NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
कोरोना संकट : क्या यह वक़्त आलोचना का नहीं है?, बिल्कुल है, यही वक़्त है सही आलोचना का
वे लोग कह सकते हैं और कहेंगे भी कि आपको राजनीति करनी है तो आप क्यों सहमत होंगे! मानो जब वे कह रहे हैं कि यह वक़्त आलोचना और राजनीति का नहीं, बल्कि एकताबद्ध होकर लड़ने का है तो वे राजनीति नहीं कर रहे हैं!
राजीव कुंवर
30 Mar 2020
कोरोना संकट
Image courtesy: The Indian Express

एक बात लगातार कही जा रही है कि "यह वक़्त आलोचना का नहीं है। अभी तो सबको एक होकर कोरोना से लड़ने की जरूरत है।" क्या इससे सहमत हुआ जा सकता है ? 

मेरा जवाब नहीं होगा। 

वे लोग कह सकते हैं और कहेंगे भी कि आपको राजनीति करनी है तो आप क्यों सहमत होंगे!

मानो जब वे कह रहे हैं कि यह वक़्त आलोचना और राजनीति का नहीं, बल्कि एकताबद्ध होकर लड़ने का है तो वे राजनीति नहीं कर रहे हैं!

तानाशाह आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकता। पिछले दो-तीन दशकों से एक बात सुनायी देती रही है कि इस देश में जो अराजकता है उसे कोई तानाशाह ही ठीक कर सकता है। कभी वही अंग्रेजों की तारीफ करते मिल सकते थे तो कभी इंदिरा गांधी के इमरजेंसी की तारीफ़ - चुस्त दुरुस्त प्रशासनिक व्यवस्था के लिए। अर्थात नागरिक कानून को स्थगित कर सत्ता-शासन के बंदूक की नोक पर व्यवस्था। नागरिक चेतना के निर्माण और नागरिक समाज बनाने की जगह फ़ॉलोअर्स तैयार करने की जो मनोवृत्ति तैयार की गई उसी की फसल आज पक चुकी है। 

आलोचनात्मक विवेक की बात आज 'राजनीति' के नकारात्मक चेतना का प्रतीक है।

आखिर जनवरी से ही जब विपक्ष द्वारा दुनिया भर में फैल रहे कोरोना के खतरे से सचेत किया जा रहा था, तो इसे भी अराजकता फैलाने की राजनीति ही कहा गया। अर्थव्यवस्था को पूरी तरह सुरक्षित बताया गया। विपक्ष पर ही हमला किया गया। क्या इसकी वजह आलोचनात्मक विवेक को समाज में तवज्जो देने की कमी नहीं? आलोचनात्मक विवेक अगर मीडिया में होता, मंत्रियों में होता, समाज में होता तो क्या सरकार का फैसला वही होता? क्या मोदी वैसे ही पप्पू कहकर इतने बड़े खतरे को नजरअंदाज कर पाते? केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जो खुद डॉक्टर हैं उन्होंने भी दिग्भ्रमित करने का काम ही किया। आखिर क्यों ?

आज जो करोड़ों दिहाड़ी मजदूर सड़कों पर देशभर में बेचैनी के साथ घर जाना चाहते हैं - उसे विपक्ष की घटिया राजनीति कौन बता रहा है? क्या यह दिल्ली मात्र की समस्या है? अब सोचिए अगर अभी भी आलोचनात्मक विवेक के साथ आप नहीं होंगे तो आपको भी मुंबई, लखनऊ, गुजरात, मध्यप्रदेश, आदि के बजाय मात्र केजरीवाल और दिल्ली का आनंद विहार ही दिखेगा। 

औचक घरबंदी का फैसला लेना इसकी वजह नहीं है क्या? तब जिम्मेदारी तो मोदी सरकार के फैसले की होगी न! लेकिन जब इसे कहेंगे तो यह राजनीति कहा जाएगा। समझिए कि कौन लोग हैं जो ये कह रहे हैं!

अगर मोदी सरकार की जिम्मेदारी तय नहीं होगी तो अब भी बड़े पैमाने पर जाँच की बात को स्वीकार करने एवं इस दिशा में सरकार की भूमिका निभाने के फैसले में और भी देरी होगी। सोचिए अगर विदेशों से कुछ लाख लोगों द्वारा आया कोरोना वायरस आज पूरे देश में कैसे फैल गया ? क्या इसके लिए चीन जिम्मेदार है ? इसके लिए मोदी सरकार पूरी तरह से जिम्मेदार है कि उसने विदेश से लौटे लोगों को आइसोलेशन में रखने, उनकी जाँच करने, उनका इलाज करने की उसने कोई तैयारी नहीं की। गौ मूत्र और गोबर से कोरोना वायरस से रक्षा का राग केंद्रीय मंत्रियों द्वारा कहा जाता रहा। अदूरदर्शिता का परिणाम है कि जब यह वायरस देश के कई राज्यों में फैल गया तो अब राज्य सरकारों को उन्हें खोजने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। क्या यह राजनीति नहीं है ?

