NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
दवाओं की महंगाई महंगे तेल की नहीं बल्कि बेकार सरकारी नीतियों का परिणाम है
क्या दवाओं की क़ीमतें भी कच्चे तेल की क़ीमतों में इज़ाफ़े की वजह से बढ़ी हैं?
अजय कुमार
31 Mar 2022
medicine

सरकार बेकार काम करने के बावजूद चुनाव जीत रही है। कमाई और रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं और महंगाई बढ़ती जा रही है। सर्फ़ साबुन तेल रसाई गैस पेट्रोल सहित रोजाना के जीवन में खपत होने वाली हर सामान की कीमत बढ़ गयी है। 1 अप्रैल के बाद दवाई के दाम भी बढ़ने का ऐलान कर दिया गया है। यह वैसे देश में हो रहा है, जहां स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च का 65 फीसदी लोगों की तरफ से किया जाता है। यानी अगर दवाओं की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका असर उन पर ज्यादा पड़ेगा जिनकी जेब हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद भी सरकारी नीतियों की वजह से हमेशा ढीली रहती है।

मेडिकल दवाओं और मशीनों की कीमतों को तय करना का काम नेशनल फार्मासुटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) करती है। NPPA ने तय किया है कि 800 आवश्यक दवाओं और मशीनों की कीमतों में 10 प्रतिशत का इजाफा किया जाएगा। 1 अप्रैल से जिन 800 आवश्यक दवाओं की कीमतें बढ़ेंगी उसमें एंटीबायोटिक्स, सर्दी-खांसी की दवाएं, कान-नाक और गले की दवाएं, एंटीसेप्टिक्स, एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स, दर्द और गैस की दवाएं शामिल हैं। बुखार में काम आने वाली पैरासिटामोल और बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज वाली एंटीबायोटिक्स एजिथ्रोमाइसिन भी इनमें शामिल है। गर्भवती महिलाओं के लिए फोलिक एसिड, विटामिन और मिनरल्स की कमी को दूर करने वाली दवाएं भी इसी श्रेणी में आती हैं।

यह सब वे दवाइयां हैं जिनका इस्तेमाल हर व्यक्ति कभी न कभी जरूर करता है। या यह कह लीजिये कि यह सब वह दवाइयां हैं जिनका इस्तेमाल सामान्य बुखार से लेकर गंभीर बीमारी के लिए किया जाता है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इन दवाओं की कीमत इसलिए बढ़ी है क्योंकि घरेलू दवा कंपनियों के लॉबी समूह बहुत लम्बे समय से आवश्यक दवाओं की कीमत में 10 प्रतिशत इजाफा के लिए दबाव बना रहे थे।

अब आप पूछेंगे कि जब दवा कंपनियां बनाती हैं तो वह कीमत बढ़ाने के लिए सरकार से क्यों कह कह रही है? इस पर जानकारों कहना है कि आवश्यक दवाएं यानी एसेंशियल मेडिसिन अनुसूचित लिस्ट के अंदर आती है। ड्रग्स प्राइस कंट्रोल आर्डर 2013 के तहत नियम यह है कि आवश्यक दवाओं की कीमत सरकार की अनुमति के बाद थोक बिक्री सूचकांक के आधार पर तय होगी। कीमतों की वार्षिक बढ़ोतरी को सरकार के जरिए नियंत्रित किया जाएगा। अगर थोक बिक्री सूचकांक के आधार पर बढ़ोतरी होगी तो सालाना इजाफा 5 प्रतिशत से अधिक का नहीं हो सकता है। दवाओं के कुल उधोग में 15 प्रतिशत हिस्सा आवश्यक दवाओं का है। बाकी 85 प्रतिशत दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी अपने आप 10 प्रतिशत की सालाना दर से की जा सकती है। फार्मा लॉबी कह रही है कि आवश्यक दवा बनाने के इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी हो रही है इसलिए आवश्यक दवाओं की कीमतों में भी 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी जाए।

दवा कारोबारियों की लागत क्यों बढ़ रही है? इसका जवाब यह है कि जिन घटकों से मिलकर दवा बनती है, जिसे तकनीकी भाषा  में एक्टीव फार्मासूटिकल ड्रग्स कहा जाता है उनका तकरीबन 70 से 80 फीसदी हिस्सा चीन से आता है। दवा की दुनिया से जुड़े कार्यकर्त्ता कहते हैं कि तकरीबन 1994 तक भारत इस मामले में स्वनिर्भर था। अधिकतर एपीआई खुद बना लिया करता था। वह कंपनियां बर्बाद हो चुकी है। भारत चीन पर निर्भर है।अगर कीमतें वहां बढ़ती है तो यहाँ भी बढ़ना तय है। यही हो रहा है। 

