NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
भूख-जाति से लड़ती सामुदायिक रसोई
वैसे तो कोरोना काल का असर सभी पर पड़ा है पर सफाई समुदाय पर जाति के कारण अधिक ही पड़ा है। ऐसे में कुछ लोगों और संगठनों ने मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए हैं। इसी तरह सफाई कर्मचारी आंदोलन की पहल पर कई राज्यों में सामुदायिक रसोई शुरू की गई है, ताकि कोई भी सफाई कर्मचारी भूखा न रहे।
राज वाल्मीकि
16 Sep 2020
सामुदायिक रसोई

पिछले हफ्ते देश की राजधानी दिल्ली से ही खबर आई कि दिल्ली नगर निगम (दक्षिण) के सफाई कर्मचारी वीरेंद्र सिंह चुड़ीयाणा ने कई महीनों से वेतन न मिलने और 13 सालों से स्थायी नौकरी की मांग करने के बावजूद स्थायी न करने के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से परिवार सहित आत्महत्या की मंजूरी मांगी है।  सफाई कर्मचारियों का कई-कई महीने वेतन न मिलना सिर्फ दिल्ली की ही नहीं पूरे देश के सफाई कर्मचारियों के समस्या है। इस कोरोना काल में जब सफाई कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर हम सब के स्वस्थ रखने के लिए सफाई कार्य में लगे हैं, ऐसे में जब इन कोरोना वारियर्स को कई-कई महीने वेतन तक नहीं मिले – तो ये अपना घर कैसे चलाएंगे। पूरे परिवार को भुखमरी से मरते नहीं देखने पर आत्महत्या के ही सोचेंगे।

कोरोना काल में जिस तरह के हालात बने हैं उस से आप और हम सभी वाकिफ हैं। देश के आम जन पर इसका बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा है। अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई है। महंगाई बढ़ी है। बेरोजगारी बढ़ी है। ऐसे में दलितों में भी दलित कहे जाने वाले सफाई समुदाय की हालत तो बद से बदतर हो गई है। उन पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तो वे सामाजिक रूप से अछूतपन, भेदभाव, अन्याय और अत्याचार से पीड़ित हैं दूसरी ओर गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी से परेशान हैं। ऐसे में परिवार का भरण-पोषण कैसे हो।

वैसे तो कोरोना काल का असर सभी पर पड़ा है पर सफाई समुदाय पर जाति के कारण अधिक ही पड़ा है। कई सफाई कर्मचारियों का कहना है कि कोरोना काल में उनका काम छूट गया है। उनके और उनके परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है।

ऐसे में कुछ लोगों और संगठनो ने मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए हैं। उनमें एक सफाई कर्मचारी आंदोलन भी है। सफाई कर्मचारी आंदोलन एक राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन है जो पिछले तीस सालों से मैला प्रथा उन्मूलन के लिए प्रतिबद्ध है। इसके नेशनल कन्वीनर मैग्सेसे अवार्डी बेजवाड़ा विल्सन मैला प्रथा उन्मूलन के लिए निरंतर संघर्षरत हैं। समाज की ही मदद से सफाई कर्मचारी आंदोलन की पहल पर कई राज्यों में सामुदायिक रसोई खोलने का निर्णय लिया गया जिससे कोई भी सफाई कर्मचारी भूखा न रहे। अपने सीमित साधनों में सामुदायिक रसोईं का प्रबंध और संचालन सफाई कर्मचारी खुद ही कर रहे हैं। वे खुद ही खाना बनाते हैं और मिल बांटकर खाते हैं।

लेखक ने सामुदायिक रसोई से जुड़े पुरुषों और महिलाओं से बात की। उन्होंने अपने अनुभव साझा किए। सामुदायिक रसोई का काम फ़िलहाल चार राज्यों में वहां के स्वयं सहायता समूह के माध्यम से चल रहा है। ये राज्य हैं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और झारखण्ड। सामुदायिक रसोई चल रही है - उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद जिले की बेहटा बस्ती में, मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की रानीगंज बस्ती में, बिहार के रोहतास जिले के डालमिया नगर में और झारखण्ड के धनबाद जिले के कतरसगंज में।

Up Kitchen.jpegउत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद की बेहटा बस्ती में सामुदायिक रसोई के देख-रेख कर रहे संजय लोहट कहते हैं कि सामुदायिक रसोई के माध्यम से हम एक ही समय का खाना दे पाते हैं पर लोगों की हमसे अपेक्षाएं अधिक होती हैं कि दो टाइम खाना मिले पर फिलहाल सीमित साधनों में हम अफोर्ड नहीं कर पाते हैं। पर इस कोरोना काल में लोग इसे भी एक बड़ा सहारा मानते हैं कि कम से कम भूखे तो नहीं सोयेंगे।

Kitchen MP.jpeg

इसी प्रकार मध्य प्रदेश पन्ना के रानीगंज में प्रमुख संचालक रविता डुमार कहती हैं कि सामुदायिक रसोई से ज्यादातर लोग खुश हैं। कभी-कभी दिक्कत भी आती है। हम खाना सीमित लोगों के लिए बनाते हैं पर आस-पास की बस्ती के लोग भी आ जाते हैं। तब स्थिति असमंजस की हो जाती है न उनको मना करते बनता है और न ही भरपेट खाना दे पाते हैं पर फिर भी थोडा-थोडा आपस में साझा कर लेते हैं।

