्बाद होता कानपुर का चमड़ा उद्योग'
    01 Feb 2022
    अपने चमड़े के कारोबार से कानपुर का नाम पूरी दुनिया में मशहूर है। लेकिन आज चमड़ा फैक्ट्री अपने पतन की ओर है। चमड़ा व्यापारियों का कहना है कि इसका एक बड़ा कारण सरकार द्वारा गंगा नदी के प्रदूषण का हवाला…
  • varansi weavers
    दित्सा भट्टाचार्य
    यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 
    01 Feb 2022
    इस नए अध्ययन के अनुसार- केंद्र सरकार की बहुप्रचारित प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) और प्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) जैसी योजनाओं तक भी बुनकरों की पहुंच नहीं है।
  • up elections
    असद शेख़
    यूपी चुनाव: क्या हैं जनता के असली मुद्दे, जिन पर राजनीतिक पार्टियां हैं चुप! 
    01 Feb 2022
    सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस की जीत और हार के बीच की इस बहस में कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब नहीं मिल पा रहा है। सवाल ये हैं कि जनता के मुद्दा क्या है? जनता की समस्या क्या है? पश्चिमी यूपी, अवध,…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License