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भारत
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क्यों आर्थिक सर्वे की यह बात नहीं पचती कि आर्थिक असमानता पर नहीं केवल आर्थिक विकास पर ध्यान देने की ज़रूरत है? 
साल 2020-21 के आर्थिक सर्वे के एक अध्याय में यह राय रखी गई है कि आर्थिक विकास से भले ही आर्थिक असमानता बढ़ेगी, लेकिन ग़रीबी भी कम होगी। तो आइए जानते हैं कि क्यों यह राय दुरुस्त नहीं है। 
अजय कुमार
12 Feb 2021
आर्थिक सर्वे

साल 2020 -21 के आर्थिक सर्वे में आर्थिक असमानता और आर्थिक विकास पर आधारित एक अध्याय है। जिस अध्याय में यह तर्क दिया गया है कि भारत को आर्थिक असमानता पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। मौजूदा समय में जैसे-जैसे आर्थिक विकास की रफ्तार तेज होती जा रही है, लोग गरीबी से बाहर निकलते जा रहे हैं। इसलिए भारत का ध्यान आर्थिक असमानता कम करने में नहीं बल्कि आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ाने में अधिक होना चाहिए। आर्थिक विकास होता रहेगा और सरकार जनकल्याण की नीतियों के जरिए लोगो को गरीबी से बाहर निकालते रहेगी। 

अगर मोटे तौर पर कहा जाए तो सरकार सुंदर शब्दों के जरिए यह कहना चाह रही है कि आर्थिक असमानता पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। जिनके पास पैसा है, वह खूब पैसा कमाएं। वह आगे बढ़ेंगे तो देश का आर्थिक विकास होगा। इस बड़े आर्थिक विकास में ही सरकार जनकल्याण की नीतियां अपनाकर गरीबी दूर करती रहेगी।

कहने का मतलब यह है कि देश में मौजूद पूंजीवादी प्रवृत्तियों पर हमला न किया जाए। पूंजीवाद से ही आर्थिक विकास होगा। अंबानी-अडानी को फलने फूलने दिया जाए। इसका आशय यह है कि अडानी-अंबानी के विकास से ही आम जनता का विकास संभव होगा। इन पूंजीपतियों की कमाई होते रहे और दूसरे जीने लायक कमाई से भी वंचित रह जाएं तो उस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है।

सबसे पहली बात पूंजीवाद के बारे में कुछ जान लेनी चाहिए। उनके पास कुछ ऐसे पंख नहीं लगे होते हैं कि आर्थिक विकास की उड़ान केवल पूंजीवाद कर पाए। यह एक तरह का भ्रम है। क्योंकि हर जगह तो इंसान ही काम करते हैं। जोखिम उठाने के लिए पैसा बैंक देती है। बैंकों में पैसा आम लोगों का जमा होता है। यानी जोखिम का भी सामाजिकरण हो जाता है। अगर मुनाफा नहीं हुआ तो दिया हुआ कर्जा डूबा हुआ कर्जा बन जाता है या बैंक टूट जाती है। अगर एक लाइन में समझा जाए तो कहने का मतलब यह है कि सबसे पहले दिमाग से यह भ्रम निकाल देना चाहिए कि आर्थिक विकास की बपौती केवल पूंजीवादियों के पास है। हर जगह मानव संसाधन लगता है जिन्हें हम कारीगर और काम करने वाले लोग कहते हैं तब जाकर उत्पादन होता है। बिना मानव संसाधन के उत्पादन नहीं होता है। यानी महत्वपूर्ण मानव है। मानव संसाधन हैं जो दूसरे संसाधनों का सही तरह से इस्तेमाल कर उन्हें उत्पादन लायक बनाता है।

अब बात करते हैं गरीबी पर। आर्थिक सर्वे का कहना है कि आर्थिक असमानता पर ध्यान नहीं देना है।

