NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
एक नज़र इधर भी : किसान आंदोलन बना लॉकडाउन के मारे लोगों की रोज़ी-रोटी का सहारा
दिल्ली के बॉर्डर पर डटे किसानों पर चाहे जितनी तोहमत लगा ली जाए, लोकल के नाम पर जितना विरोध प्रदर्शन करा लिया जाए, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये किसान आस-पास के इलाक़े में रहे वाले ग़रीब लोगों का आसरा बन गए हैं।
नाज़मा ख़ान
02 Feb 2021
किसान आंदोलन बना लॉकडाउन के मारे लोगों की रोज़ी-रोटी का सहारा

कोई मुस्तफ़ाबाद में फेरी लगाता था, तो किसी का लाल क़िला के पास ठिकाना था, कोई पहाड़गंज या फिर जहांगीरपुरी में अपनी कमाई का ज़रिया तलाशता था तो कोई सिंघु बॉर्डर और आस-पास की रेड लाइट पर दो जून की रोटी का जुगाड़ करता था। ऐसी ही एक महिला से मेरी मुलाक़ात हुई सिंघु बॉर्डर पर, कमला नाम की ये महिला तीन जोड़ी जुराबों का एक पैकेट बनाकर सिंघु बॉर्डर में घूम-घूम कर कुछ कमा लेती हैं। मैंने कमला से पूछा ''आप क्या करते हो'' ?  तो जवाब मिला यहीं घूमकर जुराब बेचती हूं, मैंने कमाई के बारे में पूछा तो कहने लगी ''दिन का दो-तीन सौ कमा लेती हूं''। ज़िक्र खाने-पीने का छिड़ा तो कहने लगी, ''खाना तो सिंघु बॉर्डर पर इतना देख लिया जितना ज़िन्दगी में कभी नहीं देखा था। जिस दिल्ली में पानी भी ख़रीद कर पीना पड़ रहा था वहां देसी घी का खाना खा लिया, और इससे अच्छा क्या होगा''? मैंने पूछा आपकी कमाई का ज़रिया बन गया ये आंदोलन? तो कहने लगी हां, ख़ाने-पीने का जुगाड़ तो हो ही गया था साथ ही कुछ कमा भी लेती हूं।

एक आंदोलन भले ही वक़्ती तौर पर ही सही,  लेकिन कई लोगों की रोज़ी-रोटी का ठिकाना बन गया है। दिल्ली देश की उन जगहों में से है जहां आने वाले भले ही बड़े सपने लेकर नहीं आते लेकिन इस उम्मीद में ज़रूर चले आते हैं कि रात को भूखा तो नहीं सोना पड़ेगा। लेकिन लॉकडाउन ने देश की राजधानी में भी कई परिवारों के नसीब में फ़ाक़ाक़शी लिख दी थी। मैंने ख़ुद लोगों को नाश्ते के वक़्त लाइनों में खड़े होकर लंच के वक़्त कटोरों में खिचड़ी ( जो बिल्कुल खाने लायक नहीं थी) लेकर लौटते देखा था। वो दिन भले ही कट गए लेकिन हालात कुछ ख़ास नहीं बदले, कमला जैसे लोग ख़ुशनसीब हैं जो सिंघु बॉर्डर जैसे इलाक़े में रहते हैं कम से कम इसी बहाने उन्हें तर माल खाने को नसीब हो रहा है।

दिल्ली के बॉर्डर पर डटे किसानों पर चाहे जितनी तोहमत लगा ली जाए, लोकल के नाम पर जितना विरोध प्रदर्शन करा लिया जाए, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये किसान आस-पास के इलाक़े में रहे वाले ग़रीब लोगों का आसरा बन गए हैं। जब से ये किसान आए हैं इस इलाक़े के ग़रीबों की चांदी हो गई है।

लेकिन जब मैंने कमला से पूछा कि ''आंदोलन के बहाने ना सिर्फ़ आपको अच्छा खाना मिल रहा है बल्कि कमाई भी हो रही है तो क्या ये आंदोलन यूं ही चलता रहना चाहिए''? तो वो मुस्कुरा कर कहने लगी ''नहीं, ये आंदोलन जल्द ही ख़त्म हो जाना चाहिए। ये लोग अपना घर-परिवार बाल-बच्चों को छोड़कर यहां दो महीने से सर्दी में बैठे हैं इन्हें अब घर लौट जाना चाहिए''।

मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि कमला कृषि क़ानून की पेचिदगी को नहीं जानती और न ही उन्हें इसपर होती सियासत का कोई इल्म है। लेकिन उन्हें इस बात का एहसास है कि जिनकी बदौलत वो दिन रात रोटी खा रही हैं वो ख़ुश रहे और ख़ुशी से अपने घरों को लौट जाएं।

कमला की बातों को सुनकर मैं सोच रही थी कि सादा सी कमला की सोच से सरकार की सोच अलग क्यों है? आख़िर क्यों वो इन किसानों की मांगों और उनके हालात से मुंह मोड़े बैठी है? क्या वाकई कुछ ऐसा है जो किसान और आम नागरिक नहीं समझ पा रहे?

बात चाहे नोटबंदी की हो, सीएए, एनआरसी या फिर कृषि क़ानून की, क्यों हर बार सरकार के कहने और जनता के समझने में फ़र्क नज़र आता है? लॉकडाउन में आर्थिक रूप से बुरी तरह टूट गए रामसेवक से भी मेरी मुलाक़ात सिंघु बॉर्डर पर हुई। रामसेवक, सिंघु बॉर्डर पर बैग बेच रहे थे, उनके मुताबिक़ ये एक ज़रूरत का सामान है, बेहद कम मुनाफ़ा कमा रहे रामसेवक ने बताया कि वो यूपी से हैं और ख़ुद भी एक किसान हैं, लेकिन हालात के मारे हुए हैं और आंदोलन का हिस्सा बन गए हैं। वो सरकार से नाराज़ नहीं थे बल्कि मायूस थे उन्हें किसी भी सरकार (केंद्र और यूपी की) से कोई उम्मीद नहीं थी।

रामसेवक बताते हैं कि इस सरकार ने मदद करना तो दूर परेशान और कर दिया। उन्होंने नोटबंदी, यूपी में बिजली का बिल और गैस सब्सिडी पर बात की उन्होंने मुझे एक छोटी से बात समझाई। वो कहते हैं कि ''पहले गैस सिलेंडर चार सौ रुपये का आता था मैं जैसे-तैसे जुगाड़ कर ले लेता था लेकिन अब नौ सौ के गैस सिलेंडर के लिए मुझे ब्याज पर पैसा उठाना पड़ता है सब्सिडी तो जब खाते में आएगी तब आएगी लेकिन पहले तो मुझे उन पैसों का इंतज़ाम करना होता है जो सिलेंडर भरवाने पर दिए जाते हैं। वो मुझसे पूछते हैं आप ही बताइए मैडम मेरा 6 लोगों का परिवार है और कमाई का कोई ख़ास ज़रिया नहीं ऐसे मैं कैसे गैस सिलेंडर भरवा पाऊंगा? मेरे पास उनके इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। लेकिन मैं सोच रही थी कि रामसेवक के वाजिब सवालों का जवाब कौन देगा? आख़िर वो किस से उम्मीद करें?

सरकार से बेज़ार हो चुके रामसेवक अकेले नहीं हैं, लॉक़डाउन के बाद से पूरे देश में मौसम और त्योहार के हिसाब से पटरी, रेहड़ी लगाने वाले हर दूसरे दुकानदार की यही कहानी सरकार की तरफ़ से गढ़ी गई क़िस्मत बन गई है। ये बिज़नेस का वो सेक्टर है जो दाने-दाने को मोहताज हो गया और इन हालात पर हाल ही में आई Oxfam की रिपोर्ट मुंह चिढ़ाती दिखती है। बताया जा रहा है कि इस रिपोर्ट के मुताबिक़ मार्च 2020 से दिसंबर 2020 के बीच लॉकडाउन के दौरान दस महीने में भारत के शीर्ष अरबपतियों की संपत्ति में क़रीब 13 लाख करोड़ रुपये का इज़ाफ़ा हुआ है। ये पैसा इतना है कि अगर बेहद ग़रीब लोगों में बांटा दिया जाए तो हर ग़रीब के खाते में क़रीब 94 हज़ार रुपये आ जाएंगे। अफ़सोस,  15 लाख का सपना देखकर वोट देने वालों के नसीब में ना तो वो रकम आई थी और ना ही ये आने वाली है।  

