NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
साहित्य-संस्कृति
भारत
राजनीति
फ़ैज़ भाई, जय श्रीराम!
कबीर को जब मज़हब के दायरे में बांधने की कोशिश हुई तब भरे बाज़ार के बीच खड़े हो कर अपने दोहों से इस समाज की चादर को मज़बूती से बुनने की कोशिश कबीर ने जारी रखी। फ़ैज़ भाई, हम भी पागलों की तरह आपको ‘जय श्री राम’ बोल रहे हैं। हमें माफ़ कीजिए, हमपर हँस दीजिये।
श्रीरंजन
07 Jan 2020
faiz ahmad faiz
Image courtesy: Amar Ujala

प्रिय फ़ैज़भाई,

चौंक गए? आज कल कोई मुझे अपने नाम से पुकारे तब भी डर महसूस होता है। मैं तो अजनबी आदमी, आपके मुझे पहचानने की कोई संभावना नहीं है। आपके चले जाने के बाद मेरा जन्म हुआ। तो हम दोनों की जीवनरेखा भी कहीं मिलती नहीं और आज अचानक इस रास्ते पे आपके साथ मुलाकात होना बड़ी अजीबोग़रीब बात है। और ये देखिए न भीड़! भीड़ कहां, ये तो झुंड है। और ऐसे झुंड के बीच दो इन्सानों का मिलना संभव है क्या! 

शायद आपको पता नहीं होगा; पर हम दोनों की मुलाकात हो गयी थी नारायण सुर्वे के विश्वविद्यालय में। उनकी कविता उभरकर आई आपकी प्रेरणा से। बाद में मैं मेघना पेठे की एक कथा पढ़ रहा था- ‘आए कुछ अब्र’ और फिर सोचने लगा की ये टायटल क्यों दिया होगा? गूगल गुरु ने तो आपकी 'आए कुछ अब्र कुछ शराब आए/इसके बाद आए जो अज़ाब आए’ इस शेर तक पहुंचा दिया। दिल पर बादल छा जाते हैं और धुंधलके में ना साफ़ उजाला होता है न घना अंधेरा। ऐसी ही एक मायूस शाम को किसी टीले पर तन्हा मंडराते हुए आपकी दो पक्तिंयां मिलने आईं : 

दिल नाउम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है 

लंबी है ग़म की शाम, मगर शाम ही तो है

एक ऐसी छोटी सी आशा की किरन मिल जाए तो बात बन जाती है। पर ये किरन कहीं बाहर से मंगवाने से नहीं आती। वो तो अंदर से आनी चाहिए और दिल के हर कोने तक पहुंचनी चाहिए।

फिर आपसे मुलाकात होती रही। किताबों के पन्नों में, यहां वहां। कभी आंदोलन में आपकी कविता पढ़ती लडकी के साथ आप मिले तो कभी हिंदी साहित्य का भंडार हमारे लिए खोलनेवाली प्रो. शशिकला राय की मुस्कान में आप झलके। कभीकभार रेख़्ता पर आपके साथ गुफ़्तगू होती रही। आपको इस सबकी ख़बर हो इसलिए यह ख़त लिख रहा हूँ।

कुछ दिन पहले एक मज़ेदार बात हुई। ये क़िस्सा आपके साथ साझा करने के वास्ते लिख रहा हूँ।

आपकी ‘हम देखेंगे’ यह हमारी पसंदीदा नज़्म। कभी बुलावा करने पर बड़ी आसानी से यह नज़्म हाज़िर हो जाती है। हाल ही में IIT कानपुर के छात्रों ने सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ एक जुलूस निकाला, जिसमें ‘हम देखेंगे’ भी शामिल थी। हम सब की आवाज़ों को एक साथ पिरोती हुई यह इंक़लाबी नज़्म। बेख़ौफ़ बुलंद जज़्बे के साथ ‘लाज़िम है कि हम भी देखेंगे’ यह पुकार करते हुए उस दिन के वादे की याद दिलाने वाली यह नज़्म। यह वह दिन है कि जब हुकुमत के सारे तख़्त गिरेंगे और तुम्हारा-मेरा, हम सब का राज आएगा। वहां शायद वह ऊपरवाला ख़ुदा नहीं होगा, वहाँ तुम्हारे और मेरे अंदर का ख़ुदा होगा। सगुन- निर्गुन लांघ के तुम्हारे और मेरे होने की एहसास दिलाने वाले आपके लफ़्ज़।

