NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
दादरी से पालघर: रक्तपिपासु भीड़ का ‘ह्यूबरिस सिंड्रोम’ कनेक्शन!  
“राजनीति और कॉरपोरेट दुनिया के कुछ ताकतवर लोगों में एक कॉमन सिंड्रोम पाया जाता है, जिसे “ह्यूबरिस सिंड्रोम” कहते है। ह्यूबरिस एक ग्रीक शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, “मूर्खतापूर्ण गर्व या ख़तरनाक अतिआत्मविश्वास।”
शशि शेखर
26 Apr 2020
mob lynching
Image courtesy: New Indian express

पालघर में दो संतों समेत तीन लोगों की हत्या दुखद है। इस कृत्य को सिर्फ एक आपराधिक घटना मान कर छोड़ना ठीक नहीं होगा। क्योंकि ऐसी घटनाएं निश्चित ही किसी उत्प्रेरक विचार से प्रेरित और पोषित होती है। क्या दादरी के अख़लाक़, क्या अलवर के पहलू ख़ान, क्या बुलंदशहर के एसआई सुबोध कुमार और अब पालघर में संतों की हत्या, भीड़ का चरित्र एक है, निशाने पर हर जगह निर्दोष हैं। ये एक ऐसी रक्तपिपासु भीड़ हैं, जिसे सिर्फ एक ऑबजेक्ट चाहिए। वह ऑबजेक्ट किसी भी जाति-धर्म का हो सकता है। तो सवाल उठता है कि आखिर, इस रक्तपिपासु भीड़ का निर्माण होता कैसे है?

ह्यूबरिस सिंड्रोम?

अब मैं अपनी तरफ से कोई उदाहरण दूं, उससे बेहतर है कि पहले ब्रिटिश चिकित्सक और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता डेविड ओवेन को पढा जाए। उन्होंने दुनिया के कुछ शीर्ष नेताओं (यूके, यूएस) के प्राइम मिनिस्टर और प्रेसीडेंट के व्यक्तित्व का अध्ययन किया है। अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि राजनीति और कॉरपोरेट दुनिया के कुछ ताकतवर लोगों में एक कॉमन सिंड्रोम पाया जाता है, जिसे “ह्यूबरिस सिंड्रोम” कहते है। ह्यूबरिस एक ग्रीक शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, “मूर्खतापूर्ण गर्व या ख़तरनाक अतिआत्मविश्वास।” प्राचीन एथेंस में ह्यूबरिस शब्द को “दूसरों को शर्मिन्दा” करने के रूप में पारिभाषित किया गया है। अरस्तू ने ह्यूबरिस शब्द को पारिभाषित करते हुए कहा कि पीड़ित को शर्मिन्दा करने के पीछे वजह ये नहीं है कि उस पीड़ित से किसी को वाकई कोई नुकसान हुआ था या होने वाला था, बल्कि ऐसा काम सिर्फ आत्मखुशी या अत्मसंतोष के लिए किया जाता है। ऐसा कर के पीड़क अपनी सर्वोच्चता साबित करना चाहता है।    

डेविड ओवेन की बात पर फिर लौटते हैं। वे इस सिंड्रोम की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि जिन ताकतवर लोगों में ये सिंड्रोम पाया जाता है, वे ताकत का इस्तेमाल स्वयं के महिमामंडन में करते हैं। ऐसे लोग अपने इमेज को ले कर बहुत कॉशस (सतर्क) होते है। उनमें अत्याधिक आत्मविश्वास होता है, अपने निर्णय को ले कर बहुत ही कांफिडेंट होते है और खुद को मसीहा के तौर पर पेश करते है। ऐसा व्यक्ति अपने अतिआत्मविश्वस की वजह से किसी पॉलिसी के नट-बोल्ट (कमी-बेशी) पर ध्यान नहीं देता और अंतत: वह पॉलिसी बेकार सबित हो जाती है।  इसके कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय उदाहरण देखने को मिल जाएंगे, जहां सरकारी योजनाएं/नीतियां कुछ ही समय बाद जा कर अपने लक्ष्य से भटक जाती हैं। 

इसे भी पढ़ें : हमारे समाज और सिस्टम की हक़ीक़त से रूबरू कराती हैं मॉब लिंचिंग की घटनाएं! 

ट्रंप की ह्यूबरिस और हिंसक समर्थक  

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस वक्त वैश्विक स्तर पर ह्यूबरिस सिंड्रोम के सबसे बेहतरीन उदाहरण माने जाते है। अब उनके इस सिंड्रोम ने अमेरिका में क्या कमाल किया है, इसे द गार्डियन की एक रिपोर्ट से समझा जा सकता है। द गार्डियन ने अगस्त 2019 की अपनी रिपोर्ट “वॉयलेंस इन द नेम ऑफ ट्रंप” में लिखा है कि कैसे ट्रंप समर्थकों ने 2015 से 2019 के बीच 52 ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया है, जहां ट्रंप का विरोध करने वाले लोगों पर खुलेआम हमला हुआ और उनकी जान ले ली गई। ट्रंप ने जिन राजनीतिक या नस्लीय समूह की निंदा की थी, उन पर हमला करते वक्त ये लोग ट्रंप की बेतुकी बयानबाजी को दुहराते हुए ट्रंप के समर्थन में नारे लगाते थे, ट्रंप विरोधी पर हमला करते हुए ट्रंप का समर्थन प्रदर्शित करने वाले कपड़े पहनते थे। आखिर ऐसा क्या हुआ कि अमेरिका में ट्रंप समर्थक इतने हिंसक हो गए?

