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कार्यानन्द शर्मा:  चानन व बड़हिया टाल के अनूठे किसान संघर्ष के नेता
कार्यानन्द शर्मा, यदुनन्दन शर्मा और स्वामी सहजानन्द सरस्वती उस त्रयी का निर्माण करते हैं जिन्होंने किसानों के अंदर से अंग्रेज़ों व ज़मींदारों दोनों का भय समाप्त किया तथा स्वाधीनता आंदोलन को एक रैडिकल तेवर प्रदान किया था।
अनीश अंकुर
17 Aug 2021
कार्यानन्द शर्मा

आज प्रख्यात किसान नेता कार्यानन्द शर्मा की 120वीं जयंती है। बिहार के पुराने मुंगेर व सन्थाल परगना जिले को अपना कार्यक्षेत्र बनाने वाले कार्यानन्द शर्मा महान क्रांतिकारी किसान नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती के सबसे अनन्य सहयोगियों में माने जाते हैं। कार्यानन्द शर्मा के नेतृत्व में चलाए गए मुंगेर व संथाल परगना जिले में चानन व बड़हिया टाल का अनूठा किसान संघर्ष बीसवीं शताब्दी के उन स्वर्णिम अध्यायों से है जिसके बगैर हिंदुस्तान में किसान आंदोलन का गौरवशाली अध्याय पूरा नहीं होता ।

कार्यानन्द शर्मा, यदुनन्दन शर्मा और स्वामी सहजानन्द सरस्वती उस त्रयी का निर्माण करते हैं जिन्होंने किसानों के अंदर से अंग्रेज़ों व जमींदारों दोनों का भय समाप्त किया तथा स्वाधीनता आंदोलन को एक रैडिकल तेवर प्रदान किया था। इन लोगों द्वारा चलाए गए किसान संघर्षों के कारण बिहार जमींदारी उन्मूलन करने वाला देश का पहला राज्य बना था। इन संघर्षों ने दुनिया भर के स्कॉलरों का ध्यान आकृष्ट किया है।  

मुंगेर जिले में चलाये गए जमींदार विरोधी संघर्ष ही वह पूर्वपीठिका है जिसके परिणामस्वरूप बिहार में 1939 में कम्युनिस्ट पार्टी मुंगेर में ही स्थापित हुई। कार्यानन्द शर्मा, पहले गांधी जी के प्रभाव में कांग्रेस में आए। उसके बाद कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी होते हुए कम्युनिस्ट पार्टी में आए।  कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकांश नेताओं का कम्युनिस्ट पार्टी में आने का रूट यही रहा है।  जमींदार विरोधी आंदोलन में शामिल होने के कारण किसान सभा से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता कम्युनिस्ट पार्टी में भी शामिल हुए। कार्यानन्द शर्मा संभवतः उन चंद नेताओं में से थे जिन्होंने फासिज्म के खतरे का काफी पहले पहचान लिया था। 

कार्यानन्द शर्मा ने महात्मा गांधी की हत्या की भविष्यवाणी तक कर दी थी। जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय में इतिहास की सुप्रसिद्ध प्रोफेसर मृदुला मुखर्जी ने गांधी हत्या पर अपने आलेख ' रीविज़िटिंग द असासिनेशन ऑफ महात्मा गांधी' में इसे रेखांकित करते हुए कहा है". गांधी जी की हत्या एक सोची समझी साजिश थी। नवंबर 1947 में, बिहार के भाकपा किसान नेता कार्यानंद शर्मा ने चेतावनी दी थी कि हिंदू राज की मांग 'बहुत खराब थी और इसके पीछे गांधीजी और पंडितजी की हत्या की साजिश थी।'  गांधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई यानी कार्यानन्द की भविष्यवाणी के तीन महीने बाद। 

1965 में सोवियत संघ में मृत्यु को प्राप्त हुए कार्यानन्द शर्मा ने पूरी एक पीढ़ी को प्रभावित किया। प्रख्यात इतिहासकार रामशरण शर्मा के प्रेरणास्रोत कार्यानन्द शर्मा ही थे। प्राचीन भारत के चर्चित इतिहासकार डी.एन. झा ने  रामशरण शर्मा की मृत्यु के पश्चात श्रद्धांजलि स्वरूप लिखा था "शर्मा जी अक्सर कार्यानंद शर्मा से अपने मेलजोल को याद किया करते थे। कार्यानंद जी ने अपना राजनीतिक जीवन साल 1920 में असहयोग आंदोलन से शुरू किया था।  आगे चलकर वे न केवल किसान आंदोलन बल्कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के एक अहमतरीन नेता बन कर उभरे थे।" डी एन झा ने रामशरण  शर्मा के व्यक्तित्व पर कार्यानन्द के प्रभाव को बताते हुए लिखा "  इनकी (कार्यानन्द शर्मा) शख्सियत के कुछ गुण शर्मा जी (रामशरण शर्मा) में भी थे। उनके ही जैसा सीधा सादा जीवन।  न कोई दिखावा, न कोई आडंबर इसके साथ की थी शर्मा जी की लाजवाब बेतकल्लुफी और अनूठी विनम्रता जो सामने वाले को अनायास में कायल कर देती थी।"

