NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
किसान बनाम भाजपा आईटी सेल, 9 महीने में किसान आंदोलन ने हिलाईं जड़ें
किसान आंदोलन ने काफी हद तक भाजपा के उन्मादी और झूठे प्रचार की मारकता कम की है। उसने न सिर्फ इसके खंडन का काम किया  है बल्कि अपने सन्देश और तर्कों को ले जाने वाले नए जरिये भी तैयार किये हैं।
बादल सरोज
26 Aug 2021
किसान बनाम भाजपा आईटी सेल, 9 महीने में किसान आंदोलन ने हिलाईं जड़ें
Image Courtesy : National Herald

26 अगस्त को नौ महीने पूरे करने वाले किसान आंदोलन ने भाजपा के ब्रह्मास्त्र आईटी सैल और पाले-पोसे कॉर्पोरेट मीडिया के जरिये किये जाने वाले दुष्प्रचार और उसके जरिये उगाही जाने वाले नफरती भक्तों की खरपतवार की जड़ों में भी, काफी हद तक, मट्ठा डाला है।

भारतीय जनता पार्टी और उसके रिमोट के कंट्रोलधारी आरएसएस और कॉर्पोरेट के गठबंधन वाले मौजूदा निजाम की दो जानी पहचानी धूर्तताये हैं। एक तो यह कि इसने बड़ी तादाद में भारत में रहने वाले खासकर सवर्ण मध्यमवर्गी मनुष्यों को उनके प्रेम, स्नेह, संवेदना और जिज्ञासा तथा प्रश्नाकुलता के  स्वाभाविक मानवीय गुणो से वंचित कर दिया है। और उन्हें नफरती चिंटू में तब्दील करके रख दिया है। देश के किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन को लेकर संघी आईटी सैल के जरिये अपने ही देश के किसानो के खिलाफ इनका जहरीला कुत्सा अभियान इसी की  मिसाल है। इस झूठे प्रचार को ताबड़तोड़ शेयर और फॉरवर्ड करने वाले Whatsapp यूनिवर्सिटी से दीक्षित जो शृगाल-वृन्द है इसे देश के पूंजीपति या अमरीकी कम्पनियां धेला भर भी नहीं देती। इनमें से ज्यादातर को तीनों कृषि क़ानून तो दूर क से किसान और ख से खेती भी नहीं पता। इनमें से दो तिहाई से ज्यादा ऐसे हैं जिनकी नौकरियाँ खाई जा चुकी हैं, आमदनी घट चुकी है और घर में रोजगार के इन्तजार में मोबाइल पर सन्नद्ध आईटी सैल के मेसेजेस को फॉरवर्ड और कट-पेस्ट करते जवान बेटे और बेटियां हैं  फिर भी ये किसानों के खिलाफ अल्लम-गल्लम बोले जा रहे हैं। क्यों?

इसके पीछे कोर्पोरेट की काबिलियत और आरएसएस की मेहनत है। इन दोनों ने मिलकर इन्हे और समाज के एक हिस्से को पर्याप्त खूँखार और आत्मघाती बना दिया है।  इन दिनों जब कथित मौद्रीकरण के नाम पर देश के पिज़्ज़ा पीसेज बनाकर सेल लगाई जा रही है  तब भी ये उसकी हिमायत करते पाए जा रहे हैं- रेल, बैंक, डिफेंस बेचने वाले पर मुदित और चूड़ी बेचने वाले पर क्रोधित हो रहे हैं। (इनमे से कुछ इन दिनों एक और विभाजन की बात करने भी लगे हैं), इनकी नफरत मुसलमानों भर के खिलाफ नहीं है। स्कूल कालेज के बच्चों के खिलाफ भी है, पढ़े लिखे लोगों के खिलाफ है, मजदूर के खिलाफ है, किसान के खिलाफ है, दलित के खिलाफ है, आदिवासी के खिलाफ है, ओबीसी हैं तो दूसरों के खिलाफ है, सवर्ण है तो दूसरे सवर्णो के भी खिलाफ है, महिला के खिलाफ तो पूरी तरह बजबजा ही रही है।