आप कहेंगे मेरी ही शायरी मुझे समझाओगे! लेकिन आप सुनिये तो सही। मज़ेदार बात तो आगे है। आपकी यह नज़्म हिंदू-विरोधी है यह इल्ज़ाम आंदोलनकारियों पर लगाया गया। यह नज़्म वाक़ई हिंदू विरोधी है कि नहीं इसकी जांच करने के लिए एक समिती गठित की गयी है।

हाँ, यह मैं जानता हूँ कि यह नज़्म आपने पाकिस्तान के तानाशाह जनरल ज़िया उल हक़ के ख़िलाफ़ हुए इंक़लाब के दौरान लिखी थी। मैं यह भी जानता हूँ कि आप नास्तिक थे और उस पार लोग आपको मुस्लिम-विरोधी समझ रहे थे! पाकिस्तान के क़ैदख़ाने में ही तो आपने ‘ज़िंदान नामा’ और ‘दस्त-ए-सबा’ लिखी। लेकिन इनको यह सब कौन बताए फ़ैज़ भाई? सच कहूं, आपको मुबारकबाद ही देनी है मुझे। ज़िन्दगी भर आप पर मुस्लिम-विरोधी होने के आरोप हुए और अब आपके इन्तक़ाल के बाद हिंदू-विरोधी होने के आरोप! आप तो हर मज़हब के विरोधी निकले, यही तो साबित होता है इससे। इन्सान होने का इससे बुलंद सबूत और हो भी क्या सकता है!

आपको सच बताऊं, यह ज़माना ही शायरी के खो जाने का है। शायरी को समझने कि क़ाबिलयत ही नहीं यहाँ की हुक़ूमतों में। समझना तो दूर की बात, इनको तो कविता से डर लगता है। अपने तख़्त की नींव हिलने के ख़ौफ़ में ही तो यह रात दिन लगे रहते हैं। इसीलिए तो इस्मत चुग़ताई और सफ़दर हाश्मी को तालीम से बाहर का रस्ता दिखाते हैं यह लोग। लेकिन मुझे बताएँ फ़ैज़ भाई, इन सबको हमारे दिलों से कौन निकाले भला!

अभी कल ही तो आपके बारे में बात हो रही थी- आपने ‘अल्लाह’ की बजाय ‘इन्सान’ लिखा होता तो कितना अच्छा होता, कोई कह रहा था। मज़े की बात है ना, शायर अब क्या लिखे इसके भी दस्तूर बनते जा रहे हैं. अभी बस कुछ ही दिनों कि बात होगी कि हुक्मरान हमें नज़्में भी लिखके दें रेडीमेड। आपकी नज़्म में मौजूद ‘अन-अल-हक़’ यानी ‘मैं ही ख़ुदा हूँ' के नारे के लिए शहीद होने वाले सूफ़ी शायर मन्सूर हजीबा को इन लोगों ने क्या कहा होता?

फ़ैज़ भाई, आपका नामांकन नोबेल के लिए हुआ था, यह बात हाल में ही कहीं पढ़ी। नोबेल मिले या ना मिले, लेकिन आपकी शायरी को आज के दौर में अहमियत हासिल होना और लाखों जवान लड़के लड़कियों ने रस्ते पर आ के ‘हम देखेंगे’ कहते हुए अपनी आवाज़ें बुलंद की, इससे क़ीमती और क्या हो सकता है!

येशू ने कहा था कि हे ईश्वर, इनको माफ़ करना के यह क्या कर रहे हैं, इनको ख़बर नहीं। कबीर को जब मज़हब के दायरे में बांधने की कोशिश हुई तब भरे बाज़ार के बीच खड़े हो कर अपने दोहों से इस समाज की चादर को मज़बूती से बुनने की कोशिश कबीर ने जारी रखी। फ़ैज़ भाई, हम भी पागलों की तरह आपको ‘जय श्री राम’ बोल रहे हैं। हमें माफ़ कीजिए, हमपर हँस दीजिये। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ कौन है, यह मालूम नहीं बेचारों को। शायरी भूलकर ख़ून से लथपथ इस नफ़रत भरे माहौल में फिर से आपके ही शेर आ कर गले लगाते हैं :

यह दाग़ दाग़ उजाला, यह शब-ग़ज़ीदा सहर

वो इंतज़ार था जिसका, यह वो सहर तो नहीं...

