NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
आर्थिक सुधारः स्कैम, मंदी और राष्ट्रवाद के सहारे
कुल मिलाकर आर्थिक सुधार न सिर्फ सैद्धांतिक तौर पर विफल रहा है बल्कि व्यावहारिक तौर पर भी उसकी भयानक त्रासदी प्रकट हुई है।
अरुण कुमार त्रिपाठी
24 Jul 2021
आर्थिक सुधारः स्कैम, मंदी और राष्ट्रवाद के सहारे
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : Economic Times

आर्थिक सुधार को समझने के दो नज़रिए हैं। पहला नज़रिया यह है कि 1991 के आर्थिक सुधारों से पहले देश आर्थिक रूप से गुलाम था और 24 जुलाई 1991 को भारत के तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने जो बजट पेश किया उसके बाद देश को आर्थिक आजादी मिली।

देश में एक टेलीविजन चैनल था, एक हवाई सेवा थी और कोटा परमिट राज के कारण कार खरीदना, टेलीफोन लगवाना, गैस कनेक्शन लेना एक विशिष्ट वर्ग का अधिकार हुआ करता था। उसमें भी लंबी कतारें लगी रहती थीं। इसलिए आज देश और दुनिया में सुख और समृद्धि का जो महासागर लहरा रहा है उसके पीछे आर्थिक सुधारों का महान योगदान है।

आर्थिक सुधार आने के बाद देश में सब कुछ पारदर्शी हो गया। सरकारें कुछ छुपा नहीं पातीं और मीडिया सब कुछ दिखा देता है और अब घोटाले नहीं होते क्योंकि पाबंदियां खत्म हो गईं। जिस तरह से पूंजी को आने जाने की आजादी मिली है उसी तरह से दुनिया में एक तरह की विश्व बंधुत्व की भावना आई है और राष्ट्रवादी संकीर्णता कम हुई है। बार्डर खुले हैं और कंटीले बाड़ हटे हैं।

दूसरा नज़रिया यह है कि आर्थिक सुधारों के तीस सालों के बाद दुनिया फिर एक चौराहे पर खड़ी है जहां से वह कहां जाए इसका कोई रास्ता सूझ नहीं रहा है। इन तीस सालों में आर्थिक तरक्की का जो दावा था न तो वह हासिल हुआ और न ही राजनीतिक आज़ादी सलामत रही।

आर्थिक सुधारों के समर्थकों का दावा था कि काले धन की समस्या और घोटालों की घटनाएं इसलिए होती हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था को बंद करके रखा गया है। अगर उसे खोल दिया जाएगा तो बाजार अपने आप तमाम गड़बड़ियों को ठीक कर लेगा। इसी के साथ प्रौद्योगिकी की प्रगति इतनी तीव्र होगी कि उससे मानवीय भूलों से जुड़ी कमजोरियां दूर हो जाएंगी। लेकिन परिणाम इसके विपरीत हुआ।

आज दुनिया में दो देशों के बीच तो असमानता बढ़ी ही है देशों के भीतर रहने वाली आबादी के भीतर भी गैर बराबरी का बोलबाला हुआ है। यानी समृद्धि का की समान वितरण न तो अंतरराष्ट्रीय फलक पर हुआ है और न ही राष्ट्रीय दायरे में।

आर्थिक सुधारों के कारण कहीं याराना पूंजीवाद पनपा तो कहीं महाघोटाले हुए। इसके चलते आर्थिक प्रक्रिया पर निगरानी की वे प्रक्रियाएं नाकाम हुई हैं जो पहले से थीं या जिन्हें सुधारों के साथ लागू किया जाना था। इन घोटालों और उससे उपजी मंदी के कारण अंतरराष्ट्रीयतावाद का सहारा लेने को आतुर पूंजी ने फिर राष्ट्रवाद का दामन थामा। क्योंकि देशों के दायरे में उसकी साख खत्म हो रही थी और जनता में उसके मनमानेपन के प्रति असंतोष पनप रहा था।

