NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
अंतरराष्ट्रीय
दुनिया भर की: गर्मी व सूखे से मचेगा हाहाकार
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई इलाके इस समय भीषण सूखे की चपेट में हैं। सूखे के कारण लोगों के पलायन में 200 फीसदी वृद्धि होने का अनुमान है।
उपेंद्र स्वामी
29 Apr 2022
global warming and migration
दशकों का सूखा और सूखती नदियां। फोटो साभार: रायटर्स

दिल्ली में अप्रैल महीने में तापमान लगातार नई ऊंचाइयां छूता रहा। अब यह आम लोगों की चिंता का भी सबब है कि अप्रैल में यह हाल है तो मई-जून में क्या होगा। राहत की बात फिलहाल सिर्फ इतनी कही जा सकती है कि इस प्रचंड गर्मी के बावजूद इस साल भी मानसून भारत में तकरीबन सामान्य रहने का अनुमान मौसम विभाग ने जारी किया है। लेकिन दुनिया के कई इलाके इतने किस्मतवाले नहीं हैं।

दरअसल, जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई इलाके इस समय भीषण सूखे की चपेट में हैं। हमने कुछ ही दिन पहले सोमालिया और उसके बहाने समूचे होर्न ऑफ अफ्रीका इलाके में कई दशकों के सबसे भीषण सूखे की चर्चा की थी। हम जानते हैं कि सूखा केवल कोई मौसम या फसल का चक्र भर नहीं है। उसके व्यापक आर्थिक-सामाजिक आयाम होते हैं। सूखा लोगों के पलायन की बड़ी वजहों में से एक होता है। दुनियाभर के वैज्ञानिक इस समय जलवायु परिवर्तन के कारण पड़ने वाले सूखे की संख्या और उस सूखे के कारण होने वाले लोगों के पलायन में तेज बढ़ोतरी को लेकर खासे चिंतित हैं।

इसे पढ़ें : दुनिया भर की: सोमालिया पर मानवीय संवेदनाओं की अकाल मौत

हमने कुछ माह पहले दक्षिण अमेरिका में चिली की चर्चा राजनीतिक बदलाव के लिए की थी। इस बार हम उसका जिक्र बिलकुल दूसरी वजह से कर रहे हैं। चिली में सूखे का यह लगातार 13वां साल है। वहां इतने अभूतपूर्व किस्म के हालात हैं कि 60 लाख की आबादी वाली राजधानी सैंटियागो में पानी की राशनिंग करनी पड़ रही है। लोगों का कहना है कि शहर के 491 साल के इतिहास में इस तरह का मौका पहली बार आया है जब शहर के हर बाशिंदे को पानी मुहैया करा पाना भी मुमकिन नहीं हो पा रहा है।

अब वहां किए जा रहे उपायों पानी के दबाव को कम करने से लेकर 24 घंटे तक पानी की कटौती के सब तरीके आजमाये जा रहे हैं। अलग-अलग तरह के अलर्ट तैयार किए गए हैं जो राजधानी को पानी देने वाली माइपो व मापोचो नदियों के पानी स्तर पर निर्भर करेगा। हम यहां चिली की बात सिर्फ उदाहरण के तौर पर कर रहे हैं। पिछले तीस साल में वहां पानी की उपलब्धता में 37 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है और हाल यही रहे तो उत्तर व मध्य चिली में 2060 तक और 50 फीसदी तक की गिरावट आने का अंदेशा है।

सैंटियागो में तो हरी घास भी अब दुर्लभ लग्जरी सरीखी होती जा रही है। हरे-भरे पौधों की जगह अब वहां शुष्क व रेगिस्तानी मौसम में चलने वाले पौधे लगाए जा रहे हैं। निकट के एंडीज पहाड़ों पर बारिश व बर्फ कम गिर रही है तो सैंटियागो के जिस इलाके की परिकल्पना कभी भूमध्यीय मौसम के हिसाब से की गई थी, अब उसे एक अर्ध-रेगिस्तानी इलाके के अनुरूप ढाला जा रहा है। यह जलवायु परिवर्तन की हकीकत का एक नमूना है जो अब हम किसी ग्लोबल स्तर पर नहीं बल्कि बहुत छोटे-छोटे स्तर पर देख रहे हैं।

