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भारत
राजनीति
बीच बहस: नेताजी सुभाष, जयश्रीराम के नारे और ममता की त्वरित प्रतिक्रिया के मायने
जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 125वीं जयंती मनाई जा रही हो तब जय श्री राम जैसा उद्घोष न केवल निरर्थक था बल्कि खुद नेताजी की शान में एक हल्का और लगभग अश्लील हस्तक्षेप था।
सत्यम श्रीवास्तव
24 Jan 2021
बीच बहस: नेताजी सुभाष, जयश्रीराम के नारे और ममता की त्वरित प्रतिक्रिया के मायने

अगर शर्म और मर्यादा के चश्मे से देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस कदर आधिकारिक फ़ज़ीहत उनके अब तक के कार्यकाल में नहीं हुई होगी जैसी कल, शनिवार को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती के मौके पर विक्टोरिया मेमोरियल के कार्यक्रम में हुई। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की स्वाभाविक और त्वरित राजनैतिक प्रतिक्रिया ने हालांकि उन्हें मीडिया के मार्फत लगभग हिन्दू विरोधी बना दिया लेकिन एक धर्मनिरपेक्ष देश में हिन्दू विरोधी होना, संविधान विरोधी होने से कम आपराधिक है।

ममता बनर्जी चाहतीं तो त्वरित प्रतिक्रिया देने से बच सकती थीं लेकिन इसी बचने के अवकाश ने बहुसंख्यकवादी धुर दक्षिणपंथ को इस कदर मजबूत कर दिया है। अपनी मर्यादा, अपने हाथ में होती है लेकिन ममता ने अपनी त्वरित प्रतिक्रिया से मर्यादा खोई नहीं बल्कि खुद से बड़ी देश के संविधान की मर्यादा की रक्षा ही की है। कोई कह सकता है कि ममता को इस तरह से बिगड़ने की ज़रूरत नहीं थी, संयम से अपना भाषण देतीं और इस आपत्तिजनक हरकत पर भी टिप्पणी कर सकती थीं? ज़रूर ऐसा किया जा सकता था लेकिन यह मशविरा देने वाले क्या इस बात की पुख्ता गारंटी दे सकते हैं कि जिन लोगों ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के हैसियत से मंच पर बोलने के लिए आयीं ममता बनर्जी को हूट किया वो उनके भाषण के दौरान ऐसा कई काई बार नहीं दोहराते?

फिर ममता ने अपने बेहद संक्षिप्त भाषण में जिसे त्वरित कठोर राजनैतिक प्रतिक्रिया कहा जा रहा है केवल इतना ही कहा कि किसी आधिकारिक सरकारी कार्यक्रम की एक गरिमा होना चाहिए। इसे एक दल के राजनैतिक कार्यक्रम की तरह नहीं लगना चाहिए। जय श्री राम का नारा एक राजनैतिक नारा बन चुका है और यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इस नारे का ईज़ाद और राजनैतिक इस्तेमाल भाजपा ने ही किया है। इसलिए जब किसी स्वतंत्र संग्राम सेनानी की जयंती के कार्यक्रम में जहां मंच प्रधानमंत्री, राज्य के राज्यपाल, देश के पर्यटन व संस्कृति मंत्री आसीन हों और संयोग से ये तीनों ही गणमान्य लोग भाजपा से संबद्ध हों और विपक्षी दल का मुख्यमंत्री अपनी बात कहने मंच पर आए तो उस समय भाजपा से अनिवार्यतया संबंधित नारा उछालने का मतलब केवल यही होता है कि इस गरिमामय कार्यक्रम का इस्तेमाल भाजपा ने अपने राजनैतिक उद्देश्यों से किया है।

