NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
आर्थिक मंदी और माइक्रो उद्योग संकट से बढ़ेगा महिला रोज़गार संकट
आधी आबादी को अर्थव्यवस्था के प्रमुख हिस्से में आधा हिस्सा भी मयस्सर नहीं है, बल्कि उन्हें इसमें 1/5 से लेकर 1/10 की भागीदारी से संतोष करना पड़ रहा है।
कुमुदिनी पति
21 Oct 2019
Economic slowdown in India
फोटो साभार : Abraxas NU

देश की अर्थव्यवस्था और रोज़गार के क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी पर एक बेहतरीन शोध रिपोर्ट बंग्लुरु स्थित अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सेन्टर फाॅर सस्टेनेब्ल एम्प्लायमेंट ने जारी की है। 16 अक्टूबर, 2019 को जारी इस रिपोर्ट से एक बड़ा खुलासा हुआ- अति लघु उद्योग यानी माइक्रो एन्टरप्राइसेस के विशाल क्षेत्र में केवल 20 प्रतिशत ऐसे उद्योग हैं जो महिलाओं द्वारा संचालित हैं, और इसमें कार्यरत महिलाओं की संख्या निराशाजनक है-समस्त श्रमिकों का केवल 16 प्रतिशत!

एनएसएसओ के आंकड़े बताते हैं कि इनमें 2015 में, गैर-कृषि माइक्रो एन्टरप्रइसेस में मात्र 9 प्रतिशत मूल्य संवर्धन देखा गया। तो लगता है आधी आबादी को अर्थव्यवस्था के प्रमुख हिस्से में आधा हिस्सा भी मयस्सर नहीं है, बल्कि उन्हें इसमें 1/5 से लेकर 1/10 की भागीदारी से संतोष करना पड़ रहा है।

पीछे चले जाइये तो 2006-07 में अति लघु, छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME: एमएसएमई) की जो चौथी अखिल भारतीय जनगणना हुई, उसके अनुुसार एमएसएमई क्षेत्र में कुल रोज़गार 93.09 लाख था, जिसमें अति लघु उद्योगों का हिस्सा करीब 70.19 प्रतिशत था, यानी करीब 64.34 लाख। पर आश्चर्य की बात है कि महिला श्रमिकों की संख्या थी केवल 19.04 लाख, यानी 20.45 प्रतिशत। एक दशक बीतने के बाद भी इसमें कोई विकास नहीं दिखता।
Capture_23.PNG
सीएसई की उक्त रिपोर्ट ग्लोबल अलायन्स फाॅर मास एन्टरप्रेन्योरशिप की साझेदारी से निकाली गई, और इसके शोधकर्ता श्री अमित बसोले और विद्या चंदी हैं। रिपोर्ट का शीर्षक है-माइक्रोएन्टरप्रइसेस इन इण्डियाः ए मल्टीडायमेंशनल अनैलिसिस।

यद्यपि एमएसएमई क्षेत्र को भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास का प्रमुख उत्प्रेरक माना गया है, हम देखते हैं कि एनएसएसओ आंकड़ों को आधार मानकर शोध बता रहा है कि 2010 और 2015 के बीच, निर्माण क्षेत्र को छोड़ दिया जाए, तो गैर-कृषि अति लघु अद्योग में राज़गार कम बढ़े-10.8 करोड़ से बढ़कर 11.13 करोड़-यानी 0.6 प्रतिशत कम्पाउंड ऐनुअल ग्रोथ रेट, जो कि काफी दयनीय है।

मोदी जी ने 2014 में घोषण की थी कि वे प्रति वर्ष 1 करोड़ रोज़गार पैदा करेंगे, तो आखिर इस विशाल क्षेत्र में 2010-2015 के अंतराल में क्यों केवल 6 लाख रोज़गार पैदा हुए? आज भी एमएसएमई क्षेत्र सुस्त पड़ा है और रोज़गार पैदा करने की उसकी क्षमता को बढ़ाया नहीं जा सका है।