लेकिन इन सबके बीच भी एक जरूरी पेंच है। दवाई कारोबार को बड़े नजदीक से देखने वाले अमिताभ गुहा बताते हैं कि यह बात ठीक है कि चीन में एपीआई की कीमतें बढ़ रही हैं तो दवा बनाने की लागत बढ़ेगी। लेकिन सवाल तो यह भी उठता है कि भारत की एपीआई बनाने वाली कंपनियों को सरकारों ने बर्बाद क्यों कर दिया? इनपुट कॉस्ट बढ़ रही है लेकिन दवा कंपनियों के बैलेंस शीट की छानबीन की जानी चाहिए। उन्होंने खूब कमाई की है।  उनका मुनाफा जबरदस्त है। लागत से कई गुना मार्जिन पर वह दवाएं बेचती हैं।  कोरोना में जब सब तबाह हो रहा था उस समय भी दवा कंपनियों ने जमकर कमाई की।  वह आसानी से बढ़ी हुई कीमतों को सहन कर सकती हैं लेकिन नहीं करना चाहती क्योंकि उन्हें और अधिक मुनाफा कमाना है।

सीलिंग प्राइस यानी किसी दवाई की सबसे ऊपरी कीमत तय करने के लिए सरकार अमुक दवाई से जुडी उन सभी ब्रांड और जेनेरिक वर्जन की औसत लागत निकालती है जिनका बाजार में हिस्सा एक प्रतिशत से अधिक है। यहाँ पर एक प्रतिशत की शर्त होने की वजह से जेनरिक वर्जन की सभी दवाएं बाहर हो जाती है। डेढ़ लाख करोड़ के दवाओं के कारोबार में 400 करोड़ रूपये का कारोबार जेनेरिक दवाओं का हैं। यानी किसी एक बिमारी से  जुड़े किसी एक जेनरिक दवा का शेयर एक प्रतिशत होना नामुमकिन है। 

 इसका मतलब यह हुआ कि केवल ब्रांडेड दवाओं को औसत लागत निकालने में इस्तेमाल किया जाता है।  इस औसत लागत के  ऊपर 16 प्रतिशत का मार्जिन जोड़कर सीलिंग प्राइस निर्धारित किया जाता है। सीलिंग प्राइस निर्धारित करने के लिए इस तरीके का विरोध तब से किया जा रहा है जब से यह नियम बना। दवा कारोबार की बारीकियों को समझने वाले कार्यकर्ताओं की मांग है कि ब्रांडेड कंपनियों की औसत लागत की बजाए किसी भी कम्पनी केवल दवा बनाने से जुड़े तत्वों की लागत के आधार पर मार्जिन जोड़कर सीलिंग प्राइस निर्धारित की जाए। अगर ऐसा नहीं होगा तो अपने आप कीमतें बढ़ जाएंगी। अमिताभ गुहा कहते है कि सरकार को चाहिए कि जेनेरिक दवाओं के लागत पर कीमत निर्धारित करे। जेनरिक दवाएं बहुत कम लागत में बन जाती है। उतनी ही असरकारी होती हैं जितनी कोई दूसरी दवा। इसलिए सरकार को चाहिए कि जेनेरिक दवाओं की औसत लागत पर सीलिंग प्राइस तय करे। अगर ऐसा होगा तो अपने आप कीमतें कम हो जाएंगी। भारत जैसे देश में दवाई की महंगाई बाजार की बनाई हुई है। लागत की नहीं। इस पूरी बहस से एक बात और साफ़ होता है कि दवाओं की कीमतों में इजाफा पेट्रोल डीजल की कीमतों में इजाफे की वजह से नहीं हुआ है बल्कि लोगों के बजाए अमीरों को अमीर बनाने की सरकारी नीतियों की वजह से हुआ है।

Medicine Price Hike
Inflation
Rising inflation
Narendra modi
Modi Govt
Indian Healthcare System
Health Sector
BJP government policies

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

क्या जानबूझकर महंगाई पर चर्चा से आम आदमी से जुड़े मुद्दे बाहर रखे जाते हैं?

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?


बाकी खबरें

  • Aap
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल मॉडल ऑफ़ गवर्नेंस से लेकर पंजाब के नए राजनीतिक युग तक
    13 Mar 2022
    हर हफ़्ते की महत्वपूर्ण ख़बरों और उनके पीछे की मंशाओं को समझाने के लिए “ख़बरों के आगे पीछे” लेकर आए हैं लेखक अनिल जैन
  • vidhansabha
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव नतीजे: कई सीटों पर 500 वोटों से भी कम रहा जीत-हार का अंतर
    13 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कई सीटों पर भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी की अगुवाई वाले गठबंधनों के बीच बेहद कांटे का मुकाबला रहा। 53 सीटें ऐसी रहीं जहां हार-जीत का अंतर 200 से लेकर 5000…
  • डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: चुनाव सेवक का अश्वमेध यज्ञ
    13 Mar 2022
    बीजेपी सरकार चलाने में जितनी मेहनत करती है उससे अधिक मेहनत सरकार बनाने में करती है। सरकार जब एक बार बन जाए तो चल तो रामभरोसे जाती ही है।
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'जीते हुए लश्कर के सिपाही, ऐसे कैसे हो जाते हैं?'
    13 Mar 2022
    बमबारी, हमले और जंग के शोर के बीच इतवार की कविता में पढ़िये स्वप्निल तिवारी की लिखी नज़्म 'शेल-शॉक्ड'...
  • एम. के. भद्रकुमार
    'सख़्त आर्थिक प्रतिबंधों' के साथ तालमेल बिठाता रूस  
    13 Mar 2022
    व्लादिमीर पुतिन की पहली प्राथमिकता यही है कि वह ख़ुद को अपने लोगों के प्रति जवाबदेह बनाये रखें।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License