बंगाल के लोग, जो भाजपा के कार्यकर्ता नहीं हैं लेकिन बांग्ला संस्कृति में सांस लेते हैं उन्हें भी नारा इसलिए नागवार गुजरा क्योंकि – इसकी ज़रूरत नहीं थी। जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 125वीं जयंती मनाई जा रही हो तब जय श्री राम जैसा उद्घोष न केवल निरर्थक था बल्कि खुद नेताजी की शान में एक हल्का और लगभग अश्लील हस्तक्षेप था। नेताजी को लौकिक जगत में देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के उद्देश्य से याद किया जा रहा था। नेताजी के समय भी राम की कल्पना रही ही होगी लेकिन वो इस अलौकिक कही जानी वाली हस्ती के बल पर बैठे नहीं रहे बल्कि देश की आज़ादी के लिए जतन किए। भाजपा की इस हरकत ने न केवल नेताजी बल्कि राम के उदार चरित्र की भी फूहड़ अवमानना की।

जो लोग नारा लगा रहे थे वो कौन लोग थे और किस विचारधारा से ताल्लुक रखते थे यह बात किसी से छिपी नहीं है और खुद भाजपा इसे लेकर आशंकित नहीं है कि नारे उनकी पार्टी के लोगों ने लगाए हैं, ज़रूर उनके प्रवक्ता अब यह तर्क दे रहे हैं कि इस कार्यक्रम में खुला आमंत्रण था (ओपेन इन्विटेशन) पर था। क्या वाकई प्रधानमंत्री के आधिकारिक कार्यक्रम जो देश कला, संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय द्वारा आयोजित हो, इस तरह खुले आमंत्रण से होता है? ऐसे उदाहरण प्राय: नहीं मिलते हैं।

श्रीराम का नारा बंगाल की संस्कृति में आम तौर पर स्वीकृत नहीं है और इसकी वजह कोई चिढ़ या वैमनस्यता नहीं बल्कि आस्थाओं का धार्मिक इतिहास है। बंगाल शक्ति पूजक समाज है जबकि राम वैष्णव संप्रदाय में एक अवतार माने जाते हैं। सनातन धर्म की दुहाई देने वाले अक्सर यह भूल जाए हैं कि इसी देश में  कुछ सदियों पहले तक ऐसे तो कई संप्रदाय थे लेकिन प्रमुख तीन संप्रदायों क्रमश: साक्त, वैष्णव और शैव के बीच में कट्टरता का लंबा इतिहास रहा है। अगर बंगाल में शक्ति की पूजा का धार्मिक इतिहास है तो उत्तर और मध्य भारत में वैष्णव धर्म का बोलबाला रहा। हालांकि अब यह विभेद नहीं सामासिकता में आधुनिक होते समाज ने अपना लिया लगता है लेकिन तात्कालिक राजनैतिक स्वार्थों के भेंट चढ़ रहे कुछ प्रादेशिक नेताओं ने इस नारे के तमाम अर्थ-अनर्थ जानते हुए भी भाजपा का दामन पकड़ा है जिससे भी बंगाल के लोग आहत हैं।

यह देखना दिलचस्प है कि इस घटना का बंगाल की राजनीति में क्या प्रभाव होगा? क्या नारा महज़ इसलिए लगाया गया कि ममता को हिन्दू-विरोधी नेता के तौर पर स्थापित किया जा सके? क्या ममता का प्रतीकार को केवल इस रूप में देखा जाएगा कि वो बांग्ला संस्कृति में श्री राम की उपस्थिति को गैर-ज़रूरी मानती हैं या इसे एक व्यवधान और पश्चिम बंगाल भाजपा में घुसपैठ कर चुके उद्दंड तत्वों के तौर पर देखा जाएगा? यह व्यवधान प्रायोजित था या नहीं था को लेकर भी तमाम तरह की अटकलें लगाईं जाएंगीं और जिसका असर बंगाल की चुनावी राजनीति पर पड़ना तय है। बंगाल अगर अभी भी हिन्दी भाषी मध्य या उत्तर भारत नहीं हुआ है तो इस पर विचार होगा और निश्चित ही इसके असर दिखेंगे। लेकिन इस सब के बीच कल प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने स्वयं अपनी गरिमा धूमिल की इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है।

