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दिल्ली हिंसा: सड़कों पर बिखरे पत्थर, जले घर-दुकान व गाड़ियां और डर के साये में ज़िंदगी
खुरेजी, चांदबाग, भजनपुरा, जाफराबाद समेत उत्तर-पूर्वी दिल्ली और आसपास के इलाकों में शांति है लेकिन ख़ौफ़ और दहशत का माहौल अभी बना हुआ है। ज्यादातर दुकानें बंद हैं और उनके दरवाजों पर हिंसा के निशान साफ देखे जा सकते हैं। न्यूज़क्लिक की खास रिपोर्ट...
अमित सिंह, तारिक अनवर, मुकुंद झा
28 Feb 2020
Delhi violence

सांप्रदायिक हिंसा के बाद उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अधिकांश इलाकों में शांति वापस लौट रही है। अब जहां एक ओर सड़कों पर पुलिस है और हिंसा के निशान हैं तो वहीं दूसरी ओर गलियों में हालात अब भी सामान्य नहीं है। लोगों में खौफ और दहशत का माहौल अभी बना हुआ है। गलियों में अब भी लोग इकट्ठा होकर माहौल भांपने की कोशिश कर रहे हैं।

इन इलाकों में ज्यादातर दुकानें बंद हैं और उनके दरवाजों पर हिंसा के निशान साफ देखे जा सकते हैं। सड़कों पर पत्थर और ईंट के टुकड़े फैले हुए हैं। बीच-बीच में जली हुई दुकानें दिख रही हैं। फूंकी हुई गाड़ियां और सामान दिख रहे हैं और हिंसा को रोकने के लिए पुलिस प्रभावित इलाकों में फ्लैग मार्च कर रही है।

कई जगहों पर लोगों के घर जला दिए गए हैं। रोजमर्रा का हर सामान और रोजी-रोटी का जरिया भी राख में बदल गया है। नफरत और हिंसा की ये तस्वीरें आपको सड़कों पर हर तरफ दिख जाएंगी। न्यूज़क्लिक की टीम ने इन प्रभावित इलाकों का दौरा किया और लोगों से बातचीत की।
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प्रेम के निशां...

इस दौरान बहुत सी नफरत बढ़ाने वाली बातें हुई तो कुछ ऐसी भी तस्वीर नजर आई जो अमन और प्रेम का पैगाम दे रही थी। खजूरी खास की श्रीरामपुर कालोनी इन दंगों से सबसे ज्यादा प्रभावित थी।

मुस्लिम बाहुल्य इस कालोनी के भीतर रहने वाली 55 वर्षीय चंपा देवी बताती हैं, 'यहां बगल में पुलिया पर बहुत पथराव हुआ। पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े। मोहल्ले के एक लड़के की मौत हो गई लेकिन हमारे पड़ोसियों ने हमारे घर की रक्षा की। यहां सब बहुत ही अमन चैन से रहते हैं। सारे लोग काम धंधे वाले हैं। अब दंगें की वजह से सबके सामने रोजी रोटी का संकट है। दंगे की चलते मुझे एक भी बार नहीं लगा कि मैं अपना घर छोड़कर कहीं दूसरी जगह रहने चली जाऊं।'

इसी तरह मुस्लिम बाहुल्य चांद बाग इलाके में जनरल स्टोर की दुकान चलाने वाले राकेश कुमार कहते हैं, 'दंगे भड़कने के बाद पूरी रात जागकर काटनी पड़ी। सोशल मीडिया पर तमाम तरह की अफवाह आ रही थी। घर के बहुत पास ही मजार को जला दिया गया था। लेकिन मेरे घर के बगल में सटे मंदिर को किसी ने हाथ नहीं लगाया है। हम और हमारे मुस्लिम पड़ोसी सारी रात अपनी गली की रक्षा के लिए जगते रहे और एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। मुझे यहां पर हिंदू होने की वजह से किसी ने निशाना नहीं बनाया।'

कुछ इसी तरह हिंदू बाहुल्य सोनिया विहार इलाके में बुधवार रात को दंगाइयों ने अल्पसंख्यक समुदाय के एक घर और दुकान को घेर लिया तो हिंदू बहुसंख्यकों ने उनके घर को बचाया और दंगाइयों को खदेड़ दिया।

अशोक नगर इलाके में जब मंगलवार को दंगाइयों ने मुस्लिमों के घरों में आग लगा दी तब से उनके हिंदू पड़ोसी ही उन्हें शरण दिए हुए हैं। हिंसा के शिकार साजिद कहते हैं, 'बाहर से आई भीड़ ने जब सबकुछ जला दिया तो हमें ये नहीं समझ आ रहा था कि अब कैसे रहेंगे लेकिन हमारे हिंदू पड़ोसियों ने मदद की है। हमें उन्होंने अकेला नहीं छोड़ा है।'