झारखण्ड में धनबाद जिले के कतरसगढ़ बस्ती का काम सन्नी राम की देखरेख में हो रहा है। वे कहते हैं कि हमारी सामुदायिक रसोई ठीक चल रही है। सबलोग मिलकर सब काम निपटा लेते हैं और फिर खाना खाकर अपने घर चले जाते हैं। कई बार लोग कुछ नॉन-वेज खाने की बात कहते हैं जो कि हमारे सीमित संसाधनों में संभव नही है। हम सादा खाना जैसे दाल-रोटी, रोटी-सब्जी इत्यादि ही बना पाते  हैं। इससे ज़्यादा हम हम जुटा नहीं पाते हैं।

bihaar kichten.jpeg

बिहार के रोहतास जिले में डालमिया नगर बस्ती की सामुदायिक रसोई कविता की देख-रेख में चल रही है। कविता कहती हैं कि मेरी सामुदायिक रसोई ठीक चल रही है। महिलाएं सहयोग कर रहीं हैं। पर कभी कभी मैं पुरुषों से परेशान हो जाती हूँ जब वे कहते है एक टाइम की जगह दो टाइम का खाना बनवाओ। जब मैं कहती हूँ कि ये संभव नहीं है वे समझने की कोशिश नहीं करते। नॉन-वेज की भी मांग होती है। वैसे सब ठीक है हम लोग मिलजुल कर खाना बनाते खाते हैं।

संजय (उत्तर प्रदेश), रविता (मध्य प्रदेश), सनीराम (झारखण्ड) और कविता (बिहार) से सरकारी मदद के बारे में पूछने पर उन्होंने असंतोष प्रकट किया। उनका कहना था सरकार बड़े-बड़े वादे करती है पर काम नहीं करती है। जितनी राहत पहुँचाने की बात सरकार करती है उतनी लोगों तक पहुँचती नहीं है। जिनके पास राशन कार्ड हैं उनको सरकार ने राशन दिया है वह भी इतना कम दिया है कि  परिवार के लिए पूरा नही हो पाता। हमारे बहुत से लोगों के पास राशन कार्ड ही नहीं हैं।

सामुदायिक रसोई में खाना बनाते और खाते वक्त बातों-बातों में महिलाएं कहती हैं कि उनके पुरुष राज्य से बाहर कमाने के लिए गए थे पर लॉकडाउन में उनका काम बंद हो गया और वे वापस लौट आए। ऐसे में घर का खर्च कैसे चले। सरकार हमारे बारे में क्यों नहीं सोचती।

सामुदायिक रसोई का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि इस से समुदाय में एकता की भावना और परस्पर सहयोग का भाव भी विकसित हो रहा है। वैसे तो खाना बनाने की कमान महिलाओं ने ही संभाल रखी है पर इसमें पुरुष भी अपना यथासंभव सहयोग करते हैं। सामुदायिक रसोई के समय बस्ती के लोग आपस में मिल कर अपने दुख–सुख भी साझा कर लेते हैं।

(लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Coronavirus
COVID-19
poverty
Hunger
Community Kitchen
Caste
Cleaning community
Narendra modi
BJP
economic crises
unemployment

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा


बाकी खबरें

  • अनिल सिन्हा
    उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!
    12 Mar 2022
    हालात के समग्र विश्लेषण की जगह सरलीकरण का सहारा लेकर हम उत्तर प्रदेश में 2024 के पूर्वाभ्यास को नहीं समझ सकते हैं।
  • uttarakhand
    एम.ओबैद
    उत्तराखंडः 5 सीटें ऐसी जिन पर 1 हज़ार से कम वोटों से हुई हार-जीत
    12 Mar 2022
    प्रदेश की पांच ऐसी सीटें हैं जहां एक हज़ार से कम वोटों के अंतर से प्रत्याशियों की जीत-हार का फ़ैसला हुआ। आइए जानते हैं कि कौन सी हैं ये सीटें—
  • ITI
    सौरव कुमार
    बेंगलुरु: बर्ख़ास्तगी के विरोध में ITI कर्मचारियों का धरना जारी, 100 दिन पार 
    12 Mar 2022
    एक फैक्ट-फाइंडिंग पैनल के मुतबिक, पहली कोविड-19 लहर के बाद ही आईटीआई ने ठेके पर कार्यरत श्रमिकों को ‘कुशल’ से ‘अकुशल’ की श्रेणी में पदावनत कर दिया था।
  • Caste in UP elections
    अजय कुमार
    CSDS पोस्ट पोल सर्वे: भाजपा का जातिगत गठबंधन समाजवादी पार्टी से ज़्यादा कामयाब
    12 Mar 2022
    सीएसडीएस के उत्तर प्रदेश के सर्वे के मुताबिक भाजपा और भाजपा के सहयोगी दलों ने यादव और मुस्लिमों को छोड़कर प्रदेश की तकरीबन हर जाति से अच्छा खासा वोट हासिल किया है।
  • app based wokers
    संदीप चक्रवर्ती
    पश्चिम बंगाल: डिलीवरी बॉयज का शोषण करती ऐप कंपनियां, सरकारी हस्तक्षेप की ज़रूरत 
    12 Mar 2022
    "हम चाहते हैं कि हमारे वास्तविक नियोक्ता, फ्लिपकार्ट या ई-कार्ट हमें नियुक्ति पत्र दें और हर महीने के लिए हमारा एक निश्चित भुगतान तय किया जाए। सरकार ने जैसा ओला और उबर के मामले में हस्तक्षेप किया,…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License