जब वो बोलने के लिए आए थे तो यह अपेक्षित था कि वो इस व्यवधान पर कुछ कहते और जो उनकी ज़िम्मेदारी थी। वो चाहते तो मंच से इस तरह के आचरण पर अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को एक संदेश दे सकते थे कि यह हरकत गैर-ज़रूरी थी और इससे उन्हें तकलीफ हुई है। या वो ममता जी के सम्मान में दो शब्द बोल सकते थे। लेकिन शायद इसे ही शेर की सवारी करना कहा जाता है जहां वो व्यक्ति जो शीर्ष पर बैठा दिया जाता है उसे इस बात का अंदाज़ा होता है कि अगर यहाँ से उतरे तो वही शेर उन्हें खा जाएगा जिसने उनसे अपनी पीठ पर लादा हुआ था।

प्रधानमंत्री के साथ साथ राज्य के महामहिम की गरिमा भी चूर चूर हुई हालांकि स्वयं राज्यपाल महोदय अपनी तमाम हरकतों से यह साबित कर चुके हैं कि चाटुकारिता और गरिमा में अगर किसी एक चीज़ को चुनना हो तो वो गरिमा को सस्ता और गैर-ज़रूरी समझ कर छोड़ सकते हैं।

ममता ने कल प्रधानमंत्री के आत्मविश्वास को तो भी बुरी तरह हिला दिया। इसकी झलक प्रधानमंत्री के उबाऊ भाषण में मिली। और कल प्रधानमंत्री ने जैसे इस पद पर होने की अर्हता भी खो दी जब उन्होंने किसानी पर बात करते हुए भी किसान आंदोलन का एक बार भी ज़िक्र किए उनकी भलाई की बातें कर डालीं। उन्होंने इस बात पर तो ज़ोर दिया कि किसानी की लागतों में भारी कमी आ गयी है लेकिन इस बात का ज़िक्र एक बार भी नहीं किया कि पिछले दो महीनों से किसान आंदोलनरत हैं। यह सोचने का भी अब वक़्त आ गया है कि क्या एक ऐसा व्यक्ति जो देश की मौजूदा परिस्थितियों से इस कदर अंजान है उनके प्रति इस कदर बेपरवाह है उसे इस पद पर रहना चाहिए?

बंगाल में हुई इस घटना के दूरगामी असर भारत की राजनीति पर होना तय हैं। आसन्न विधानसभा चुनावों के मद्देनजर दोनों ही दलों और उनके नेताओं ने नेताजी सुभाष के नाम का भावनात्मक दोहन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह देखना भी दिलचस्प रहा की जहां ममता बनर्जी ने नेताजी की जयंती को ‘देश नायक दिवस’ के रूप में मनाया वहीं नरेंद्र मोदी ने इसे ‘पराक्रम दिवस’ कहा। ‘पराक्रम’ शब्द को लेकर हालांकि ममता ने सवाल उठाए और नेताजी के व्यक्तित्व के खिलाफ बताया। इतिहास के संदर्भों में नेताजी ही वह नेता रहे हैं जिन्होंने ‘प्रेम’ को अपनी राजनैतिक विचारधारा का अभिन्न अंग माना। यह ‘बांग्ला मानुष’ की सहज अभिव्यक्ति के तौर पर भी देखा जाता रहा है। 

संभाव है कि आक्रामक चुनाव अभियान में नेताजी की ‘धर्मनिरपेक्षता और प्रेम को विचारधारा का मूल बताने वाले संदेश गायब हो जाएं और महज़ चुनावी हार-जीत के हथकंडे ही यथार्थ बन जाएं।  

(लेखक डेढ़ दशकों से जन आंदोलनों से जुड़े हैं और समसामयिक विषयों पर लिखते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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