NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
भारत
राजनीति
भारत का एजुकेशन सेक्टर, बिल गेट्स की निराशा और सिंगापुर का सबक़
आज़ादी के 72 साल बाद भी अपनी दो मुकम्मल राष्ट्रीय नीतियों और एक विवादास्पद ड्राफ्ट पॉलिसी पर बवाल के बीच भारत की बेहाल शिक्षा व्यवस्था एक लंबी अंधेरी सुरंग से निकलने को छटपटा रही है।
दीपक के मंडल
26 Jul 2020
एजुकेशन सेक्टर

सरकारी स्कूलों की पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता की कलई खोलने वाली रिपोर्टों की कमी नहीं है। लेकिन सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की हाल की एक स्टडी ने आठ राज्यों के एजुकेशन खर्च का विश्लेषण कर बताया है कि क्यों स्कूल आने के लिए छात्र-छात्राओं को दिए जा रहे प्रोत्साहन, बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च और शिक्षकों के वेतन में तेज बढ़ोतरी के बावजूद हम बच्चों की सिखाने के मामले में लचर साबित होते जा रहे हैं।

इस स्टडी के मुताबिक राज्यों के शिक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा शिक्षकों के वेतन पर खर्च होता है लेकिन उन्हें ट्रेनिंग देने पर नाम मात्र का पैसा लगाया जाता है। साल दर साल आने वाली ASER REPORT हमें यह बता जाती है कि हमारे स्कूली बच्चे बुनियादी स्किल में अपनी क्लास से कई साल पीछे होते हैं। जैसे, 2018 की ASER REPORT बताती है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में आठवीं क्लास के 73 फीसदी बच्चे ही दूसरी क्लास की टेक्स्टबुक पढ़ने में सक्षम हैं। और सिर्फ 44 फीसदी बच्चे ही तीन अंकों की संख्या को एक अंक से भाग दे सकते हैं।

इसे भी पढ़ें : साक्षरता का झूठ: असर रिपोर्ट का दावा, बच्चों को सिखाने के मामले में फेल स्कूल का तंत्र

लेकिन एजुकेशन सेक्टर की इस बदहाली के बीच सुपर पावर और अगले पांच साल में 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने का मंसूबा बांधे यह देश अब भी इस बहस में उलझा है कि उसकी एजुकेशन पॉलिसी कैसी हो। जबकि एशिया में ही उसके छोटे-बड़े पड़ोसियों ने पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए ऐसे-ऐसे तरीके ईजाद कर लिए हैं कि अमेरिका और यूरोपीय देशों को भी अचंभा हो रहा है।

अपनी बदहाल शिक्षा व्यवस्था के लिए नई राह तलाशने में उलझा भारत कभी अमेरिका और कभी फिनलैंड जैसे यूरोपीय देशों की एजुकेशन पॉलिसी की ओर देखता है। लेकिन अपनी नई पीढ़ी की पढ़ाई-लिखाई के लिए सबसे अच्छा सबक उसे एशिया में ही मिल जाएगा। भारत अगर अपने दक्षिण पूर्वी एशियाई पड़ोसी सिंगापुर की पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था पर नजर दौड़ाए तो उसे अपने स्कूलों में पढ़ाने के तरीके बेहतर बनाने के तमाम सूत्र मिल सकते हैं।

1965 में आजादी हासिल करने वाला छोटा सा द्वीपीय देश सिंगापुर के पास शुरुआत में न तो प्राकृतिक संसाधन थे और न मददगार दोस्त। लेकिन तीन-चार दशक में ही यह दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेडिंग और फाइनेंशियल सेक्टर बन गया। आखिरकार यह जादू कैसे हुआ? इस सवाल पर सिंगापुर के पहले पीएम ली कुआन यी ने कहा था कि उनके देश के लोग ही उनके सबसे बड़े प्राकृतिक संसाधन हैं। इन्हें ही विकसित कर सिंगापुर महान बन सकता है।