लॉकडाउन के दौरान मैंने जो एक बात सीखी वो ये कि अब कोई कल नहीं है हमें आज में जीना सीखना होगा? कल क्या होगा पता नहीं, कुछ ऐसा ही सोचने वाले आशू मुझे सिंघु बॉर्डर पर मिले, वो सौ रुपये में शॉल बेच रहे थे, पहले वो लाल क़िला पर दुकान लगा कर अच्छी कमाई किया करते थे लेकिन लॉकडाउन में उनका बिज़नेस पूरा तरह से चौपट हो गया, लेकिन कुछ उम्मीद के साथ वो सिंघु बॉर्डर पर पहुंचे और यहां सौ रुपये के हिसाब से शॉल बेचने लगे, आशू ने बताया कि उन्होंने बहुत माल बहुत उठा लिया था लेकिन कोई कमाई नहीं हो पा रही थी फिर उन्होंने सिंघु बॉर्डर का रुख़ किया और यहां उनकी थोड़ी बहुत कमाई हो जाती है। वो आगे बताते हैं कि लाल क़िला पर वो इन शॉल को डेढ़ सौ रुपये के हिसाब से बेच रहे थे लेकिन यहां सौ रुपये में बेच रहे हैं। आशू कहते हैं कि मौसम जाने वाला है इसलिए नुक़सान उठाने से बेहतर है कि कम क़ीमत पर ही सामान बेच लिया जाए कम से कम घाटा तो नहीं उठाना पड़ेगा। आशू बहुत मायूस थे उन्होंने बताया कि लॉकडाउन की वजह से उनका सारा धंधा चौपट हो चुका है। अब वो ये नहीं सोचते कि कल कितना मुनाफ़ा होगा बस आज नुक़सान से बचने की जुगत में लगे हैं।  

लॉकडाउन की मार झेल रहे एक और शख़्स से मुलाक़ात हुई, ये राकेश अरोड़ा थे, जिन्होंने सिंघु बॉर्डर पर क़रीब चार-पांच जगह अपनी छोटी-छोटी दुकानें लगा रखी हैं वो किसान आंदोलन से जुड़े पोस्टर, बैनर, बैच, झंडे बेच रहे थे। राकेश अरोड़ा की ऐसी ही एक दुकान पर मैंने 11 साल के आसिफ़ को बैठे देखा, राकेश अरोड़ा ने बताया कि आसिफ़ पहले सिंघु बॉर्डर पर घूमता रहता था मैंने उसके घरवालों से पूछकर उसे अपनी दुकान पर बैठा दिया अब वो यहीं खाता-पीता है और मेरे साथ दुकान भी देख लेता है और शाम को मैं इसे दो सौ रुपये भी दे देता हूं।

मैंने आसिफ़ से पूछा कि क्या वो इस दुकान पर बैठकर ख़ुश है तो उसने खिलखिलाकर कहा ''हां''। आसिफ़ को अपने दिन के दो सौ रुपये  से मतलब था इसलिए वो ख़ुश था लेकिन राकेश अरोड़ा कितना ख़ुश थे मैं जानना चाहती थी। राकेश अरोड़ा ने बताया कि लॉकडाउन से पहले पहाड़गंज में उनकी दुकान थी वो जगह-जगह कोल्ड ड्रिंक और चिप्स सप्लाई का काम करते थे लेकिन लॉकडाउन में उन्हें क़रीब 12 लाख का नुक़सान हो गया था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि फिर से ज़िन्दगी की गाड़ी को एक बार फिर पटरी पर कैसे लाएं लेकिन इसी बीच किसानों का आंदोलन शुरू हो गया और उन्होंने एक छोटे स्केल पर यहां अपना काम शुरू कर दिया वो बताते हैं कि उनकी यहां अच्छी कमाई हो जाती है।

