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राजनीति
विशेष : किसान आंदोलन में महापंचायतों की एंट्री और कुछ अन्य ज़रूरी बातें
किसान आंदोलन में खापों का महापंचायत का रूप लेना, मुस्लिम किसानों का किसान आंदोलन को समर्थन देना और नेताओं की राजनीतिक महत्वकांक्षा..., इस सब पर सिसौली, मुज़फ़्फ़रनगर से अनिल शारदा की विशेष रपट
अनिल शारदा
13 Feb 2021
Mahendra Singh Tikait
मुज़फ़्फ़रनगर के सिसौली में किसान नेता (दिवंगत) महेंद्र सिंह टिकैत का घर, जहां आज भी उनके लिए रोज़ हुक्का भरा जाता है।

भारत का किसान सरकार की नीतियों से पीड़ित है। सरकार द्वारा लाए गए नए तीन कृषि क़ानूनों के खिलाफ़ दिल्ली की दहलीज़ पर लगभग पिछले 80 दिनों से धरना प्रदर्शन कर रहा है। हम भी किसानों के इस आंदोलन को 26 नवंबर से लगातार कवर कर रहा हैं। 26 जनवरी को हुए ट्रैक्टर मार्च के बाद किसान आंदोलन में कई तरह के उथल-पुथल देखने को मिले। लेकिन 28 जनवरी के बाद से पूरे किसान आंदोलन का नया केंद्र गाजीपुर बॉर्डर हो गया। भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत की छवि में बड़ा उछाल देखने को मिला। जिस धरनास्थल को किसान नेताओं ने राजनीति और राजनेताओं से दूर रखने की कोशिश की, वहाँ 29 जनवरी से नेताओं का आना-जाना शुरू हो गया। इस पूरे आंदोलन का भविष्य क्या होगा, इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों को देखें तो कई पार्टियां किसान आंदोलन के साथ में अपना और अपनी पार्टी का राजनीतिक भविष्य तलाशने में जुट गई हैं।

BKU अध्यक्ष नरेश टिकैत के घर हमारी मुलाक़ात नरेंद्र टिकैत जी से हुई। नरेंद्र टिकैत चार भाइयों में तीसरे नंबर के हैं। नरेंद्र टिकैत सबसे पहले हमें BKU के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत के कमरे में लेकर जाते हैं। इस कमरे में महेंद्र सिंह टिकैत की एक तस्वीर के सामने एक बड़े से पतीले में ज्योत जल रही है। यह ज्योत महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु के उपरांत निरंतर जल रही है। इसी कमरे में एक बिस्तर सजाया हुआ है और जाटों की पहचान कहा जाने वाला हुक्का भरा हुआ है।

हम भी गाज़ीपुर बॉर्डर पर किसान आंदोलन का पुनःजीवित होना, किसान आंदोलन में खापों का महापंचायत का रूप लेना, मुस्लिम किसानों का किसान आंदोलन को समर्थन देना और इसमें नेताओं की राजनीतिक महत्वकांक्षा जानने समझने मुज़फ्फ़रनगर पहुँच गए और सबसे पहले गए भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत के गाँव सिसौली।

नरेंद्र टिकैत और पूरा परिवार मानता है कि बाबूजी ने अपना शरीर त्यागा है, लेकिन वह हमेशा हमारे साथ हैं और इसीलिए उनके जाने के बाद से लेकर आज तक प्रत्येक दिन इस कमरे की सफाई होती है, बिस्तर की सफाई होती है और हुक्का भर के रखा जाता है। दिल्ली के बॉर्डर पर हो रहे किसान आंदोलन की पूरी जानकारी बाबूजी को शाम में दी जाती है। इस कमरे से बाहर आने पर बाईं तरफ़ बैठक के लिए एक बड़ा सा हॉल बनाया गया है, जहां पर किसान आंदोलनों से जुड़ीं तस्वीरों को सजाया गया है।