फिनलैंड से टक्कर ले रही है सिंगापुर की एजुकेशन पॉलिसी

आज सिंगापुर का एजुकेशन सिस्टम पूरी दुनिया में नंबर 1 माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुनिया भर के स्टूडेंट्स की क्षमताएं आंकने के लिए OECD के प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल एसेसमेंट यानी PISA में इसकी रैंकिंग सबसे ऊंची है। मैथ्स, साइंस और रीडिंग कैटेगरी में सिंगापुर के स्टूडेंट्स ने सबको पीछे छोड़ दिया है। यहां के स्टूडेंट्स गणित में अमेरिकी स्टूडेंट्स से तीन साल आगे हैं। सिर्फ छोटी क्लास की एजुकेशन में ही सिंगापुर के बच्चे कमाल नहीं कर रहे हैं, यहां से निकले हुए ग्रेजुएट भी दुनिया के तमाम नामी यूनिवर्सिटीज में फैले हुए हैं।

आखिर सिंगापुर ने ऐसा क्या किया कि अब तक बेहतरीन माने जा रहे अमेरिकी और यूरोपीय देशों के एजुकेशन सिस्टम स्टूडेंट्स परफॉरमेंस के मामले में इसका मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं।

जानी-मानी मैगजीन ‘द इकनॉमिस्ट’ के मुताबिक सिंगापुर की सफलता की एक बड़ी वजह है, पारंपरिक पढ़ाई का वो तरीका जिसमें क्लास रूम का नेतृत्व टीचर्स करते हैं। कई इंटरनेशनल स्टडीज ये साबित कर चुकी हैं टीचर्स का सीधे स्टूडेंट्स को पढ़ाना नॉलेज डिलीवरी का काफी बढ़िया तरीका है। इस तरीके से सिंगापुर के स्टूडेंट्स अपने परफॉरमेंस में बेहतरीन साबित हो रहे हैं। सिंगापुर के स्टूडेंट्स ने साबित किया है न सिर्फ वे अकादमिक दक्षता में आगे हैं बल्कि इस पढ़ाई ने उन्हें पर्सनल स्किल में भी सिरमौर बना दिया है।  2015 की नई PISA रैंकिंग में भी सिंगापुर के स्टूडेंट्स टॉप पर रहे थे। यह रैंकिंग समस्याओं को सुलझाने, साइंस और रीडिंग में दक्षता पर आधारित थी। साथ ही सिंगापुर के स्टूडेंट्स फिनलैंड के स्टूडेंट्स से भी खुश पाए गए, जहां माना जाता है कि पढ़ाई के नरम तरीके ज्यादा कारगर होते हैं।

पिछले कुछ सालों में सिंगापुर ने अपने यहां शिक्षा व्यवस्था में जो सुधार किए हैं, वे भारत के लिए काफी मददगार साबित हो सकते हैं। एजुकेशन सेक्टर के भारतीय कर्ता-धर्ताओं को इन पर एक नजर जरूर डालना चाहिए-

1.एजुकेशनल रिसर्च पर जोर- टुकड़ों में और छोटे-छोटे सुधारों की तुलना में सिंगापुर हर बदलाव को पूरे सिस्टम में लागू करता है। इसका सबसे बड़ा है उदाहरण एजुकेशनल रिसर्च। हर रिसर्च को कसौटी पर कसा जाता है। इसके नतीजों पर बारीक निगाह रखी जाती है। इस बात पर बहुत ध्यान दिया जाता है कि नए आइडिया और नतीजे स्कूलों पर कैसे लागू किए जाएं। पश्चिमी एजुकेशन पॉलिसी में नकार दिए गए तरीके मसलन सावधानी से डेवलप किए गए टेक्स्टबुक, वर्कशीट और पढ़ाए गए पाठ की प्रैक्टिस-शीट का इस्तेमाल स्टूडेंट्स की योग्यता बढ़ाने में किया जाता है। टीचर्स की योग्यता का आकलन, उत्तरदायित्व और पढ़ाने की उसकी शैली का मूल्यांकन इसी के जरिये होता है।

