NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
महिलाएं
भारत
राजनीति
तलाक़शुदा मुस्लिम महिलाओं को भी है गुज़ारा भत्ता पाने का अधिकार 
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मुस्लिम महिलाओं को भी गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है। तलाकशुदा औरतें 'इद्दत' की अवधि के बाद भी दूसरी शादी तक गुजारा भत्ता पा सकती हैं।
सोनिया यादव
19 Apr 2022
allahabad high court

"एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला इद्दत की अवधि समाप्त होने के बाद भी जब तक वह पुनर्विवाह नहीं करती, सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपने पति से भरण-पोषण का दावा करने की हकदार होगी।”

ये टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मुस्लिम महिलाओं के हक में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए की। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के साल 2009 में शबाना बानो बनाम इमरान खान मामले का जिक्र करते हुए कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत प्रावधान लाभकारी कानून हैं और इसका लाभ तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को मिलना चाहिए। मुस्लिम महिलाएं इद्दत की अवधि के बाद भी अपना गुजारा भत्ता हासिल कर सकती हैं।

बता दें कि हाई कोर्ट का ये फैसला जिस मामले को लेकर सामने आया है, उसमें इद्दत की अवधि को लेकर विवाद चल रहा था। इस्लाम में इद्दत या इद्दाह किसी भी महिला के तलाक या उसके पति की मृत्यु के बाद की एक निर्धारित अवधि होती है। इसका पालन करना महिला के लिए अनिवार्य है। इस अवधि के दौरान महिला किसी अन्य पुरुष के साथ शादी नहीं कर सकती है। अमूमन ये अवधी 90 दिनों की होता है लेकिन परिस्थितियों के आधार पर बदल भी सकती है। शरियत के मुताबिक इद्दत अवधि के बाद गुजारा-भत्ता लेना या देना हराम (अवैध) है, क्योंकि इद्दत अवधि खत्म होने के बाद पुरुष और महिला का रिश्ता भी खत्म हो जाता है।

हालांकि साल 1985 का शाह बानो मामला हो या 2001 का डेनियल लतीफी मामला सुप्रीम कोर्ट ने हर बार तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए गुजारा भत्ता सुनिश्चित किया है। साल 2009 में शबाना बानो केस में भी कोर्ट ने यही फैसला दिया कि तलाकशुदा महिला को गुजारे भत्ते का पूरा हक है जब तक कि वो दूसरी शादी नहीं करती। कोर्ट ने ये भी साफ किया कि ये अधिकार ‘इद्दत’ की मुद्दत यानी 90 दिन के बाद भी लागू रहेगा।

क्या है पूरा मामला?

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ में एक मुस्लिम महिला की ओर से आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की गई थी। साल 2008 में दाखिल इस याचिका में प्रतापगढ़ की एक सत्र अदालत के 11 अप्रैल 2008 के आदेश को चुनौती दी गई थी। सत्र न्यायालय ने निचली अदालत के 23 जनवरी 2007 को पारित आदेश को पलटते हुए कहा था कि मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ  राइट्स ऑन डिवोर्स) एक्ट 1986 के आने के बाद याची ( जिसने याचिका दाखिल की है) व उसके पति का मामला इसी अधिनियम के अधीन होगा। सत्र न्यायालय ने कहा था कि उक्त अधिनियम की धारा 3 व 4 के तहत ही मुस्लिम तलाकशुदा महिला गुजारा भत्ता पाने की अधिकारी है। ऐसे मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 लागू नहीं होती।

हाईकोर्ट ने सत्र अदालत के इस फैसले को रद्द करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा शबाना बानो मामले में 2009 में दिए गए निर्णय के बाद यह तय हो चुका है कि मुस्लिम तलाकशुदा महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत इद्दत की अवधि के बाद भी गुजारा भत्ता पाने की अधिकारी है, जब तक वह दूसरी शादी नहीं कर लेती। कोर्ट ने इस फैसले के साथ याचिका मंजूर कर ली। हाई कोर्ट की ओर से न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार ने यह अहम नजीर वाला फैसला सुनाया। ये फैसला लाखों महिलाओं के लिए आशा की एक किरण है।

मालूम हो कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान से जीने के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए सीआरपीसी की धारा 125 में गुज़ारा भत्ता का हक़ दिया गया है। देश में महिलाओं के लिए गुजारा भत्ता यानी मेंटेनेंस क्लेम करने के लिए 3 कानून हैं।

मेंटेनेंस क्लेम करने के क्या कानून हैं?

