NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
दिल्ली झुग्गी प्रकरण: मी-लॉर्ड ये ग़रीब कहां जाएंगे यह भी बता देते!
सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेवारी है कि ‘‘संवैधानिक अधिकारों के पालन में अगर कोई कोताही होती है तो उसे लागू कराना, लेकिन यहां सुप्रीम कोर्ट खुद ही संवैधानिक अधिकारों के ख़िलाफ़ खड़ा होता नज़र आ रहा है।
सुनील कुमार
13 Sep 2020
दिल्ली झुग्गी प्रकरण

सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त और 1 सितम्बर 2020 को दो फैसले दिये। 31 अगस्त के आदेश में कहा गया कि रेलवे की जमीन पर बसी हुई 48,000 झुग्गियों को तीन माह के अन्दर हटा दिया जाए। 1 सितम्बर के फैसले में कोर्ट ने राजस्थान की बिजली वितरण कम्पनियों की याचिका को खारिज कर दिया जिससे अडानी ग्रुप को 5000 करोड़ की बचत हो गई। इन दोनों फैसलों में न्याय करने वाले मी-लॉर्ड अरूण मिश्रा उपस्थित थे जो दो सितम्बर, 2020 को रिटायर हो गये।

हम बात करते हैं 31 अगस्त, 2020 के एम.सी. मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एंड अदर्स, 13029/1985 के फैसले की जिसमें मी-लॉर्ड ने कहा है कि तीन माह में चरणबद्ध तरीके से रेलवे की जमीन पर बसी हुई 48,000 झुग्गियों को तोड़ दिया जाये। उन्होंने यह नहीं बताया कि तोड़ने से पहले इन परिवारों को कहां और कैसे बसाया जाये, पुर्नवास नीति क्या होगी? 

मी-लॉर्ड ने कहा है कि अपेक्षित राशि का 70 प्रतिशत हिस्सा रेलवे और 30 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार द्वारा दिया जाएगा। कार्यबल एसडीएमसी, रेलवे और सरकारी एजेंसियों द्वारा निःशुल्क उपलब्ध किया जाएगा और वे इसे एक-दूसरे के लिए चार्ज नहीं करेंगे। यानी मी-लॉर्ड ने यह नसीहत दी है कि आपस में लड़ने की जरूरत नहीं है सब एजेंसियां एकजुट होकर इन्हें उजाड़ने में एक हो जायें। अपेक्षित राशि किसके लिए कहा गया है इसका कोई जिक्र नहीं है क्योंकि पुनर्वास के विषय में बोला ही नहीं गया है तो हो सकता है कि फोर्स को लाने-ले जाने, बुलडोजर इत्यादि के किराये के लिए कहा गया हो।

मी-लॉर्ड ने यह भी तय कर दिया कि कोई राजनीतिक हस्तक्षेप या किसी कोर्ट के द्वारा स्टे नहीं लगाया जा सकता है। यानी देश का सुप्रीम कोर्ट अब राजनीतिक पार्टियों के लिए एजेंडा भी देने लगा है कि वह किस पर विरोध कर सकती हैं किस पर नहीं! भारत का संविधान हर नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने, लिखने बोलने, विरोध करने की आजादी देता है। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश क्या संविधान की धारा 19 (1) का उल्लंघन नहीं है। यह उल्लंघन है दिल्ली सरकार द्वारा बनाई गई नीति ‘स्लम एंड जेजे रिहैबिलिटेशन एंड रीलोकेशन पॉलिसी 2015 का जिसको दिसम्बर 2017 में उपराज्यपाल ने अधिसूचित भी कर दिया है। जिसमें कहा गया है कि 2006 तक बसी हुई बस्ती और 2015 तक के दस्तावेज वाली झुग्गी को तोड़ने से पहले पुर्नवास किया जायेगा। यह उल्लंघन है अजय माकन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2019) के दिल्ली उच्च न्यायलय के निर्णय का जिसमें कहा गया है कि दिल्ली की पुनर्वास नीति केन्द्र सरकार के जमीन पर भी लागू होगी जिसे केन्द्र सरकार के द्वारा भी सहमति दी गई है। सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेवारी है कि ‘‘संवैधानिक अधिकारों के पालन में अगर कोई कोताही होती है तो उसे लागू कराना, लेकिन यहां सुप्रीम कोर्ट खुद ही संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ खड़ा होता नजर आ रहा है।

कोरोना काल में एक तरफ लोगों को घरों में रहने की हिदायत दी जा रही है तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाने की बात कर रहा है। डुसूब लिस्ट के अनुसार दिल्ली में 60 झुग्गी बस्ती रेलवे के जमीन पर है जिन पर 43634 झुग्गियां हैं। 7 बस्ती रेलवे और डीडीए के जमीन पर बसी हैं जिसमें 4794 झुग्गियां हैं इस तरह से 48428 झुग्गियों को तोड़ने का फारमान जारी कर दिया गया है। इन झुग्गियों में काफी झुग्गियां दो-तीन मंजिला हैं यानी करीब 4-5 लाख आबादी को बेघर करके सड़क पर लाने का प्लान है।

