NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
यूपी में एस्मा लागू यानी “जबरा मारे, रोने भी न दे!”
एक कहावत है “जबरा मारे, रोने भी न दे” यानी बलवान निर्बल को सताता भी है और रोने या शिकायत का मौका भी नहीं देता। यही अब यूपी में दोहराया जा रहा है। श्रम कानूनों के स्थगन और कर्मचारी भत्तों में कटौती के बाद अब प्रदेश में एस्मा लगा दिया गया है। जिसके तहत अब छह महीने तक कोई भी अधिकारी व कर्मचारी संगठन अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर नहीं जा सकते।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
23 May 2020
cartoon click

 “प्रदेश सरकार के कार्यकलापों से संबंधित किसी लोक सेवा, राज्य सरकार के स्वामित्व व नियंत्रण वाले किसी निगम के अधीन सेवाओं और किसी स्थानीय प्राधिकरण के अधीन सेवाओं में छह महीने के लिए हड़ताल निषिद्ध की गई है।”

ये वक्तव्य उत्तर प्रदेश के कार्मिक विभाग के अपर मुख्य सचिव मुकुल सिंघल का है। प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सरकारी सेवाओं और निगमों में आवश्यक सेवा रख-रखाव अधिनियम यानी ‘एस्मा’ लगा कर हड़ताल पर रोक लगा दी है। आदेश के मुताबिक अब छह महीने तक कोई भी अधिकारी व कर्मचारी संगठन अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर नहीं जा सकते हैं।

मुकुल सिंहल के अनुसार यदि कर्मचारी हड़ताल पर रोक के बावजूद आंदोलन आदि करते हैं तो सरकार इस कानून के तहत अब सख्त कार्रवाई कर सकती है।

एस्मा लागू होने का क्या मतलब है?

इस कानून के लागू होने के दौरान प्रदेश में होने वाली किसी भी हड़ताल को अवैध माना जायेगा। इसके साथ ही हड़ताल पर जाने वाले किसी भी व्यक्ति को एक साल तक की सजा या जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं। इसका उल्लंघन होने  पर पुलिस बिना वॉरंट के भी गिरफ्तार कर सकती है।

क्या है पूरा मामला?

शुक्रवार, 22 मई को उत्तर प्रदेश के कार्मिक एवं नियुक्ति विभाग द्वारा एक अधिसूचना जारी की गई। जिसमें कहा गया कि राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश अत्यावश्यक सेवाओं का अनुरक्षण अधिनियम, 1966 की धारा तीन की उपधारा एक के अधीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए छह माह की अवधि के लिए हड़ताल पर प्रतिबंध लगा दिया है।

up-govt_052220081635_0.jpg

इसके दायरे में उत्तर प्रदेश राज्य के कार्य-कलापों से संबंधित किसी लोक सेवा, राज्य सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निगम के अधीन किसी सेवा तथा किसी स्थानीय प्राधिकरण के अधीन सेवा में हड़ताल नहीं की जा सकेगी। 

हड़ताल पर रोक क्यों?

प्राप्त जानकारी के मुताबिक कोरोना महामारी के चलते वित्तीय संकट का हवाला देते हुए बीते दिनों राज्य सरकार ने अधिकारियों और कर्मचारियों को दिए जाने वाले विभिन्न भत्तों में कटौती का फैसला किया था। जिसके बाद से ही तमाम कर्मचारी संगठन सरकार से नाराज चल रहे थे, लगातार काम पर काली पट्टी बांध कर अपना प्रतीकात्मक विरोध भी दर्ज करा रहे थे।

हाल ही में कुछ संगठनों ने इस बाबत बैठक कर सरकार के प्रति रोष व्यक्त करते हुए आने वाले दिनों में धरना-प्रदर्शन और हड़ताल की भी चेतावनी दी थी। जिसके मद्देनजर अब सरकार का ये नया फैसला सामने आया है।

