NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
भारत
राजनीति
एक्सप्लेनर: क्या है संविधान का अनुच्छेद 142, उसके दायरे और सीमाएं, जिसके तहत पेरारिवलन रिहा हुआ
“प्राकृतिक न्याय सभी कानून से ऊपर है, और सर्वोच्च न्यायालय भी कानून से ऊपर रहना चाहिये ताकि उसे कोई भी आदेश पारित करने का पूरा अधिकार हो जिसे वह न्यायसंगत मानता है।”
विकास भदौरिया
20 May 2022
SC

सुप्रीम कोर्ट ने राजीव गांधी हत्याकांड के दोषी ए जी पेरारिवलन को बुधवार को रिहा करने का आदेश दिया। जस्टिस एल नागेश्वर राव और बी आर गवई की बेंच ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत का कहना था कि इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 142 द्वारा प्राप्त उक्त अधिकारों का इस्तेमाल यहाँ उचित है।

क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 142?

अनुच्छेद 142 की उपधारा 1 कहती है कि, "उच्चतम न्यायालय अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री पारित कर सकेगा या ऐसा आदेश कर सकेगा जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो।"

संविधान का यह प्रावधान देश की शीर्ष अदालत को खास मामलों में "पूर्ण न्याय" करने का व्यापक अधिकार देता है।

संविधान में इस अनुच्छेद को शामिल करने की आवश्यकता को संविधान सभा की बहस से समझा जा सकता है। इस अनुच्छेद पर बहस के दौरान श्री ठाकुर दास भार्गव ने इसकी जरूरत को दर्शाते हुए कहा था कि प्राकृतिक न्याय सभी कानून से ऊपर है, और सर्वोच्च न्यायालय भी कानून से ऊपर रहना चाहिये ताकि उसे कोई भी आदेश पारित करने का पूरा अधिकार हो जिसे वह न्यायसंगत मानता है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण खंड है और लगभग असीमित अधिकार देता है। इसलिए, सर्वोच्च न्यायालय पूर्ण न्याय के लिए इन शक्तियों का उपयोग करने के लिए अधिकृत है और कोई भी नियम या कानून, कार्यकारी अभ्यास या कार्यकारी परिपत्र या विनियम आदि के प्रावधान उसे उपयुक्त न्याय करने में बाधा नहीं बन सकते हैं।  इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय, हर अर्थ में, कानून से ऊपर होगा

अनुच्छेद 142 का दायरा

अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त शक्तियां व्यापक हैं, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई निर्णयों के द्वारा इसके दायरे और सीमा को परिभाषित किया है। इस संबंध में कुछ महत्वपूर्ण मामलों में 'प्रेम चंद गर्ग बनाम आबकारी आयुक्त, उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद' (1962); 'ए.आर. अंतुले बनाम आर.एस. नायक और अन्य' (1988); 'यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन बनाम भारत संघ' (1991); और 'सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ' (1998) आदि शामिल हैं।

सबसे पहले, 'प्रेम चंद गर्ग' में, बहुमत की राय से अनुच्छेद 142 (1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों के प्रयोग के लिए कुछ सीमाएं निर्धारित की। अदालत ने इस मामले में कहा कि पूर्ण न्याय करने के लिए यह अदालत जो भी आदेश देगी, वो न केवल संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के अनुरूप होने चाहिएं, बल्कि प्रासंगिक वैधानिक कानूनों के मूल प्रावधानों के साथ असंगत भी नहीं होने चाहिएं।"

यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में, गैस के खराब रखरखाव के कारण भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड इंडिया प्लांट से हानिकारक मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव होने के कारण हजारों लोगों की मृत्यु हो गई थी। अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए अदालत ने भारत सरकार को पीड़ितों का प्रतिनिधित्व करने और उनके सर्वोत्तम हितों की रक्षा करने के लिए अधिकृत किया।

मुआवजे के रूप में कंपनी को 470 मिलियन डॉलर का भुगतान करने का आदेश देते हुए, खंडपीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 142(1) के तहत इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र  के दायरे पर कुछ गलतफहमियों को दूर करना आवश्यक है। अदालत ने पीड़ितों को मुआवजा देने का आदेश देने के लिए स्वयं को संसदीय कानूनों से ऊपर रखकर पूर्ण न्याय की प्राप्ति के लिए वैधानिक कानूनों पर लागू प्रतिबंध को अनुच्छेद 142 के दायरे से बाहर रखा।

अदालत ने अपने फैसला में कहा, "सामान्य कानूनों में निहित प्रावधानों पर जिस तरह प्रतिबंध होते हैं, वे अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त संवैधानिक अधिकारों पर लागू नहीं हो सकते हैं ...यह कहना पूरी तरह से गलत होगा कि अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त अधिकार व्यक्त सांविधिक निषेध के अधीन हैं। अगर ऐसा होता है, तो इससे यह प्रतीत होगा कि संवैधानिक प्रावधान वैधानिक प्रावधान के अधीन हैं..."