पत्नी अपने पति से तलाक लिए बिना भी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत  गुजारा भत्ता ले सकती है। धारा 125 में पत्नी, माता-पिता और संतान के भरण पोषण के लिए आदेश का प्रावधान है।

हिंदू मैरिज एक्ट-1955 की धारा 24 और 25 के तहत कोई भी महिला अपने पति से मुआवजा मांग सकती है। अगर कानूनी प्रक्रिया के दौरान अदालत को लगता है कि पत्नी के पास आय का साधन नहीं है, जिससे वह अपना गुजारा कर सके या कानूनी लड़ाई लड़ सके, तब अदालत ही तलाक प्रक्रिया के दौरान धारा 24 के तहत गुजारा भत्ता दिला सकती है, जबकि धारा 25 के तहत तलाक के फैसले के साथ ही तय हो जाता है कि पति को स्थायी गुजारा भत्ता यानी एलिमनी कितनी और कैसे और कब देनी है।

'प्रोटेक्शन ऑफ वुमन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005' के तहत भी महिलाएं गुजारा भत्ता ले सकती हैं। यह धारा 125 की तरह ही काम करती है।

दरअसल, हमारे देश में शादी को लेकर अलग-अलग धर्म से जुड़े अलग-अलग कानून है। एक महिला का अपने पति की संपत्ति पर कितना अधिकार है, इसके लिए भी कोई एक समान कानून नहीं है, हर धर्म के अपने निजी कानून हैं। जहां हिंदू (सिख, बौद्ध और जैन) एक कानून के तहत आते हैं और वहीं क्रिश्चियन इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट, 1872 का पालन करते हैं।

निजी कानून संविधान में दिए गए अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकते

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पहले तलाक में सिर्फ मेहर की रकम लौटाना ही काफी मानता था। इसमें गुजारा भत्ता देने की कोई व्यवस्था नहीं थी, खासकर इद्दत की अवधि के बाद। लेकिन शाह बानो ने 62 साल की उम्र में तलाक के बाद अपने हक के लिए पति के खिलाफ कानूनी जंग छेड़ी। निचली अदालत से लेकर हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक ने शाह बानो के हक में फैसला किया। ये फैसला ऐतिहासिक था, जो मुस्लिम संगठनों खासकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मानने से इनकार कर दिया।

इसके बाद दबाव में सियासी नफे-नुकसान को समझते हुए राजीव गांधी सरकार ने 1986 में कोर्ट का फैसला पलट दिया और 986 के फरवरी महीने में सरकार एक नया बिल लेकर आई- मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम। इसके तहत सीआरपीसी की धारा 125 से अलग इस अधिनियम के अनुसार मुस्लिम महिलाओं के तलाक और गुजारे भत्ते के निपटान का नियम बनाया गया।

इस संबंध में वकील आर्शी जैन कहती हैं कि क्योंकि ज्यादातर एक महिला तलाक के बाद अपनी सम्मान की जिंदगी जीने में समर्थ नहीं होती। उसे अपनी जरूरतों के लिए गुजारे भत्ते की जरूरत होती है। समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को बरकरार रखते कई बार कह चुके हैं कि महिलाएं पितृसत्तात्मक ढांचे की दया पर निर्भर नहीं रह सकतीं, जो मौलवियों द्वारा स्थापित किया गया है, जिनकी पवित्र कुरान की अपनी व्याख्या है। किसी भी समुदाय के निजी कानून संविधान में दिए गए अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकते।