अमेरिका की स्टोनी ब्रुक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जैसे-जैसे हम 21वीं सदी में आगे बढ़ेंगे, सूखे के कारण लोगों के पलायन में 200 फीसदी तक बढ़ोतरी हो जाएगी। ‘इंटरनेशनल माइग्रेशन रिव्यू’ पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में जलवायु व समाज-विज्ञान—दोनों ही तरह के मॉडल का इस्तेमाल करके यह निष्कर्ष निकाला गया है कि यह पलायन भविष्य में सामाजिक-राजनीतिक नीतियों में बदलाव के लिए सरकारों को मजबूर कर सकता है।

इन शोधकर्ताओं ने करीब 16 जलवायु मॉडलों का इस्तेमाल करके 21वीं सदी के बचे हुए वक्त के लिए सूखे की स्थिति के अनुमान तैयार किए हैं। ये अनुमान भी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के दो परिदृश्यों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए- एक तो आशावादी जिसमें पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं को मानकर चला गया। दूसरा निराशावादी, जिसमें ऊर्जा के मौजूदा इस्तेमाल व ग्रीनहाउस गैसों के मौजूदा उत्सर्जन की स्थिति को केंद्र में रखा गया।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जहां कुछ समय पहले आई ग्राउंड्सवेल रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के कारण 2050 तक दुनिया के छह इलाकों में मानव पलायन के अनुमान जारी किए गए थे, वहीं इस स्टोनी ब्रुक अध्ययन में इस सदी में आगे बढ़ते हुए तकरीबन समूचे विश्व में ही सूखे- के चलते होने वाले पलायन की संभावना का आकलन कया गया है।

शोधकर्ताओं के एक हिस्से ने जहां जलवायु मॉडलों के हिसाब से सामाजिक-राजनीतिक माहौल व नीतियों का विश्लेषण किया, वहीं कुछ विशेषज्ञों ने 2008 से लेकर 2100 तक की अवधि के लिए उत्सर्जन के दो परिदृश्यों को आधार बनाकर दुनियाभर में सूखे के चलते होने वाले पलायन का अनुमान लगाया।

नतीजा यही निकला कि सूखे के चलते आने वाले सालों में भयानक पलायन होगा—अगर जलवायु परिवर्तन के आशावादी अनुमानों पर चलें तो भी कम से कम 200 फीसदी ज्यादा और अगर दुनिया के नीति-नियंता जलवायु परिवर्तन को काबू में रखने के उपायों पर एकमत नहीं हो पाए और अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी न कर पाए, तब तो 500 फीसदी तक ज्यादा।

अब जरा कल्पना कीजिए कि किसी इलाके में पलायन का स्तर 500 फीसदी तक बढ़ गया तो वहां की आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियां कैसे बदल जाएंगी। हमने अपनी पिछली रिपोर्ट में सोमालिया का जिक्र किया था जहां पानी की तलाश में लोग गांवों से पलायन कर रहे थे।

रिपोर्ट में एक बात यह भी सामने आई कि बड़ी संख्या में लोग ऐसे भी हैं जो पलायन तो करना चाहते हैं लेकिन कर नहीं पा रहे हैं क्योंकि सूखा इतना ज्यादा फैल चुका है कि उनके जाने की संभावित जगहें खुद सूखे की चपेट में हैं और जो जगहें बची हुई हैं, वे इतनी दूर हैं कि वहां जाकर गुरज-बसर कर पाना संभव नहीं है। यानी इस तरह के लाचार लोगों की तादाद भी बेहद आशावादी नजरिये में भी 200 फीसदी तक बढ़ जाएगी। निराशावादी नजरिये में तो ऐसे लाचार लोग 600 फीसदी तक बढ़ जाएंगे।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस लिहाज से चिंता केवल उन लोगों की नहीं है जो जलवायु परिवर्तन के कारण पलायन करके दुनियाभर में फैलेंगे, बल्कि चिंता उन लोगों की बड़ी तादाद की भी है जो हताश होकर भी पलायन न कर पाने से लाचार हैं। इससे अलग किस्म की सामाजिक अस्थिरता व पीड़ा फैलेगी। जो पलायन कर जाएंगे, उनके लिए भी यह एक चिंता रहेगी कि फिलहाल पर्यावरण के चलते होने वाला पलायन शरणार्थियों को सुरक्षा देने वाले किसी भी अंतरराष्ट्रीय कनवेंशन के दायरे में नहीं आता।

अब इस तरह के अध्ययन वैज्ञानिक मॉडल बनाकर अनुमान तो तैयार कर लेते हैं, लेकिन हकीकत में स्थितियां कैसी बनेंगी, किस तरह का सामाजिक व्यवहार सामने आएगा, किस तरह के दबाव आएंगे, किस तरह की राजनीतिक प्रतिक्रिया रहेगी, इस सबका अंदाजा लगाना तो बेहद मुश्किल है।

