NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
कोरोना संकट: प्रवासी मज़दूरों का कोई देस नहीं है महाराज!
प्रवासी मज़दूरों के लिए चली श्रमिक एक्सप्रेस में सोमवार के दिन भूख और प्यास से 7 लोगों की मौत हो गई। अपमान, बेबसी, भूख से मौत की जो तस्वीर पिछले दो महीने से प्रवासी मज़दूरों की हालात दिखा रही हैं, उससे लगता है कि सरकार और समाज के आंखों का पानी मर गया है। इस कठिन घड़ी में सुनहरे सपने बेचने वाली सरकार को शायद अभी मनुष्यता का पाठ भी ठीक से पढ़ना बाकी है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
26 May 2020
प्रवासी मज़दूर
Image courtesy: National Herald

दिल्ली: रविवार को एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सफर कर रहे साजिद नबी नाम के एक व्यक्ति ने अपनी समस्या बयां करने के लिये रेल मंत्री पीयूष गोयल को टैग कर ट्वीट किया, ‘हम चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन से उधमपुर जा रहे हैं...और सचमुच में हम भूखे हैं। हमें कहा गया था कि हमें इटारसी में भोजन दिया जाएगा, लेकिन हमारे भाग्य और प्रशासन की बदौलत, हमें कुछ नहीं मिला।’

इसके एक घंटे के अंदर उसने फिर से ट्वीट कर कहा कि 26 घंटों से महिलाएं और बच्चे भूखे हैं। ट्विटर पर पोस्ट कर गुहार लगाने के बाद भी उसे इटारसी और भोपाल में भोजन नहीं मिला और वह झांसी में यह मिलने की उम्मीद कर रहा है। यह ट्रेन चेन्नई से 23 मई को शाम साढ़े पांच बजे चली थी और यह अभी तक गंतव्य पर पहुंची इसकी कोई सूचना नहीं मिली है।

तमिलनाडु से बिहार के लिये रवाना हुई एक अन्य ट्रेन को समस्तीपुर पहुंचने में 68 घंटे का वक्त लगा और इसमें सवार श्रमिक एवं छात्रों ने दावा किया कि उन्हें रेलवे की ओर से भोजन और पानी नहीं मिला।

अख़बार दैनिक भास्कर के मुताबिक प्रवासियों को उनके जिलों तक छोड़ने के लिए रेलवे की श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का कोई माई-बाप नहीं है। ट्रेनें रास्ता भटक रही हैं और कहीं की कहीं पहुंच रही हैं। नतीजा है कि कोरोना की कौन कहे भूख, प्यास, गर्मी से कई लोगों ने दम तोड़ दिया। 16 मई को गुजरात के सूरत से सीवान के लिए चली ट्रेन 25 मई को पहुंची है।

अख़बार के मुताबिक इस तरह की श्रमिक ट्रेनों में अब तक भूख और प्यास से एक दिन में 7 मौतें हो चुकी हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि राजकोट-भागलपुर श्रमिक स्पेशल ट्रेन से गया में सोमवार को 8 माह के बच्चे के शव को उतारा गया। परिवार मुम्बई से सीतामढ़ी जा रहा था। आगरा में बच्चे का इलाज हुआ। बच्चे की कानपुर के पास मौत हो गई। परिवार ने कानपुर से गया तक बच्चे की लाश के साथ सफर किया।

गौरतलब है कि अपमान, बेबसी, भूख से मौत की जो तस्वीर पिछले दो महीने से प्रवासी मज़दूरों की हालात दिखा रही है, उससे लगता है कि सरकार और समाज के आंखों का पानी मर गया है। इस कठिन घड़ी में सुनहरे सपने बेचने वाली सरकार को शायद अभी मनुष्यता का पाठ भी ठीक से पढ़ना बाकी है।