डेविड ओवेन ने जो ह्यूबरिस सिंड्रोम बताया है, उसका राजनीतिक-सामाजिक विस्तार न हो, ये संभव नहीं है। कोई ताकतवर व्यक्ति कृत्रिम तरीके से निर्मित अपनी मसिहाई छवि के सहारे अपने समर्थन में एक ऐसी भीड़ तैयार कर सकता है, जो उसके मूर्खतापूर्ण गर्वानुभूति और ख़तरनाक अतिआत्मविश्वास पर भरोसा कर ले। जैसा कि ट्रंप ने अमेरिका में किया। उनके चुनावी भाषणों को याद कीजिए, वो कैसे अमेरिका को ग्रेट बनाने के लिए बेतुके वादे कर रहे थे।

भारतीय सन्दर्भ 

पालघर हिंसा के बाद, महाराष्ट्र सरकार ने नफरत न फैलाने की अपील की। लेकिन हुआ क्या? एक नेशनल चैनल का मालिक और स्वघोषित राष्ट्रवादी टीवी एंकर, जो ह्यूबरिस सिंड्रोम से ग्रस्त है, नफरत की आग खुलेआम फैला रहा है। इतना अधिक कि उसके खिलाफ कई राज्यों में 16 एफआईआर तक दर्ज हो जाती है। लेकिन उसे चिंता नहीं कि उसके इस कृत्य से समाज में क्या सन्देश जा रहा है। समाज किस तरह उसके विचार से प्रेरित हो सकता है। क्योंकि आम लोग हमेशा अपने रोल मॉडल्स को सही मानते है और उसका अनुगमन करते हैं।

थोड़ा पीछे जाए तो तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा झारखंड के रामगढ लिंचिंग केस में फास्ट ट्रैक कोर्ट से मौत की सजा पा चुके एक अभियुक्त को माला पहुंचाने पहुंच जाते हैं। या कि दादरी में अख़लाक़ की हत्या के आरोपी की जब जेल में मृत्यु हो जाती है, तो फिर से एक केन्द्रीय मंत्री, महेश शर्मा उसे सम्मान देने उसके गांव पहुंच जाते हैं। हत्यारोपी को तिरंगा में लपेट कर सम्मान दिया जाता है। अब इसे शीर्ष केन्द्रीय मंत्रियों की हिम्मत, ताकत, अतिआत्मविश्वास, झूठा गौरव कहेंगे या चुनावी (वोट की) मजबूरी? शायद दोनों। लेकिन, ऐसे मूर्खतापूर्ण गौरव और ख़तरनाक अतिआत्मविश्वास से जो सन्देश निकला, वो देश के आमलोगों के बीच एक गहरा सन्देश दे गया। ये कि पीड़ित को पीडा पहुंचाना सही था, इससे एक खास समूह की सर्वोच्चता स्थापित होती है और इस तरह के कृत्य को अंजाम देना गलत नहीं है। 

जाहिर है, एक हिंसक भीड़ भी किसी विचार से ही प्रेरित होती है। और यदि उस विचार के पोषक “ह्यूबरिस सिंड्रोम” से ग्रस्त हो तो फिर एक रक्तपिपासु भीड़ का निर्माण बहुत मुश्किल नहीं रह जाता। क्योंकि लोकतंत्र में भले बहुमत का शासन हो लेकिन जब रोल मॉडल्स अपनी छवि मसिहाई बना कर लोकतंत्र पर हावी होने लगते हैं, तब एक छोटी सी निरंकुश भीड़ भी बहुमत से अधिक ताकतवर हो जाती है। और इसी का नतीजा है, दादरी के अख़लाक़, अलवर के पहलू ख़ान, बुलंदशहर के एसआई सुबोध कुमार और अब पालघर में संतों की हत्या।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

mob lynching
mob voilence
Palghar Lynching
dadri lynching
Hubris syndrome
Narendra modi
Central Government
Donand Trump
USA

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 861 नए मामले, 6 मरीज़ों की मौत
    11 Apr 2022
    देश में अब एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 11 हज़ार 58 हो गयी है।
  • nehru
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या हर प्रधानमंत्री एक संग्रहालय का हक़दार होता है?
    10 Apr 2022
    14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेहरू स्मृति संग्रहालय और पुस्तकालय की जगह बने प्रधानमंत्री संग्रहालय का उद्घाटन करेंगेI यह कोई चौकाने वाली घटना नहीं क्योंकि मौजूदा सत्ता पक्ष का जवाहरलाल…
  • NEP
    नई शिक्षा नीति का ख़ामियाज़ा पीढ़ियाँ भुगतेंगी - अंबर हबीब
    10 Apr 2022
    यूजीसी का चार साल का स्नातक कार्यक्रम का ड्राफ़्ट विवादों में है. विश्वविद्यालयों के अध्यापक आरोप लगा रहे है कि ड्राफ़्ट में कोई निरंतरता नहीं है और नीति की ज़्यादातर सामग्री विदेशी विश्वविद्यालयों…
  • imran khan
    भाषा
    पाकिस्तान में नए प्रधानमंत्री का चयन सोमवार को होगा
    10 Apr 2022
    पीएमएल-एन के शहबाज शरीफ, पीटीआई के कुरैशी ने प्रधानमंत्री पद के लिए नामांकन पत्र जमा किया। नए प्रधानमंत्री का चुनाव करने के लिए सोमवार दोपहर दो बजे सदन की कार्यवाही फिर से शुरू होगी।
  • Yogi
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति
    10 Apr 2022
    हर हफ़्ते की प्रमुख ख़बरों को लेकर फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License