लेकिन जो एक बात तय है, वो यह कि जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संकेत अब हमारे-आपके दरवाजों पर दस्तक दे रहे हैं। देर तो पहले ही बहुत हो चुकी है। लेकिन अब भी- ‘कुछ तो किया ही जा सकता है’, वाली स्थिति तो है। ‘अब तो कोई फायदा नहीं’- वाली स्थिति की तरफ बढ़ने की हमारी रफ्तार भी बहुत तेज है, यह बाहर का तापमान बता ही रहा है।

climate change
Climate Change and Global Hunger
global warming
Earth Temperature
Temperature Rise
Rivers
migration

Related Stories

गर्म लहर से भारत में जच्चा-बच्चा की सेहत पर खतरा

मज़दूर वर्ग को सनस्ट्रोक से बचाएं

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

जलवायु परिवर्तन : हम मुनाफ़े के लिए ज़िंदगी कुर्बान कर रहे हैं

लगातार गर्म होते ग्रह में, हथियारों पर पैसा ख़र्च किया जा रहा है: 18वाँ न्यूज़लेटर  (2022)

अंकुश के बावजूद ओजोन-नष्ट करने वाले हाइड्रो क्लोरोफ्लोरोकार्बन की वायुमंडल में वृद्धि

‘जलवायु परिवर्तन’ के चलते दुनियाभर में बढ़ रही प्रचंड गर्मी, भारत में भी बढ़ेगा तापमान

कांच की खिड़कियों से हर साल मरते हैं अरबों पक्षी, वैज्ञानिक इस समस्या से निजात पाने के लिए कर रहे हैं काम

जलविद्युत बांध जलवायु संकट का हल नहीं होने के 10 कारण 

संयुक्त राष्ट्र के IPCC ने जलवायु परिवर्तन आपदा को टालने के लिए, अब तक के सबसे कड़े कदमों को उठाने का किया आह्वान 


बाकी खबरें

  • Varun singh
    भाषा
    वायु सेना हेलीकॉप्टर दुर्घटना: घायल ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह का निधन
    15 Dec 2021
    8 दिसंबर को हुए इस हादसे में प्रमुख रक्षा अध्यक्ष (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी और 11 अन्य सैन्य कर्मियों की जान चली गई थी। हादसे में गंभीर रूप से घायल वरुण सिंह का उपचार जारी था।
  • cartoon
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर खीरी कांड: गृह राज्य मंत्री टेनी दिल्ली तलब
    15 Dec 2021
    दिल्ली से लेकर यूपी तक, लोकसभा से लेकर विधानसभा तक आज इस मामले की गूंज रही और टेनी के बर्ख़ास्तगी/इस्तीफ़े की मांग की जाती रही। इसी दौरान मंत्री जी द्वारा मीडिया से बदसुलूकी का वीडियो भी वायरल हो गया…
  • gujarat
    आदित्य गुजराती
    गुजरात में आख़िर लाभ-साझाकरण वाली धनराशि कहां जा रही है?
    15 Dec 2021
    गुजरात जैव-विविधता बोर्ड के क्रूर शासन ने भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के साथ-साथ जैविक विविधता अधिनियम, एवं 2014 के एबीएस नियम-कानूनों के पूरे उद्देश्य को ही विफल कर दिया है।
  • सोनिया यादव
    गुजरात: सरकारी आंकड़ों से कहीं ज़्यादा है कोरोना से मरने वालों की संख्या!
    15 Dec 2021
    सुप्रीम कोर्ट में गुजरात सरकार अपने ही हलफनामे से झूठी साबित हुई है। अब सरकार ने खुद आधिकारिक तौर पर इस बात को स्वीकार कर लिया है कि राज्य में कोरोना से मरने वालों की जितनी गिनती की गई थी, असली…
  • बिहारः कोरोना टीके से मौत का आरोप लगाकर चिकित्सा पदाधिकारी को बनाया बंधक
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः कोरोना टीके से मौत का आरोप लगाकर चिकित्सा पदाधिकारी को बनाया बंधक
    15 Dec 2021
    कोरोना टीके से मौत का आरोप लगाते हुए कटिहार में वैक्सीनेशन महाअभियान के तहत टीकाकरण के लिए मनसाही के छोटी बथना गांव गए चिकित्सा पदाधिकारी को ग्रामीणों ने दो घंटे तक बंधक बनाए रखा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License