आपको बता दें कि प्रवासी मज़दूरों के बीच जान बचाने और अपने घरों को लौट जाने की देशव्यापी दहशत के बीच सरकारों की मशीनरी बिल्कुल नदारद दिख रही है।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है यानी 25 मार्च 2020 से लेकर 20 मई तक रोज औसतन चार मज़दूरों की मौत हो रही है। गौरतलब है कि लॉकडाउन की घोषणा इसलिए की गई थी ताकि कोरोना वायरस के कम्युनिटी ट्रांसमिशन को रोका जा सके। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार लॉकडाउन के बाद सड़क हादसों और सेहत बिगड़ जाने से 20 मई तक कुल 208 मज़दूरों की मौत हो चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स से पता चला है कि लॉकडाउन के बाद से 42 सड़क हादसे, 32 मेडिकल इमर्जेंसी और पांच ट्रेन हादसे हुए हैं जिनमें सैकड़ों मज़दूरों की जान गई। ये आंकड़े वो हैं जो रिपोर्ट किए गए हैं। इसके अलावा पता नहीं कितने ऐसे मामले होंगे जो रिपोर्ट ही नहीं हो पाए हैं।

अब इस तस्वीर के दूसरे पहलू यानी सरकार की तैयारियों पर विचार करते हैं। पिछले दो महीनों के दौरान प्रवासी मज़दूरों को लेकर सरकारी मशीनरी पूरी तरह निर्लज्ज दिखी है। केंद्र और राज्यों की सरकारें सिर्फ घोषणाएं कर रही हैं जबकि इन घोषणाओं की जमीनी स्थिति बिल्कुल अलहदा है।

हालांकि टीवी चैनलों और सोशल मीडिया के जरिए वो इसका प्रोपेगेंडा बेहतर तरीके से कर रही हैं। दुखद यह है कि हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग इन घोषणाओं को ही वास्तविकता मान ले रहा है। उसे इतना भी समझ नहीं आ रहा है कि अगर घोषणाओं से ही मज़दूरों की स्थिति में बदलाव आ जाता तो वह आराम से अपने घर में बैठकर भोजन कर रहा होता। सड़कों पर, ट्रेनों में, पैदल चलते हुए वह मौत को गले नहीं लगा रहा होता।

दूसरी बात इन मज़दूरों के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग सरकारी महकमें द्वारा किया जा रहा है वह भी बेहद तकलीफदेह और सरोकारों से दूर है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। साइकिल पर अपने बीमार पिता को बैठाकर गुरुग्राम से बिहार के दरभंगा तक की 1200 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली 15 साल की ज्योति कुमार पासवान को लेकर केंद्रीय मंत्रियों और सत्ताधारी दल के नेताओं के बयान और ट्वीट असंवेदनशीलता का प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं।

वह इस पर बात नहीं कर रहे हैं कि ज्योति इस स्थिति के लिए क्यों मजबूर हुई। इसके बजाय वह उसे भारतीय साइकिल महासंघ से ट्रायल का प्रस्ताव प्रोपेगेट कर रहे हैं। जब वह साइकिल से घर वापस लौट रही थी तो कई भी सरकार उनकी पीठ पर हाथ रखने नहीं पहुंची है।

वैसे भी प्रवासी मज़दूरों की समस्या का अंत सिर्फ घर पहुंच जाने से ही नहीं हो रहा है। गांव पहुंचे इन मज़दूरों को भोजन, पानी की समस्या के साथ ही मजदूरी की तलाश में भटकना होगा। दरअसल अगर गांवों में उनके लिए बेहतर माहौल होते तो वह इसे छोड़ने के लिए मजबूर नहीं होते। कोरोना के बाद से इन प्रवासी मज़दूरों के लिए गावों में स्थितियां और भी बदतर हो गई है। अब इन्हें गांवों के कमाऊ पूत को शहर से बीमारी लाने वाले लोगों में गिना जा रहा है। यानी उनका अपना देस भी अब बेगाना हो गया है।