इन तर्क, तथ्य और असहमति भीरुओं की बुद्धिहीनता से आसक्ति इस कदर है कि ये इस देश के बड़े पूंजीपति घरानों या मोदी, शाह जैसे उनके नेताओं के लिए ही नहीं भिड़ते ट्रम्प और नेतन्याहू के लिए भी लड़ मरते हैं। इन्हे चौतरफा विफलतायें नजर नहीं आतीं। इन्हे अपने आराध्यों की कथनी और करनी में आकाश पाताल का अंतर समझ नहीं आता।  इन्हें यह भी समझ नहीं आता कि ठीक जो बात दिल्ली से बोली जाती है उसकी एकदम उल्टी बात इन्हीं के नेता भोपाल और हरियाणा से बोल रहे हैं रहे हैं, यह सिर्फ हास्यास्पद ही नहीं शरारत पूर्ण भी है। ऐसा करना जनता और देश ही नहीं खुद अपने भक्तों के साथ भी छल, छद्म और पाखण्ड है। मगर भक्तों की प्रजाति में शामिल होने की मुख्य शर्त ही विवेक और तार्किकता को ताले में बंद करके रख देना।

इस गिरोह की दूसरी खूबी है दो जुबानों से एक साथ बोलना। उधर मोदी-शाह देश भर के किसानों की मांगों को ठुकराते हुए कोर्पोरेट खरीदी की हिमायत में लगे हैं। कह रहे हैं कि इससे किसानों को अपनी फसल देश भर में कही भी बेचने का हक़ मिल जाएगा। अमृतसर का किसान अपने चावल अलेप्पी में और गोरखपुर का किसान अपना गेंहू चेन्नई में बेच सकेगा, इधर उन्हीं की पार्टी के हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर बोल रहे हैं कि राजस्थान का किसान अपना बाजरा हरियाणा बेचने आएगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।  मध्यप्रदेश वाले शिवराज सिंह तो उनसे भी दो कदम आगे निकल गए और बोले कि किसी और प्रदेश का किसान अपनी फसल मध्यप्रदेश बेचने आया तो उसकी गाड़ी जब्त करके जेल भेज दी जाएगी। यह दोमुंहापन अनायास नहीं है। इसे योजना बनाकर, सोच विचार कर किया जाता है। लोगों को गुमराह करने और उनके हर तबके को किसी न किसी बात से बहकाने की कला में भाजपा और संघ निर्लज्ज भी हैं पारंगत भी हैं। कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया के वर्चस्व के चलते इन बयानों की विवेचना और आलोचना पूरी तरह बंद होने से इनका छल, छद्म और पाखण्ड बिना किसी जाँच परख के चलता रहता है। मगर हमेशा ऐसा नहीं हो सकता।  

किसान आंदोलन ने काफी हद तक इस उन्मादी और झूठे प्रचार की मारकता कम की है। उसने न सिर्फ इसके खंडन का काम किया  है बल्कि अपने सन्देश और तर्कों को ले जाने वाले नए जरिये भी तैयार किये हैं। लोगों के बीच असलियत ले जाने, उन्हें उसके आधार पर संगठित और आंदोलित करने और झूठ के कुहासे को नारों की गूँज से उड़ा देने का वैकल्पिक तंत्र विकसित किया है। अपने नूतन तरीके निकाले हैं। हर वर्ग संघर्ष में शोषित लड़ाके अपने माध्यम ढूंढ़ ही लेते हैं।  प्राचीनकाल में स्पार्टकस की अगुआई में हुए रोमन साम्राज्य के खिलाफ दासों के विद्रोह के समूचे इलाके में फ़ैल जाने के पीछे उनके सन्देश भेजने की मौलिकता थी। भारत में भी इसके अनेक उदाहरण हैं। जैसे 1857 के  स्वतन्त्रता संग्राम की खबर और उसमे हिस्सा लेने का आह्वान आनन-फ़ानन में पूरे देश में पहुँच जाना। इसके लिए आजादी के लड़ाकों ने कितना मौलिक और ठेठ देहाती तरीका अपनाया था। हर बगावती गाँव पांच रोटी बनाता था और उन पर नमक और गोश्त की डली रखकर अगले पांच गाँवों के लिए भेज देता था। उनमें से सहमत होने वाले गाँव फिर पांच रोटी बनाकर इसी प्रक्रिया को जारी रखते थे। अंग्रेजो की खुफिया फ़ौज और उसके चाटुकार सामंत समझ ही नहीं सके और रोटियों ने उनके तख़्त उछाल दिए। गरज यह कि जनता हुक्मरानों की मीडिया की मोहताज नहीं रहती, वह खुद अपने तरीके चुनती है। 

