NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
भारत
राजनीति
कोरोना संकट: रहना नहिं देस बिराना है!
ज़ाहिर है देश में कोरोना से लड़ने की रणनीति विफल रही। सच बात तो यह है कि भारत के कर्णधार न लोकतांत्रिक पूंजीवादी देशों की सरकारों से कुछ सबक़ ले पाए न जनवादी गणतंत्र देशों की सरकारों से।
शंभूनाथ शुक्ल
23 Apr 2021
कोरोना संकट: रहना नहिं देस बिराना है!
Image courtesy : The Hindu

प्रधानमंत्री देश के नाम अपने संबोधन में अब लॉकडाउन को राज्यों की ज़िम्मेदारी बता रहे हैं। जिस काम को उन्हें बहुत पहले करना था, वह वे आज कर रहे हैं। पिछले साल 22 मार्च को उनका सम्बोधन आप लोगों ने देखा-सुना होगा तो क्या आपने गौर किया कि तीन दिन पहले 20 अप्रैल को हुए सम्बोधन के दौरान उनका चेहरा-मोहरा पहले से कितना बदल चुका था। इस बार उनके चेहरे पर कोविड से मुक़ाबला न कर पाने की नाकामी साफ़ झलक रही थी। और बिना कोई ख़ास घोषणा किये, बस इतना कह कर चले गए कि जो राज्य चाहें, अपने यहाँ लॉकडाउन कर लें। लेकिन अगर वे यह काम पिछले वर्ष करते तो न अफ़रा-तफ़री फैलती न लाखों प्रवासी मज़दूरों को भटकना पड़ता। ज़ाहिर है देश में कोरोना से लड़ने की रणनीति विफल रही। अब जब कोरोना संक्रमण के फैलने की गति दुनिया भर में सबसे अधिक भारत में है तो तत्काल ऐसे कदम उठाए जाने चाहिए, ताकि यह रफ़्तार रुके। क्योंकि आदमी की ज़ान बचाना सरकार का सबसे बड़ा दायित्त्व होता है।

देश में कोरोना की ताज़ा लहर पहले वाली लहर से बहुत अधिक है। हालात ये हैं कि विश्व के अधिकांश देशों ने भारत से आवा-जाही पर रोक लगा दी है। जिस कोरोना पर क़ाबू पाने के लिए सरकार अपनी पीठ थपथपा रही थी, वह सारा दम्भ बिखर गया है। स्थिति यह है कि अस्पतालों में कोई व्यवस्था नहीं बची। डॉक्टर और पैरा मेडिकल स्टाफ़ भयाक्रांत हैं। आक्सीजन नहीं है, बेड नहीं, रेमडेसिविर के इंजेक्शन नहीं हैं। ऐसे में आम जनता का ग़ुस्सा डॉक्टरों पर उतरता है। इसलिए वे ड्यूटी करने से घबरा रहे हैं। ऐसी स्थिति किसी भी और देश की नहीं हुई, क्योंकि वहाँ की सरकारों ने अपनी जनता का भरोसा पाया। यह भरोसा तो वाइस-वरसा है यानी अन्योन्याश्रित। सरकार यदि भरोसे वाले काम करती तो लोग उस पर भरोसा करते लेकिन जब लोगों को लगे कि इस सरकार का सारा ज़ोर आपदा में अवसर तलाशने का है तो कौन उस पर भरोसा करे?

सच बात तो यह है कि पहले दिन से ही कोविड से लड़ने के लिए कोई फ़ुल-प्रूफ़ योजना नहीं बनी। जबकि डब्लूएचओ ने बहुत पहले चेता दिया था। सरकार यह सोचती रही कि यहाँ तो ग़रीबी की वजह से लोगों में स्वास्थ्य को लेकर कोई चेतना नहीं है। वे किसी अस्पताल में जाने की बजाय मर जाना पसंद करते हैं। ऐसे लोगों में रोग से लड़ने की क्षमता भी संपन्न देशों से बेहतर होती है। इसलिए कोरोना ख़ुद ही भारत से भाग जाएगा या उसकी मारक क्षमता बहुत कम हो जाएगी। इसलिए कोरोना के प्रति एक लापरवाही-सी रही।

