NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
आसमान से गिरते इंसान: मानव होने की निरर्थकता
कुछ इंसान आज के दौर में भगवान की तरह बर्ताव करते हैं। यह लोग दूसरे लोगों से ऐसे व्यवहार करते हैं, जैसे उद्दंड बच्चे उड़ती हुई तितलियों के साथ करते हैं।
प्रतीक
24 Aug 2021
आसमान से गिरते इंसान: मानव होने की निरर्थकता

हम एक ऐसे दौर में रहते हैं जहां तस्वीरों का कभी ना खत्म होने वाला बहाव हमारी कल्पनाओं पर प्रहार करता रहता है। हाल में कुछ ऐसी तस्वीरें आईं जिन्होंने हमारे ऊपर कुछ ज़्यादा ही प्रभाव डाला। इन तस्वीरों ने हमें महसूस कराया कि कैसे इंसानों ने उनके साथी इंसानों की जिंदगी बेमोल बना दी है। काबुल से उड़ते विमान से गिरते शख़्स की तस्वीर इस क्रम में नया जुड़ाव है। यह राहत की बात रही कि यह घटना हवा में तब हुई, जब वहां कोई दानिश सिद्दीकी की तरह का शख़्स मौजूद नहीं था, जो उस घटना की क्रूरताओं को बारीकी से अपने कैमरे में कैद करता। लेकिन यह राहत बहुत थोड़े समय के लिए ही रही। इस तस्वीर का प्रभाव तब काफ़ी ज़्यादा बढ़ गया, जब पता चला कि गिरने वाला शख़्स अफ़गानिस्तान की युवा टीम का फुटबॉलर ज़ाकी अनवारी था। फ्रेंच फुटबॉलर एरिक कैंटोना ने एक बाद शेक्सपियर का उद्धरण देते हुए कहा था कि फुटबॉल खिलाड़ी कुछ लोगों के लिए वैसे ही होते हैं, जैसे उद्दंड बच्चों के लिए उड़ती तितलियां होती हैं। ज़ाकी अनवारी ने इसे शब्दश: साबित कर दिया। कुछ इंसान आज के दौर में भगवान की तरह बर्ताव करते हैं और दूसरे लोगों से वैसा व्यवहार करते हैं, जैसे उद्दंड बच्चे उड़ती हुई तितलियों के साथ करते हैं। यह इन्हीं लोगों की उद्दंडता थी, जिसने ज़ाकी और दूसरे लोगों को निगल लिया।

हाल के इतिहास में एलान कुर्दी की मृत तस्वीर से ज़्यादा किसी भी चीज ने इंसानी जिंदगी का कोई मोल ना होने की बात को साबित नहीं किया। लाल शर्ट और नीली पतलून में एक सुंदर सा बच्चा, जो विशाल समंदर के किनारे रेत में निर्जीव पड़ा हुआ है। आज 6 साल बाद भी निलुफेर देमिर की इस तस्वीर का सच किसी को भी दहला देता है; इस दुनिया में किसी बच्चे की जिंदगी की कीमत सागर में फेंकी गई एक प्लास्टिक की बॉटल के बराबर है। समुद्र दोनों को ही तटों पर पहुंचा देता है। जब सितंबर 2015 में इस तस्वीर ने हमें तोड़ दिया था, तब कलाकारों ने दिल की गहराई से अपनी अभिव्यक्ति का प्रदर्शन किया था। कुछ ने एलान को पंख दे दिए थे, ताकि वो स्वर्ग तक उड़ सके, तो कुछ ने उसे भगवान की गोद में प्रदर्शित किया था। इसके बाद कुछ यूरोपीय देशों ने शरणार्थी समस्या पर थोड़ा खुला नज़रिया अपनाया था। लेकिन व्यापक स्तर पर उस डराने वाली तस्वीर ने इंसानों को ना तो ज़्यादा दयावान बनाया और ना ही उनकी दूसरी नस्ल के लोगों की घृणा को कम किया। 