झुग्गी बस्ती आई कहां से

विकास के नाम पर गांवों को उजाड़ा जा रहा है। गांव के कृषि, लघु उद्योग, हस्तशिल्प को देशी-विदेशी धनपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए नष्ट किया जा रहा है। किसानों, आदिवासियों की जमीन छीनकर देशी-विदेशी लुटेरों को सेज व औद्योगिक कॉरिडोर बनाने और खनन के नाम पर दिया जा रहा है। इससे गांव का पलायन बढ़ा है और भारत की करीब 35 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करने लगी है जिसे भारत के भूतपूर्व वित्तमंत्री पी चिदम्बरम 80 प्रतिशत तक बढ़ाने की बात करते थे।

गांव से उजड़ कर जब वहां के किसान-मजदूर शहर को आते हैं तो उनकी शरणस्थली झुग्गी-बस्ती होती है। जिन लोगों को यहां पर शरण नहीं मिल पाती है वह फैक्ट्रियों में, फुटपाथ पर शरण लेते हैं। फैक्ट्रियों में शरण लेने के कारण कई बार आग लगी के कारण मजदूरों की जान चली गई है। फुटपाथ पर सोते समय कभी ठंड से तो कभी लू लगने से तो कभी गाड़ी चढ़ जाने से इन लोगों की जाने चली जाती हैं। आज के समय झुग्गी बस्ती मेहनतकश जनता के लिए वैसी ही है जैसा मछली के लिए जल। अगर झुग्गियां नहीं रहीं तो मजदूरों को रहने के लिए आवास की कोई सुविधा नहीं है। सरकार द्वारा की गयी व्यवस्था ऊंट के मुंह में जीरा के समान है।

महानगरों में इन्डस्ट्रीयल इलाके बना दिये गये लेकिन मजदूरों के लिए आवास का प्रबंध नहीं किया गया। मजदूरों को दूर-दूर से काम करने कारखानों में जाना पड़ता था जब वह बेकार पड़ी जमीन पर झुग्गियां बना ली और रहने लगे। धीरे-धीरे शहरों का विकास हुआ जमीनों की कीमतें बढ़ने लगी तो लोगों को समय-समय पर उजाड़ा जाने लगा। यही कारण है कि कभी दिल्ली के क्षेत्रफल के ढाई से तीन प्रतिशत पर झुग्गी बस्तियां थी लेकिन आज के समय दिल्ली के क्षेत्रफल के मात्र आधे प्रतिशत जमीन पर 675 नोटिफाईड बस्तियां बसी हुई है जिसमें 306521 झुग्गियां हैं। सरकारी जनगणना के अनुसार करीब 16 लाख लोग झुग्गी-बस्तियों में रहते हैं। लेकिन वास्तविकता अलग है ज्यादातर बस्तियां में दो-तीन मंजिल का मकान बना है जिसमें दो से तीन परिवार हैं लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में इसे एक ही यूनिट मानी जाता है।

इस तरह झुग्गी बस्ती में रहने वाली आबादी करीब करीब 40 लाख के आस-पास है। दिल्ली की अधिकतर बस्तियां 30-40 साल पुरानी हैं उस समय बस्तियों के स्थान पर खड्ढे,  जंगल हुआ करते थे लोगों ने उसे साफ सुथरा करके रहने लायक बनाया और अपनी जिन्दगी की कमाई का एक बड़ा हिस्सा अपने घरों को बनाने में लगा दिया। हर 5-10 साल बाद उनको अपने बनाये हुए घरों को तोड़कर ऊंचा करना पड़ता था क्योंकि समय-समय पर सड़कें ऊंची की जाती रही हैं, उनके घरों में बारिश का पानी भर जाया करता था इस तरह से लोगों ने उस जगह पर अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा लगा दिया है। जब वह जमीन कीमती हो गई तो उनको ही चोर समझा जाने लगा जैसा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बार कहा था कि ‘‘इनको पुनर्वास करना जेबकतरों को इनाम देने जैसा है’’। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा या जो अभी सुप्रीम कोर्ट का फारमान आया है वह एक तरह से भारत के शासक वर्ग की मेहनतकश जनता की प्रति सोच को ही दर्शाता है।