किसान आंदोलन कैसे बना सम्मान की लड़ाई

नरेंद्र टिकैत दीवारों पर लगी तस्वीरों को दिखाते हुए कहते हैं कि हमारी कोई राजनीतिक महत्वकांक्षा नहीं है, हम लड़ रहे हैं क्योंकि किसानों के साथ अन्याय हो रहा है और अब यह सम्मान की लड़ाई बन गई है। राकेश टिकैत के आंसुओं का हिसाब अब तो सरकार को देना ही पड़ेगा।

बगल की कुर्सी पर एक बुज़ुर्ग किसान किशनपाल बैठें हैं। उम्र कोई 75 साल के आसपास है। हुक्का गुड़गुड़ाते हुए किशनपाल कहते हैं कि अभी तक तो लड़ाई एक बिल की थी, जो किसानों के खिलाफ़ था। लेकिन अब बिल के साथ - साथ किसानों के सम्मान की भी लड़ाई हो गई है। इस लिए अब सरकार को समझना होगा, नहीं तो एक पार्टी का भविष्य अंधकार में नज़र आने लगेगा।

राकेश बालियान की उम्र 60 वर्ष है। आप भी हमें टिकैत जी की बैठकी में मिलते हैं। राकेश 15 बीघे में गन्ने की खेती करते हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में राकेश ने भाजपा को वोट दिया था। राकेश बोलते हुए भावुक हो जाते हैं फ़िर थोड़ी देर रुकते हैं और कहते हैं कि हर हफ़्ते किसी ना किसी किसान का बच्चा तिरंगे में लिपटा हुआ देश कि सरहद से गाँव आता है। तिरंगे में लिपटे अपने बच्चे को देख कर दुख तो होता ही है लेकिन उससे कहीं ज्यादा गर्व होता है कि बेटा देश कि हिफाज़त करते हुए शहीद हुआ है। गर्व की बात है कि अब हम एक शहीद के पिता के रूप में पहचाने जाएंगे। लेकिन आज ये सरकार हम किसानों को ही आतंकवादी बता रही है। वे सवालीय लहजे में कहते हैं कि क्या सरकार के नेताओं का किसानों को आतंकवादी और खालिस्तानी कहना सही है? क्या सरकार को नहीं मालूम कि हम कौन हैं? हम हिंदुस्तान के निवासी है और हम कौन हैं? यह बताने कि जरूरत हमें नहीं है। अब यह आंदोलन ही बताएगा कि हम कौन हैं।

किसान रोहतास बालियान

2019 के चुनाव में भाजपा को ही वोट देने वाले रोहतास बालियान (50) कहते हैं कि सरकार समस्याओं को सुलझाने के बजाय एक नई समस्या खड़ा कर देती है और फ़िर दूसरी समस्या की आड़ में पहली समस्या को दफ़ना देती है। हमारे आसपास सालों से रहते आ रहे मुसलमानों से हमें कोई दिक्कत नहीं है और ना ही हमारे रिश्तों में कोई खटास है। लेकिन सरकार कभी राम मंदिर तो कभी लव जिहाद, तो कभी गौ हत्या का मुद्दा उठा कर हिन्दू और मुसलमानों के बीच दंगे करवाती रहती है। आपसी सौहार्द को नष्ट कर देती है। अपनी राजनीति को लेकर सरकार आम जनमानस को आपस में लड़वा देती है। लेकिन हमें इससे क्या मिलता है? हमें राम मंदिर से क्या मिल जाएगा जो अगर हमारे बच्चों को अच्छी शिक्षा ही ना मिल सके तो। राम मंदिर हमारे बच्चों की शिक्षा, बेटियों की शादी और दवाई का ख़र्च उठा सकता है क्या? नहीं। इसी लिए हमें हमारा हक़ दे दे सरकार। हमें बस इतना ही चाहिए।

