NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अमेरिका
बीच बहस: अमेरिका की आलोचना करते हुए अपने और अपने देश के हालात पर भी सोचिए!
अमेरिका की संसद पर जिन प्रवृत्तियों ने हमला किया? क्या वह प्रवृत्तियां हमारे यहां नहीं हैं? इन सवालों पर बड़े गौर से सोचने की ज़रूरत है।
अजय कुमार
08 Jan 2021
बीच बहस: अमेरिका की आलोचना करते हुए अपने और अपने देश के हालात पर भी सोचिए!

ट्रंप समर्थकों ने अमेरिका की संसद पर हमला किया। हमले और हुड़दंग से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो पूरी दुनिया में तैरने लगे। अमेरिका का मज़ाक बनने लगा। यह सब स्वभाविक था क्योंकि घटना ही अमेरिका को शर्मसार कर रही थी। इन्हीं सबके बीच भारतीय सरजमीं की मेन स्ट्रीम मीडिया में यह राय चलाई जा रही थी कि अमेरिका को भारत से सीखना चाहिए।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अपनी तमाम खामियों के बावजूद भारत दुनिया के सबसे शानदार मुल्कों में से एक है। लेकिन ऐसे कथन का इस्तेमाल दुनिया का हर एक नागरिक अपने देश के लिए करता है। इसका कहीं से भी है मतलब नहीं कि वह अपने देश की खामियों की तरफ ना देखे और दुनिया को यह नसीहत देने लगे कि दुनिया को हमसे सीखना चाहिए। 

इस तर्ज पर कहा जाए तो बात यह है कि जब सामने वाले के खिलाफ एक उंगली कर खामियां गिनाई जाती हैं तो पीछे की तरफ मुड़ी चार उंगलियां हम से यह सवाल करती हैं कि ठीक वैसे ही मामले में हमारा क्या हाल है? कहने का मतलब यह कि अमेरिका की संसद पर जिन प्रवृत्तियों ने हमला किया? क्या वह प्रवृत्तियां हमारे यहां नहीं है? इन सवालों पर बड़े गौर से सोचने की जरूरत है।

मोटे तौर पर देखें तो अमेरिका में क्या हुआ? राष्ट्रपति ट्रंप चुनावी नतीजों को मानने से इंकार कर रहे थे। चुनाव में धांधली का आरोप लगाकर अपने समर्थकों को भड़का रहे थे। और अपने कामकाज से समर्थकों की ऐसी भीड़ भी बना रखी थी जिसने अमेरिका की मान मर्यादा और संविधान से ज्यादा ट्रंप की सोच को ज्यादा तवज्जो दिया. इन सब ने मिलकर अमेरिका के कैपिटल हिल यानी संसद पर हमला कर दिया। 

क्या बिल्कुल ऐसी ही प्रवृतियां भारत में नहीं हैं? जवाब है कि भारत में इस से भी खतरनाक प्रवृतियां मौजूदा समय-समाज में व्याप्त हैं। अमेरिका से भी खतरनाक प्रवृतियां भारत में इस लिहाज से मौजूद हैं क्योंकि बड़े ध्यान से देखा जाए तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की झूठे आरोपों और अनर्गल गलत बयानों को अमेरिकी संस्थाओं ने सिरे से खारिज कर दिया। चुनाव में धांधली का आरोप अमेरिकी राज्य के अधिकारियों और अदालतों ने खारिज कर दिया। मीडिया ने डोनाल्ड ट्रंप की झूठ का पर्दाफाश किया। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। भारत में संस्थाएं पूरी तरह से जर्जर हो चुकी हैं। अदालतों तक पर आरोप हैं कि वे वही करती हैं जो राज्य का हुकुम होता है। मीडिया वही दिखाती है जो सरकार दिखवाना चाहती है। इसके एक नहीं अनेकों उदाहरण हैं। इस लिहाज से सोचने की भी जरूरत नहीं है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद है। केवल प्रमाण में संसद नाम की जगह नहीं है। सिर्फ संसद पर हमला ही लोकतंत्र पर हमला नहीं होता है। पिछले पांच छह सालों में हुए उन तमाम भीड़ हत्याओं को याद कीजिए जहां भारत माता की जय के नारे लगाते हुए किसी को मौत के घाट उतार दिया गया। उन तमाम जायज आंदोलनों को याद कीजिए जहां पर आंदोलन में शामिल लोगों को देश विरोधी करार देकर खारिज करने का खुलेआम खेल खेला गया। सरकार की कार्य पद्धति से निराश उन तमाम आलोचनाओं को याद कीजिए जिन्हें सरकार के चमचों ने देशद्रोही करके पुकारा। क्या यह सारी प्रवृतियां ठीक वैसी ही नहीं है? जिसकी नुमाइंदगी ट्रंप के समर्थक ' मेक अमेरिका ग्रेट अगेन ' का नारा लगाते हुए अपने ही देश के संसद पर हमला करते हुए कर रहे थे। अंतर केवल इतना है कि अमेरिका में इन प्रवृत्तियों ने हमला संसद पर किया और भारत में यह हमला देश के अपने ही नागरिकों की जायज बातों पर होता है। 