2.पढ़ाई पर डीप फोकस– दूसरा अहम सबक सिंगापुर में पढ़ाई का गहरा और फोक्स्ड तरीका है। खास कर गणित जैसे विषय की पढ़ाई में एक केंद्रित यानी फोक्स्ड और गहरे पाठ्यक्रम पर जोर दिया जाता है। इस बात पर खास ध्यान होता है कि पूरा क्लास इस सिलेबस के मुताबिक एक साथ प्रोग्रेस करे। जिन बच्चों को दिक्कत आती है उनके लिए कंप्लसरी एकस्ट्रा क्लास होती हैं। यह तरीका स्टूडेंट्स और पैरेंट्स दोनों के लिए तनाव देने वाला हो सकता है लेकिन इसके काफी अच्छे नतीजे आए हैं। इंग्लैंड में 2016 में किए गए विश्लेषण ने यह साबित किया कि सिंगापुर में पढ़ाई के इस तरीके से रिजल्ट बेहतर हुए हैं। हालांकि यह अलग बात है कि खुद ब्रिटेन ऐसे तरीकों को अपनाने में हिचकिचाता रहा है।

3.अच्छे टीचर तैयार करने पर पूरा जोर - सिंगापुर के एजुकेशन सिस्टम का यह सबसे अहम सबक है। इस देश का पूरा जोर अच्छे शिक्षक तैयार करने पर है। पढ़ाने के नए तरीके सिखाने के लिए टीचर्स को 100 घंटे की ट्रेनिंग दी जाती है। सरकार टीचरों को अच्छा वेतन देती है। कॉन्सेप्ट ये है कि औसत टीचर कम स्टूडेंट्स वाली क्लास को पढ़ाएं उससे अच्छा है कि बेहतरीन टीचर ज्यादा स्टूडेंट्स वाली क्लास को पढ़ाएं। इससे ज्यादा स्टूडेंट्स को औसत दर्जे के टीचर की तुलना में बेहतर टीचर का फायदा मिलता है।

ऑनलाइन पढ़ाई क्लास रूम की पढ़ाई का विकल्प नहीं

सिंगापुर ने साबित किया है कि क्लास-रूम में बैठ कर आमने-सामने की पढ़ाई के बेहतरीन नतीजे निकलते हैं। भारत में इस वक्त ऑनलाइन पढ़ाई के समर्थन  में जिस सोची-समझी रणनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है, वह टीचर के सामने बैठ कर सीखने का विकल्प साबित नहीं हो सकती।

इसे पढ़ें : ऑनलाइन शिक्षा मूल संवैधानिक उद्देश्य से भटकाव का मॉडल है

इसे भी पढ़ें : ऑनलाइन शिक्षा कोई विकल्प नहीं

सिंगापुर में टीचर्स को अनावश्यक प्रशासनिक बोझ से नहीं लादा जाता है। तरक्की की सीढ़ियां सिर्फ पढ़ा कर ही हासिल की जा सकती हैं। जो टीचर्स प्रशासनिक भूमिका नहीं निभाना चाहते हैं वो बेहतरीन ढंग से पढ़ा कर ‘मास्टर टीचर’ बन सकते हैं। उन्हें अपने साथियों को प्रशिक्षित करना पड़ता है। अच्छे शिक्षकों की पोस्टिंग एजुकेशन मिनिस्ट्री में होती है और उन्हें भारी बोनस मिलता है। शिक्षकों का वेतन प्राइवेट सेक्टरों के बेहतरीन प्रोफेशनल्स के बराबर होता है। तरक्की के लिए हर साल टीचर्स को असेसमेंट की बेहद कड़ी शर्तों पर खरा उतरना होता है।

इसे पढ़ें : खोता बचपन और शिक्षा का ‘राजमार्ग’

आजादी के 72 साल बाद भी अपनी दो मुकम्मल राष्ट्रीय नीतियों और एक विवादास्पद ड्राफ्ट पॉलिसी पर बवाल के बीच भारत की बेहाल शिक्षा व्यवस्था एक लंबी अंधेरी सुरंग से निकलने को छटपटा रही है।

हमारे एजुकेशन सिस्टम के बारे में बिल गेट्स कहते हैं, “भारत के बारे में जो चीज सबसे ज्यादा निराश करती है, वह है इसका एजुकेशन सिस्टम। इसमें सुधार के बगैर भारत एक समृद्ध देश बनने की रेस में हमेशा पिछड़ा ही रहेगा। न जाने क्यों भारत इस ओर तरक्की नहीं कर पा रहा है, जबकि वियतनाम जैसा छोटा देश भी एजुकेशन में अपना प्रदर्शन जबरदस्त ढंग से सुधारता जा रहा है।”