प्रारम्भिक जीवन

पंडित कार्यानन्द शर्मा का जन्म 17 अगस्त 1901 को बिहार के मुंगेर जिले में लखीसराय के निकट सहुर गाँव में एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। पिता गजाधर शर्मा और माता पार्वती ने बेटे का नाम रखा "कारू"। 

पांच साल की उम्र में, 1906  में कारू को गाँव के पाठशाला में पढ़ने के लिए बैठाया गया। 1911 में  यानी 10 वर्ष की उम्र में उन्हें  पढ़ाई बन्द करनी पड़ी। 1911 में उनकी शादी कर दी गई। पिता पढ़ाने के लिए पैसा देने की शक्ति नहीं रखते थे। सिर्फ 9 एकड़ जमीन में चार बेटे और दो बेटियाँ, गजाधर शर्मा का परिवार बड़ा था। 

लाचार होकर कारू बेगूसराय के निकट रामदिरी गाँव में अपने फुआ के पास चले गये। फुआ का घर भी बहुत धनी नहीं था। वह बेगूसराय में 'ब्रह्मदेव प्रसाद हाई स्कूल' में छठे क्लास में दाखिल हो गये। बेगूसराय के निकट पोखरिया गाँव के बाबू कुलदीप सिंह के लड़के को ट्यूशन पढ़ाते थे।  इसी दरम्यान  प्रथम महायुद्ध छिड़ने की खबर मिली। युद्ध की खबरों को जानने के लिए वे अखबार भी नियमित रूप से पढ़ने लगे। कानपुर से प्रकाशित 'प्रताप’ मिलने लगा। 

इस अखबार ने कारू में देशभक्ति की भावना जगा दी। स्कूल में आतंकवाद से प्रभावित कुछ विद्यार्थियों के सम्पर्क में कारू ने 'आनन्द मठ' पढ़ा। अख़बार से लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन की खबर मिली। चम्पारण में निलहे गोरे साहबों के खिलाफ गांधी जी के आन्दोलन की खबरें पढ़कर उनकी देशभक्ति और गांधीभक्ति बढ़ती जा रही थी। साल 1920 में मैट्रिक पास किया। जब भी छुट्टी में घर जाते तो समाज सुधार की बातें करते और गाँव में नाटक आदि भी खेला करते।

स्वतन्त्रता संग्राम में  

उन्हें अपना नाम कारू प्रसाद पसंद नहीं था, लिहाजा कॉलेज में उन्होंने अपना नाम कारू प्रसाद से बदलकर कार्यानन्द शर्मा रखा। उसी दरम्यान  गांधी जी मुंगेर आये। गांधीजी के दर्शन के साथ-साथ कार्यानन्द को उनके व्याख्यान सुनने का अवसर मिला। गांधीजी के असहयोग की पुकार सुन कार्यानन्द कॉलेज छोड़कर बाहर चले आये। कालेज से असहयोग कर कार्यानन्द ने लखीसराय में एक राष्ट्रीय विद्यालय खोला। 

अपनी शुरुआती सियासी सक्रियता के बारे में कार्यानन्द शर्मा ने  खुद लिखा है " महात्मा गांधी, शौकत अली के साथ मुंगेर आये थे। उनके आह्वान पर मैं मुंगेर जी०. डॉ० कालेज से पढ़ाई छोड़ अपने घर के निकट लखीसराय में काम करने लगा। स्वर्गीय शाह जुबैर और बिहार राज्य के स्वर्गीय मुख्य मंत्री श्रीकृष्ण सिंह ( बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री) के नेतृत्व  में काम करने लगा। मैं उनका एक प्रमुख विश्वासी साथी बन गया। लखीसराय में रह कर मैं गाँवों में भाषण देता, पुठिया इकट्ठा करता, स्वयं सेवक दल तैयार करता, मद्य निषेध का प्रचार करता, गाँव पंचायत की स्थापना करता था। तिलक स्वराज फण्ड की वसूली में मैंने आगे बढ़कर काम किया था। इन कामों को करते हुए लखीसराय में एक राष्ट्रीय विद्यालय चलाता था। प्रबन्धक और शिक्षक का काम भी करता था। आगे चलकर देशबन्धु चित्तरंजन दास के नाम पर आश्रम की स्थापना मैंने की। इसका उद्घाटन महात्मा गांधी के द्वारा हुआ था। यह आश्रम राजनीति का बड़ा केन्द्र था और आजकल सर्वोदयवाद का एक केन्द्र है। " 