नीलुफेर के फ्रेम में एक छोटे बच्चे को पानी के बड़े विस्तार के साथ दिखाया था। अगली तस्वीर जो दिमाग में आती है, उसमें कोई शख़्स फ्रेम में नहीं है। इसके बावजूद इसकी प्रबलता हमारे दिमाग में कौंधती है। इस तस्वीर में एक रेलवे ट्रैक पर कुछ रोटियां बिखरी हुई दिखती हैं। यह 8 मई, 2020 का दिन था। 16 प्रवासी मज़दूरों को औरंगाबाद के पास उस वक़्त एक ट्रेन ने कुचल दिया, जब वो सो रहे थे। यह लोग महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश तक पैदल ही घर तक का रास्ता तय कर रहे थे। क्योंकि देश में कुछ ही घंटे के नोटिस पर लॉकडाउन लगा दिया गया था। इन लोगों की गलती उनका यह अंदाजा था कि इस ट्रैक से कोई ट्रेन नहीं गुजरेगी, क्योंकि 25 मार्च से ट्रेनों की आवाजाही बंद हो गई थी। इन मौतों के लिए कौन जिम्मेदार था? सिस्टम की संवेदनहीनता या देश की संवेदनहीनता? जब यह ख़बर सार्वजनिक हो गई तब प्रधानमंत्री दुख और हैरानी जताई। लेकिन शायद जब वो लॉकडाउन लगा रहे थे, तब इस तरह के लोग उनके दिमाग में नहीं थे। राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन में प्रवासी मज़दूरों के अमानवीय संघर्ष को दिखाती तस्वीरों की कोई कमी नहीं है। 

लेकिन इन तस्वीरों ने बताया कि यह लोग इस देश के कई लोगों के लिए कुछ मौजूद ही नहीं थे। कड़वा लगा? शायद है भी। लेकिन बदतर यह है कि औरंगाबाद के पास मारे गए 16 लोगों के परिवारों के सदस्यों को इस साल मार्च तक मृत्यु प्रमाणपत्र भी नहीं मिला। 

इसी तरह काबुल छोड़कर जाने वाले प्लेन से गिरता शख़्स भी हवाई ज़हाज और अथाह आकाश के स्वामित्व वाली तस्वीर में सिर्फ़ एक बिंदु था। यह तस्वीर है कि मानवीय अविष्कार अब मानवीय भावनाओं के परे जा चुके हैं। जब किसी विमान को उड़ना है, तो उड़ना है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि कितने लोग इसके टायर से लटके हुए हैं। हम अपनी खुद की प्रजाति के लिए इससे ज़्यादा तुच्छ नहीं हो सकते थे। 

उड़ना इंसान की सबसे पुराने सपनों में से एक रहा है। दुनिया के सभी हिस्सों के मिथकों में उड़ने से संबंधित चीजें पाई जाती हैं। शायद इनमें सबसे ज़्यादा दिल तोड़ने वाली कहानी डाएडालस के बेटे ल्कारुस की है। ल्कारुस के पर, मोम और पंखों के बने हुए थे। वह सूर्य के ज़्यादा पास तक पहुंच गया और मोम पिघल गई। नतीज़तन ल्कारुस समुद्र में गिर गया और मर गया। तुच्छ इंसानों को यहां शांति की खोज करनी चाहिए, यह खोज ग्रीक कहानी में नहीं, बल्कि इस कहानी से प्रेरित पुनर्जागरण काल की पेंटिंग में होनी चाहिए।

किसी को भी पीटर ब्रुगेल द एल्डर्स "फाल ऑफ़ ल्कारुस" में ल्कारुस को खोजने में दिक्कत हो सकती है। आपको एक इंसान दिखाई दे सकता है, जो पीछे की तस्वीर में घोड़े को धक्का दे रहा है, फिर एक चरवाहा अपने घोड़ों के साथ दिखता है, जिसक मेमने घास चर रहे हैं। आपको एक इंसान मछली पकड़ता हुआ दिखा देगा, साथ पेड़ की एक डाली पर बैठा पक्षी भी दिखेगा। यहां तक कि चित्र में आपको दूर-दराज के पर्वत और दूसरे द्वीप भी दिखाई दे सकते हैं। लेकिन ल्कारुस कहां है? आपको सिर्फ उसके पैर दिखाई देंगे, जब वो डूब रहा है। उसके आसपास की दुनिया इस बात से पूरी तरह बेफिक्र है।