कोर्ट का फैसला और मुस्लिम महिलाओं का संघर्ष

आर्शी के मुताबिक इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला कोई नया नहीं है लेकिन खास जरूर है। हम सब शाह बानो केस को एक लैंडमार्क जजमेंट मानते हैं लेकिन शायद कम लोग ही ये जानते होंगे कि शाह बानो से पहले बाई ताहिरा बनाम अली हुसैन और फजलुनबी बनाम के खादिर वली के मामले भी देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचे थे। दोनों ही मामलों में कोर्ट ने फैसला महिलाओं के हक में दिया था। इसके लिए सीआरपीसी की धारा 125 का सहारा लिया गया था। मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम के बाद भी शबाना बानो, सायरा बानो जैसे उदाहरण हैं हमारे बीच जहां सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारों को ऊपर रखते हुए सीआरपीसी की धारा 125 के तहत फैसले किए हैं।

बहरहाल, आज़ादी के इतने सालों बाद भी हमारे देश में अपनी आज़ादी, अपने अधिकारों के लिए आधी आबादी संघर्ष कर रही है। जहां आज भी समाज में बेटी को पराया धन कहा जाता है तो वहीं बहु को जिंदगी भर पराए घर से आई लड़की मान लिया जाता है। इन दो घरों के बीच लड़की के हाथ वाकई क्या आता है ये सोचने के बात है। तलाक लेने की हिम्मत और उसके बाद का संघर्ष एक महिला के लिए कितना दर्दनाक हो सकता है, शायद इसकी कल्पना भी करते डर लगता है। ऐसे में कानून का सहारा ही उसकी उम्मीद बन सकता है, जो निश्चित ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद मज़बूत होगा।

Allahabad High Court
Muslim women
Divorced Muslim women
Muslim Personal Law Board
women's rights

Related Stories

शाहीन बाग से खरगोन : मुस्लिम महिलाओं का शांतिपूर्ण संघर्ष !

दलित और आदिवासी महिलाओं के सम्मान से जुड़े सवाल


बाकी खबरें

  • up elections
    असद रिज़वी
    लखनऊ में रोज़गार, महंगाई, सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन रहे मतदाताओं के लिए बड़े मुद्दे
    24 Feb 2022
    लखनऊ में मतदाओं ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर वोट डाले। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन की बहाली बड़ा मुद्दा था। वहीं कोविड-19 प्रबंधन, कोविड-19 मुफ्त टीका,  मुफ्त अनाज वितरण पर लोगों की अलग-अलग…
  • M.G. Devasahayam
    सतीश भारतीय
    लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त खामियों को उजाकर करती एम.जी देवसहायम की किताब ‘‘चुनावी लोकतंत्र‘‘
    24 Feb 2022
    ‘‘चुनावी लोकतंत्र?‘‘ किताब बताती है कि कैसे चुनावी प्रक्रियाओं की सत्यता को नष्ट करने के व्यवस्थित प्रयासों में तेजी आयी है और कैसे इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
  • Salempur
    विजय विनीत
    यूपी इलेक्शनः सलेमपुर में इस बार नहीं है मोदी लहर, मुकाबला मंडल-कमंडल के बीच होगा 
    24 Feb 2022
    देवरिया जिले की सलेमपुर सीट पर शहर और गावों के वोटर बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कोविड के दौर में योगी सरकार के दावे अपनी जगह है, लेकिन लोगों को याद है कि ऑक्सीजन की कमी और इलाज के अभाव में न जाने कितनों…
  • Inequality
    प्रभात पटनायक
    आर्थिक असमानता: पूंजीवाद बनाम समाजवाद
    24 Feb 2022
    पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के चलते पैदा हुई असमानता मानव इतिहास में अब तक पैदा हुई किसी भी असमानता के मुकाबले सबसे अधिक गहरी असमानता है।
  • putin
    अब्दुल रहमान
    मिन्स्क समझौते और रूस-यूक्रेन संकट में उनकी भूमिका 
    24 Feb 2022
    अति-राष्ट्रवादियों और रूसोफोब्स के दबाव में, यूक्रेन में एक के बाद एक आने वाली सरकारें डोनबास क्षेत्र में रूसी बोलने वाली बड़ी आबादी की शिकायतों को दूर करने में विफल रही हैं। इसके साथ ही, वह इस…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License