चितरंजन आश्रम 1927 में स्थापित हुआ। बिहार में किसान आंदोलन के तीन बड़े केंद्रों में से एक माना जाता है। अन्य दो केंद्र हैं- सीताराम आश्रम, बिहटा तथा नेयामतपुर आश्रम, बेलागंज। इन दोनों की स्थापना क्रमशः स्वामी सहजानन्द सरस्वती तथा यदुनन्दन शर्मा ने की थी।

कार्यानन्द शर्मा आगे बताते हैं  “ 1921 में कॉंग्रेस सेवा दल का में जिला सरदार (कमांडर) था। कई हजार स्वयंसेवक तैयार थे। सेवा दल के गैर कानूनी करार किया जाने पर मैं मुंगेर कांग्रेस ऑफिस में नवम्बर के प्रारम्भ में रात 9 बजे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। एक वर्ष की सजा देकर मुझे भागलपुर केन्द्रीय जेल में भेज दिया गया। चौरा-चौरी काण्ड के बाद और गया कांग्रेस के पहले मैं जेल से बाहर आया। गया कॉंग्रेस में मैं स्वर्गीय डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद के साथ अपरिवर्तनवादी दल में था और उसके बाद रचनात्मक काम में लग गया  ।"

बिहार किसान सभा का संगठन

सन 1929 में आई व्यापक मंदी के चलते बिहार के किसान बड़े तबाह और परेशान थे। नवम्बर महीने स्वामी सहजानन्द सरस्वती के प्रयास और कांग्रेस नेताओं के सहयोग से सोनपुर में  प्रान्तीय स्तर पर किसान सभा गठित हुई और प्रथम सम्मेलन आयोजित हुआ। डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद समेत सभी नेताओं ने उस सम्मेलन में भाग लिया। स्वामी सहजानन्द सरस्वती बिहार प्रादेशिक किसान सभा के अध्यक्ष और डाक्टर श्री कृष्ण सिंह प्रधान मंत्री निर्वाचित हुए। कार्यानन्द शर्मा भी किसान सभा के संगठन के साथ जुड़ गये। 1931 में मुंगेर जिला किसान सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन घोसैठ गाँव में हुआ। कार्यानन्द शर्मा इस सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष थे।

चानन  का किसान  संघर्ष

राज्य स्तर पर किसान सभा के गठन के पूर्व 1927 में गिद्धौर और खैरा राज्य के कारिन्दों के अत्याचार से तंग आकर चानन परगने के किसानों ने जब गुहार की तो कार्यानन्द शर्मा उनकी मदद में दौड़ पड़े। पहाड़ी क्षेत्रों में 36 गाँव राजा गिद्धौर और खैरा की जमींदारी में थे। किसान अत्यन्त शोषित और पीड़ित थे। गिद्धौर राज्य का मैनेजर कार्टर नाम का अंग्रेज था। खैरा राज बिक कर कलकत्ता और मुंगेर के मारवाड़ी सेठों के हाथ में चला गया था। लगान की दर बहुत ऊँची थी। हर बेगारी, दूध-दही, बकरा, तरकारी आदि मुफ्त लेना, खेतों से बेदखल कर देना, लगान वसूली की रसींद नहीं देना, बहु-बेटियों की इज्जत बरबाद करना आम बात थी। किसानों की शिकायतों को लेकर शर्मा जी गिद्धौर राजा और खैरा राज्य के मैनेजर से कई बार मिले।  किसान आन्दोलन के कारण कार्यानन्द शर्मा की शिकायत जमीन्दारों ने डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद से की।  