किसान राजबल सिंह

वहीं बगल में बैठे राजबल सिंह (65) कहते हैं कि पिछले साल जो हमने गन्ना मिलों को दिया था उसमें अप्रैल और मई का पैसा बकाया है और अब नवंबर से लेकर फरवरी 2021 में आधा महीना बीत चुका है, इन सब का पैसा बकाया है। पैसों की तंगी के कारण हमें कर्ज़ लेना पड़ रहा है। कभी महाजनों से तो कभी बैंकों से। हम कर्ज़ का ब्याज़ भी सही समय पर चुका नहीं पा रहे हैं। कर्ज़ छोड़िए हम तो उसके ब्याज़ के तले दबे हुए हैं। अगर हमें सही समय पर मीलों के द्वारा गन्ने का पैसा मिल जाए तो हमें कर्ज़ लेने कि जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लेकिन सरकार इस समस्या का समाधान करने के बजाय नई समस्या पैदा कर रही है। नए कृषि क़ानूनों को किसानों पर थोपना किसी भी तरह से संवैधानिक नहीं है। सरकार को लगता है कि किसान ज्यादा परेशान होगा तो आत्महत्या कर लेगा। लेकिन अब सरकार को यह बताने का समय आ गया है कि किसान चाहे तो भाजपा सरकार को सत्ता से बेदख़ल कर सकता है और इसकी शुरुआत हो गई है, जो दिल्ली के बॉर्डर पर देखने को भी मिल रहा है।

किसान आंदोलन और मुस्लिमों की बढ़ती हुई भागीदारी

मुज़फ़्फ़रनगर से 14 किलोमीटर दूर खामपुरा में 2013 के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों में पीड़ित मुस्लिमों की एक कॉलोनी है। यहाँ हमारी मुलाक़ात सबसे पहले शमीम अहमद से हुई। शमीम 40 साल के हैं और कपड़ा व्यवसाय का काम करते हैं।

शमीम अहमद

शमीम बताते हैं कि दंगों के बाद से वो यहाँ रह रहे हैं। किसान आंदोलन को लेकर सवाल करने पर शमीम कहते हैं कि किसान ही नहीं रहेगा तो हम खाएँगे क्या? इसी लिए वो किसानों के प्रदर्शन के साथ हैं। कृषि कानून वापस होना ही चाहिए। लेकिन साथ ही वो कहते हैं कि उन्हें कृषि क़ानूनों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। जो भी उन्हें थोड़ा बहुत मालूम है वो अख़बारों और टीवी चैनलों के माध्यम से ही मालूम हैं। जब हमने शमीम से पूछा, “क्या आपको लगता है कि इस आंदोलन ने हिन्दू मुस्लिम एकता का परिचय दिया है? तो शमीम थोड़ी देर के लिए चुप हो जाते हैं और फिर कहते हैं कि यह कहना सही नहीं होगा कि एक आंदोलन से आपसी भाईचारा स्थापित हो गया है। हम 2013 के दंगों को भूल जाने कि कोशिश करते हैं लेकिन अतीत आपका पीछा कभी नहीं छोड़ता है। हम किसान के साथ हमेशा थे और रहेंगे।

गौरतलब हो कि 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर में तब खापों की महापंचायत बुलाई गई थी, जब दो जाट युवकों की हत्या कवाल गांव में 27 अगस्त 2013 को कर दी गई थी। इसके बाद दोनों समुदायों के बीच टकराव शुरू हो गया और पूरे इलाके में दंगे भड़क उठे। उस वक़्त राकेश और नरेश टिकैत पर दंगे भड़काने के आरोप लगे और उनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करवाई गई। लेकिन बीते महीने की 29 तारीख़ को एक और महापंचायत बुलाई गई। इस महापंचायत में भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने मंच से 2013 में हुए दंगों के लिए माफ़ी मांगी। इस मंच पर मुस्लिम खाप नेता गुलाम जौला को भी आमंत्रित किया गया था। गुलाम जौला 2 दशक से भी अधिक तक महेंद्र टिकैत के साथी रहे थे। लेकिन दंगों के वक़्त वो भारतीय किसान यूनियन से दूर हो गए थे। लेकिन किसान आंदोलन के समर्थन में बुलाई कई महापंचायत में एक बार फिर जौला को देख कर क़यास लगाया जा रहा है कि दोनों धर्मों के बीच सौहार्द स्थापित हो रहा है।