लॉकडाउन में छोटे-छोटे बिजनेस और दिहाड़ी पर काम करने वालों की ज़िन्दगी सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई थी बात दिल्ली में कमाने आए लोगों की करें तो जहां ये लोग लॉकडॉउन में वापस अपने गांव लौट गए थे वहीं एक बार फिर ये लोग वापस दिल्ली लौट आए हैं लेकिन अब दिल्ली में ना तो वो पहले वाली कमाई है और ना ही जल्द काम मिलने की उम्मीद, ऐसे में छोटा-मोटा धंधा करने वाले लोग सिंघु बॉर्डर पर थोड़ा बहुत कमाते दिखाई दिए। किसानों के इसे रेले में मुझे पीर मोहम्मद जवाहर जैकेट बेचते दिखे, तो सिलाई का काम बंद हो जाने पर कपडों की सेल लगाकर बैठे सुखराम मिले, तो हरभजन कौर भी दिखीं जो सर्दी में आठ सौ की जैकेट को पांच सौ में बेचकर एक तरह से आंदोलन का हिस्सा बनने का दावा करती हैं। बासित भी गले में ढोल लटकाए दिखे। ये लोग देश के उस तबके से आते हैं जिनके लिए मौजूदा वक़्त में कमाई की तरकीब तलाश करना रॉकेट साइंस बन गया है। नो प्रॉफ़िट नो लॉस के हिसाब से काम कर रहे ये लोग किसान आंदोलन का वो हिस्सा हैं जिनके बारे में सरकार को ज़रूर पता करना चाहिए क्योंकि इन लोगों ने किसानों को नहीं बल्कि सरकार को वोट दिया था। तो इसलिए उनकी रोज़ी-रोटी की ज़िम्मेदारी भी शायद उसी की है।

सभी फोटो नाज़मा ख़ान

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

farmers protest
Ground report farmers protest
Singhu Border
Tikri Border
Ghazipur Border
Lockdown

Related Stories

छोटे-मझोले किसानों पर लू की मार, प्रति क्विंटल गेंहू के लिए यूनियनों ने मांगा 500 रुपये बोनस

लखीमपुर खीरी हत्याकांड: आशीष मिश्रा के साथियों की ज़मानत ख़ारिज, मंत्री टेनी के आचरण पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी

युद्ध, खाद्यान्न और औपनिवेशीकरण

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

किसान आंदोलन: मुस्तैदी से करनी होगी अपनी 'जीत' की रक्षा

लॉकडाउन-2020: यही तो दिन थे, जब राजा ने अचानक कह दिया था— स्टैचू!

जब तक भारत समावेशी रास्ता नहीं अपनाएगा तब तक आर्थिक रिकवरी एक मिथक बनी रहेगी

25 मार्च, 2020 - लॉकडाउन फ़ाइल्स

किसान आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी एक आशा की किरण है


बाकी खबरें

  • yogi
    एम.ओबैद
    सीएम योगी अपने कार्यकाल में हुई हिंसा की घटनाओं को भूल गए!
    05 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज गोरखपुर में एक बार फिर कहा कि पिछली सरकारों ने राज्य में दंगा और पलायन कराया है। लेकिन वे अपने कार्यकाल में हुए हिंसा को भूल जाते हैं।
  • Goa election
    न्यूज़क्लिक टीम
    गोवा चुनाव: राज्य में क्या है खनन का मुद्दा और ये क्यों महत्वपूर्ण है?
    05 Feb 2022
    गोवा में खनन एक प्रमुख मुद्दा है। सभी पार्टियां कह रही हैं कि अगर वो सत्ता में आती हैं तो माइनिंग शुरु कराएंगे। लेकिन कैसे कराएंगे, इसका ब्लू प्रिंट किसी के पास नहीं है। क्योंकि, खनन सुप्रीम कोर्ट के…
  • ajay mishra teni
    भाषा
    लखीमपुर घटना में मारे गए किसान के बेटे ने टेनी के ख़िलाफ़ लोकसभा चुनाव लड़ने का इरादा जताया
    05 Feb 2022
    जगदीप सिंह ने दावा किया कि समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने उन्हें लखीमपुर खीरी की धौरहरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे 2024 के लोकसभा…
  • up elections
    भाषा
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पहला चरण: 15 निरक्षर, 125 उम्मीदवार आठवीं तक पढ़े
    05 Feb 2022
    239 उम्मीदवारों (39 प्रतिशत) ने अपनी शैक्षणिक योग्यता कक्षा पांच और 12वीं के बीच घोषित की है, जबकि 304 उम्मीदवारों (49 प्रतिशत) ने स्नातक या उससे ऊपर की शैक्षणिक योग्यता घोषित की है।
  • election
    न्यूज़क्लिक टीम
    "चुनाव से पहले की अंदरूनी लड़ाई से कांग्रेस को नुकसान" - राजनीतिक विशेषज्ञ जगरूप सिंह
    05 Feb 2022
    पंजाब में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद के दावेदार की घोषणा करना राहुल गाँधी का गलत राजनीतिक निर्णय था। न्यूज़क्लिक के साथ एक खास बातचीत में राजनीतिक विशेषज्ञ जगरूप सिंह ने कहा कि अब तक जो मुकाबला…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License