NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
लॉकडाउन में वेतन न देने को लेकर कंपनी मालिक पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, अदालत ने सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को पूरा वेतन देने के सरकार के 29 मार्च के निर्देश पर केंद्र सरकार से दो सप्ताह में जवाब मांगा है।
मुकुंद झा
28 Apr 2020
supreme court

दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को पूरा वेतन देने के सरकारी निर्देश पर केन्द्र सरकार से जवाब मांगा है। सरकार को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना है। गौरतलब है कि कई निजी कंपनियों ने शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल कर लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को पूरा वेतन देने संबंधी केंद्र सरकार के 29 मार्च के आदेश को चुनौती दी है और कोर्ट से यह आदेश रद्द करने की मांग की है।

आपको बता दें कि गृह मंत्रालय द्वारा 29 मार्च को जारी अधिसूचना के मुताबिक सभी नियोक्ताओं को अपने कर्मचारियों को लॉकडाउन के दौरान पूरा वेतन देना होगा। सरकार के इस आदेश के बाद भी कई जगहों से मजदूरों की शिकायत है कि नियोक्ता उन्हें वेतन नहीं दे रहे है। कंपनी मालिकों की अपनी दलील है की बिना उत्पादन के वो वेतन का भुगतान कैसे करे?

अब इसी सवाल को लेकर कई निजी कंपनियां सुप्रीम कोर्ट चली गई। इसी के साथ एक वकील ने मज़दूरों को पूरा वेतन मिले यह सुनिश्चित करने को लेकर भी जनहित याचिका लगाई थी। इन सभी याचिकाओं पर सोमवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को पूर्ण वेतन के भुगतान का निर्देश देने वाली गृह मंत्रालय (MHA) अधिसूचना के बारे में अपनी "नीति को रिकॉर्ड पर" रखने के लिए केंद्र को दो सप्ताह का समय दिया। यानी दो सप्ताह के बाद कोर्ट में बताना होगा कि सरकार की क्या नीति है और कैसे कर्मचारियों को उनका पूरा वेतन मिलेगा?

सोमवार को कोर्ट में क्या हुआ?

जस्टिस एनवी रमना, संजय किशन कौल और बीआर गवई की खंडपीठ ने यह आदेश पारित किया, जिसमें निजी संगठनों द्वारा दायर याचिकाओं की सुनवाई की जा रही थी। इस याचिका में  गृहमंत्रालय के उस नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई है, जिसमें लॉकडाउन के दौरान नियोक्ताओं को पूर्ण वेतन देने का आदेश दिया गया है और यह सुनिश्चित करने के लिए कि किसी कर्मचारी को हटाया नहीं जा सकता है।

लीगल वेबसाइट ‘बार एन्ड बेंच’ की खबर के अनुसार अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि सभी याचिकाकर्ता अपने आवेदन की प्रतियों की आपूर्ति सॉलिसिटर जनरल को ई-मेल के माध्यम से करेंगे। यह याचिकाएँ तीन अलग अलग कंपनियों और एडवोकेट आदित्य गिरि द्वारा दाखिल की गई थी। इसमें मुंबई स्थित फर्म, नागरिका एक्सपोर्ट्स, कर्नाटक स्थित कंपनी फिक्स पैक्स प्राइवेट लिमिटेड और पंजाब स्थित लुधियाना हैंड टूल्स एसोसिएशन शामिल हैं ।
 
मुख्य याचिकाकर्ता नागरिका एक्सपोर्ट्स ने यह कहते हुए अपनी याचिका वापस ले ली कि वह एक ही मुद्दे पर शीर्ष अदालत में दलीलों की संख्या को देखते हुए सबमिशन के टकराव से बचना चाहती थी।
 
ऐसे में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड जीतेंदर गुप्ता द्वारा मामले का प्रतिनिधित्व किया गया जो फिक्स पैक्स कंपनी के तरफ से पेश हुए और बहस किया।  

कर्नाटक स्थित इस कंपनी ने सचिव (श्रम और रोजगार) द्वारा 20 मार्च की अधिसूचना और MHA द्वारा 29 मार्च की अधिसूचना के खंड III,  की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी। दोनों ही  अधिसूचनाएं लॉकडाउन की अवधि के दौरान श्रमिकों और कर्मचारियों को पूर्ण मजदूरी का भुगतान करने के लिए मजबूर करती हैं। याचिकाकर्ता कंपनी ने कहा  कि "ये दोनों अधिसूचनाएं भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 (1) (जी) कानून के प्रावधानों के खिलाफ हैं।"
 