केंद्र सरकार ने सब कुछ अपने हाथ में रखा। जबकि स्वास्थ्य राज्यों का विषय है। अगर राज्य अपने-अपने हिसाब से लड़ते तो बेहतर रहता। जिन-जिन इलाक़ों में कोरोना का प्रकोप अधिक होता, वहाँ लॉकडाउन। बाक़ी जगह सामान्य आवा-जाही, बस भीड़-भाड़ और मेलों-ठेलों पर लगाम रखते। मगर पिछले साल 25 मार्च से जिस तरह का लॉकडाउन लगाया गया था, उसे कोई भी बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कह सकता। इसी तरह दिल्ली में वहाँ के मुख्यमंत्री ने इस साल 19 अप्रैल की रात से 26 तक की सुबह तक का जैसा लॉकडाउन लगाया, वह भी हड़बड़ी फैलाने वाला है। इस तरह के फ़ैसलों से हड़कंप मचता है। हर आदमी घबराता है, कि भविष्य में पता नहीं क्या हो? ख़ासकर दिहाड़ी के मज़दूर। उनके पास न तो कोई जमा-पूँजी होती है न नियमित काम मिलने की गारंटी। वे घबरा कर गाँवों की तरफ़ चल देते हैं। और संक्रमण भी उनके साथ चल देता है। आपदा के समय केंद्र सरकार यदि सभी राज्य सरकारों और विपक्षी दलों के साथ बैठती और सब मिल कर रणनीति बनाते तो शायद हम इससे उबर भी जाते। लेकिन सरकार के पास बस एक ही एक्सक्यूज है कि भारत की आबादी बहुत ज़्यादा है इसलिए कोरोना पर नियंत्रण यहाँ मुश्किल है। यह तो अजीब बात है। अस्पतालों की कमी तो आबादी का रोना, आक्सीजन नहीं है तो आबादी का रोना और बदइंतज़ामी है तो इसकी ज़िम्मेदार भी बढ़ती आबादी।

चीन का उदाहरण सामने रख कर सोचना चाहिए। वहाँ की आबादी हमसे अधिक है, किंतु उन्होंने तो क़ाबू पा लिया। हमें पड़ोसी देशों से ख़ुद को श्रेष्ठ दिखाने की बजाय उनकी रणनीति को समझना था। सत्य यह है कि चीन को भले लोग एक व्यक्ति और एक पार्टी की तानाशाही वाला देश कहें किंतु कोरोना से युद्ध में उसने शुरू से विकेंद्रीकरण का लक्ष्य रखा। वुहान में उसने कोरोना का प्रकोप ख़त्म करने के लिए एकदम माइक्रो लेबल पर जाकर जन-भागीदारी को मज़बूत किया। हर मोहल्ले में रेज़िडेंट्स वेलफ़ेयर एसोशिएसंस को अधिकार दिए, कि उनके मोहल्ले की ज़िम्मेदारी उनकी है। आवाजाही पर प्रतिबंध लगाएँ, ज़रूरतमंदों तक मदद पहुँचाएँ और संक्रमित लोगों को घर पर रह कर ही दवाएँ लेने को कहें। कोई हबड़-तबड़ नहीं, कोई घबराहट नहीं। अस्पतालों में अनावश्यक भीड़-भाड़ नहीं। और इस तरह से उन्होंने वुहान से कोरोना भगा दिया। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य शहरों में भी उन्होंने यही रणनीति अपनाई। यह एक तरह से सरकार को ज़मीनी स्तर पर ले जाना था। इसके विपरीत भारत में सब कुछ केंद्र सरकार ने अपने हाथ में रखा। मदद, रसद और सप्लाई चेन में। एक लोकतांत्रिक देश में इस तरह का केंद्रीकरण चीजों को बिगाड़ेगा ही। और वही हुआ, जिसकी आशंका थी। इसीलिए अब प्रधानमंत्री सब कुछ राज्यों के मत्थे मढ़ रहे हैं। यहाँ तक कि एक मई से कोरोना की वैक्सीन लेने की ज़िम्मेदारी भी अब राज्यों की होगी। यह तो एक तरह का भेदभाव हुआ। प्रधानमंत्री को यह भी तो बताना चाहिए, कि पीएम केयर फंड, डब्लूएचओ आदि से जो मदद आई, उसमें से किस राज्य को कितना दिया गया। ऐसे बहुत सारे प्रश्न हैं जो अनुत्तरित हैं।

कहने को तो इस देश में त्रि-स्तरीय शासन प्रणाली है। केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय। तीनों के काम भी बँटे हैं, मगर न केंद्र राज्य को पूरे अधिकार देता है न राज्य स्थानीय निकायों को। नतीजा यह होता है कि सब बस लूट-खसोट में व्यस्त रहते हैं। सच यह है, कि देश में आज़ादी के बाद जब यह व्यवस्था बनायी गई थी, तब तीनों अपने-अपने काम में मुस्तैद थे। शिक्षा, स्वास्थ्य और लोक प्रशासन में तीनों की अहम भूमिका थी। लेकिन आज शहरी स्थानीय स्तर पर नगर प्रमुख से लेकर पार्षद तक और गाँवों में ज़िला पंचायत अध्यक्ष से लेकर ग्राम प्रधान तक कोई भी यह नहीं बता पाएगा कि शिक्षा और स्वास्थ्य की देखभाल में उनके दायित्त्व क्या हैं। अलबत्ता उनको हिस्सा मिल जाता है। यही हाल मुख्यमंत्रियों और विधायकों का है। क्योंकि इस व्यवस्था को पंगु कर दिया गया है। अगर ज़िला अस्पताल, कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर काम कर रहे होते तो आज की यह मारामारी देखने को नहीं मिलती। सच बात तो यह है कि भारत के कर्णधार न लोकतांत्रिक पूँजीवादी देशों की सरकारों से कुछ सबक़ ले पाए न जनवादी गणतंत्र देशों की सरकारों से।