इसी तरह दुनिया आसमान से गिरते अफ़गानियों के बारे में भी नहीं सोचेगी। सभी देश, जिनमें हमारा देश भी शामिल है, वे शरणार्थियों से मुंह मोड़ते रहेंगे। ना ही तालिबान बदलेगा। हम सिर्फ़ यह कहकर खुद को शांति दे सकते हैं कि इंसान हमेशा से दूसरे इंसान के लिए इतना ही तुच्छ रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो एक कलाकार इस तरह से ल्कारुस को नहीं डुबा पाता।

लेखक कोलकाता में रहने वाले स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे समाज, राजनीति और खेल पर लिखना पसंद करते हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Falling From the Sky: The Insignificance of Being Human

Afghanistan
kabul
Kabul Plane
Alan Kurdi
Danish Siddiqui
Migrant workers
COVID-19
Aurangabad Migrant Workers
Icarus

Related Stories

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

महामारी के दौर में बंपर कमाई करती रहीं फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां

विश्व खाद्य संकट: कारण, इसके नतीजे और समाधान

महामारी में लोग झेल रहे थे दर्द, बंपर कमाई करती रहीं- फार्मा, ऑयल और टेक्नोलोजी की कंपनियां

कोविड मौतों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर मोदी सरकार का रवैया चिंताजनक

महंगाई की मार मजदूरी कर पेट भरने वालों पर सबसे ज्यादा 

भोजन की भारी क़िल्लत का सामना कर रहे दो करोड़ अफ़ग़ानी : आईपीसी

जनवादी साहित्य-संस्कृति सम्मेलन: वंचित तबकों की मुक्ति के लिए एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप

कोरोना अपडेट: देश में एक हफ्ते बाद कोरोना के तीन हज़ार से कम मामले दर्ज किए गए

दिल्लीः एलएचएमसी अस्पताल पहुंचे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मंडाविया का ‘कोविड योद्धाओं’ ने किया विरोध


बाकी खबरें

  • Jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध
    02 Feb 2022
    पिछले दिनों झारखंड सरकार के कर्मचारी चयन आयोग द्वारा प्रदेश के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों की नियुक्तियों के लिए भोजपुरी, मगही व अंगिका भाषा को धनबाद और बोकारो जिला की स्थानीय भाषा का दर्जा…
  • ukraine
    पीपल्स डिस्पैच
    युद्धोन्माद फैलाना बंद करो कि यूक्रेन बारूद के ढेर पर बैठा है
    02 Feb 2022
    मॉर्निंग स्टार के संपादक बेन चाकों लिखते हैं सैन्य अस्थिरता बेहद जोखिम भरी होती है। डोंबास में नव-नाजियों, भाड़े के लड़ाकों और बंदूक का मनोरंजन पसंद करने वाले युद्ध पर्यटकों का जमावड़ा लगा हुआ है।…
  • left candidates
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: मज़बूत विपक्ष के उद्देश्य से चुनावी रण में डटे हैं वामदल
    02 Feb 2022
    “…वामदलों ने ये चुनौती ली है कि लूट-खसोट और उन्माद की राजनीति के खिलाफ एक ध्रुव बनना चाहिए। ये ध्रुव भले ही छोटा ही क्यों न हो, लेकिन इस राजनीतिक शून्यता को खत्म करना चाहिए। इस लिहाज से वामदलों का…
  • health budget
    विकास भदौरिया
    महामारी से नहीं ली सीख, दावों के विपरीत स्वास्थ्य बजट में कटौती नज़र आ रही है
    02 Feb 2022
    कल से पूरे देश में लोकसभा में पेश हुए 2022-2023 बजट की चर्चा हो रही है। एक ओर बेरोज़गारी और गरीबी से त्रस्त देश की आम जनता की सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं हैं, तो
  • 5 election state
    रवि शंकर दुबे
    बजट 2022: क्या मिला चुनावी राज्यों को, क्यों खुश नहीं हैं आम जन
    02 Feb 2022
    पूरा देश भारत सरकार के आम बजट पर ध्यान लगाए बैठा था, खास कर चुनावी राज्यों के लोग। लेकिन सरकार का ये बजट कल्पना मात्र से ज्यादा नहीं दिखता।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License