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दोहरा मापदंड: बांग्लादेश की आज़ादी में कथित सत्याग्रह और म्यांमार के लोगों का प्रवेश निषेध!
भारत सरकार उन लोगों से कैसे अलग है, जो उस समय अपनी इमारत का दरवाज़ा बंद कर रहे थे जब हमले की शिकार औरत को उनकी मदद की ज़रूरत थी? उसने भी सख़्ती से हुक्म दिया कि म्यांमार और भारत के बीच की सीमा सील कर दी जाए ताकि वहाँ की सेना की हिंसा के शिकार भारत न आ पाएँ।
अपूर्वानंद
31 Mar 2021
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भारत-म्यांमार सीमा। फोटो साभार : अमर उजाला

कुछ दिन पहले अमेरिका के मैनहटन में फुटपाथ पर एक 65 साल की एशियाई महिला पर सामने से आ रहे एक व्यक्ति ने अचानक हमला कर दिया। उसने उसे मारकर गिरा दिया और उसे कई बार लात से ठोकर मारता रहा। सामने की इमारत में काम कर रहे लोगों ने इस हमले को देखा। अचानक हमले से चौंक गई गई औरत को गिरते और बार बार उसपर वार करते शख्स को भी वे देखते रहे। इतना वक्त था कि वे भागकर उस आदमी को पकड़ सकते थे और उस औरत को बचा सकते थे। लेकिन न सिर्फ वे देखते रहे बल्कि अपनी इमारत का दरवाजा बंद कर लिया। इस हमले के वीडियो के प्रसारित होते ही उस इलाके की पुलिस ने हमलावर की पहचान के लिए लोगों से मदद माँगी है। जो हमला देखकर उदासीन ही नहीं रहे बल्कि हिंसा की शिकार उस औरत के मुँह पर जिन्होंने दरवाज़ा बंद कर लिया, उन्हें नौकरी से निलंबित कर दिया गया है।

भारत सरकार उन लोगों से कैसे अलग है, जो उस समय अपनी इमारत का दरवाज़ा बंद कर रहे थे जब हमले की शिकार औरत को उनकी मदद की ज़रूरत थी? उसने भी सख्ती से हुक्म दिया कि म्यांमार और भारत के बीच की सीमा सील कर दी जाए ताकि वहाँ की सेना की हिंसा के शिकार भारत न आ पाएँ।  

यह राहत की बात है कि मणिपुर सरकार ने अपना वह परिपत्र वापस ले लिया है जिसके मुताबिक़ पड़ोसी म्यांमार में जनतंत्र की बहाली के लिए आन्दोलन करने वालों पर फौजी हिंसा के चलते वहाँ से भागकर भारत में शरण लेने आए म्यांमार के लोगों को खाना पानी भी नहीं देना था और उन्हें नरमी से म्यांमार लौटा देना था। इस परिपत्र ने भारत के लोगों को झकझोर दिया और इसकी व्यापक भर्त्सना की गई। इस मानवीय रोष का कुछ असर हुआ। अब मणिपुर सरकार ने एक दूसरा परिपत्र जारी किया है जिसमें यह कहा गया है  कि पहले परिपत्र को गलत समझा गया और उसकी गलत व्याख्या की जा रही है इसलिए उसे वापस लिया जा रहा है। यह भी कहा गया है कि शरणार्थियों को मानवीय सहायता दी जा रही है।

पहला परिपत्र इतना स्पष्ट है कि उसे समझने के लिए किसी विशेष बुद्धि की ज़रूरत नहीं। साफ़ कहा गया था कि खाना और पनाह देने के लिए जिला प्रशासन कोई शिविर नहीं खोलेगा। इतना ही नहीं वह किसी सामाजिक संगठन को भी ऐसा करने से रोकेगा। अब चतुर्दिक आलोचना के बाद संभवतः लज्जित प्रशासन ने कहा है कि वह पहले ही शरणार्थियों को मानवीय सहायता दे रहा है। लेकिन यह गलत समझे जाने के मामला न था। भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार का समझा बूझा फैसला था। यह इससे साबित होता है कि करीबी राज्य मिजोरम में इसी तरह शरण लेने आए म्यांमार के लोगों को पनाह देने और कोई  भी मदद देने से केंद्र सरकार ने मना किया। यह अलग बात है कि मिजोरम के मुख्यमंत्री ने गृह मंत्रालय के उस आदेश को मानने से इनकार कर दिया है जिसमें कहा गया है कि म्यांमार से अवैध तरीके से भारत में आ रहे लोगों को शरण न दी जाए और जल्दी वापस भेजा जाए।