कंपनी ने बताया कि लॉकडाउन से पहले, इसके सभी कारखानों / गोदामों / कार्यालयों में 176 स्थायी कर्मचारी और 939 ठेका कर्मचरी थे और इसने मार्च 2020 के महीने के लिए "संविदाकर्मियों सहित सभी श्रमिकों को मजदूरी का भुगतान किया था। "

इसी तरह मुंबई की कंपनी जिसने अपनी याचिका को वापस लिया उसने भी कहा था कि करीब 1400 कर्मचारी जो उसके पास काम करते थे उसे उसने मार्च का वेतन दे दिया लेकिन वो अब अप्रैल का वेतन नहीं दे पाएगी।

कोर्ट के सामने तर्क देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि ये अधिसूचनाएँ औद्योगिक प्रतिष्ठान विशेष रूप से एमएसएमई प्रतिष्ठान को को दिवालिया और भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं।

वहीं, लुधियाना हैंड टूल्स एसोसिएशन ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड राजीव एम रॉय के माध्यम से कहा कि 29 मार्च को आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत एमएचए आदेश संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1) (जी), 265 और 300 का उल्लंघन है। और इसे तत्काल वापस लेना चाहिए।  

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि लॉकडाउन के दौरान कंपनियों को भी आर्थिक नुकसान हो रहा है, इसलिए उन्हें लॉकडाउन के दौरान अपने काम करने वालों को भुगतान करने से छूट दी जानी चाहिए।

राजीव एम रॉय  ने तर्क दिया कि "अकेले अनुबंध की एकतरफा कार्यान्वयन की अनुमति नहीं दी जा सकती है क्योंकि नियोक्ता और कर्मचारी के बीच एक संबंध पारस्परिक वादों के तहत होते हैं जिसमें भुगतान केवल किये गए काम पर ही दिया जाता है।"

याचिकाकर्ताओं के लिए अधिवक्ता राजीव एम रॉय, अभय नेवगी और जमशेद कामा उपस्थित हुए।

दूसरी ओर अधिवक्ता आदित्य गिरि द्वारा दायर जनहित याचिका को अन्य याचिकाओं के साथ ही शामिल किया गया था। वकील गिरि की याचिका में इस महामारी के दौरान "कर्मचारियों की छंटनी पर अंकुश लगाने में विफल रहने के लिए" उनके कर्त्तव्य और उनकी लापरवाही की भूमिका के लिए नियोक्ताओं सहित सभी हितधारकों की जवाबदेही को तय करने की मांग थी। इसके साथ ही इस याचिका में केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को निर्देश जारी करने की मांग की गई थी कि वे निजी क्षेत्र के कर्मचारियों द्वारा फेस की जाने वाली समस्याओं से निपटने के लिए एक रूपरेखा तैयार करें।

क्या सरकार के पास कोई नीति है?

फिलहाल ये मामला अब अदालत में गया है लेकिन सरकार द्वारा अचानक लागू किए गए लॉकडाउन के बाद से ही तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं। जैसेकि सरकार ने यह तो कह दिया सबको वेतन दिया जाए लेकिन सवाल यह है कि यह सुनिश्चित कौन करेगा कि सबको वेतन मिले?

तमाम मज़दूर संगठनों का दावा है कि सरकार के अपने संस्थानों में काम करने वाले आउटसोर्स और ठेका कर्मचारयों को वेतन नहीं मिल रहा है। बाकी की तो बात ही छोड़ दो।

गौरतलब है कि दिल्ली सहित देश के कई कंपनियों ने मार्च महीने का वेतन भी अपने मज़दूरों को नहीं दिया है। इस दौरान बड़े स्तर पर लोगों की छंटनी हुई है और कई जगह पर लोगों को  अनपेड लीव पर भेजा गया है लेकिन किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई हैं। इसके अलावा बहुत सारी ऐसी कंपनियां है जिन्होंने मार्च का भुगतान किया भी है लेकिन अब अप्रैल का वेतन भुगतान करने से मना कर रही है।

लेकिन सरकार के पास अभी भी कोई ठोस नीति नहीं दिख रही है जबकि यह सब सरकार और उसके तंत्र की नाक के नीचे हो रहा है।  

