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भारत
राजनीति
देश की फ़िज़ा में ज़हर घोल रहा है कारपोरेट मीडिया
यदि पिछले तीन दशकों के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है देश में सांप्रदायिक उन्माद उसी दौरान बढ़ा है, जब कथित आर्थिक सुधार के नाम पर देश की संपत्तियों को पूंजीपतियों के हाथों में बेचा गया है और मज़दूर विरोधी क़ानून बनाए गए हैं। वैसे चुनावी ज़रूरतों लिहाज़ से भी सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश की जाती है।
अफ़ज़ल इमाम
14 Aug 2020
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कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी की मौत के बाद टीवी चैनलों पर होने वाली बहसों की गरिमा को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इस दुःखद घटना के लिए के भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा, संघ विचारक संगीत रागी और टीवी एंकर को जिम्मेदार बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग न्यूज़ ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) को आत्ममंथन करने और गलती सुधारने की सलाह दे रहे हैं। कांग्रेस प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने केंद्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर पत्र लिख कर टीवी पर जहरीली और विभाजनकारी बहसों को नियंत्रित करने के लिए एडवाजरी जारी करने की मांग की है।

सवाल उठता है कि क्या मसला सिर्फ इतना सा ही है? या इसके पीछे कोई गहरा और खौफनाक षडयंत्र है? 

ध्यान रहे कि आमतौर पर टीवी पर बहसों के लिए वही विषय चुने जाते हैं, जिनसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिन्दू बनाम मुसलमान का मुद्दा बने। जनसंख्या नियंत्रण, पाकिस्तान और आतंकवाद का विषय होता है तो उसमें भी मुसलमानों को ही खींचा जाता है। बीच-बीच में दर्शकों का टेस्ट बदलने के लिए सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या जैसी खबरों को भी राष्ट्रीय व जनहित का विषय़ बना दिया जाता है। इस तरह की खबरों के जरिए भी एक तीर से कई निशाने साधे जाते हैं। एक तो जनता का ध्यान बंटा रहता है दूसरे राजनीतिक व कारपोरेट एजेंडा भी चल जाता है। कुछ चैनलों की तो रिपोर्टिंग में भी जहर भरा हुआ होता है, जिसे हाल ही में हुए सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन और उसके बाद तबलीगी जमात प्रकरण से समझा जा सकता है।

वर्ष 2014 के पहले भी यह काम होता था, लेकिन भाषा इतनी गंदी नहीं होती थी, लेकिन अब तो सीधे गाली-गलौज व निजी हमलों से बात शुरू होती है और उसी खत्म हो जाती है। इतना ही नहीं बहस के लिए कुछ ऐसे “ख़ास” मुसलमानों को भी पकड़ लाया जाता है, जो स्क्रिप्ट के मुताबिक ऐसी भाषा बोलते हैं, जिससे हिन्दुओं को बुरा लगे। इसके बाद भाजपा का प्रवक्ता या राजनीतिक विश्लेषक के रूप बैठा हुआ दूसरा व्यक्ति पूरी उत्तेजना के साथ उस पर टूट पड़ता है और वह मुसलमानों, यहां तक की कुरान और शरीयत के बारें में अनाप-शनाप बातें बोलता है। इस दौरान वह कथित मुस्लिम स्कॉलर शांत बैठा रहता है। कभी-कभी जो काम भाजपा के प्रवक्ता नहीं कर पाते हैं, वह यह कथित मुस्लिम स्कॉलर कर देता है।

यदि बीच में विपक्षी पार्टी के किसी प्रवक्ता ने बोलने की कोशिश की तो उसकी आवाज को कम कर दी जाती है। अक्सर भाजपा का प्रवक्ता ही एंकर को हुक्म देता है कि इसकी आवाज़ को बंद करो। संबित पात्रा और गौरव भाटिया अक्सर यह काम करते हैं। यदि विपक्षी प्रवक्ता ने कोई मजबूत तर्क दे दिया या गंभीर सवाल पूछ लिय़ा तो एंकर कमर्शियल ब्रेक पर जाने के बात कह देता है। दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिमों के करीब 8-10 चेहरे हैं, जो अलग-अलग चैनलों पर मुस्लिम स्कॉलर या मुस्लिम मामलों के जानकार के रूप में कई वर्षों से नजर आ रहे हैं। वे अपने घर पर चाहे जिस तरह रहते हों, नमाज पढ़ते हों या नहीं, लेकिन टीवी पर पूरे मौलाना वाले कास्ट्यूम के साथ नजर आते हैं। कुछ नहीं तो कम से कम जाली वाली टोपी तो सिर पर जरूर लगा लेते हैं। बहस खत्म होने के बाद भी उस प्रोग्राम को रात में कई बार रिपीट किया जाता है। साथ ही उसका फुटेज टीवी चैनल की वेबसाइट और सोशल मीडिया पर भी डाल दिया जाता है, जिससे इसकी पहुंच अधिक से अधिक लोगों तक हो जाए। मकसद यह होता है कि आम जनता इन्हीं गैरजरूरी मुद्दों में उलझी रहे और उसका ध्यान अपने मूलभूत सवालों की तरफ न जाए।

