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भारत
राजनीति
क्या राजनेताओं को केवल चुनाव के समय रिस्पना की गंदगी नज़र आती है?
देहरादून की जीवनरेखा कही जाने वाली रिस्पना नदी आज एक गंदा नाला बन चुकी है। जिस ओर देखो नज़र अता है बदबूदार काला पानी और प्लास्टिक के कचरे का ढेर। 
सत्यम कुमार
18 Apr 2021
क्या राजनेताओं को केवल चुनाव के समय रिस्पना की गंदगी नज़र आती है?

नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हाइड्रोलॉजी रुड़की के द्वारा, प्रिपरेशन ऑफ़ स्ट्रेटेजिक लैंड एंड वॉटर मैनेजमेंट प्लान फॉर रेजुवेनशन ऑफ़ रिस्पना रिवर सिस्टम नामक एक ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार कर, इरीगेशन डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ़ उत्तराखण्ड देहरादून को, नवम्बर 2019 को सौंपी गयी।

इस रिपोर्ट के अनुसार  नदी  का पानी राजपुर कैनाल के बाद ही प्रदूषित होना शुरू हो जाता हैं। जैसे-जैसे नदी आगे की ओर बढ़ती है, नदी के पानी में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जाता है। ये नदी जब मोथरोवाला के पास बिंदाल नदी में मिलती है तो और भी प्रदूषित हो जाती है। क्योंकि बिंदाल भी अपने साथ शहर से निकले सीवर और गंदी नालियों का पानी बहाकर लाती हैं। दुधली के पास आकर जब ये दोनों नदी, एक तीसरी नदी सुसवा में मिलती है तो पानी में प्रदुषण का स्तर इतना बढ़ जाता है कि स्वच्छ पानी के किसी भी मानक को पूर्ण करने में असमर्थ है।

रिस्पना एक बारहमासी नदी है लेकिन वर्तमान में गैर बरसाती मौसम में यह लगभग सुख जाती है। रिपोर्ट बताती है कि यदि रिस्पना को पुनर्जीवित करना है तो उसके लिए नदी में अलग-अलग स्थान पर जलग्रह बनाये जाने चाहिये ताकि मानसून में जब बारिश होती है तो उस जल को सालभर नदी का प्रवाह बनायें रखने के उपयोग में लाया जा सके। लेकिन इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह करना काफी मुश्किल है क्योंकी नदी में स्थान स्थान पर अतिक्रमण देखने को मिलता है।

उत्तराखंड रिवर रेजुवेनशन कमेटी द्वारा तैयार एक्शन प्लान फॉर सुसवा रेजुवेनशन की रिपोर्ट में भी यह कहा गया है कि रिस्पना और बिंदाल दो मुख्य नदियाँ है जो नगर निगम देहरादून के नालों को ढोती हैं। उत्तराखंड पेयजल निगम के अनुसार 9.386 MLD नगर निगम का अपशिष्ट जल 177 नालों और नदी के दोनों ओर बसे 2901 घरो के आउटलेटों के द्वारा नदी में मिलता है। इसी प्रकार 18.14 MLD नगरपालिका अपशिष्ट बिंदाल में मिलता है। आप को याद दिला दें कि सुसवा गंगा की एक सहायक नदी है जो रायवाला के पास गंगा में मिलती है, जिस को नमामि गंगा प्रोजेक्ट में भी शामिल किया गया है। रिस्पना लगभग 19 कि.मी. एवं बिंदाल 16 कि.मी. शहरी हिस्से से होकर गुजरती है। वे अपने साथ बहाकर लाती है शहर की गंदगी का अधिकतम  हिस्सा जो आगे जाकर पहले सुसवा और फिर गंगा में मिल जाता है।

सोसायटी ऑफ पॉल्यूशन एंड एनवायरमेंटल कंजर्वेशन साइंटिस्ट के द्वारा हुए एक अध्ययन में पाया गया कि रिस्पना के साथ साथ बिंदाल, जो कि एक बरसाती नदी है यह भी आज साल भर सीवर और कारखानों से निकलने वाले दूषित पानी से भरी रहती है। जिस कारण इन नदियों के पानी में बहुत से हानिकारक तत्व जैसे क्रोमियम, आयरन, लेड, मैग्नीज, ऑयल एंड ग्रीस, क्लोराइड, फॉस्फेट, सल्फेट और नाइट्रेट आदि की मात्रा बहुत बढ़ जाती है। परिणाम यह है कि जीवनदायिनी नदी आज एक गंदे नाले का  रूप ले  चुकी है ।

दून वैली अपने बासमती चावल के लिये देश भर में प्रसिद्ध है, दुधली और उसके आसपास के क्षेत्र में भी अधिकांश चावल की ही खेती होती है। लेकिन पिछले कुछ दशकों से यहां के चावल की वो महक कही गुम हो चुकी है, जो यहाँ के चावल को एक अलग पहचान दिलाती थी। क्षेत्र के किसान  गगन छेत्री का कहना है कि क्षेत्र के किसान खेती के लिये सुसवा का पानी इस्तेमाल करते हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों से नदी का पानी इतना दूषित हो चुका है कि क्षेत्र में पैदा होने वाले बासमती चावल की महक अब पहले की तरह नहीं है। फसलों की पैदावार भी घटी है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि  नदी का पानी इस कदर जहरीला हो चुका है और नदी में रहने वाले जलीय जीव विलुप्त हो चुके हैं। नदी के पानी में बहकर आया प्लास्टिक खेतों की मिट्टी और फसल दोनों को हानि पहुँचाता है।