इस तरह राष्ट्रीय सरकारें जो पहले न्यूनतम नियंत्रण और अधिकतम विकास की बात कर रही थीं वे अब अधिकतम नियंत्रण और न्यूनतम विकास पर आ गई हैं। उदारीकरण के साथ जो सरकारें अपने नागरिकों को अधिकार संपन्न बना रही थीं वे उन्हीं अधिकारों की कटौती कर रही हैं। यानी सबका साथ और सबका विकास का आर्थिक सुधार से जुड़ा नारा भी बेमानी साबित हुआ है।

कुल मिलाकर आर्थिक सुधार न सिर्फ सैद्धांतिक तौर पर विफल रहा है बल्कि व्यावहारिक तौर पर भी उसकी भयानक त्रासदी प्रकट हुई है।

ब्रेटनवुड की संस्थाओं ने आर्थिक सुधारों की पटकथा अस्सी के दशक में लिखी थी और सोवियत संघ के विघटन के बाद जिस पर दुनिया का यकीन बढ़ा और कहा जाने लगा कि अब दुनिया विकल्पहीन हो गई है, वह अब अपनी समाजवादी नीतियों को पलटने लगी है।

आर्थिक सुधार, मुक्त व्यापार की उन्नीसवीं सदी की धारणा पर शुरू किया गया था। जिसका मतलब है कि व्यापार को खुला छोड़ दो। उस पर किसी तरह के सरकारी नियंत्रण की जरूरत नहीं है। इसी के साथ आया था निजीकरण और वैश्वीकरण का सिद्धांत। लेकिन बाद में वे संस्थाएं ही सरकारों को मजबूत करने पर जोर देने लगीं और राष्ट्रवादी दायरे में होने वाले कार्यक्रमों पर यकीन करने लगीं।

इसी के साथ क्षेत्रीय आर्थिक संगठनों का भी दौर चला जिसमें ब्रिक्स या दक्षिण अमेरिका के संगठनों के साथ जी-7 और जी-23 प्रमुख हैं। पहले लगता था कि आर्थिक गतिविधियों को खुला छोड़ देने का उदारता का जो सिद्धांत है वही राजनीतिक स्तर पर भी लागू होगा, दुनिया में लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत होंगी और राज्य अपनी शक्तियों को छोड़ता जाएगा। लेकिन जिस तेजी के साथ महाघोटाला, मंदी और आतंकवाद पनपा उसी तेजी के साथ राष्ट्रवाद और अधिनायकवाद भी।

अगर हम भारत को देखते हैं तो आर्थिक सुधारों के समर्थक यह साबित करने लगते हैं कि देखिए शेयर बाजार कितनी तेजी से तरक्की कर रहा है और डिजिटल युग के आगमन के साथ घोटाले कम होते जा रहे हैं। लेकिन यह हैरानी की बात है कि भारत के शेयर बाजार में प्रतिभूति जैसा बड़ा घोटाला आर्थिक सुधारों के एक साल बाद ही हो गया। रोचक बात यह है कि जब बिना किसी कारण शेयर बाजार पहले उठ रहा था और बाद में गिरने लगा तो आर्थिक सुधारों के प्रणेता और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि शेयर बाजार के उठने गिरने पर सरकारों को अपनी नींद नहीं खराब करनी चाहिए। लेकिन तब तक हर्षद मेहता अपना काम कर चुके थे।

विडंबना देखिए कि भारत में बड़े बड़े आर्थिक घोटाले तब हुए जब आर्थिक सुधारों के प्रणेता और दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह स्वयं प्रधानमंत्री थे। टू-जी घोटाला, कोयला घोटाला तो दो ऐसे बड़े घोटाले थे जिनके पीछे आर्थिक प्रक्रिया ही प्रमुख कारण थी। वास्तव में आर्थिक सुधारों की इस प्रक्रिया में घोटाले निहित हैं। अगर आप आर्थिक गतिविधियों की निर्बाध छूट देंगे तो घोटाले होंगे और अगर नहीं देंगे तो अर्थव्यवस्था तरक्की नहीं करेगी। अमेरिका का सब- प्राइम संकट लोगों को बिना गारंटी के मकान और कार के लिए कर्ज लेने की छूट देने का परिणाम था। उसके चलते कई बैंक डूबे, आटोमोबाइल सेक्टर डूबा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी साख को धक्का लगा। बल्कि वह झटका पूरी दुनिया को झेलना पड़ा। उसके बाद मंदी आई और उससे उबरने के लिए पूंजीपतियों और बाजार ने फिर सरकारों की मदद मांगी और अमेरिका के फेडरल रिजर्व से लेकर भारत तक में सरकारों को अपना खजाना खोलना पड़ा।

