NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
कोविड-19 का घरेलू कामगारों पर संकट : बिना वेतन की छुट्टियों का डर
घरेलू मदद के रूप में मुंबई में लगभग तीन लाख से अधिक श्रमिक काम करते हैं। इनमें से अधिकांश को घर के मालिकों ने काम पर आने से मना कर दिया है – ऐसा उन्होंने सामाजिक दूरी रखने के उपायों के तहत किया है।
अमय तिरोदकर
19 Mar 2020
Translated by महेश कुमार
घरेलू कामगारों पर संकट
Image Courtesy : The Indian Express

देश में नावेल कोरोनावायरस संक्रमण के तेज़ी से फैलने से, इसकी आर्थिक मार भी समाज के ग़रीब वर्गों पर भारी पड़ने लगी है। महिलाएं और पुरुष जो घरेलू मदद के रूप में काम करते हैं, विशेष रूप से बड़े शहरों में, उन्हें डर है कि इस महामारी से उन्हें अपनी नौकरी या कम से कम दो महीने का वेतन गंवाना पड़ सकता है।

37 वर्षीय शुभांगी जाधव जो खार, मुंबई में घरेलू मदद के रूप में काम करती हैं, ने कहा, "मैं बांद्रा के पाली हिल इलाक़े में काम करती हूँ। मैं घर के बर्तन और फ़र्श साफ़ करती हूँ। मैं चार घरों का काम करती हूं। लेकिन कोरोनोवायरस के कारण घर के मालिकों ने मुझे इस बीमारी के ख़त्म होने तक काम पर न आने को कहा है। इसलिए अब मेरे पास कोई काम नहीं है।"

घरेलू मदद के रूप में मुंबई में लगभग तीन लाख से अधिक श्रमिक काम करते हैं। इनमें से अधिकांश को घर के मालिकों ने काम पर आने से मना कर दिया है – ऐसा उन्होंने सामाजिक दूरी रखने के उपायों के तहत किया है। हालांकि इसका अनुमान लगाना मुश्किल है कि यह इस महामारी का असर कितने समय तक रहने वाला है, लेकिन इन घरेलू मददों, ख़ास तौर पर महिलाओं को आजीविका का नुकसान हो रहा है।

भारती शर्मा एक वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं और कई महिला संगठनों के साथ काम करती हैं। उन्होंने कहा, "हर घर में कार्यरत घरेलू सहायक कों एक घर से अधिकतम 2,000-3000 रुपये की कमाई होती है। इसलिए, उनकी कुल आय करीब 7,000-8,000 रुपये महावार से अधिक नहीं है। यदि वे इस वाईरस की वजह से एक या दो महीने का वेतन खो देती हैं, तो इसका उनकी घरेलू आम्दानी पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।"

घरेलू मदद का बड़ा हिस्सा संगठित नहीं है, यही वजह है कि इनके लिए कोई दबाव समूह नहीं है जो राज्य सरकार को सुनने के लिए मजबूर कर सके।

डोमेस्टिक हेल्प आर्गेनाइजेशन की बबली रावत को उम्मीद है कि राज्य सरकार हस्तक्षेप करेगी और लोगों से अपील करेगी कि वे इन जबरन दी जाने वाली छुट्टियों के लिए वेतन में कटौती न करें। रावत ने कहा कि, "हर दूसरे दिन काम या 31 मार्च तक छुट्टी होनी चाहिए। लेकिन साथ ही, राज्य सरकार को लोगों से इन महिलाओं के वेतन में कटौती न करने के लिए अपील करनी चाहिए। क्योंकि एक महीने का वेतन खोना भी उनके लिए बड़ा नुकसान है।"

कई अन्य तरह के सुझाव भी दिए गए हैं। घरेलू मदद के रूप में काम करने वाली महिलाओं में से कई विरार, वसई, नालासोपारा, बदलापुर या विटवा और दीघा जैसे उपनगरीय क्षेत्रों से आती हैं। वे काम पर आते-जाते जोखिम के प्रति संवेदनशील हैं। श्री मुक्ति संगठन की ज्योति म्हापसेकर ने कहा, “सरकार कों कम से कम सभी को सैनिटाइज़र और मास्क देना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें हाथ के दस्ताने भी मिलने चाहिए। यह वायरस के फैलने की संभावना को कम करेगा।"