अविनाश कल्ला स्वतंत्र पत्रकार हैं। इन्होंने इस बार की अमेरिकी चुनाव के दौरान तकरीबन अमेरिका की तकरीबन 18 हजार किलोमीटर यात्रा कर हर जगह से रिपोर्टिंग की थी। अविनाश कल्ला अपने संपादकीय में लिखते हैं कि ट्रंप ने अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान अमेरिका को इतना अधिक विभाजित कर दिया है कि अमेरिका का एक बड़ा वर्ग ट्रंप के अलावा किसी दूसरे की सुनता ही नहीं है। वह रंग के आधार पर लोगों से भेदभाव करता है। आर्थिक समानता के  पर बैठा हुआ है। शहरी ग्रामीण में बंटा हुआ है। वह यह मानता है कि वॉशिंगटन में सिर्फ बिचौलिया ही राज करते हैं। और योजनाबद्ध तरीके से इन्हें बाहर रखते हैं। ऐसी सोच वालों को ट्रंप ने पहचाना। इनके खौफ और आशंका को बढ़ावा दिया। कहा कि अगले कुछ सालों में अमेरिका में अश्वेतों का बहुमत होगा। उन्हें पूछने वाला कोई नहीं होगा। इसे फैलाने के लिए इंटरनेट पर मौजूद सभी प्लेटफार्म का बड़ी जमकर इस्तेमाल किया। और समर्थकों की एक ऐसी भीड़ तैयार की। जिसके लिए ट्रंप का हर टवीट हर बयान ट्रंप के साथ हुई नाइंसाफी का उदाहरण है।

अब ठीक ऐसी ही प्रवृत्तियों को भारत में देखिए। भारत का एक बहुत बड़ा वर्ग खुद को हिंदू मुस्लिम में बांट कर देखता है। उसके लिए भारत और भारत के संविधान से पहले हिंदू धर्म से जुड़े कर्मकांड प्यारे हैं। सामाजिक न्याय के लिए इस्तेमाल की जाने वाली औजार की जगह जातिगत भेदभाव प्यारे हैं। गिरती हुई अर्थव्यवस्था की जगह नरेंद्र मोदी की छवि प्यारी है। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी जैसे आत्मघाती फ़ैसले को झूठी देश सेवा के नाम पर हंसते-हंसते सह लेता है। वह महामारी के दौरान दूरदराज के इलाकों से अपने गांव पैरों में छाले लिए हुए जाने के लिए अभिशप्त है लेकिन पत्रकारों के सवाल पूछने पर कहता है कि नरेंद्र मोदी अच्छा कर रहे हैं। देश के किसी इलाके में बैठकर वह अपने विधायक और सांसद को वोट नहीं देता बल्कि खुलकर कहता है कि उसका वोट एक व्यक्ति नरेंद्र मोदी के खाते में जा रहा है। जब भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ से यह चुनावी सिक्का उछाला जाता है कि आने वाले समय में मुस्लिमों की आबादी हिंदुओं से अधिक हो जाएगी। तो बिना दिमाग लगाए ऐसे तर्क को आसानी से स्वीकार लेता है। इतिहास नहीं देखता, अर्थव्यवस्था के चाल चलन नहीं देखता, अपनी जिंदगी से जुड़ी परेशानियों को नहीं देखता खुलकर कहता है कि मोदी नहीं तो कौन? मोदी की हां में हां मिलाते हुए कहता है कि 70 साल से हिंदुस्तान में कुछ भी नहीं हुआ। उसे बस जीत चाहिए। अपने नेता नरेंद्र मोदी और भाजपा की जीत चाहिए। भले ही वह जीत विधायकों की खरीद-फरोख्त से क्यों न की गई हो? संविधान की धज्जियां उड़ाकर क्यों न की गई हो? यह किसी भी तर्क को स्वीकार नहीं करता। इसे केवल वही तर्क प्यारा है जो प्रधानमंत्री की जुबान से निकलता है। जो भाजपा के आईटी सेल के द्वारा फैलाया जाता है। अगर भाजपा के आईटी सेल ने कह दिया कि किसान नहीं खालिस्तानी विरोध कर रहे हैं तो यह किसानों को भी अलगाववादी कह कर पुकारने लगता है। यह वही समर्थकों की भीड़ का हिस्सा है जिसने अमेरिका की संसद पर हमला किया।