आर्थिक सुधारों के सिद्धांतकार और अमेरिका के नोबेल अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिग्लिट्ज, दार्शनिक और भाषाशास्त्री नोम चोमस्की, कनाडा के दार्शनिक और समाजशास्त्री जान रालस्टन साल और इजराइल के इतिहासकार जुआल नोवा हरारी जैसे दुनिया के कई बौद्धिक और सिद्धांतकार यह मान चुके हैं कि आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया विफल हो चुकी है। उसके पास दुनिया को समता और समृद्धि देने की न तो कोई नीति बची है और न ही कार्यक्रम। उसकी गाड़ी अब जैसे तैसे खिंच रही है क्योंकि दुनिया के पास नए विचार देने वालों की कमी है।

थामस पिकेटी की कैपिटल इन ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी, हरारी की ट्वेंटीवन लेशन्स फार ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी, जान रालस्टन साल की कोलैप्स आफ ग्लोबलिज्म और स्टिग्लिट्ज की ग्लोबलाइजेशन एंड इट्स डिसकंटेंट यह सब ऐसे ग्रंथ हैं जो स्पष्ट रूप से बताते हैं कि विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और डब्लूटीओ द्वारा संचालित आर्थिक सुधार का कार्यक्रम कई मोर्चों पर विफल हो चुका है। अगर वह आर्थिक तरक्की देता है तो राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं। अगर वह राजनीतिक स्वतंत्रता देता है तो आर्थिक तरक्की नहीं। अगर वह दुनिया के एक हिस्से में समृद्धि देता है तो दूसरे हिस्से में आर्थिक संकट पैदा करता है। अगर चीन तरक्की करता है तो दक्षिण अमेरिका के देश संकट में डूबते हैं। अगर चीन और भारत तरक्की करते हैं तो दक्षिण पूर्व एशिया में आर्थिक संकट आता है। सबसे बड़ी बात यह है कि आर्थिक प्रक्रिया के वैश्वीकरण का दावा करने वाली नीति ने दुनिया में राजनीतिक और आर्थिक राष्ट्रवाद को और ज्यादा कट्टरता प्रदान की है। ब्रिटेन के ब्रैग्जिट से लेकर चीन, भारत और अमेरिका तक इसके प्रमाण मौजूद हैं।

इससे भी बड़ी बात यह है कि इस प्रक्रिया ने उन देशों को तो लोकतांत्रिक बनाया ही नहीं जहां अधिनायकवाद था लेकिन भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी लोकतंत्र को कमजोर करके रख दिया। आज दुनिया भर के 45 देशों की सरकारें अपने मीडिया संस्थानों और नागरिक संस्थाओं और स्वतंत्र नागरिकों की निगरानी करने में लग गई हैं। यह महज संयोग नहीं है कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का बजट 33 करोड़ से 333 करोड़ हो गया है और आरोप है कि उसमें से 100 करोड़ रुपये पेगासस पर खर्च हुए हैं ताकि न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका और मीडिया सबकी निगरानी की जा सके। यह डिजिटल पूंजीवाद की मेहरबानी है जो एक ओर लोगों को बेराजगार कर रहा है तो दूसरी ओर बैंकों से लेकर दूसरी संस्थाओं में तमाम घोटाले करवा रहा है। नोटबंदी से लेकर कोरोना काल में पैदा हुई बेरोजगारी और असमानता इसके उदाहरण हैं।