फिलहाल, एक ओर जहां दंगा प्रभावित इलाकों में घूमते हुए नफरत को मिटाने वाली और प्रेम का संदेश देने वाली ऐसी तमाम कहानियां आपको सुनने और देखने को मिलेंगी। तो इसके उलट आपको यह भी बताया जाएगा कि हमने हिंदू मोहल्ले में मुसलमानों की रक्षा की है पर मुसलमानों के इलाके में हिंदुओं की रक्षा नहीं हुई। या फिर मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में कहा गया कि हमने अपने इलाके में हिंदुओं के घरों और दुकानों की सुरक्षा की लेकिन हिंदू बाहुल्य इलाकों में ज्यादती हुई है।

हालांकि हिंसा की आग में उत्तर-पूर्वी दिल्ली किस कदर झुलसी, इसकी तस्वीर धीरे-धीरे सामने आ रही है। क्या हिंदू और क्या मुसलमान, नफ़रत की इस आग ने किसी को भी नहीं छोड़ा है। लेकिन ऐसी भी कहानियां दोनों तरफ से कम नहीं है कि दोनों समुदायों ने एक दूसरे लोगों की हिफाजत की है।

डर और नफरत की तस्वीर

दंगों के बाद की दिल्ली की जो तस्वीर दिख रही है उसमें डर और नफरत अब भी बाकी है। दंगे के बाद अब कैसे हालात हैं? यह पूछने पर हिंसा प्रभावित कर्दमपुरी के फैयाज कहते हैं, ‘अब भी डर बना हुआ है। कोई चैन से नहीं सो पा रहा है। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, हर व्यक्ति घरों के अंदर ही रहना मुनासिब समझ रहा है। यहां तक कि हम लोग भी यात्रा के लिए अपने वाहनों का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। इन तीन दिनों में जो भी हुआ उससे हम लोग सदमे में हैं।’
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तो वहीं चांदबाग में फल की दुकान चलाने वाले भूरे खान कहते हैं, 'हमारी पुश्तैनी दुकान में आग लगा दी गई है। पिछली कई पीढ़ियों से यह दुकान यहां पर है। हमने अपने खून पसीने की कमाई से इसे बड़ा किया है। अब हिंसा तो खत्म हो गई है लेकिन हमारी दुकान और घर को जला दिया गया है। इसे हम कैसे भूल जाएं। जब हम अपनी इस दुकान को देखेंगे तो हमें यह मंज़र याद आएगा।'

चांदबाग के मुख्य चौराहे में मजार के बगल ही भूरे खान की दुकान है। गौरतलब है कि सोमवार की शाम को उपद्रवियों ने मजार में भी आग लगा दी थी। उसके सामने भूरे लाल की फल की दुकान में तोड़फोड़ करके आग लगा दी गई है। हिंसा के चार—पांच दिन बाद भी सड़कों पर अभी फल बिखरे पड़े हैं।

इसी तरह चांदबाग से थोड़ा आगे खजूरी एक्सटेंशन में एक गद्दे की दुकान में आग लगा दी गई है। इस दुकान के मालिक दिलशाद अली बताते हैं, 'यहां से फोम की एक्सक्लूसिव सप्लाई बड़ी बड़ी कंपनियों को होती थी। करीब दो करोड़ का सामान जल गया है। सोमवार शाम को हिंसा भड़कने के बाद दुकान बंद करके यहां से निकल गए थे। बाद में पता चला कि दुकान में आग लगा दी गई है। यही दुकान ही हमारा सबकुछ था। अब सब बर्बाद हो गया है। इंश्योरेंस से बहुत ही मामूली रकम मिलती है। अब आगे के बारे में सोचने पर अंधेरा नजर आ जा रहा है।'

इसी तरह खजूरी खास एक्सटेंशन में अल्पसंख्यकों की एक पूरी गली में करीब दर्जन भर घरों को आग के हवाले कर दिया गया है। दंगाइयों ने इस गली में हिंदू मकानों को सुरक्षित छोड़ दिया है। यहां का मंजर इतना खौफनाक है कि आप शायद ज्यादा देर खड़े न रह पाएं।

दरअसल इस तरह की नफरती हिंसा देखने के बाद आपको देश में पुलिस प्रशासन, नेताओं और दूसरे जिम्मेदार लोगों की याद आती है। लेकिन देश के तमाम दूसरे दंगों की तरह यहां पर भी यह कहानी दोहराई गई है कि पुलिस, प्रशासन और राजनेता सभी इस दौरान लापता रहे।
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जबकि तकनीक ने इस दंगे की बर्बरता को और बढ़ा दिया। ये सिर्फ सेलेक्टिव घरों या दुकानों की कहानी नहीं है। करावल नगर पुश्ते पर दंगाई परिवहन विभाग के ऐप का इस्तेमाल करके गाड़ी के मालिक की पहचान कर रहे थे और तब गाड़ियों में आग लगा रहे थे।