अनुच्छेद 142 में प्रयुक्त अभिव्यक्ति अदालत को 'पूर्ण न्याय' के लिए प्रयास करने का अधिकार देती है। इसके दायरे को लेकर अदालत ने मनोहर लाल शर्मा बनाम प्रधान सचिव के मामले में विस्तार से चर्चा की थी और समझाने का प्रयास किया था कि सर्वोच्च न्यायालय जनता के व्यापक हित के लिए असाधारण परिस्थितियों में हस्तक्षेप कर सकती है ताकि जनता का कानून के शासन में विश्वास न डगमगाए।

इसी तरह  ए.आर. अंतुले बनाम आर.एस. नायक के मामले में अदालत ने साफ तौर पर समझाया कि अदालत के किसी भी फैसले में उसका न्यायिक विवेक न तो मनमाना होना चाहिए और न ही किसी भी तरह से से निर्धारित वैधानिक कानूनों के प्रावधानों के साथ असंगत नहीं हो सकता है।

इसे भी पढ़ें: राज्यपाल प्रतीकात्मक है, राज्य सरकार वास्तविकता है: उच्चतम न्यायालय

पेरारिवलन मामले में अनुच्छेद 142 का सहारा

इसी अधिकार का माकूल उपयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने, “पूर्ण न्याय” के उद्देश्य से राज्यपाल द्वारा पेरारिवलन को क्षमा करने में अत्यधिक देरी का हवाला देते हुए उसे रिहा करने का फैसला किया।

राज्यपाल ने अनुच्छेद 161, जो राज्यपाल को पेरारिवलन की रिहाई का फैसला करने की अधिकार देता है, के तहत राष्ट्रपति को राज्य के मंत्रिमंडल की सिफारिश भेजने से पहले उसे कई महीनों तक लटकाए रखा।

अनुच्छेद 161 राज्यपाल को किसी भी मामले से संबंधित किसी भी कानून के खिलाफ किसी भी अपराध के लिए दोषी व्यक्ति की सजा को माफ करने, राहत देने, या सजा में छूट देने या सजा को निलंबित करने या सजा को कम करने अधिकार देता है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति के फैसले का इंतजार करने के फैसले से असहमत है, वो भी तब जब तमिलनाडु राज्य मंत्रिमंडल ने अपनी सिफारिश काफी समय पहले ही दे दी है। यह देखते हुए अदालत ने कहा कि "कोई भी कानून से ऊपर नहीं है।"

अदालत ने इससे पहले पेरारीवलन को उनकी लंबी कैद और पैरोल पर बाहर रहते हुए पैरोल की शर्तों का किसी तरह उल्लंघन न करने और किसी प्रकार की शिकायत का मौका न देने को मद्देनजर रखते हुए उन्हें जमानत दे दी थी।

Perarivalan
rajiv gandhi murder
Supreme Court
constitution
 Article 142
A.G. Perarivalan

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा

ज्ञानवापी कांड एडीएम जबलपुर की याद क्यों दिलाता है

राज्यपाल प्रतीकात्मक है, राज्य सरकार वास्तविकता है: उच्चतम न्यायालय

राजीव गांधी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट ने दोषी पेरारिवलन की रिहाई का आदेश दिया

मैरिटल रेप : दिल्ली हाई कोर्ट के बंटे हुए फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, क्या अब ख़त्म होगा न्याय का इंतज़ार!

राजद्रोह पर सुप्रीम कोर्ट: घोर अंधकार में रौशनी की किरण

सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह मामलों की कार्यवाही पर लगाई रोक, नई FIR दर्ज नहीं करने का आदेश

क्या लिव-इन संबंधों पर न्यायिक स्पष्टता की कमी है?

उच्चतम न्यायालय में चार अप्रैल से प्रत्यक्ष रूप से होगी सुनवाई


बाकी खबरें

  • पीपल्स डिस्पैच
    कोलंबिया की नेशनल स्ट्राइक कमेटी ने प्रदर्शन का आह्वान किया
    09 Jun 2021
    इस विरोध प्रदर्शन का आह्वान यह मांग करने के लिए किया गया है कि राष्ट्रीय सरकार आंदोलनकारी क्षेत्रों की मांगों पर बातचीत करने के लिए आगे बढ़ने और प्रदर्शन के अधिकार का प्रयोग करने के लिए गारंटी प्रदान…
  • पीपल्स डिस्पैच
    इज़रायल की संसद में रविवार को नई सरकार को मंज़ूरी देने के लिए मतदान
    09 Jun 2021
    अगर गठबंधन की नई सरकार को बहुमत मिलता है तो यह बेंजामिन नेतन्याहू के इज़रायल के प्रधानमंत्री के रूप में 12 साल के लंबे शासन को समाप्त कर देगा जो विवाद, भ्रष्टाचार और हिंसा के लिए जाना जाता है।
  • Wheat Produce
    मो. इमरान खान
    बिहार: बंपर फसल के बावजूद गेहूं की कम ख़रीद से किसान मायूस
    09 Jun 2021
    इस वर्ष सरकार ने अब तक अपने कुल गेहूं की खरीद के लक्ष्य से 40% से भी कम की खरीद की है।
  • दिल्ली : राशन को लेकर सरकारों के आपसी झगड़े में ग़रीबों के लिए क्या है?
    मुकुंद झा
    दिल्ली : राशन को लेकर सरकारों के आपसी झगड़े में ग़रीबों के लिए क्या है?
    09 Jun 2021
    दिल्ली की ग़रीब वर्ग के घर तक राशन पहुंचाने को लेकर केजरीवाल और केंद्र सरकार के बीच तकरार जारी है, मगर सवाल यह है कि काफ़ी देर से लागू हो रही इस योजना का जनता को कितना फ़ायदा मिल पाएगा?
  • बिरसा मुंडा का उलगुलान : सामाजिक जागरण का अभियान
    अनिल अंशुमन
    बिरसा मुंडा का उलगुलान : सामाजिक जागरण का अभियान
    09 Jun 2021
    बिरसा मुंडा द्वारा छेड़ा गया उलगुलान (विद्रोह) अंग्रेजी हुकूमत और स्थानीय शोषकों के खिलाफ महज एक तात्कालिक आदिवासी विद्रोह मात्र नहीं था। बल्कि यह पूरा आन्दोलन उस समय के आदिवासी और व्यापक समाज के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License