सच है फ़ैज़ भाई, यह वो सुबह भी नहीं। यह वो देश भी नहीं। जिस ख़ूबसूरत हसीन देश का सपना हमने देखा, यह वो देश नहीं, यह तो सच है… पर यह दिल नाकाम है लेकिन नाउम्मीद नहीं।

शुक्रिया फ़ैज़ भाई.

अपना ख़याल रखिये और हमें माफ़ कर दीजिये।

‘नए भारत’ में पुराने भारत की तस्वीर ढूंढता हुआ

आप का छोटा दोस्त 

श्रीरंजन 

Religion Politics
hindu-muslim
religion
Kabir
Pakistan
Secularism
Faiz Ahmad Faiz

Related Stories

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!

इतवार की कविता : 'टीवी में भी हम जीते हैं, दुश्मन हारा...'

विचार: बिना नतीजे आए ही बहुत कुछ बता गया है उत्तर प्रदेश का चुनाव

हम भारत के लोगों की असली चुनौती आज़ादी के आंदोलन के सपने को बचाने की है

तालिबान सरकार को मान्यता देने में अनिच्छुक क्यों है पाकिस्तान?

हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व का फ़र्क़

ईश्वर और इंसान: एक नाना और नाती की बातचीत

भारत और अफ़ग़ानिस्तान:  सामान्य ज्ञान के रूप में अंतरराष्ट्रीय राजनीति

जै श्रीराम: अभिवादन को युद्धघोष बनाने के पीछे क्या है?

उनके तालिबान तालिबान, हमारे वाले संत?


बाकी खबरें

  • श्याम मीरा सिंह
    यूक्रेन में फंसे बच्चों के नाम पर PM कर रहे चुनावी प्रचार, वरुण गांधी बोले- हर आपदा में ‘अवसर’ नहीं खोजना चाहिए
    28 Feb 2022
    एक तरफ़ प्रधानमंत्री चुनावी रैलियों में यूक्रेन में फंसे कुछ सौ बच्चों को रेस्क्यू करने के नाम पर वोट मांग रहे हैं। दूसरी तरफ़ यूक्रेन में अभी हज़ारों बच्चे फंसे हैं और सरकार से मदद की गुहार लगा रहे…
  • karnataka
    शुभम शर्मा
    हिजाब को गलत क्यों मानते हैं हिंदुत्व और पितृसत्ता? 
    28 Feb 2022
    यह विडम्बना ही है कि हिजाब का विरोध हिंदुत्ववादी ताकतों की ओर से होता है, जो खुद हर तरह की सामाजिक रूढ़ियों और संकीर्णता से चिपकी रहती हैं।
  • Chiraigaon
    विजय विनीत
    बनारस की जंग—चिरईगांव का रंज : चुनाव में कहां गुम हो गया किसानों-बाग़बानों की आय दोगुना करने का भाजपाई एजेंडा!
    28 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के बनारस में चिरईगांव के बाग़बानों का जो रंज पांच दशक पहले था, वही आज भी है। सिर्फ चुनाव के समय ही इनका हाल-चाल लेने नेता आते हैं या फिर आम-अमरूद से लकदक बगीचों में फल खाने। आमदनी दोगुना…
  • pop and putin
    एम. के. भद्रकुमार
    पोप, पुतिन और संकटग्रस्त यूक्रेन
    28 Feb 2022
    भू-राजनीति को लेकर फ़्रांसिस की दिलचस्पी, रूसी विदेश नीति के प्रति उनकी सहानुभूति और पश्चिम की उनकी आलोचना को देखते हुए रूसी दूतावास का उनका यह दौरा एक ग़ैरमामूली प्रतीक बन जाता है।
  • MANIPUR
    शशि शेखर
    मुद्दा: महिला सशक्तिकरण मॉडल की पोल खोलता मणिपुर विधानसभा चुनाव
    28 Feb 2022
    मणिपुर की महिलाएं अपने परिवार के सामाजिक-आर्थिक शक्ति की धुरी रही हैं। खेती-किसानी से ले कर अन्य आर्थिक गतिविधियों तक में वे अपने परिवार के पुरुष सदस्य से कहीं आगे नज़र आती हैं, लेकिन राजनीति में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License