दरअसल आपदा में अवसर तलाशने की जब नीयत हो जाए तो हर राजनीतिक दल सत्तारूढ़ दल के प्रति शंकालु हो जाता है। अब प्रधानमंत्री भले लॉकडाउन पॉलिसी और कोविड वैक्सीन को लेकर राज्यों को स्वतंत्रता दें, किंतु कोई भी सरकार यह नहीं मान रही कि प्रधानमंत्री पूरी ईमानदारी से इन नीतियों पर अमल करेंगे। इसीलिए जिन-जिन प्रदेशों में ग़ैर भाजपाई सरकारें हैं, वहाँ के मुख्यमंत्री इस सशोपंज में हैं कि वे कोरोना वैक्सीन कैसे लें। कोविशील्ड के निर्माताओं ने क़ीमत बढ़ा दी है और कह दिया है कि पुरानी क़ीमत का करार तो सिर्फ़ दस करोड़ वैक्सीन के लिए था। अब जब 18 साल से ऊपर के लोगों को टीका लगाने का नम्बर आया, केंद्र ने ख़रीदी से हाथ खींच लिए। राज्यों के पास संसाधन कम हैं, ऊपर से केंद्र सरकार के पास जीएसटी से जो पैसा आता है, उसका शेयर उनको नहीं मिल रहा। ऐसे में वे कैसे निपटेंगे। इसीलिए कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पत्र लिख कर प्रधानमंत्री से कहा है कि इस संकट काल में इस तरह का भेदभावपूर्ण व्यवहार न करें। अभी तक तो केंद्र ने स्वयं पहल कर टीका मुफ़्त लगवाया और जब पूरे देश के आम लोगों का नम्बर आया तो हाथ पीछे खींच ले। सरकार इस समय राजनीति न खेले।

राजनेताओं के ऐसे आचरण देख कर लगता है कि अब तो यह देश रहने लायक़ नहीं बचा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Coronavirus
COVID-19
Corona Crisis
Narendra modi
Lockdown
State Government

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा


बाकी खबरें

  • prashant kishor
    अनिल सिन्हा
    नज़रिया: प्रशांत किशोर; कांग्रेस और लोकतंत्र के सफ़ाए की रणनीति!
    04 Dec 2021
    ग़ौर से देखेंगे तो किशोर भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ने में लगे हैं। वह देश को कारपोरेट लोकतंत्र में बदलना चाहते हैं और संसदीय लोकतंत्र की जगह टेक्नोक्रेट संचालित लोकतंत्र स्थापित करना चाहते हैं…
  • All five accused arrested in the murder case
    भाषा
    माकपा के स्थानीय नेता की हत्या के मामले में सभी पांच आरोपी गिरफ्तार
    04 Dec 2021
    घटना पर माकपा प्रदेश सचिवालय ने एक बयान जारी कर आरएसएस को हत्या का जिम्मेदार बताया है और मामले की गहराई से जांच करने की मांग की है.पुलिस के अनुसार, घटना बृहस्पतिवार रात साढ़े आठ बजे हुई थी और संदीप…
  • kisan andolan
    लाल बहादुर सिंह
    MSP की कानूनी गारंटी ही यूपी के किसानों के लिए ठोस उपलब्धि हो सकती है
    04 Dec 2021
    पंजाब-हरियाणा के बाहर के, विशेषकर UP के किसानों और उनके नेताओं की स्थिति वस्तुगत रूप से भिन्न है। MSP की कानूनी गारंटी ही उनके लिए इस आंदोलन की एक ठोस उपलब्धि हो सकती है, जो अभी अधर में है। इसलिए वे…
  • covid
    भाषा
    कोरोना अपडेट: देशभर में 8,603 नए मामले सामने आए, उपचाराधीन मरीजों की संख्या एक लाख से कम हुई
    04 Dec 2021
    देश में कोविड-19 के 8,603 नए मामले सामने आए हैं, जिसके बाद कुल संक्रमितों की संख्या बढ़कर 3,46,24,360 हो गई है।  
  • uttarkhand
    सत्यम कुमार
    देहरादून: प्रधानमंत्री के स्वागत में, आमरण अनशन पर बैठे बेरोज़गारों को पुलिस ने जबरन उठाया
    04 Dec 2021
    4 दिसंबर 2021 को उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी देहरादून में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आ रहे हैं। लेकिन इससे पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत के लिए आमरण अनशन पर बैठे बेरोजगार युवाओं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License