मेहंदी हसन

लेकिन जब मेहंदी हसन (52) से हमारी बात हुई तो उस दौरान वह दंगों को याद करते हुए भावुक उठे और सवालिए लहजे में कहा, “कौन दंगा चाहता है? कौन चाहता है कि डर के साए में कोई सोये? कौन चाहता है या चाहेगा कि वो अपना घर, खेती खलिहान छोड़ कर विस्थापितों की जिंदगी जिए? बीते सात सालों में क्या क्या हुआ और कैसे हमारा जीवन चल रहा है, इससे किसी सरकार या नेता को क्या फ़र्क पड़ता है। हम सिर्फ़ वोट देने के लिए बने हैं क्या? यह बात स्पष्ट है कि हम किसान आंदोलन में किसानों के साथ हैं लेकिन अगर आप हमसे यह पूछते हैं कि दंगों के घाव भर चुके हैं तो आप गलत हैं। वो घाव हमारी आत्मा पर है और आत्मा पर लगा घाव लोक लुभावन के वादों से नहीं मिटने वाला है।

लोगों से बात कर उनके अनुभवों को सुनने के बाद इस बात का एहसास हुआ कि लोगों के जेहन में दंगो का घाव अभी भी ताज़ा है। मग़र इस बात से दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि एक वक़्त में जिन टिकैत बँधुओं ने बीजेपी को वोट दिया था आज वही लोग मंच से अपनी गलतियों की माफ़ी मांग रहे हैं। बड़े से बड़ा घाव भी सही इलाज़ मिलने पर भर जाता है। राकेश टिकैत का माफ़ी मांगना, मुस्लिम समुदाय के घाव पर मरहम लगाने जैसा है। किसान आंदोलन की वजह से जाट और मुस्लिम समुदाय के बीच जो खाई बन गयी थी वो भरती हुई नज़र आ रही है। बीजेपी के लिए आने वाले समय में एक बार फ़िर से जाट और मुसलमानों की जोड़ी खतरनाक साबित हो सकती है।

क्या थी BKU और महेंद्र सिंह टिकैत के आंदोलन की पृष्ठभूमि और इसे कहाँ लेकर गए राकेश टिकैत

बिरेन्द्र सिंह (65) सन् 1987 में भारतीय किसान यूनियन से जुड़े थे लेकिन वैचारिक मतभेदों की वजह से उन्होंने 2000 में संगठन से किनारा कर लिया। वो बताते हैं कि 1986 में उत्तर प्रदेश सरकार ने बिजली के दाम 22.5 रुपये से बढ़ाकर 30 रुपये प्रति हार्स पावर कर दिया था। तब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नहरों के अलावा अधिकतर किसान बिजली से सिंचाई करते थे। एक तरफ उन्हें बिजली कम मिल रही थी तो दूसरी तरफ सरकार ने बिजली के रेट बढ़ा दिए थे। इस कारण से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान सरकार के इस फैसले से नाराज थे। तब खेखड़ा क्षेत्र के किसान नेता चौधरी महेंद्र दंग ने विद्युत उपकेंद्र पर बिजली संबंधी समस्याओं के लिए आंदोलन किया। इसके बाद बड़ौत क्षेत्र के किसानों ने तथा भाकियू के पुराने पदाधिकारियों ने देश खाप के चौधरी एवं भारतीय किसान यूनियन उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष चौधरी सुखवीर से संपर्क किया और उन्होंने क्षेत्र के किसानों की एक बैठक बुलाई। 1986 में जनता इंटर कॉलेज बड़ौत में यह मीटिंग बुलाई गई। मीटिंग में चौधरी महेंद्र टिकैत, मंत्री चौधरी कबूल सिंह, चौधरी उदयवीर सिंह भैंसवाल, चौधरी महेंद्र सिंह भैंसवाल, मंत्री चौधरी रामस्वरूप और बाबा हरिकिशन मलिक जैसे कई किसान नेताओं ने इसमें भाग लिया।