क्या हम सिंगापुर के एजुकेशन सिस्टम से सबक सीख कर आने वाले कुछ सालों में बिल गेट्स के इस नजरिये को बदल सकेंगे?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

education
Education Sector
Education System In India
Government schools
Government School facility
ASER Report
OECD report
PISA
Bill Gates

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

कर्नाटक पाठ्यपुस्तक संशोधन और कुवेम्पु के अपमान के विरोध में लेखकों का इस्तीफ़ा

जौनपुर: कालेज प्रबंधक पर प्रोफ़ेसर को जूते से पीटने का आरोप, लीपापोती में जुटी पुलिस

बच्चे नहीं, शिक्षकों का मूल्यांकन करें तो पता चलेगा शिक्षा का स्तर

अलविदा शहीद ए आज़म भगतसिंह! स्वागत डॉ हेडगेवार !

कर्नाटक: स्कूली किताबों में जोड़ा गया हेडगेवार का भाषण, भाजपा पर लगा शिक्षा के भगवाकरण का आरोप

शिक्षा को बचाने की लड़ाई हमारी युवापीढ़ी और लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई का ज़रूरी मोर्चा

नई शिक्षा नीति बनाने वालों को शिक्षा की समझ नहीं - अनिता रामपाल

उत्तराखंड : ज़रूरी सुविधाओं के अभाव में बंद होते सरकारी स्कूल, RTE क़ानून की आड़ में निजी स्कूलों का बढ़ता कारोबार 

बिहारः प्राइवेट स्कूलों और प्राइवेट आईटीआई में शिक्षा महंगी, अभिभावकों को ख़र्च करने होंगे ज़्यादा पैसे


बाकी खबरें

  • रिचर्ड हिल
    स्पैम व्यापार का मुद्दा क्यों है? क्योंकि यह विकसित देशों के अनुकूल काम करता है
    24 Nov 2021
    2012 में, विकसित देशों ने वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस ऑफ इंटरनेशनल टेलीकम्यूनिकेशंस (डब्ल्यूसीआईटी) के इंटरनेशनल टेलीकम्यूनिकेशंस यूनियन (आईटीयू) के विश्व सम्मेलन में संधि के रूप में अपने अंतर्राष्
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    जेपीसी में डाटा क़ानून को मंज़ूरी, जारी रहेगा किसान आंदोलन और अन्य ख़बरें
    23 Nov 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी निजी डाटा सुरक्षा क़ानून को जेपीसी में मंज़ूरी, जारी रहेगा किसान आंदोलन और अन्य ख़बरों पर
  • pollution
    सतीश भारतीय
    दिल्ली ही नहीं गुरुग्राम में भी बढ़ते प्रदूषण से सांसों पर संकट
    23 Nov 2021
    "नाक साफ करते हैं तो नाक के अंदर से काली परत जमीं निकलती है जो प्रदूषण की गंभीरता के संकेत है।"
  • MSP
    अजय कुमार
    MSP की लीगल गारंटी नहीं पड़ेगी देश की जेब पर भारी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था संभल जाएगी
    23 Nov 2021
    भाजपा और सरकार समर्थक कह रहे हैं कि एमएससी की लीगल गारंटी देने से देश का खजाना खाली हो जाएगा और देश का दिवाला निकल जाएगा। चलिए समझते हैं कि क्यों ऐसा नहीं होगा, और इससे कैसे देश की अर्थव्यवस्था पहले…
  • Taiwan and Ukraine
    एम. के. भद्रकुमार
    अमेरिका जो चाल ताइवान में चल रहा है, हूबहू वही यूक्रेन में भी
    23 Nov 2021
    वास्तव में ताइवान और यूक्रेन  दोनों ही एक दूसरे से कूल्हे से जुड़े हुए हैं। अतः रूस एवं चीन के लिए कोई भी  दांव इसके ऊंचा नहीं हो सकता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License