गौरतलब है कि दिल्ली में सबसे बड़े मीडिया हाउस टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ने अपने कर्मचारियों को लॉकडाउन के दौरान ही हटाया है। इसके साथ ही कई मीडिया संस्थानों में छंटनी, अनपेड लीव और वेतन कटौती के बात सामने आई थी।

इस पर कई जानकारों का कहना है कि सरकार जानबूझकर किसी भी कंपनी के खिलाफ एक्शन नहीं लेती है क्योंकि वो किसी भी उद्योगपति को नाराज़ नहीं करना चाहती है। उद्योगों की भी अपनी सीमा है। सरकार ने तो कह दिया बिना उत्पादन के भी वेतन दो लेकिन कई ऐसे कंपनी मालिक है जिनके लिए यह मुश्किल है। इसके लिए भी सरकार को कोई उपाय करना चहिए था लेकिन उसने नहीं किया। दुनिया के बाकी देश चाहे वो अमेरिका, ब्रिटेन या बाकि यूरोपीय देश हो सभी जगहों की सरकारों ने निजी कंपनियों के कर्मचारियों के वेतन का एक हिस्सा दिया जिससे कंपनी मालिकों पर भी अधिक बोझ न पड़े। परन्तु हमारे यहाँ ऐसा कुछ नहीं किया गया।

हालांकि सरकार ने कई आदेश जारी किये की सभी को वेतन मिले लेकिन जमीन पर इसे लागू करने की मंशा नहीं दिखी। ऐसे में इस महामारी में कर्मचारियों और मज़दूरों के लिए स्थिति और भी भयावह होने की उम्मीद जताई जा रही है। 

Lockdown
Company
Company boss
Workers Payment
Central Government
modi sarkar
Supreme Court
MHA

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

तेलंगाना एनकाउंटर की गुत्थी तो सुलझ गई लेकिन अब दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?

मलियाना कांडः 72 मौतें, क्रूर व्यवस्था से न्याय की आस हारते 35 साल

क्या ज्ञानवापी के बाद ख़त्म हो जाएगा मंदिर-मस्जिद का विवाद?


बाकी खबरें

  • जितेन्द्र कुमार
    मुद्दा: बिखरती हुई सामाजिक न्याय की राजनीति
    11 Apr 2022
    कई टिप्पणीकारों के अनुसार राजनीति का यह ऐसा दौर है जिसमें राष्ट्रवाद, आर्थिकी और देश-समाज की बदहाली पर राज करेगा। लेकिन विभिन्न तरह की टिप्पणियों के बीच इतना तो तय है कि वर्तमान दौर की राजनीति ने…
  • एम.ओबैद
    नक्शे का पेचः भागलपुर कैंसर अस्पताल का सपना अब भी अधूरा, दूर जाने को मजबूर 13 ज़िलों के लोग
    11 Apr 2022
    बिहार के भागलपुर समेत पूर्वी बिहार और कोसी-सीमांचल के 13 ज़िलों के लोग आज भी कैंसर के इलाज के लिए मुज़फ़्फ़रपुर और प्रदेश की राजधानी पटना या देश की राजधानी दिल्ली समेत अन्य बड़े शहरों का चक्कर काट…
  • रवि शंकर दुबे
    दुर्भाग्य! रामनवमी और रमज़ान भी सियासत की ज़द में आ गए
    11 Apr 2022
    रामनवमी और रमज़ान जैसे पर्व को बदनाम करने के लिए अराजक तत्व अपनी पूरी ताक़त झोंक रहे हैं, सियासत के शह में पल रहे कुछ लोग गंगा-जमुनी तहज़ीब को पूरी तरह से ध्वस्त करने में लगे हैं।
  • सुबोध वर्मा
    अमृत काल: बेरोज़गारी और कम भत्ते से परेशान जनता
    11 Apr 2022
    सीएमआईए के मुताबिक़, श्रम भागीदारी में तेज़ गिरावट आई है, बेरोज़गारी दर भी 7 फ़ीसदी या इससे ज़्यादा ही बनी हुई है। साथ ही 2020-21 में औसत वार्षिक आय भी एक लाख सत्तर हजार रुपये के बेहद निचले स्तर पर…
  • JNU
    न्यूज़क्लिक टीम
    JNU: मांस परोसने को लेकर बवाल, ABVP कठघरे में !
    11 Apr 2022
    जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में दो साल बाद फिर हिंसा देखने को मिली जब कथित तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से संबद्ध छात्रों ने राम नवमी के अवसर कैम्पस में मांसाहार परोसे जाने का विरोध किया. जब…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License