बिहार में किसान आंदोलन जोर पकड़ रहा था। बिहार के जमींदारों ने टेनेन्सी कानून में सुधार के लिए एक बिल पेश किया था। किसान सभा के प्रबल विरोध के कारण वह बिल पड़ा हुआ था। डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने बिल की धाराओं में कुछ संशोधन के साथ जमींदारों से समझौता कर लिया। किसान सभा से राय-सलाह नहीं ली थी। यद्यपि नये कानून में किसानों को थोड़ी सुविधा मिली। इसी पृष्ठभूमि में चानन के किसान नये संघर्ष में उतर पड़े। 

गिद्धौर राज्य का अंग्रेजी मैनेजर कार्टर लगान वसूली के लिए दल बल के साथ चानन आया। किसानों पर अमानवीय जुल्म हुए। कितने लोगों को निर्दयतापूर्वक पीटा गया। किसानों की चीजें उठाने, मवेशियों को जब्त  करने, मूंछे उखाड़ना, अलकतरा पोतना, मनमानी करने के लिए सादे कागजों पर उनके आने का निशान लेना आम बात थी। सारे चानन इलाके में हड़कम्प मचा था। कार्यानन्द को जब इसकी खबर मिली तो वे दौड़े-दौड़े चानन पहुँचे। पहली सभा में दो हजार किसान भी शामिल हुए। फिर दस-दस हजार किसानों का जमाव होने लगा। महाराजा के अमले और जुल्म करने वाला मैदान छोड़कर भाग गया। 15 महीनों के अनवरत संघर्ष के बाद जमींदारों से लिखित समझौता हुआ। यह आन्दोलन 1935 तक चला।

नमक सत्याग्रह 

नमक सत्याग्रह के दौरान मुंगेर, भागलपुर और संथाल परगना के सत्याग्रहियों का कैम्प लखीसराय के 'चितरंजन आश्रम'  को बनाया गया। चौकी गाँव में नमक कानून तोड़ा गया। कार्यानन्द शर्मा को चितरंजन आश्रम से गिरफ्तार कर एक साल की सजा देकर भागलपुर केन्द्रीय जेल में भेज दिया गया। भागलपुर से हजारीबाग जेल में भेज दिया गया। 

1931 में गांधी-इरविन समझौते के कुछ दिन पहले शर्मा जी जेल से मुक्त हुए और चानन के किसानों के बीच जा डटे। 1932 की जनवरी में लंदन से वापस होते गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद मुंगेर जिले में सर्वप्रथम कार्यानन्द शर्मा के नेतृत्व में 6 सत्याग्रहियों का जत्था निकला। हजारों लोग पीछे-पीछे चल रहे थे। 6 दर्जन हथियारबन्दी, और उतने ही लाठीधारी पुलिस पहले से ही तैनात थी। लाठी चार्ज में सैंकड़ों लोग घायल हुए। कार्यानन्द शर्मा गिरफ्तार कर लिए गये। विभिन्न दफाओं में कुल चार साल दो महीने की सजा दे , उन्हें पटना कैम्प जेल भेज दिया गया।

इस दौर में कार्यानन्द शर्मा की लोकप्रियता का अंदाज़ा  राहुल सांकृत्यायन की इस टिप्पणी से लगाया जा सकता है " 1932 में कार्यानन्द ने अपने इलाके में इतना जबर्दस्त संगठन किया था और लोगों का अपने नेता के प्रति इतना सम्मान था, कि पुलिस गिरफ्तार करने में डरती थी। लाचार होकर मिलिट्री से भरी एक स्पेशल ट्रेन बुलाई गई और वह कार्यानन्द को पकड़कर ले गई।" 

भूकंप पीड़ितों की सहायता में 

 1934 में बिहार के प्रलयंकारी भूकम्प में हजारों आदमी मर गये थे। शहर बर्बाद हो गया था। भूकम्प का केंद्र मुंगेर था। यहां सबसे अधिक तबाही हुई थी। कार्यानन्द शर्मा को बाकी कांग्रेसी नेताओं की तरह जेल से छोड़ा गया। मुंगेर जा कर उन्होंने स्वयंसेवकों का चार्ज लिया। साल भर तक सहायता कार्य चलता रहा।

बड़हिया टाल के किसानों का संग्राम

चानन के विजय की खबरें दूर-दूर के गाँवों में किसानों के कानों तक पहुँच चुकी थीं। कार्यानन्द शर्मा चानन के आन्दोलन समाप्त होते ही बड़हिया टाल बकाश्त संघर्ष में जुट गये। बड़हिया का क्षेत्र उन दिनों लक्खीसराय थाने का ही एक हिस्सा था। बड़हिया, मोकामा और शेखपुरा क्षेत्रों का टाल क्षेत्र एक साथ जुड़ा हुआ है। इस क्षेत्र में कोई तीन लाख एकड़ भूमि है, जो बरसात में गंगा के पानी से डूब जाती है। यह क्षेत्र रबी फसल के लिए मशहूर है। लगभग चालीस बस्तियाँ इस क्षेत्र में हैं। 