वेंटिलेटर, जाँच के किट और सुरक्षा के इंतजाम, आदि पर अभी भी सरकार कितनी गंभीर है यह कहना मुश्किल है। भूख से मरना या कोरोना से मरना - क्या यही दो विकल्प है उन दिहाड़ी मजदूर के लिए? तब वे क्या चुनेंगे इनमें से - इसे आप सड़कों पर पैदल चलते उन मजदूरों के इंटरव्यू से जान सकते हैं।

इसलिए एकजुटता से लड़ने के लिए भी आलोचनात्मक विवेक की सख्त जरूरत है। इसके बिना सत्ता को आप तानाशाह बनाने में अपनी बौद्धिक आहुति दे रहे हैं। हाँ आपको तानाशाह ही चाहिए तो अंग्रेजों को भगाने के लिए जो स्वाधीनता आंदोलन का संघर्ष चला जिसमें चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरु, भगत सिंह आदि को फांसी की सज़ा मिली - उसकी आपको निरर्थकता लगेगी ही। आपको गांधी, नेहरू, पटेल, अम्बेडकर, आदि के द्वारा संविधान निर्माण के द्वारा जनतान्त्रिक प्रक्रिया परेशान करती ही होगी। 

अंतिम बात सुन लीजिए - कोरोना वायरस से तो दुनिया लड़ रही है, हम भी लड़ रहे हैं, मौत भी होगी, पर अंततः विश्व-मानव उसे जीत ही लेंगे। लेकिन अगर आलोचनात्मक विवेक को हमने 'राजनीति' के नकारात्मक अर्थ में ले लिया तो तानाशाह की फ़ौज ही तैयार होगी, जिसमें जनतंत्र का दम घुटकर सदियों के लिए दफ़न हो जाएगा।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

इसे भी पढ़े : कोरोना : संकट के समय ही प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी सोच का अंतर साफ़ होता है

Coronavirus
COVID-19
Corona Crisis
India Lockdown
Migrant workers
Daily Wage Workers
Poor People's
politics
Government criticism
Narendra modi
modi sarkar

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा


बाकी खबरें

  • Sudha Bhardwaj
    भाषा
    एल्गार परिषद : बंबई उच्च न्यायालय ने वकील सुधा भारद्वाज को ज़मानत दी
    01 Dec 2021
    अदालत ने भारद्वाज को इस आधार पर ज़मानत प्रदान कि उनके ख़िलाफ़ निश्चित अवधि में आरोपपत्र दाखिल नहीं हुआ इसलिए वह ज़मानत की हकदार हैं। भारद्वाज वर्ष 2018 में गिरफ़्तारी के बाद से विचाराधीन कैदी के तौर पर…
  • palestine prisoner
    पीपल्स डिस्पैच
    फ़िलिस्तीनी प्रशासनिक बंदी लोय अल-अश्क़र ने रिहाई पर हुए समझौते के बाद भूख हड़ताल ख़त्म की
    01 Dec 2021
    इजरायल ने दो अन्य फिलिस्तिनियों-हिशाम अबू ह्वाश और निदाल बॉलआउट को हिरासत में रखा हुआ है और इस अवैध प्रशासनिक हिरासत के ख़िलाफ़ ये दोनों इस समय बंदी भूख हड़ताल पर हैं। वे क्रमश: 104 दिनों और 31 दिनों…
  • AICCTU
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: ऐक्टू ने किया निर्माण मज़दूरों के सवालों पर प्रदर्शन
    30 Nov 2021
    कार्यक्रम की शुरुआत सुश्रुत ट्रामा सेंटर से मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय की ओर जुलूस निकालकर हुई। दिल्ली पुलिस द्वारा मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय तक का रास्ता बंद किये जाने के चलते सड़क पर ही सभा की गई।
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    नीति आयोग की MPI रिपोर्ट, निर्माण मज़दूरों की हड़ताल और अन्य ख़बरें
    30 Nov 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी नीति आयोग की ग़रीबी पर रिपोर्ट, निर्माण मज़दूरों की हड़ताल और अन्य ख़बरों पर।
  • Protest
    मुकुंद झा
    दिल्ली: बैंक कर्मचारियों के 'बैंक बचाओ, देश बचाओ' अभियान को ट्रेड यूनियनों, किसान संगठन का मिला समर्थन  
    30 Nov 2021
    बैंक कर्मियों की भारत यात्रा मंगलवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर समाप्त हुई। जिसमें सरकार को चेताया गया कि अगर सरकार ने अपने निजीकरण के निर्णय को वापस नहीं लिया तो आंदोलन और तेज़ होगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License