पूंजीवादी व्यवस्था के तहत जैसे-जैसे आर्थिक विकास बड़ा होता चला जाएगा गरीबी कम होती चली जाएगी। लेकिन पूंजीवादी विकास के तहत गरीबी में बढ़ोतरी का चोली-दामन का रिश्ता है। मार्क्स ने बहुत पहले इसकी पहचान कर ली थी और इसे इस प्रकार से व्यक्त किया था कि: चूंकि “धन का संचय एक ही धुरी पर होता है, इसलिए, उसी समय में, दुख, दासतापूर्ण श्रम, गुलामी, अज्ञानता, क्रूरता और नैतिक गिरावट का भी विपरीत धुरी पर संचय होता है।

साल 1991 के बाद से भारत में खुलकर निजीकरण और उदारवाद को अपनाया जा रहा है। यानी 1991 के बाद का माहौल ऐसा है जिसमें अमीरों को खूब कमाने की छूट सरकार की तरफ से जी भर कर दी गई है। साल 1993- 94 में ग्रामीण इलाके में प्रतिदिन जिस की खपत 2200 कैलोरी से अधिक होती थी, उसे गरीबी रेखा से ऊपर कहा जाता था. इस परिभाषा के तहत उस समय  ग्रामीण इलाके की तकरीबन 58 फ़ीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे थी।

साल 2011-12 में ग्रामीण इलाके में 2200 कैलोरी से कम की खपत करने वाली यह आबादी बढ़कर 68 फ़ीसदी हो गई। यही हाल शहर इलाके में भी रहा। साल 1990 में 2100 कैलोरी से कम खपत करने वाली आबादी 58 फ़ीसदी थी। यह बढ़कर 2011- 12 में 65 फ़ीसदी हो गई।

2011-12 के बाद से 2017-18 में फिर से नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े जारी हुए। जिसके मुताबिक  2011-12 और 2017-18 के बीच अगर महंगाई दर को समायोजित करके देखा जाए ( in real term) तो  प्रति व्यक्ति ग्रामीण खपत में 9 प्रतिशत की गिरावट आई है। अगर प्रति व्यक्ति ग्रामीण अमीरों की खपत पर होने वाले व्यय को थोड़ा सा अलग करके देखा जाए तो यह गिरावट और अधिक दिखेगी। यह इतना जरूरी आंकड़ा था कि सरकार ने इससे उभरे सवालों के जवाब देने के बजाय सार्वजनिक डोमेन से एनएसएस नमूना सर्वेक्षण के परिणामों को पूरी तरह से वापस लेने का फैसला किया।

चांसेल और थॉमस पिकेटी फ्रांस के दो अर्थशास्त्री हैं। इन्होंने अपने रिसर्च में बताया कि साल 1982 में भारत की एक फ़ीसदी सबसे अमीर लोगों की पूरी संपत्ति में हिस्सेदारी महज 6 फ़ीसदी थी। यह हिस्सेदारी साल 2013 में बढ़कर 22 फ़ीसदी  हो गई।मार्सेलस इन्वेस्टमेंट के सौरभ मुखर्जी और हर्ष शाह का विश्लेषण बताता है कि भारत की 20 बड़ी कंपनियों के पास भारत की अर्थव्यवस्था में होने वाले कुल मुनाफे का 70 फ़ीसदी हिस्सा है। साल 1990 में मुनाफे में हिस्सेदारी का यह आंकड़ा महज 14 फ़ीसदी हुआ करता था।

अभी हाल में ही प्रकाशित हुई ऑक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि मुकेश अंबानी ने लॉकडाउन के दौरान प्रति घंटे तकरीबन ₹90 की कमाई की। वहीं पर एक आदमी के मुकाबले भारत की 24 फ़ीसदी गरीब लोगों की महीने भर की कमाई ₹3 हजार से भी कम किए थी।

अब अगर हम आर्थिक असमानता और गरीबी के आंकड़े मिलाकर पढ़ें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे की आर्थिक असमानता बढ़ने के साथ गरीबी भी बड़ी है। महज साल 1990 के बाद आर्थिक वृद्धि के आंकड़े बढ़े हैं।