अब यह रस्म बन गई है कि हर सरकार दावा करती है कि आर्थिक सुधार की प्रक्रिया जारी रहेगी। लेकिन वह इस बात पर गौर नहीं करती कि इस बीच कोविड के आरंभ में हर घंटे 1,70,000 लोग बेरोजगार हुए हैं और अरबपतियों की संपत्ति में 35 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। जाहिर सी बात है कि आर्थिक सुधार की इस प्रक्रिया को पहले उपभोक्तावाद और मध्यवर्ग को सपने दिखाकर चलाया जाता था और अब इसे चलाने का तरीका धर्म और राष्ट्रवाद आधारित व्यवस्था ही है। वह पारदर्शी तरीके से और न्यायपूर्ण तरीके से नहीं चल सकती। यह बात कोरोना काल में और भी मजबूती से साबित हो गई है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

economic reform
Economic reforms of 1991
Nationalism
Economic Recession
economic crises

Related Stories

एक ‘अंतर्राष्ट्रीय’ मध्यवर्ग के उदय की प्रवृत्ति

किधर जाएगा भारत— फ़ासीवाद या लोकतंत्र : रोज़गार-संकट से जूझते युवाओं की भूमिका अहम

भारत की राष्ट्रीय संपत्तियों का अधिग्रहण कौन कर रहा है?

श्रीलंका का संकट सभी दक्षिण एशियाई देशों के लिए चेतावनी

जब तक भारत समावेशी रास्ता नहीं अपनाएगा तब तक आर्थिक रिकवरी एक मिथक बनी रहेगी

रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध का भारत के आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

केंद्रीय बजट में दलित-आदिवासी के लिए प्रत्यक्ष लाभ कम, दिखावा अधिक

सामाजिक कार्यकर्ताओं की देशभक्ति को लगातार दंडित किया जा रहा है: सुधा भारद्वाज

रोजगार, स्वास्थ्य, जीवन स्तर, राष्ट्रीय आय और आर्थिक विकास का सह-संबंध

डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरावट उन्हें भी मारती है जिन्होंने पूरी जिंदगी डॉलर नहीं देखा है!


बाकी खबरें

  • अजय कुमार
    मोदी जी की नोटबंदी को ग़लत साबित करती है पीयूष जैन के घर से मिली बक्सा भर रक़म!
    29 Dec 2021
    मोदी जी ग़लत हैं। पीयूष जैन के घर से मिला बक्से भर पैसा समाजवादी पार्टी के भ्रष्टाचार का इत्र नहीं बल्कि नोटबंदी के फ़ैसले को ग़लत साबित करने वाला एक और उदाहरण है।
  • 2021ः कोरोना का तांडव, किसानों ने थमाई मशाल, नफ़रत ने किया लहूलुहान
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    2021ः कोरोना का तांडव, किसानों ने थमाई मशाल, नफ़रत ने किया लहूलुहान
    29 Dec 2021
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने साल 2021 के उन उजले-स्याह पलों का सफ़र तय किया, जिनसे बनती-खुलती है भारतीय लोकतंत्र के भविष्य की राह।
  • जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?
    रवि शंकर दुबे
    जानिए: अस्पताल छोड़कर सड़कों पर क्यों उतर आए भारतीय डॉक्टर्स?
    29 Dec 2021
    यह हड़ताली रेजिडेंट डॉक्टर्स क्या चाहते हैं, क्यों चाहते हैं, अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरना इनके लिए क्यों ज़रूरी है। आइए, क्रमवार जानते हैं-
  • सोनिया यादव
    जेएनयू: ICC का नया फ़रमान पीड़ितों पर ही दोष मढ़ने जैसा क्यों लगता है?
    29 Dec 2021
    नए सर्कुलर में कहा गया कि यौन उत्पीड़न के मामले में महिलाओं को खुद ही अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। महिलाओं को यह पता होना चाहिए किए इस तरह के उत्पीड़न से बचने के लिए उन्हें अपने पुरुष दोस्तों के…
  • कश्मीरी अख़बारों के आर्काइव्ज को नष्ट करने वालों को पटखनी कैसे दें
    एजाज़ अशरफ़
    कश्मीरी अख़बारों के आर्काइव्ज को नष्ट करने वालों को पटखनी कैसे दें
    29 Dec 2021
    सेंसरशिप अतीत की हमारी स्मृतियों को नष्ट कर देता है और जिस भविष्य की हम कामना करते हैं उसके साथ समझौता करने के लिए विवश कर देता है। प्रलयकारी घटनाओं से घिरे हुए कश्मीर में, लुप्त होती जा रही खबरें…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License