प्रदेश सचिवालय में कार्यरत कई कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर न्यूज़क्लिक को बताया कि राज्य सरकार ने करीब आठ तरह के भत्ते खत्म कर दिए हैं, जिसके खिलाफ कई बार लिखित में विरोध भी दर्ज करवाया गया, प्रत्यावेदन भी दिए गए लेकिन बावजूद इसके सरकार कुछ सुनने को तैयार नहीं थी। इसलिए सचिवालय से जुड़े सभी सेवा संगठनों ने सचिवालय समन्वय समिति बनाकर इसके खिलाफ विरोध शुरू किया। लेकिन सरकार नहीं चाहती थी कि कोई भी इसकी मुख़ालिफ़त करे। इसलिए कई माध्यमों से कर्मचारियों और अधिकारियों पर दबाव बनाया जा रहा था कि वे ये सब बंद कर दें लेकिन इसके बाद भी जब विरोध जारी रहा तो सरकार ने एस्मा का फैसला लागू कर दिया।

कर्मचारी संगठनों ने जताई नाराज़गी

प्रदेश सरकार के ‘एस्मा’ लगाने के फैसले पर कर्मचारी संगठनों ने नाराज़गी जताई है। इसे सरकार द्वारा हवा में तीर चलाने जैसा बताया है। उनका कहना है कि कोरोना संकट में कर्मचारी, शिक्षक व चिकित्सक सहित सभी वर्ग पूरी तरह सरकार का सहयोग कर रहे हैं। सरकार से तमाम मुद्दों पर असहमति होने के बावजूद किसी भी संगठन ने अभी तक सरकार को हड़ताल का नोटिस तक नहीं दिया। ऐसे में सरकार ये कानून लागू करने का फैसला कैसे कर सकती है?

इस संबंध में राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष हरिकिशोर तिवारी ने कहा कि वित्त विभाग के अफसर सरकार को गुमराह कर रहे हैं। भत्तों की कटौती से नाराजगी के बावजूद हम सभी लगातार काम कर रहे हैं। ऐसे में इस कानून को लगाने का मतलब कार्मिकों को अकारण चुनौती देना है।

कर्मचारी-शिक्षक समन्वय समिति के प्रवक्ता बीएल कुशवाहा ने बताया कि काली पट्टी बांधना सांकेतिक विरोध है। जब किसी संगठन ने हड़ताल का नोटिस ही नहीं दिया तो एस्मा लगाने का मतलब ही क्या है।

गौरतलब है कि यूपी सरकार द्वारा छह महीने के लिए कर्मचारियों की हड़ताल पर लगाई गई रोक के चलते राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद (निगम गुट) ने अपना विरोध प्रदर्शन स्थगित कर दिया है।

परिषद के प्रांतीय अध्यक्ष विजय कुमार निगम ने बताया कि 27 मई को प्रस्तावित आंदोलन को स्थगित कर दिया गया है। इस हड़ताल को राज्य कर्मचारी महासंघ ने भी अपना समर्थन दिया था लेकिन एस्मा लगाए जाने के कारण इसे स्थगित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि भत्ते खत्म करने के विरोध व अन्य मांगों को लेकर यह आंदोलन शुरू किया जाना था।

बता दें कि पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में एक ऐसे अध्यादेश को मंजूरी दी गई जो प्रमुख श्रम कानूनों में तीन सालों के लिए छूट देता है। इसमें श्रमिक संघों से संबंधित सभी महत्वपूर्ण कानून, काम के विवादों को निपटाने, काम करने की स्थिति, काम करने के अवधि, अनुबंध आदि को मौजूदा और नए कारखानों के लिए तीन साल तक निलंबित रखा जाएगा।

सरकार के इस फैसले का श्रमिक संगठनों ने जोरदार विरोध किया था। काम करने के समय को आठ घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे करने का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंच गया था, जिसके बाद सरकार अपने फैसले से पीछे हट गई और वर्कर्स फ्रंट को एक बड़ी कामयाबी मिली।