मिजोरम के मुख्यमंत्री ने कहा है उनकी सीमा से लगे म्यांमार के इलाके में चिन समुदाय के लोग रहते हैं जिनसे मिजोरम के लोगों का पुराना रिश्ता है। भारत की आजादी से भी काफी पुराना। इस संबंध को इस राष्ट्र राज्य के रणनीतिक हित के लिए कुर्बान नहीं किया जा सकता। लेकिन यह तर्क फिर भी एक “सीमित मानवीयता” का तर्क है। हम सिर्फ अपने जैसे लोगों के दुःख में ही शामिल हों, इसमें कोई बड़ाई नहीं। हर तरह से अजनबी की तरफ भी अगर आप हाथ बढ़ा सकें तब आपको इंसान माना जाएगा।

मणिपुर सरकार की इस सफाई के बावजूद रिपोर्ट है कि सीमा पर असम राईफल्स की गश्त इतनी सख्त कर दी गई है कि शरणार्थी भारत में प्रवेश ही न कर पाएँ। इसका सीधा मतलब यही है कि उन्हें म्यांमार की फौज के हाथों क़त्ल होने के लिए खुला छोड़ा जा रहा है। फिर मणिपुर सरकार के नए परिपत्र का क्या अर्थ रह जाता है?

अपनी फौज की हिंसा से बचकर भाग रहे सैकड़ों लोग जंगलों में फंसे हुए हैं। एक तरफ म्यांमार की सेना है, दूसरी तरफ भारत का सैन्य बल। चूँकि इन दोनों देशों की सीमा की बाड़ेबंदी नहीं हुई है, किसी तरह बच-बचा कर म्यांमार के लोग भारत में घुस पा रहे हैं। लेकिन अभी भी फँसे हुए लोगों की संख्या का ठीक ठीक अंदाज नहीं है। मिजोरम सरकार ने जब ऐसे लोगों की मदद की बात की तो केंद्र सरकार ने उसे फटकारा और अपना निर्देश वापस लेने को बाध्य किया।

लोग कह सकते हैं कि देश और राष्ट्र को अपनी आतंरिक सुरक्षा की फिक्र करनी होती है और उसे रणनीतिक रिश्ते पड़ोसी मुल्कों से बनाए रखने पड़ते हैं। उसने हर मुल्क की जनता की हिफाजत का ठेका नहीं ले रखा है। वह दूसरे देश की जनतांत्रिक लड़ाई नहीं लड़ सकता। लेकिन अभी ही तो भारत के प्रधानमंत्री ने बांग्लादेश की स्वाधीनता की स्वर्ण जयंती पर अतिथि के रूप में बोलते हुए दावा किया कि बांग्लादेश की आज़ादी के लिए भारत में सत्याग्रह करते हुए वे जेल गए थे। उनके इस दावे की सच्चाई की परीक्षा को एक तरफ छोड़ दें इसके पीछे के विचार से किसी से असहमति नहीं हो सकती। किसी दूसरे देश में अपने जनतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़नेवाली जनता का समर्थन किया जाना चाहिए। उसके चलते आपको जेल जाना पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए।

ऐसा नहीं हो सकता कि यह सिद्धांत 1971 में तो ठीक हो लेकिन 20 साल बाद वह गलत हो जाए। उस समय जो दूसरे मुल्क की जनता के संघर्ष में साथ देने के लिए अपनी आज़ादी गँवा सकता था आज वह दूसरे पड़ोसी मुल्क की जनता के साथ न सिर्फ नहीं खड़ा है बल्कि उसकी हत्या करनेवाली फौज के सालाना जश्न में कातिल के साथ जाम उठा रहा है। या यह कहा जाएगा कि तब मामला जनतंत्र का नहीं था, पाकिस्तान के टुकड़े करने का था! हम जनतंत्र की आड़ में पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहते थे!