आंकड़ों की बाजीगरी छोड़कर अब कुछ मोटे तौर पर बात करते हैं। गरीबी क्या होती है? गरीबी एक तरह का सापेक्षिक मामला है। यानी हर व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के मुकाबले गरीब होता है। इस तरह से देखा जाए तो भारत की बहुत बड़ी आबादी कुछ मुट्ठी भर लोगों के मुकाबले गरीब है। 86 फ़ीसदी आबादी ₹10 हजार से कम की आमदनी पर जीती है। इसके पास इतना पैसा नहीं है की समय के साथ-साथ महंगी हो रही जीवन की आधारभूत जरूरतों को पूरा कर पाए। जरा सोच कर देखिए अगर आर्थिक असमानता पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो क्या भारत की 86 फीसदी आबादी अपने बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर या कलेक्टर की पढ़ाई करवाने का ख्वाब दिखेगी? बिल्कुल नहीं देखेगी। बल्कि इसका जवाब तो यह है कि कम आमदनी की वजह से भारत में बहुत बड़ी आबादी मजदूर बनने की तैयारी में लगी हुई है।

पढ़ाई लिखाई और जीवन स्तर महंगा होने की वजह से गरीबों के बच्चों का भविष्य मजदूरी की तरफ जा रहा है।

आर्थिक असमानता के दौरान गरीबी में बढ़ोतरी क्यों होती है? इसे मार्क्स के सिद्धांत से समझा जा सकता है। मार्क्स कहते हैं कि जब नौकरियां कम होती हैं और बहुत बड़ी आबादी को नौकरी की चाह होती है तब ओने पौने दाम पर लोगों को नौकरी पर रख लिया जाता है। लोग अपने मालिकों से मजदूरी और वेतन के लिए ठीक ढंग से मोलभाव नहीं कर पाते हैं। यही सिद्धांत आर्थिक असमानता के माहौल में काम करता है।

सरकार का एक और तर्क है कि जब आर्थिक विकास होगा तो जनकल्याणकारी नीतियों के जरिए सरकार लोगों की गरीबी दूर करेगी!। यह बात दिखने में जितनी सही लग रही है। हकीकत में उतनी ही कमजोर हो जाती है।

हकीकत यह है कि भारत की कुल जीडीपी अमूमन 200 करोड रुपए की है। इसमें से केंद्र और राज्य सरकार मिलाकर महज 54 लाख करोड़ रुपए खर्च करती हैं। जो जीडीपी का 27 फीसद है। यह खर्च भी तब ही संभव है जब लोगों की जेब में पैसे हों और वे खर्च करें। अब सोचिए सरकार ने जब अपना पॉकेट इतना छोटा रखा है और उसके बाद सरकारी कंपनियों की बिक्री भी होने लगी हैं तो जनकल्याण के काम कैसे होंगे? लोगों की बुनियादी जीवन सही करने में सरकार की कितनी दिलचस्पी होगी?

आम जनता के जीवन को सुधारने के लिए सरकार की तरफ से जितनी मदद की जरूरत है उतना सरकार की तरफ से नहीं मिल रही है। आर्थिक विकास के नाम पर आर्थिक असमानता बढ़ रही है और गरीबी बढ़ रही है। इन सारी परेशानियों से दूर होने के लिए आर्थिक विकास की बहुत जरूरत है लेकिन ऐसे आर्थिक विकास की जो महज आंकड़ों की न हो। जिसे इस तरीके से प्रबंधित किया जाए कि सबके जीवन स्तर में सुधार हो।

इसलिए प्रोफेसर प्रभात पटनायक लिखते हैं कि नव उदारवाद में जितनी तेजी से आर्थिक विकास के आंकड़ें बढ़े हैं उतनी ही तेजी से गरीबी भी बढ़ी है। 

Economic Survey 2020-21
Economic Growth in India
Economic inequality
economic crises
Poverty in India
Deference between Poor and Rich
unemployment
Hunger Crisis

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