इन झुग्गी झोपड़ियों के कारण ही सस्ते मजदूर मिल जाते हैं जिनके खून-पसीने से शहर बनता है और शहर भी उन्हीं के बल पर चलता है। यहीं से फैक्ट्री मजदूर, ड्राइवर, घरेलू कामगार, राज मिस्त्री, बेलदार, पीयून, चौकीदार इत्यादी तरह के काम करने वाले मिलते हैं। भारत के आर्थिक अर्थव्यवस्था में इन मजदूरों का अच्छा खास योगदान होता है लेकिन सरकार उनकी इस योगदान को नहीं मानती है। यहां पर केवल आवास ही नहीं छोटे-छोटे काम भी होते हैं जिसके कारण लागत कम होती है। कीर्तिनगर के अन्दर ही देखा जाये तो रेलवे लाइन के किनारे बस्तियों में कमला नेहरू कैम्प, संजय कैम्प, जवाहर कैम्प, इंदिरा कैम्प, हरिजन बस्ती हैं जिसमें करीब 200 घरों में फर्नीचर, बेड, सोफे बनाने का काम होता है। वहां के बनाये हुए सोफे, कुर्सियां, बेड बड़े-बड़े शोरूम में बिकते हैं जो कि देश की अर्थव्यवस्था में योगदान करता है। हो सकता है कि मी-लॉर्ड ने जिस कुर्सी पर बैठ कर यह फैसला सुनाया हो वह कुर्सी भी इन्हीं बस्तियों की बनी हुई हो। यह भी हो सकता है जिस गद्देदार बेड पर शासक को अच्छी नींद आती हो वह बेड भी इन्हीं बस्तियों में रहने वाले कारिगरों के हाथों से बने हों। एक तरफ जनता गिरते हुए देश की अर्थव्यवस्था, जाती हुई नौकरी से परेशान है तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के फरमान ने लाखों लोगों को सड़क पर लाने के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को और संकट में डालने का काम कर दिया है।

अगर इन बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है तो न केवल अर्थव्यवस्था नीचे जायेगी बल्कि यह गरीब लोग और गरीबी के गर्त में जायेंगे जिसका जिक्र ’संयुक्त राष्ट्र यूनिवर्सिटी वर्ल्ड इंस्टीच्यूट फॉर डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स रिसर्च’ के प्रकाशित रिपोर्ट में भी किया है कि कोरोना काल में गरीबी और बढ़ेगी। आम आदमी पार्टी (आप) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सत्ता में आने के लिए चुनाव में वादा किया था कि ‘जहां झुग्गी वहां मकान’ वह वादा भी खोखला साबित होगा। प्रधानमंत्री ने लालकिले से घोषणा की है कि 2022 तक सभी को मकान दिया जायेगा लेकिन आज जब इन गरीबों के मकान टूटने की कगार पर है तो वे चुप हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Supreme Court
Slum Area
48000 slum Demolition
Poor People's
Rajasthan
Power distribution companies
adani group
Corona Crisis
AAP
Arvind Kejriwal
BJP
Narendra modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट


बाकी खबरें

  • general strike
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्यों है 28-29 मार्च को पूरे देश में हड़ताल?
    27 Mar 2022
    भारत के औद्योगिक श्रमिक, कर्मचारी, किसान और खेतिहर मज़दूर ‘लोग बचाओ, देश बचाओ’ के नारे के साथ 28-29 मार्च 2022 को दो दिवसीय आम हड़ताल करेंगे। इसका मतलब यह है कि न सिर्फ देश के विशाल विनिर्माण क्षेत्र…
  • Bhagat Singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    शहीद भगत सिंह के इतिहास पर एस. इरफ़ान हबीब
    27 Mar 2022
    'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस एपिसोड में नीलांजन ने बात की है इतिहासकार एस. इरफ़ान हबीब से भगत सिंह के इतिहास पर।
  • Raghav Chadha
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: पंजाब में राघव चड्ढा की भूमिका से लेकर सोनिया गांधी की चुनौतियों तक..
    27 Mar 2022
    हर हफ़्ते की प्रमुख ख़बरों को लेकर एकबार फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन…
  • jaunpur violence against dalits
    विजय विनीत
    उत्तर प्रदेश: योगी के "रामराज्य" में पुलिस पर थाने में दलित औरतों और बच्चियों को निर्वस्त्र कर पीटेने का आरोप
    27 Mar 2022
    आरोप है कि बदलापुर थाने में औरतों और बच्चियों को पीटने से पहले सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए गए। पहले उनके कपड़े उतरवाए गए और फिर बेरहमी से पीटा गया। औरतों और लड़कियों ने पुलिस पर यह भी आरोप लगाया कि वे…
  • सोनिया यादव
    अपने ही देश में नस्लभेद अपनों को पराया बना देता है!
    27 Mar 2022
    भारत का संविधान सभी को धर्म, जाति, भाषा, वेशभूषा से परे बिना किसी भेदभाव के एक समान होने की बात करता है, लेकिन नस्लीय भेद इस अनेकता में एकता की भावना को कलंकित करता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License