इस मीटिंग के बाद बड़ौत बिजली घर पर घेराव की घोषणा की गई। इस मीटिंग में भारतीय किसान यूनियन की कमान चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत को सौंपने तथा भारतीय किसान यूनियन की अगली पंचायत सिसौली में रखने का निर्णय हुआ। 17 अक्टूबर 1986 को सिसौली में एक पंचायत हुई और उसमें चौधरी टिकैत को भारतीय किसान यूनियन की कमान सौंप दी गई। 17 जनवरी 1987 को ठाकुर रोहतास सिंह दुधली की अध्यक्षता व डॉ. सत्येंद्र बहरा खुर्द के संचालन में किसानों की एक बड़ी महापंचायत सिसौली में बुलाई गई, जिसमें करीब बीस हज़ार किसानों ने भाग लिया। इस महापंचायत में तय हुआ कि भारतीय किसान यूनियन संगठन हर गांव में बनाए जाएं तथा खाप व्यवस्था जो पंचायत पर आधारित है उनके चौधरियों को इस को मजबूती प्रदान करने की जिम्मेदारी दी गई। इस पंचायत में 27 जनवरी 1987 को खेड़ी कर्म बिजली घर पर घेराव करने का निर्णय किया गया। इन आंदोलन में सरकार के सामने 11 सूत्रीय मांगों को रखा गया।

मुख्य मांगे

1.      बिजली की बढ़ी हुई दरें वापस ली जाए

2.      गन्ने का मूल्य 48 रुपये प्रति क्विंटल जाए

3.      गेहूं का मूल्य 292 रुपये प्रति क्विंटल किया जाए

4.      किसान की फसल की कुल उत्पादन लागत पर 12% लाभांश जोड़कर कीमत तय की जाए

और इस तरह चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन के किसानों की लड़ाई लड़ने का निर्णय लिया। कई लड़ाइयाँ हुईं, जिसे बिरेन्द्र सिंह ने महेंद्र सिंह टिकैत के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ा।

बिरेन्द्र सिंह

बिरेन्द्र सिंह कहते हैं कि बाबा टिकैत के जैसा किसान नेता होना मुश्किल है। वो याद करते हुये कहते हैं कि चौधरी देवी लाल ने तत्कालीन भारतीय किसान यूनियन अध्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत को राज्यसभा में आने का प्रस्ताव दिया था लेकिन महेंद्र सिंह टिकैत ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि वो कभी राजनीति में नहीं आएंगे। लेकिन बिरेन्द्र सिंह इस बात से नाराज़ नज़र आते हैं कि भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता और दिल्ली के गाज़ीपुर बॉर्डर पर तीन कृषि क़ानूनों के खिलाफ़ आंदोलन कर रहे किसानों का नेतृत्व करने वाले राकेश टिकैत की महत्वाकांक्षा इस आंदोलन से अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्थापित होने की हो रही है। बिरेन्द्र सिंह कहते हैं कि महेंद्र टिकैत कभी नहीं चाहते थे कि उनके परिवार से कोई राजनीति में जाए लेकिन राकेश टिकैत ने अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए 2007 में अपने पिता और उस वक़्त भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत की मर्ज़ी के खिलाफ़ जा कर चुनाव लड़ा और हारे। फिर 2014 में भी वो चुनाव मैदान में उतरे लेकिन उन्हें जीत नहीं नसीब हुई। बिरेन्द्र सिंह के मुताबिक़ यह किसान आंदोलन राकेश टिकैत के लिए संजीवनी बन कर आया है और वो इस मौके को गंवाना नहीं चाहते हैं। हालांकि राकेश टिकैत खुद अब आगे चुनाव न लड़ने की बात कह चुके हैं।