आज की सरकार जो करे,1971 की भारत सरकार ने अपना राजनयिक और रणनीतिक कौशल और संयम बनाए रखा था और पाकिस्तान के पूर्वी बंगाल की संघर्षरत जनता के पक्ष में विश्व जनमत तैयार किया था और बाद में उस जनता को अपनी फौजी मदद भी दी थी। आज की सरकार का रुख म्यांमार की उस जनता के खिलाफ है जो अपनी सेना की हिंसा के खिलाफ उठ खड़ी हुई है। आज की भारत सरकार उस जनता को वापस फौज के हवाले कर रही है।

म्यांमार में जनतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार को बर्खास्त करके सेना ने फिर से सत्ता पर एकाधिकार कर लिया है। पिछले कुछ बरस से जनतंत्र का अनुभव कर चुकी म्यांमार की जनता को यह मंजूर नहीं है और उसने विद्रोह कर दिया है। 1962 से सत्ता पर काबिज सेना ने 2010 में सत्ता से अपनी पकड़ कुछ ढीली की थी। सालों से नज़रबंद आंग सान सू की को रिहा किया और उनके दल नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी को जनतांत्रिक सरकार में शामिल होने की राह खोली। यह सेना के द्वारा नियंत्रित जनतंत्र था। सेना ने वहाँ की संसद में अपने लिए चौथाई जगहें आरक्षित कर ली थीं। आंग सान सू की उम्मीद थी कि वे सेना के इस नियंत्रण को और ढीला कर पाएँगी। लेकिन उन्होंने इसके लिए कई समझौते किए। सबसे शर्मनाक था रोहंगिया जनता के संहार के पक्ष में उनका खड़ा होना और अंतरराष्ट्रीय पटल पर इस मामले में अपनी फौज की वकालत करना। इस एक चीज़ ने उनकी साख पूरी तरह खत्म कर दी। उन्होंने अपने देश में बहुसंख्यकवादी उन्माद का साथ दिया। शायद इसी वजह से वे पिछले साल फिर चुन कर आईं। फौज ने आरोप लगाया कि चुनाव में अनियमितता हुई है और उसने सरकार को सत्ता से बेदखल करके आंग सान सू की को फिर से गिरफ्तार कर लिया।

लेकिन जनतंत्र का स्वाद चख चुकी जनता ने नेता विहीन होने का बहाना नहीं लिया। वह उठ खड़ी हुई। तब से आज तक सैकड़ों विरोध प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी हो रही है।

चीन पूरी तरह फौज के साथ है। रूस ने भी उसका समर्थन कर दिया है। पूर्वी एशिया के देश शायद ही कोई पहल लें। भारत ने एक औपचारिक बयान भर जारी किया है। लेकिन जिस समय सेना लोगों को कुचल रही है और उनका क़त्ल कर रही है, उस समय भारत ने सेना के उत्सव में भाग लेने के लिए अपना प्रतिनिधि भेजा। फिर वह किसकी मित्र है? म्यांमार की सेना की या उसकी जनता की?

भारत, जो यह दावा कर रहा है कि उसका प्रभाव दुनिया में किसी भी समय के मुकाबले कहीं अधिक है, आज अपने पड़ोस में जुल्म के शिकार लोगों के मुँह पर दरवाजा बंद कर रहा है। यह सभ्यता के किसी भी नियम के खिलाफ है। जो यह सोचकर खुश थे कि रोहंगिया लोगों पर जुल्म हो रहा है बल्कि उस जुल्म में शामिल थे आज वे  जुल्म के शिकार हैं। भारत ने कुछ ही समय पहले एक कानून बनाया जिसके सहारे वह पड़ोसी मुल्कों में जुल्म झेल रहे गैर मुसलमानों को नागरिकता देना चाहता है। म्यांमार भले ही उन तीन मुल्कों में न हो, पड़ोसी तो है। उसमें जुल्म झेल रहे बौद्धों को भी भारत क्यों शरण नहीं देना चाहता? क्या इससे यह नहीं मालूम होता कि जब आप अपनी इंसानियत से एक हिस्से को वंचित करते हैं तो वह इंसानियत ज़िंदा नहीं रहती?

भारत की जनता को तय करना होगा कि वह एक पड़ोसी मुल्क में चल रहे जनतांत्रिक आंदोलन के साथ खड़ी होगी या एक खुदगर्ज, संकीर्ण और असंवेदनशील सरकार की अमानवीयता का साथ देगी।

(अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक और स्वतंत्र लेखक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)


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