दरअसल ये प्रवासी मज़दूर वही लोग हैं जिन्होंने सपना देखा और उन्हें सच करने के लिए पलायन का विकल्प चुना था। उन्हें अपनी काबिलियत, अपनी ऊर्जा, अपने हुनर पर भरोसा था। उन्होंने गांवों की अपनी जिंदगी को छोड़कर उन्होंने शहरों की बेतरतीब जिंदगी को सिर्फ इसलिए चुना था कि वह अपने देश और समाज के साथ अपने गांव-परिवार की ज़िंदगी कुछ बेहतर बना सकेंगे। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि शहरों ने उन्हें अपनाया नहीं। वहां के समाज ने सिर्फ इनके हुनर का इस्तेमाल किया और मुसीबत पड़ते ही दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल दिया है।

और इतने दिनों बाद गांव में भी उन्हें अपनापन नहीं मिल पा रहा है। वह भी उनसे बेगानों की तरह व्यवहार कर रहा है। ऐसे में उन्हें अपने अधूरे सपने, अधूरी ऊर्जा के साथ एक बार फिर उन्हें पूरा संघर्ष करना होगा। क्योंकि प्रवासी मज़दूरों का अपना कोई देस नहीं है महाराज!

Lockdown
Migrant workers
Special Train
indian railways
Late Trains

Related Stories

कर्नाटक: मलूर में दो-तरफा पलायन बन रही है मज़दूरों की बेबसी की वजह

हैदराबाद: कबाड़ गोदाम में आग लगने से बिहार के 11 प्रवासी मज़दूरों की दर्दनाक मौत

यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

पश्चिम बंगाल में मनरेगा का क्रियान्वयन खराब, केंद्र के रवैये पर भी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाए सवाल

मौत के आंकड़े बताते हैं किसान आंदोलन बड़े किसानों का नहीं है - अर्थशास्त्री लखविंदर सिंह

महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या

रेलवे के निजीकरण के ख़िलाफ़ रेल कर्मियों का राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन कल!

कोलकाता मेट्रो ने 2500 से अधिक अस्थायी कर्मचारियों की छंटनी की

सीटू ने बंगाल में प्रवासी श्रमिकों की यूनियन बनाने की पहल की 


बाकी खबरें

  • punjab
    भाषा सिंह
    पंजाब चुनावः परदे के पीछे के खेल पर चर्चा
    19 Feb 2022
    पंजाब में जिस तरह से चुनावी लड़ाई फंसी है वह अपने-आप में कई ज़ाहिर और गुप्त समझौतों की आशंका को बलवती कर रही है। पंजाब विधानसभा चुनावों में इतने दांव चले जाएंगे, इसका अंदाजा—कॉरपोरेट मीडिया घरानों…
  • Biden and Boris
    जॉन पिलगर
    युद्ध के प्रचारक क्यों बनते रहे हैं पश्चिमी लोकतांत्रिक देश?
    19 Feb 2022
    हाल के हफ्तों और महीनों में युद्ध उन्माद का ज्वार जिस तरह से उठा है वह इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है
  • youth
    असद रिज़वी
    भाजपा से क्यों नाराज़ हैं छात्र-नौजवान? क्या चाहते हैं उत्तर प्रदेश के युवा
    19 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के नौजवान संगठनों का कहना है कि भाजपा ने उनसे नौकरियों के वादे पर वोट लिया और सरकार बनने के बाद, उनको रोज़गार का सवाल करने पर लाठियों से मारा गया। 
  • Bahubali in UP politics
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: सियासी दलों के लिए क्यों ज़रूरी हो गए हैं बाहुबली और माफ़िया?
    19 Feb 2022
    चुनाव में माफ़िया और बाहुबलियों की अहमियत इसलिए ज्यादा होती है कि वो वोट देने और वोट न देने,  दोनों चीज़ों के लिए पैसा बंटवाते हैं। इनका सीधा सा फंडा होता है कि आप घर पर ही उनसे पैसे ले लीजिए और…
  • Lingering Colonial Legacies
    क्लेयर रॉथ
    साम्राज्यवादी विरासत अब भी मौजूद: त्वचा के अध्ययन का श्वेतवादी चरित्र बरकरार
    19 Feb 2022
    त्वचा रोग विज्ञान की किताबों में नस्लीय प्रतिनिधित्व की ऐतिहासिक कमी ना केवल श्वेत बहुल देशों में है, बल्कि यह पूरी दुनिया में मौजूद है
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License