किसान आंदोलन के जरिए उत्तर प्रदेश में तलाश हो रही राजनीतिक ज़मीन

28 जनवरी 2021 के बाद से जिस तरह गज़ीपुर बॉर्डर पूरे किसान आंदोलन का नया केंद्र बना उसके बाद से राकेश टिकैत का कद देखते ही देखते बहुत बड़ा हो गया है। उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए जिस पर संयुक्त किसान मोर्चा ने आपत्ति जाहिर की। वहीं जब आप 29 जनवरी को मुज़फ्फ़रनगर में हुई महापंचायत को देखें तो वहाँ कई पार्टियों के नेता जैसे आरएलडी के जयंत चौधरी और आम आदमी पार्टी के संजय सिंह भी शामिल होते हैं और महापंचायत के मंच से केंद्र सरकार को ललकारा जाता है। जयंत चौधरी गंगा जल और नमक गिराकर स्टेज से कहते हैं कि मेरा प्रस्ताव यह है कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का हु्क्का पानी बंद किया जाए। उन्होंने कहा कि जो गाजीपुर, सिंघु बॉर्डर जहां पर बैठ सकता है बैठ जाए और आंदोलन करे। उसी दिन दिल्ली के गाज़ीपुर बॉर्डर पर दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सीसोदिया और आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्डा भी किसानों को समर्थन देने पहुंचे, साथ ही हर संभव मदद का आश्वासन भी दिया। इसके बाद से अगर आप देखें तो सिंघु बॉर्डर पर नेताओं का आना जिस तरीक़े से बैन था वहीं गज़ीपुर बॉर्डर पर नेताओं का आना शुरू हो गया। पंजाब से, हरियाणा से, महाराष्ट्र से, तो उत्तर प्रदेश से कई नेताओं ने गाज़ीपुर बॉर्डर पर आकर राकेश टिकैत से मुलाकात की और अपना समर्थन राकेश टिकैत को दिया। अगर आप अभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से देखेंगे तो आपको समझ आएगा की जाट बहुल ये इलाक़ा जिस तरीक़े से 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाओं में भाजपा की तरफ़ आ गया था वो अब सरकार द्वारा लाए गए कृषि क़ानूनों के खिलाफ़ है।

किसान आंदोलन को देखते हुए एक बार फिर इस इलाक़े में जाटों की एकजुटता दिख रही है और इसी मौक़े को अपने पक्ष में लगे हैं आरएलडी नेता जयंत चौधरी। जयंत लगातार खापों की महापंचायत को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में बुला रहे हैं और कृषि कानूनों और किसान आंदोलन के जरिए सरकार पर हमलावर हो रहे हैं। वह पूरी कोशिश कर रहे हैं कि वह किसानों के इस आंदोलन में हर संभव शामिल होकर किसानों के दिलों को जीत सके और उसे आने वाले 2022 के उत्तरप्रदेश चुनाओं में अपनी पार्टी के लिए वोटों के रूम में बदल सके। महापंचायतों में शामिल होने आ रहे किसान भी इस बात को स्वीकार करते हैं और कहते हैं की जो इस वक़्त हमारे साथ खड़ा होगा वही हमारा नेता होगा।

किसान आंदोलन अपनी पूरी मज़बूती से चल रहा है और सरकार भी किसानों की मांगों के सामने अब झुकती नज़र नहीं आ रही है। ऐसे में अब देखना होगा की भविष्य में किसान आंदोलन की रूप रेखा में किस प्रकार बदलाव होता है और सरकार इस आंदोलन को खत्म करने लिए कौन सा नया रास्ता तलाशती है।

(अनिल शारदा एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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