हालांकि कई राज्य सरकारों द्वारा श्रम कानूनों में संशोधन किये जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है। झारखण्ड के सामाजिक कार्यकर्ता पंकज कुमार यादव ने जनहित याचिका दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट से राज्य सरकारों द्वारा बनाए अध्यादेशों को रद्द करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकारें श्रम कानूनों में बदलाव कर उद्योग जगत को बढ़ावा दे रही हैं, ऐसे में मज़दूरों का शोषण बढ़ेगा। 

 इसे भी पढ़े : वर्कर्स फ्रंट की पहली जीत: बैकफुट पर योगी सरकार, 12 नहीं अब 8 ही घंटे होगा काम

UttarPradesh
yogi sarkar
ESMA
Essential Services Maintenance Act
labor laws
Workers and Labors
Coronavirus
Lockdown

Related Stories

श्रम क़ानूनों और सरकारी योजनाओं से बेहद दूर हैं निर्माण मज़दूर

मनरेगा मज़दूरों के मेहनताने पर आख़िर कौन डाल रहा है डाका?

उनके बारे में सोचिये जो इस झुलसा देने वाली गर्मी में चारदीवारी के बाहर काम करने के लिए अभिशप्त हैं

ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?

ग्राउंड रिपोर्ट: किसानों के सामने ही ख़ाक हो गई उनकी मेहनत, उनकी फसलें, प्रशासन से नहीं मिल पाई पर्याप्त मदद

यूपी चुनाव: पूर्वी क्षेत्र में विकल्पों की तलाश में दलित

यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 

यूपी चुनावों को लेकर चूड़ी बनाने वालों में क्यों नहीं है उत्साह!

सड़क पर अस्पताल: बिहार में शुरू हुआ अनोखा जन अभियान, स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए जनता ने किया चक्का जाम

ग्राउंड रिपोर्ट: पूर्वांचल में खाद के लिए हाहाकार, योगी सरकार ने किसानों को फिर सड़कों पर ला दिया


बाकी खबरें

  • corona
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,778 नए मामले, 62 मरीज़ों की मौत
    23 Mar 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.05 फ़ीसदी यानी 23 हज़ार 87 हो गयी है।
  • moon
    संदीपन तालुकदार
    चीनी मिशन में इकट्ठा किये गये चंद्रमा के चट्टानों से शोध और नये निष्कर्षों को मिल रही रफ़्तार
    23 Mar 2022
    इस परिष्कृत चीनी चंद्र मिशन ने चीन और उसके बाहर दोनों ही जगहों पर पृथ्वी या उसके वायुमंडल से बाहर के चट्टानों पर शोध किया है। जानकार उम्मीद जता रहे हैं कि इससे हमें सौर मंडल के बारे में नयी-नयी…
  • bhagat singh
    हर्षवर्धन
    जाति के सवाल पर भगत सिंह के विचार
    23 Mar 2022
    भगत सिंह के जाति व्यवस्था के आलोचना के केंद्र में पुनर्जन्म और कर्म का सिद्धांत है। उनके अनुसार इन दोनों सिद्धांतों का काम जाति व्यवस्था से हो रहे भीषण अत्याचार के कारण उत्पन्न होने वाले आक्रोश और…
  • bhagat singh
    लाल बहादुर सिंह
    भगत सिंह की फ़ोटो नहीं, उनके विचार और जीवन-मूल्यों पर ज़ोर देना ज़रूरी
    23 Mar 2022
    शहादत दिवस पर विशेष: भगत सिंह चाहते थे कि आज़ाद भारत में सत्ता किसानों-मजदूरों के हाथ में हो, पर आज देश को कम्पनियां चला रही हैं, यह बात समाज में सबसे पिछड़े माने जाने वाले किसान भी अपने आन्दोलन के…
  • भाषा
    साल 2021 में दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी थी : रिपोर्ट
    22 Mar 2022
    साल 2021 में वैश्विक स्तर पर वायु गुणवत्ता की स्थिति बयां करने वाली यह रिपोर्ट 117 देशों के 6,475 शहरों की आबोहवा में पीएम-2.5 सूक्ष्म कणों की मौजूदगी से जुड़े डेटा पर आधारित है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License