कुछ घर के मालिकों ने अपनी घरेलू मदद को काम पर नहीं आने को कहा है, लेकिन उन्होंने पूरा वेतन देने का आश्वासन दिया है। अक्षता सकपाल भांडुप में काम करती हैं और कहती हैं कि दो मकान मालिकों ने उन्हें पूरा वेतन देने का वादा किया है। लेकिन उसी समय दो अन्य मालिकों ने वेतन देने के बारे में कुछ नहीं कहा है। उन्होंने उसे काम पर नहीं आने के लिए कह दिया है। अक्षता ने कहा, "सभी लोग एक जैसे नहीं हैं। कुछ हमारा ख़याल रखते हैं और कुछ नहीं रख पाते हैं। इसलिए हमारे जैसे लोगों के लिए सरकार की तरफ़ से कुछ तो समर्थन होना चाहिए।"

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Domestic Helps’ Plight Amid COVID-19 Crisis: Forced Leaves and Fear of No Salary

Domestic help
COVID-19
Coronavirus
Mumbai
Maharashtra Domestic Workers
China
Wuhan

Related Stories

यूपी चुनाव: बग़ैर किसी सरकारी मदद के अपने वजूद के लिए लड़तीं कोविड विधवाएं

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

सड़क पर अस्पताल: बिहार में शुरू हुआ अनोखा जन अभियान, स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए जनता ने किया चक्का जाम

लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़

किसान आंदोलन@378 : कब, क्या और कैसे… पूरे 13 महीने का ब्योरा

पश्चिम बंगाल में मनरेगा का क्रियान्वयन खराब, केंद्र के रवैये पर भी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाए सवाल

यूपी: शाहजहांपुर में प्रदर्शनकारी आशा कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पीटा, यूनियन ने दी टीकाकरण अभियान के बहिष्कार की धमकी

दिल्ली: बढ़ती महंगाई के ख़िलाफ़ मज़दूर, महिला, छात्र, नौजवान, शिक्षक, रंगकर्मी एंव प्रोफेशनल ने निकाली साईकिल रैली

पश्चिम बंगाल: ईंट-भट्ठा उद्योग के बंद होने से संकट का सामना कर रहे एक लाख से ज़्यादा श्रमिक

महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या


बाकी खबरें

  • Sudan
    पवन कुलकर्णी
    कड़ी कार्रवाई के बावजूद सूडान में सैन्य तख़्तापलट का विरोध जारी
    18 Jan 2022
    सुरक्षा बलों की ओर से बढ़ती हिंसा के बावजूद अमेरिका और उसके क्षेत्रीय और पश्चिमी सहयोगियों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र भी बातचीत का आह्वान करते रहे हैं। हालांकि, सड़कों पर "कोई बातचीत नहीं, कोई समझौता…
  • CSTO
    एम. के. भद्रकुमार
    कज़ाख़िस्तान में पूरा हुआ CSTO का मिशन 
    18 Jan 2022
    रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बुधवार को क्रेमलिन में रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु के साथ कज़ाख़िस्तान मिशन के बारे में कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीट ऑर्गनाइजेशन की “वर्किंग मीटिंग” के बाद दी गई चेतावनी…
  • election rally
    रवि शंकर दुबे
    क्या सिर्फ़ विपक्षियों के लिए हैं कोरोना गाइडलाइन? बीजेपी के जुलूस चुनाव आयोग की नज़रो से दूर क्यों?
    18 Jan 2022
    कोरोना गाइडलाइंस के परवाह न करते हुए हर राजनीतिक दल अपनी-अपनी तरह से प्रचार में जुटे हैं, ऐसे में विपक्षी पार्टियों पर कई मामले दर्ज किए जा चुके हैं लेकिन बीजेपी के चुनावी जुलूसों पर अब भी कोई बड़ी…
  • Rohit vemula
    फ़र्रह शकेब
    स्मृति शेष: रोहित वेमूला की “संस्थागत हत्या” के 6 वर्ष बाद क्या कुछ बदला है
    18 Jan 2022
    दलित उत्पीड़न की घटनायें हमारे सामान्य जीवन में इतनी सामान्य हो गयी हैं कि हम और हमारी सामूहिक चेतना इसकी आदी हो चुकी है। लेकिन इन्हीं के दरमियान बीच-बीच में बज़ाहिर कुछ सामान्य सी घटनाओं के प्रतिरोध…
  • bank
    प्रभात पटनायक
    पूंजीवाद के अंतर्गत वित्तीय बाज़ारों के लिए बैंक का निजीकरण हितकर नहीं
    18 Jan 2022
    बैंकों का सरकारी स्वामित्व न केवल संस्थागत ऋण की व्यापक पहुंच प्रदान करता है बल्कि पूंजीवाद की वित्तीय प्रणाली की स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License