नदी किनारे बसे वन गुर्जर जिन का मुख्य कार्य पशुपालन है। उन के दूधारू  पशु भी इस नदी का पानी पीते हैं। और इन के  दूध को शहर में बेचा जाता है। दुधली क्षेत्रवासियोंके अनुसार क्षेत्र में कैंसर के रोगियों की संख्या भी बढ़ी है।

हालांकि, यही हालात मौजूदा वक्त देश की अधिकतर नदियों की है। परन्तु उत्तराखंड की अस्थायी राजधानी देहरादून में बहने वाली रिस्पना नदी की हालत बद से बतर हो  चुकी है। वैसे तो राज्य की पूर्व सरकार के द्वारा दोनों नदियों पर सीवर ट्रीटमेंट प्लांट भी बनाये गये  हैं। लेकिन, नदी की हालत अभी भी ख़राब है। नदी की ऐसी हालत को देखते हुए मौजूदा सरकार में मुख्यमंत्री रह चुके त्रिवेंद्र सिंह रावत  ने बर्ष 2018 को रिस्पना नदी के पुनर्जीवन अभियान का शुभारंभ करते हुए कहा था कि वो रिस्पना को फिर से ऋषिपर्णा बनाएंगे। जिस के तहत नदी के उद्गम से लेकर संगम तक पौधरोपण के लिए ढाई लाख पेड़ लगाये जाने थे। राज्य सरकार ने इसे अपना ड्रीम प्रोजेक्ट कहा और नाम दिया मिशन  रिस्पना। जिस के तहत इन दोनों नदियों में गिरने वाले गंदे नालों को बंद (टैप) कर इन्हें सीवर ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ने की योजना तैयार की गई थी। गंगा की सहायक नदियां होने के कारण इन को नमामि गंगा प्रोजेक्ट में शामिल किया गया था। स्थानीय अख़बार के द्वारा मिली जानकारी के अनुसार इस महत्वाकांक्षी योजना पर 63.75 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की बात कही गयी थी। ये मुद्दा राजनीतिक द्रष्टिकोण से भी बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सुसवा नदी का अधिकांश हिस्सा त्रिवेंद्र सिंह रावत के विधानसभा क्षेत्र में ही आता है। 

दून विश्वविद्यालय से एनवायरनमेंट एंड नेचुरल रिसोर्स डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. सुनीत नैथानी का कहना है कि रिस्पना एक ऐसी नदी है जो सरफेस के साथ ग्राउंड के नीचे भी बहती है, जो क्षेत्र के ग्राउंड वाटर और वाटर लेवल दोनों को प्रभावित करती है । जिस कारण नदी का साफ और निरंतर प्रवाह में होना बहुत आवश्यक है। साथ ही यह भी बताते हैं की यदि रिस्पना को ऋषिपर्णा बनाना है तो उसके लिए भगीरथ प्रयास की आवश्यकता होगी। आसान शब्दों में बात करें तो नदी के आसपास की मिट्टी पथरीली है जिस कारण वहा केवल उसी प्रकार के पेड़ लगाये जाएँ जो इस तरह की मिटी में पनप सकें। साथ ही कुछ ऐसे उपाय किये जाएँ जिस से नदी में सालभर उचित जलप्रवाह बना रहे। 

समाजसेवी अजय शर्मा का कहना है कि सुसवा नदी का पानी कभी इतना साफ हुआ करता था कि नदी किनारे पैदा होने वाली घास भी साग कही जाती थी। वहीं दून के लोग कभी रिस्पना का पानी ही पीते थे। लेकिन आज नदी का पानी इतना बदबूदार है कि  नदी किनारे चलना भी दुर्भर है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि रिस्पना को रौंदने वाले, उस पर बस्तियां बसाने वाले, उसी के दम पर विधानसभा में पहुँच रहे हैं और सरकार का हिस्सा बन रहे हैं। और नदी की सफाई की बात केवल चुनावी प्रचार के लिये करते हैं। यदि रिस्पना को ऋषिपर्णा बनाना है तो सबसे पहले नदी में गिरने वाले गंदे नालो को नदी से हटाना होगा। जनता से किये गये सभी वादों को जमीनी स्तर पर पूर्ण करना होगा। साथ ही जनता को भी नदी के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझ कर कर नदी की सफाई में अपना योगदान देना होगा।

दून के लिये रिस्पना के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यदि  रिस्पना पुनर्जीवित हो जाती है तो केवल  एक नदी ही पुनर्जीवित नहीं होगी, इस से पुनर्जीवित होगी एक सभ्यता, एक संस्कृति, एक विरासत। पुनर्जीवित होगा एक शहर और स्थापित होंगी नई परम्परा, क्योंकि मानव सभ्यताओं और नदियों का पुराना रिश्ता जो रहा है।

लेकिन सच तो यह है कि एक मुहाने पर संकल्प लेने भर से रिस्पना को पुनर्जीवन नहीं मिलने वाला। क्योंकि एक्शन प्लान फॉर सुसवा रेजुवेनशन की रिपोर्ट के अनुसार रिस्पना पुनर्जीवन के लिये किये जाने वाले सभी कार्यों को मार्च 2021 तक समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन स्थानीय लोगों की माने तो धरातल पर अभी भी नदी की हालत में कोई सुधार देखने को नहीं मिला है। अतः अपना संकल्प सिद्ध करने के लिये सरकार  को खुद मैदान में डटकर मोर्चा लेना होगा, इस संकल्प को प्राथमिकता में रखना होगा। रिस्पना तभी बन पायेगी ऋषिपर्णा।

(लेखक देहरादून स्थित एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

Uttrakhand
Dehradun
Respina river
National Institute of Hydrology
Trivendra Singh Rawat
uttrakhand government
Tirath Singh Rawat

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