इसलिए आत्ममुग्ध और आत्मरत कार्पेरेटी-हिन्दुत्व के पिछलग्गू कितने ही अपने स्वर्ग में बने रहें,  इनके किये कुछ नहीं बनने वाला। इनके विरोध के बावजूद देश ने आजादी हासिल कर ही ली थी। इनके माफियां मांगने के बावजूद जनता ने इमरजेंसी से मुक्ति पा ही ली थी। इनके विरोध के बावजूद बदलाव की ताकतें अपना रास्ता ढूंढ लेती हैं। किसान आंदोलन ने इस रास्ते की तलाश की है।  

किसान आंदोलन की यह खासियत इस बात की आश्वस्ति देती है कि इतिहास रचा जा रहा है, इतिहास रचा जाएगा और जो अहंकारी उसके खिलाफ साजिश रचेगा उसे इतिहास के कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाएगा।

लेखक लोकजतन के संपादक हैं और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। उपरोक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं।

farmers protest
Farm bills 2020
Agriculture Laws
9 Months of Farmers protest
Modi government
Samyukt Kisan Morcha
BJP
BJP IT cell

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

मूसेवाला की हत्या को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन, कांग्रेस ने इसे ‘राजनीतिक हत्या’ बताया

बिहार : नीतीश सरकार के ‘बुलडोज़र राज’ के खिलाफ गरीबों ने खोला मोर्चा!   

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

दिल्ली : पांच महीने से वेतन व पेंशन न मिलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों ने किया प्रदर्शन

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ़ श्रमिकों का संघर्ष जारी, 15 महीने से कर रहे प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

जहाँगीरपुरी हिंसा : "हिंदुस्तान के भाईचारे पर बुलडोज़र" के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन

दिल्ली: सांप्रदायिक और बुलडोजर राजनीति के ख़िलाफ़ वाम दलों का प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • Ashok Gehlot and Sachin Pilot
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    राजस्थान: क्या एक हो गए हैं अशोक गहलोत और सचिन पायलट?
    22 Nov 2021
    नए मंत्रिमंडल फेरबदल को लेकर अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों ही संतुष्ट नज़र आ रहे हैं और इसी से उम्मीद की जा रही है कि दोनों के बीच जारी अंदरूनी कलह फिलहाल शांत हो गई है।
  • Rajasthan: Rape accused along with friends attacked Dalit girl with knife
    एम.ओबैद
    राजस्थान: रेप के आरोपी ने दोस्तों के साथ मिलकर दलित लड़की पर चाकू से किया हमला
    22 Nov 2021
    अलवर में शुक्रवार की रात रेप करने वाले शख्स और उसके साथियों द्वारा कथित रूप से 20 वर्षीय दलित लड़की पर हमला किया गया। जिसमें उसकी आंख में गंभीर चोटें आईं। पीड़िता को जयपुर रेफर कर दिया गया है जहां…
  • Tribal Pride Week
    रूबी सरकार
    जनजातीय गौरव सप्ताह में करोड़ों खर्च, लेकिन आदिवासियों को क्या मिला!
    22 Nov 2021
    प्रदेश के आदिवासियों के लिए सवाल बरकरार है कि 52 करोड़, कुछ जानकारों के अनुसार 100 करोड़ सरकारी खर्च से इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर जो सम्मेलन किया गया, क्या वह भाजपा के एजेंडे का हिस्सा भर था? क्योंकि…
  • farmers
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    क़ानूनों की वापसी से मृत लोग वापस नहीं आएंगे- लखीमपुर हिंसा के पीड़ित परिवार
    22 Nov 2021
    बीजेपी को क़ानूनों की वापसी से राजनीतिक फ़ायदे का अनुमान है, जबकि मूल बात यह है कि राज्य मंत्री अजय मिश्रा अब भी खुलेआम घूम रहे हैं, जो आने वाले दिनों में सरकार और किसानों के बीच टकराव की वजह बन सकता…
  • South region leader
    पार्थ एस घोष
    अपने क्षेत्र में असफल हुए हैं दक्षिण एशियाई नेता
    22 Nov 2021
    क्षेत्रीय नेताओं के लिए शुरूआती बिंदु होना चाहिए कि, वे इस मूल वास्तविकता को आंतरिक करें कि दक्षिण एशिया दुनिया के सबसे असमान और संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में से एक है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License