आइये हम ज़रा इस क्षेत्र पर नज़र डालें। देश में करीब 6 करोड़ 30 लाख एमएसएमई इकाइयां हैं। इनका जीडीपी में 8 प्रतिशत का येगदान है और मैनुफैक्चरिंग आउटपुट में 45 प्रतिशत हिस्सा; साथ ही निर्यात का 40 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से होता है। और, अति लघु उद्योग (निर्माण क्षेत्र को छोड़कर) कुल एमएसएमई क्षेत्र का 95 प्रतिशत हिस्से का निर्माण करते हैं। तब क्या यह चौंकाने वाली बात नहीं कि देश के कुल रोज़गार में इनका योगदान मात्र 11 प्रतिशत ही है? हम जानते हैं कि इसी क्षेत्र में महिलाओं को सबसे अधिक रोज़गार मिलने की संभावना हो सकती है, क्योंकि माइक्रो उद्योग इकाइयां अधिकतर गृह-आधारित होती हैं और इसमें मैन्युफैक्चरिंग के अलावा छोटी दुकानें, सब्ज़ी-फल की रेहड़ी, टिफिन सप्लाई, ढाबे, डेरी, मुर्गी-पालन, दर्ज़ी की दुकानें आदि हैं।

इनमें अधिकतर वर्कर न रखकर स्वरोज़गार पर बल दिया जाता है। पर आर्थिक मंदी के इस दौर में ज़रूर इस क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, रोज़गार घटेंगे, और सबसे अधिक नुक्सान महिला रोज़गार का होगा। इसलिए देखा जा रहा है कि कई इकाइयां आर्थिक गतिविधि के दायरे से बाहर होती जा रही हैं। रोज़गार के लिहाज से देखें तो सबसे बड़े एमएसएमई की श्रेणी में (जहां 10-19 श्रमिक हैं) 5 प्रतिशत सालाना की दर से रोज़गार घट रहे हैं।  

देश की प्रथम वित्त मंत्री इंदिरा गांधी के समय से वर्तमान समय तक कभी महिला श्रमिकों के इस भयावह संकट के मद्देनज़र क्यों कोई विशेष पैकेज नहीं घोषित किया गया, जबकि महिला सशक्तिकरण की बात होती रही?
 
वर्तमान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1,45,000 करोड़ रुपये काॅरपोरेट टैक्स में छूट का उपहार काॅरपोरेट्स को दिया, जिसका अधिक हिस्सा बड़े काॅरपोरेट्स ने हथिया लिया।

अति लघु उद्योग वे हैं जिनका निवेश 25 लाख रुपये से कम होता है, उनमें से अधिकतर को जीएसटी से मुक्ति मिली हुई है; इन्हें प्रथम पांच वर्ष तक टैक्स से छूट मिलती है। 96 प्रतिशत एमएसएमई काॅरपोरेट टैक्स से मुक्त हैं, और 5 लाख आमदनी तक, आयकर से भी मुक्त होते हैं। ॉ
और, मध्यम श्रेणी के एमएसएमई, जिनका 250 करोड़ रुपये तक का कारोबार है, उन्हें काॅरपोरेट टैक्स में 15 प्रतिशत की छूट से मात्र 7000 करोड़ रुपये का कुल लाभ होगा, जबकि उनकी संख्या 6 करोड़ 30 लाख में केवल 7000 है!

एक और सांकेतिक वित्तीय सहायता ब्याज में मात्र 2 प्रतिशत की छूट के रूप में दी गई है। क्या आर्थिक मंदी के मद्देनज़र एमएसएमई इकाइयों को पूर्ण कर्ज़ माफी देने से सरकार को भारी घाटा लगता जबकि उनको 3.59 लाख करोड़ के बकाये कर्ज़ का ब्याज तक चुका पाना मुश्किल हो रहा है? सरकार ज़रूर कह रही है कि उनके कर्ज़ को एनपीए नहीं माना जाएगा, पर उनके लगातार बढ़ते ब्याज का क्या होगा? यह भी घोषणा की गई कि बैंक इन्हें अधिक कर्ज़ दें, पर बैंकों पर भारी एनपीए बोझ के कारण वे अघोषित तौर पर इन्हें लोन देने पर रोक लगा चुके हैं।

ऐसे संकट को देखते हुए महिलाओं के लिए रोज़गार का परिदृष्य निराशाजनक लगता है। सीएसई के शोध के अनुसार बड़े-से-बड़े एमएसएमई में भी 2015 में औसत मासिक वेतन 10,000 रुपये से अधिक न था; अधिकतर में 6-8 हज़ार रुपये ही रहा। यह दिल्ली के न्यूनतम् वेतन का आधा ही है! जब जेंडर वेज गैप पट नहीं पा रहा, इसका नतीजा महिलाओं के लिए काफी घातक साबित होगा।