इसी तरह तमाम अफवाहें सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप और दूसरे माध्यम) के जरिए तेजी से वायरल हो रही थी। दंगाग्रस्त इलाकों में घूमते समय ज्यादातर लोगों ने इस बात को दोहराया कि सोशल मीडिया ने नेगेटिव रोल अदा किया। लोगों के बीच भय और नफरत के बीज वहीं से बोए गए। फिलहाल हमें इन तमाम खतरों के बीच ही अमन कायम करना है और इंसानियत की रक्षा करनी है।

जीटीबी अस्पताल: तकलीफ का भयावह मंजर

उत्तर पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा में जहां लोगों को अपनों को खोने का गम साल रहा है, वहीं उनके शवों को लेने के लिए उनके रिश्तेदारों को जीटीबी अस्पताल के शवगृह के बाहर लंबा इंतजार करना पड़ रहा है क्योंकि शव सौंपे जाने से पहले उनका पोस्टमार्टम होना है।

हिंसा भड़कने के बाद से लापता चल रहे लोगों के परिजन अस्पताल अधिकारियों से यह पता करने को कह रहे हैं कि कहीं शवों में उनके अपनों का शव तो नहीं है या कहीं अस्पताल में उनका इलाज तो नहीं चल रहा है। रोते बिलखते परिजन और रिश्तेदार जीटीबी अस्पताल में हर तरफ दिखाई दे रहे हैं।

जीटीबी अस्पताल के शवगृह के बाहर इंतजार कर रहे 35 वर्षीय अनवर बात करते ही रोने लगते हैं। उन्हें आखों से ज्यादा दिखाई नहीं देता है। उनके ससुर नसीरुद्दीन को शिवविहार इलाके में दंगाइयों ने मार दिया है। वो कहते हैं, ‘हम कल दोपहर से आए हैं। कल पता चला कि फाइलें तैयार हैं और पोस्टमॉर्टम किये जाएंगे। आज बोला गया कि करावल नगर थाने से आईओ आएंगे तब लाश मिलेगी, लेकिन अभी तक मिल नहीं पाई है।’
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गौरतलब है सोमवार से ही जीटीबी अस्पताल में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुई बर्बर हिंसा में घायल और मारे गए लोगों को लाया जा रहा है। गुरुवार को भी यह सिलसिला जारी था। न्यूज़क्लिक की टीम जब शाम 6 बजे के करीब अस्पताल परिसर में पहुंची उसी वक्त शाहिद नाम के 15 साल के लड़के को इमरजेंसी में भर्ती किया गया। उसके साथ मारपीट की गई थी। रोटी की दुकान में काम करने वाले शाहिद के परिजनों ने आरोप लगाया कि वह करावल नगर से काम पर गया हुआ था। जहां पर उसके साथ मारपीट की गई और पैंट उतारकर चेक किया गया कि वह किसी धर्म का है।
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इसी तरह गुरुवार को ही शिव विहार में सिलाई का काम करने वाले मोहम्मद मंसूरी को गोली लगने के बाद भर्ती किया गया है। उनके पिता जमालुद्दीन ने बताया, 'जब से दंगा शुरू हुआ था तब से हम लोग घर छोड़कर सुरक्षित जगह भाग गए थे। गुरुवार को जब हमें लगा कि सब सामान्य हो गया है तो हम लोग अपने घर के हालात को देखने गए थे। लेकिन शिव विहार पुलिया से नीचे उतरते ही दंगाइयों ने गोली चलानी शुरू कर दी। हम 15—20 लोग थे, सब भागने लगे। इसी बीच मेरे बेटे को गोली लग गई। पुलिस वाले दूर खड़े थे। जब तक वो मेन रोड से हमारे पास पहुंचते तब तक दंगाई भाग निकले। बाद में पुलिस वाले मेरे बेटे को यहां हॉस्पिटल लेकर आए।'

गुरुवार देर शाम जीटीबी हॉस्पिटल प्रशासन द्वारा हमें बताया गया कि अभी 51 से ज्यादा घायलों का इलाज चल रहा है जिसमें से एक की हालत गंभीर है। यहां पर 9 की मौत इलाज के दौरान हुई है। मौतों का सिलसिला अभी भी रुका नहीं है और शुक्रवार दोपहर को ख़बर लिखे जाने तक मरने वालों का आंकड़ा 42 तक पहुंच गया था।

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