लेकिन इन सबका मतलब यह भी नहीं है की जनता के भीतर मौजूद असंतोष को खारिज कर दिया जाए। इन सबका मतलब केवल यही है कि जनता के भीतर मौजूद असंतोष को गलत दिशा में मोड़ने वाले तत्व को खारिज किया जाए। 70 साल में बहुत कुछ हुआ लेकिन इतना नहीं हुआ कि भारत की बहुत बड़ी आबादी एक गरिमा पूर्ण जीवन जी पाए। इसलिए आम जनता के जीवन में असंतोष का पनपना जायज है। दिक्कत तब आती है जब इस असंतोष से मुंह फेर कर सारी संस्थाएं काम करने लगती हैं। पक्ष विपक्ष मीडिया अदालत जब सब आम जनता के जरूरी मुद्दों से नजर फेर लेते हैं। ऐसे में असंतोष का गुबार खतरनाक रूप लेता रहता है। मौजूदा दौर में सरकार से लेकर अदालत, अदालत से लेकर मीडिया सब के सब आम जनता की बुनियादी जरूरतों से कटे हुए हैं। इसलिए भले ही मीडिया और पैसे के बलबूते सरकारों की ऐसी छवि पेश की जा रही हो जो जनता को हकीकत से काट दे।

लेकिन इससे हकीकत तो बदल नहीं जाती। हकीकत वही की वही रहती है। हकीकत में केवल सरकारें बदली हैं। आर्थिक असमानताएं बढ़ी हैं। लोगों के पास अपने बच्चों को पढ़ाने लिखाने और खुद को सेहतमंद रखने के लिए संसाधन नहीं हैं। एक गरिमा पूर्ण जिंदगी के लिए रोजगार मिलना बहुत मुश्किल हुआ है। नफ़रत का माहौल पहले के मुकाबले बढ़ता जा रहा है। समाज का ताना-बाना बिगड़ा है। लोग अपनी मान्यताओं विचार और समझदारीयों में पहले के मुकाबले ज्यादा बंटे है। सरकार कारोबारियों का रहनुमा बनकर रह गई है। ऊंची जगहों पर केवल उन्हीं की पकड़ है जो कई तरह के गठजोड़ का हिस्सा है। व्यक्ति की मेहनत और समझ की कीमत नहीं मिल रही है। असंतोष खतरनाक है। कई दिनों से अपनी उपज की न्यूनतम कीमत मांगने के लिए किसान सड़कों पर जूझ रहे हैं। सरकार अनसुना कर दे रही हैं। लोगों को जहर पिलाया जा रहा है। सच से दूर रखने के सारे जतन किए जा रहे हैं। पता नहीं यह घड़ा कब फूटे।

अफ़सोस जब ट्रंप समर्थक अमेरिकी संसद पर हमला कर रहे थे तो हमलावरों की हाथ में मौजूद कई सारे झंडों में भारत का झंडा भी शामिल था। उस भीड़ में भारत का झंडा उठाने वाले का मकसद चाहे जो भी हो लेकिन शायद कुदरत का इशारा साफ था कि इस हमले से भारत को अपनी खामियों की तरफ ध्यान देने की सबसे अधिक जरूरत है। नहीं तो भारत का हश्र शायद अमेरिका से भी बुरा हो।

Capitol Hill Attack
US media
Trump Supporters
us elections
Donald Trump
KEEP AMERICA GREAT
Joe Biden
BJP
Hindu Muslim Riots
Religion Politics
Narendra modi
Hindutva
RSS

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • modi
    अनिल जैन
    खरी-खरी: मोदी बोलते वक्त भूल जाते हैं कि वे प्रधानमंत्री भी हैं!
    22 Feb 2022
    दरअसल प्रधानमंत्री के ये निम्न स्तरीय बयान एक तरह से उनकी बौखलाहट की झलक दिखा रहे हैं। उन्हें एहसास हो गया है कि पांचों राज्यों में जनता उनकी पार्टी को बुरी तरह नकार रही है।
  • Rajasthan
    सोनिया यादव
    राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?
    22 Feb 2022
    किसानों पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ और उसकी वसूली के लिए बैंकों का नोटिस, जमीनों की नीलामी इस वक्त राज्य में एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में गहलोत सरकार 2023 केे विधानसभा चुनावों को देखते हुए कोई जोखिम…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव, चौथा चरण: केंद्रीय मंत्री समेत दांव पर कई नेताओं की प्रतिष्ठा
    22 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के चौथे चरण में 624 प्रत्याशियों का भाग्य तय होगा, साथ ही भारतीय जनता पार्टी समेत समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। एक ओर जहां भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना चाहेगी,…
  • uttar pradesh
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव : योगी काल में नहीं थमा 'इलाज के अभाव में मौत' का सिलसिला
    22 Feb 2022
    पिछले साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि "वर्तमान में प्रदेश में चिकित्सा सुविधा बेहद नाज़ुक और कमज़ोर है। यह आम दिनों में भी जनता की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त…
  • covid
    टी ललिता
    महामारी के मद्देनजर कामगार वर्ग की ज़रूरतों के अनुरूप शहरों की योजना में बदलाव की आवश्यकता  
    22 Feb 2022
    दूसरे कोविड-19 लहर के दौरान सरकार के कुप्रबंधन ने शहरी नियोजन की खामियों को उजागर करके रख दिया है, जिसने हमेशा ही श्रमिकों की जरूरतों की अनदेखी की है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License