यदि पिछले तीन दशकों के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है देश में सांप्रदायिक उन्माद उसी दौरान बढ़ा है, जब कथित आर्थिक सुधार के नाम पर देश की संपत्तियों को पूंजीपतियों के हाथों में बेचा गया है और मजदूर विरोधी कानून बनाए गए हैं। वैसे चुनावी जरूरतों लिहाज से भी सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश की जाती है। नरसिम्हा राव के समय भी जब उदारीकरण हो रहा था और पीएसयू बेचने की तैयारी हो रही थी, तो देश में संप्रादायिकता उफान पर थी। सन् 1991 और 1992 में मीडिया की जो भूमिका थी, उसका रिकार्ड आज भी मौजूद है। तब से लेकर अब तक यह सिलसिला जारी है। मौजूदा सरकार रेलवे, एयर इंडिया, नवरत्न कंपनियों समेत 23 पीएसयू में विनिवेश की तैयारी कर चुकी है।

सवाल उठता है कि देश की संपत्तियों के बिकने से टीवी पर होने वाली जहरीली व जानलेवा बहसों व गैरजरूरी खबरों का क्या रिश्ता है? दरअसल देश के मीडिय़ा के 90 फीसदी हिस्से पर उन्हीं कारपोरेट घरानों का कब्जा हो चुका है, जो देश के संसाधनों की लूट में शामिल हैं। कई सारे टीवी चैनल्स और अखबार न सिर्फ इन कारपोरेट घरानों के मोटा मुनाफा कमाने वाले उद्योग हैं, बल्कि वे देश में राजनीतिक व सामाजिक ‘नरेटिव’ तय का माध्यम भी हैं। कारपोरेट घरानों को अधिनायकवाद और सांप्रदायिकता सूट करती है। सामाजिक क्षेत्र के लिए काम करने और किसानों व गरीब जनता को सब्सिडी देने वाली सरकारें इन्हें बुरी लगती है। इनका मकसद सिर्फ भारत के जल, जंगल, जमीन पर कब्जा कर उनका दोहन करना और मोटा मुनाफा कमाना है। यही कारण है कि टीवी पर बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा व स्वास्थ्य के बाजारीकरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) आदि के बारे में न ज्यादा खबरें आती हैं और न ही इन मुद्दों पर बहस होती है।

वर्तमान में हालत यह है कि कोई भी यह सवाल नहीं पूछने वाला नहीं है कि कोरोना काल में छाई इस मंदी में भी देश में सिर्फ 4-5 लोगों की दौलत क्यों बढ़ती जा रही है? और 15 करोड़ आम देशवासी, जो बेरोजगार हो गए हैं उनका क्या होगा ? स्थिति यह है कि लोग ईपीएफ से अपना पैसा निकाल कर काम चला रहे हैं। कहने का अर्थ यह कि वर्तमान में देश की फिज़ाओं में जो जहर घुल रहा है, उसकी बड़ी वजह कारपोरेट घरानों की लालच है और उनके स्वामित्व वाला मीडिया है। जाहिर है कि यह काम कारपोरेट अकेले नहीं कर सकता है। इसे खाद-पानी तो सियासत से मिल रहा है। जिसे इन चंद जुमलों से समझा जा सकता है ‘मुसलमानों को न पुरस्कृत करें, न तिरस्कृत करें, बल्कि उन्हें परिष्कृत करें।’,  ‘...ये कौन हैं, उनके कपड़ों से ही पता चल जाता है।’ और ‘यह संयोग नहीं प्रयोग है...।’  अब तो गोस्वामी तुलसीदास जी का दोहा ‘भय बिनु होई न प्रीति…’ को राजनीतिक हथियार के रूप में पेश किया जा रहा है।

तुलसीदास जी ने तो यह दोहा भगवान राम की महिमा का बखान करते हुए लिखा था, जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने शायद पाकिस्तान और चीन को ध्यान में रखते हुए इसका जिक्र किया है, लेकिन भाजपा के कुछ प्रवक्ता और टीवी के एंकर इसे घरेलू सियासत से जोड़ कर अमल में लाने का प्रयास कर रहे हैं। इसमें कारपोरेट का भी फायदा है, क्योंकि जब तक आदिवासी डरेंगे नहीं तो पहाड़ों की खुदाई और जंगलों की कटाई कैसे हो पाएगी? 

बताया जाता है कि जब राजीव त्यागी को दिल का दौरा पड़ा तो उस समय वे अपने घर से ही एक चैनल पर ऑनलाइन बहस में शामिल थे। चर्चा बेंगलुरू हिंसा पर थी, जो सामान्य रूप से शहर के एक थाना क्षेत्र में कानून व्यवस्था का मामला था। इसमें संबित पात्रा और टीवी एंकर दोनों ने मुसलमानों पर कटाक्ष किया ‘ अभी डरे हुए नहीं हैं तो ये हाल है, जब निडर हो जाएंगे तो क्या हाल होगा...’ यानी वे यह कहना चाहते थे कि इनके लिए भी ‘भय बिनु होई न प्रीति... की नीति को अपनाना होगा! हद तो यह है कि एक तरफ राजीव का दम टूट रहा था और दूसरी तरफ पूरी बेशर्मी के साथ वह टीवी एंकर अपने डॉयलाग को ट्वीट कर रहा था। बहस के दौरान राजीव पर भद्दी व आपत्तिजनक टिप्पणियां की जा रही थीं और उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा था। वे एक भले इंसान, सच्चे आस्थावान हिन्दू और महात्मा गांधी को मानने वाले थे। उन्हें जयचंद कहा गया और टिप्पणी की गई कि माथे पर टीका लगाने से कोई हिन्दू नहीं हो जाता है, टीका लगाना है तो दिल पर लगाओ और कहो कि किसने घर जलाया है? ठीक इसी समय उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे कुर्सी से गिर गए। बकौल उनकी पत्नी के उन्होंने अपने अंतिम समय पर सिर्फ इतना कहा ‘इन लोगों ने मुझे मार डाला…।’       

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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