सीएसई रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि जो महिलाएं खुद इकाइयां चलाती हैं, उन्हें भी आय में घाटा हो रहा है। 78 प्रतिशत महिला संचालित अति लघु उद्योग तो गृह-आधरित हैं और इनमें से केवल 2.7 प्रतिशत 3 या अधिक कर्मियों को रोज़गार देते हैं। फिर हम देख रहे हैं कि महिलाओं की कार्यशक्ति में हिस्सेदारी 2005 में 36.7 से घटकर 2018 में 26 प्रतिशत रह गई है। ऐसी स्थिति में जब इस क्षेत्र में महिला रोज़गार घटेगा, तो औरतों को सबसे अधिक भुगतना होगा। यदि सरकार आपात स्थिति में भी विशेष पैकेज के जरिये इन उद्यमी महिलाओं को अधिक आर्थिक सहयोग देकर संकट से नहीं उबारती, तो यह मंदी महिला कार्यशक्ति को और भी गिरा देगी।

Economic Recession
Micro industry crisis
Increase female unemployment
NSSO Report
CSE
Global Alliance for Mass Entrepreneurship

Related Stories

एक ‘अंतर्राष्ट्रीय’ मध्यवर्ग के उदय की प्रवृत्ति

किधर जाएगा भारत— फ़ासीवाद या लोकतंत्र : रोज़गार-संकट से जूझते युवाओं की भूमिका अहम

रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध का भारत के आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

उत्तर प्रदेश: हिजाब मामले के बीच, महिलाओं की बेरोज़गारी का रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है?

केंद्रीय बजट में दलित-आदिवासी के लिए प्रत्यक्ष लाभ कम, दिखावा अधिक

डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरावट उन्हें भी मारती है जिन्होंने पूरी जिंदगी डॉलर नहीं देखा है!

मोदी सरकार की राजकोषीय मूढ़ता, वैश्वीकृत वित्तीय पूंजी की मांगों से मेल खाती है

बढ़ती थोक महंगाई दर और बदहाल होती भारत की अर्थव्यवस्था 

मोदी सरकार जब मनरेगा में काम दिलवाने में नाकाम है, तो रोज़गार कैसे देगी?

आंदोलन: 27 सितंबर का भारत-बंद ऐतिहासिक होगा, राष्ट्रीय बेरोज़गार दिवस ने दिखाई झलक


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामले घटकर 10 लाख से नीचे आए 
    08 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 67,597 नए मामले सामने आए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 9 लाख 94 हज़ार 891 हो गयी है।
  • Education Instructors
    सत्येन्द्र सार्थक
    शिक्षा अनुदेशक लड़ रहे संस्थागत उत्पीड़न के ख़िलाफ़ हक़ की लड़ाई
    08 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने शिक्षकों को आश्वस्त किया था कि 2019 तक उन्हें नियमित कर दिया जायेगा। लेकिन इस वादे से भाजपा पूरी तरह से पलट गई है।
  • Chitaura Gathering
    प्रज्ञा सिंह
    यूपी चुनाव: मुसलमान भी विकास चाहते हैं, लेकिन इससे पहले भाईचारा चाहते हैं
    08 Feb 2022
    पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गांव के मुआयने से नफ़रत की राजनीति की सीमा, इस इलाक़े के मुसलमानों की राजनीतिक समझ उजागर होती है और यह बात भी सामने आ जाती है कि आख़िर भाजपा सरकारों की ओर से पहुंचायी जा…
  • Rajju's parents
    तारिक़ अनवर, अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव : गांवों के प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या की कहानी
    08 Feb 2022
    महामारी की शुरूआत होने के बाद अपने पैतृक गांवों में लौटने पर प्रवासी मज़दूरों ने ख़ुद को बेहद कमज़ोर स्थिति में पाया। कई प्रवासी मज़दूर ऐसी स्थिति में अपने परिवार का भरण पोषण करने में पूरी तरह से असहाय…
  • Rakesh Tikait
    प्रज्ञा सिंह
    सरकार सिर्फ़ गर्मी, चर्बी और बदले की बात करती है - राकेश टिकैत
    08 Feb 2022
    'वो जाटों को बदनाम करते हैं क्योंकि उन्हें कोई भी ताक़तवर पसंद नहीं है' - राकेश टिकैत
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License