बड़हिया टाल के क्षेत्र में 80 हजार एकड़ जमीन और 12 बस्तियाँ हैं। इन्हीं बारह गाँवों में पहले आन्दोलन छिड़ा जो फ़ैल कर सारे टाल में फैल गया। इन गाँवों की जमीन तो बड़हिया के बाबूओं ने ले ही ली थी। जो काम और बेगारी के लिए किसानों पर बेहद ज़ुल्म करते थे।

इन गाँव वालों का सम्बन्ध चानन क्षेत्र के गाँवों से था। वहाँ के किसानों की जीत का असर इन पर पड़ा और उनमें जागृति आई। उनके आमंत्रण पर ही कार्यानन्द शर्मा वहाँ गये। किसानों की सभायें हुईं। बेगारी के विरोध में संघर्ष आरम्भ हो गया। 1936 के अक्टूबर में किसानों ने बेकब्जा खतियानी पर चढ़ने का निश्चय किया। जमींदारों के लठैत और पुलिस दल के बावजूद हजारों बीघे जमीन में किसानों ने खेती की। एसेम्बली का चुनाव सर पर था। श्रीकृष्ण सिंह उस क्षेत्र से उम्मीदवार थे। किसानों ने उत्साह से उन्हें वोट दिया।

साल 1937 के मार्च में शेखपुरा में कार्यानन्द शर्मा की अध्यक्षता में मुंगेर जिला किसान सम्मेलन बड़े उत्साह के साथ सम्पन्न हुआ। सम्मेलन के खुले अधिवेशन में तीस हजार किसानों ने भाग लिया। सम्मेलन होते ही टाल और आसपास  के किसानों ने नीलाम जमीन पर हमला कर दिया। हजारों बीघे की फसल काट ली गई। बिहार में बकाश्त आन्दोलन व्यापक पैमाने पर फैलने लगा। गांवों में घुड़सवार और हथियारबन्द पुलिस भेजी गई। 200 प्रमुख किसान और किसान सभा के कार्यकर्ताओं के साथ कार्यानंद शर्मा गिरफ्तार कर लिये गये। 

बड़हिया टाल के आन्दोलन में कम्युनिस्ट दृष्टिकोण के का. अनिल मित्रा का सक्रिय सहयोग शर्मा जी को मिला था। 1939 में खड़ड़िया में मुंगेर जिला किसान सम्मेलन में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस से मिलने का अवसर मिला। स्वामी जी के चलते कार्यानन्द शर्मा की सुभाष बाबू के काम से भी सहानुभूति हुई। उनसे कई बार उनकी भेंट हुई।  

कार्यानन्द शर्मा का झुकाव कम्युनिस्ट आन्दोलन की ओर बढ़ने लगा।

कार्यानन्द शर्मा के कम्युनिस्ट बनने की प्रक्रिया को प्रख्यात बहुभाषाविद राहुल सांकृत्यायन ने ' नए भारत के नए नेता' पुस्तक में इस रूप में दर्ज किया है "नजरबन्दी के समय (20 सितम्बर 1940-23 फरवरी 1942) में उन्होंने किसान और मजदूर समस्याओं का गम्भीर अध्ययन किया। मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन के गंभीर विचारों का अध्ययन किया। जिन बातों को अभी वे प्रयोग करके ठीक समझते और उन पर चलते, अब मालूम हुआ कि समाज, उसके अंदर की विरोधी शक्तियों और उनके पारस्परिक संघर्ष के भीतर भी खास नियम काम कर रहा है। उनका एक साइंस है, जिसे मार्क्सवाद कहते हैं। मार्क्सवाद को पाकर कार्यानन्द अपनी क्षमता को कई गुना बढ़ी पाते हैं। आज राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय गुत्थियों को समझने में उनको यह दिक्कतें नहीं उठानी पड़तीं। जर्मनी और जापान के फासिस्टों की पराजय क्यों जरूरी है, इसे वे साफ-साफ समझते हैं। वे किसानों और मजदूरों के हितों को सर्वोपरि समझते हैं, और किसानों और मज़दूरों की आजादी में मनुष्य मात्र की आजादी मानते हैं।"

Karyanand Sharma
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